भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-महाराज! अब मैं भगवान् वाराहके द्वारा कहे गये तिलधेनु- दानकी विधि बता रहा हूँ। जिससे दाता ब्रह्महत्यादि महापातकों तथा सभी उपपातकोंसे मुक्त हो जाता है और स्वर्गमें निवास करता है।
पहले पृथ्वीको गोबरसे लीपकर उसपर काला मृगचर्म तथा उसके चारों ओर कुश बिछा ले। तदनन्तर उसपर गायकी आकृतिके रूपमें तिलकी राशि फैला ले अर्थात् तिलमयी धेनु बना ले। सफेद, कृष्ण, भूरे तथा गोमूत्रवर्णके तिलोंसे धेनुकी रचना करनी चाहिये। चार आढकके मानकी गाय और एक द्रोण तिलसे बछड़ेका निर्माण करे। गायके खुरके पास चाँदी, सींगके पास स्वर्ण, जिहाके पास शक्कर, मुखके पास गुड़, गलकम्बलके पास कम्बल, पैरके स्थानमें ईख, पीठके स्थानपर ताँब और नेत्रों के लिये मुक्ता रखनी चाहिये । इसी प्रकार कानके स्थानपर पीपलके पत्ते, दाँतोंके स्थान पर फल, पूँछके स्थानपर माला और स्तनोंके स्थानपर मक्खन रखे। सिरके स्थानपर सफेद वस्त्र, रोमोंके स्थानपर सफेद सरसों रख दे। सुन्दर फलों तथा मणि मुक्ताओंसे उस तिलमयो कल्पित धेनुको सुसज्जित करे। कांस्यकी दोहनी भो समीपमें रख दे। किसी पुण्य पर्वके दिन उस धेनुका पूजन इत्यादि कर ब्राह्मणको दान कर दे और इस मन्त्रको पढ़ते हुए प्रार्थनापूर्वक प्रदक्षिणा करे-
या लक्ष्मीः सर्वभूताना या वै देवेष्ववस्थिता।
धेनुरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु ।।
(उत्तरपर्व १५२।१५)
दक्षिणासहित गाय ब्राहाणको दे दे। इस विधिसे जो तिलधेनुका दान करता है, वह व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त होकर परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति इस दानका अनुमोदन कर प्रसन्नचित्र होकर प्रशंसा करते हैं तथा विधिपूर्वक जो ब्राह्मण दान ग्रहण करते हैं, वे भी ब्रह्मलोकको प्राप्त करते हैं। प्रशान्त, सुशील, वेदव्रतपरायण ब्राह्मणके लिये तिलधेनुका दान करनेवाले व्यक्तिको अपने कृत-अकृतका शोक नहीं करना पड़ता । तिलथेनु-दान करनेवाले व्यक्तिको तीन दिन अथवा एक दिन तिलका ही भोजन करना चाहिये। दान करनेसे मनुष्यके पाप नष्ट हो जाते हैं और उसके अंदर पवित्रता आ जाती है। तिलका पक्षण करना चान्द्रायणव्रतसे अधिक श्रेष्ठ माना गया है। बाल्द, युवा अथवा वृद्धावस्थामें मन, बचन तथा कर्मसे जो पाप हुआ हो अथवा अभक्ष्य प्रक्षण, अगम्यागमन, अपेयपान इत्यादि जो पातक, महापातक और उपपातक किये गये हों, वे सच तिलधेनुके दानसे दूर हो जाते हैं। पवित्र गङ्गा आदि नदियों में थूकने तथा ना खान करनेसे जो पाप होता है, वह भी नाट हो जाता है। तिलधेनुका दान करनेवाला व्यक्ति 'यमलोकके मार्गको भयंकर यातनाओंका अतिक्रमण कर सुवर्णके विमान में बैठकर उत्तम लोकमें चला "जाता है। राजन् । नैमिषारण्यमें कथा-प्रसंगके समय मुनियोंने यह विधि सूनायी और नारदजीने मुझे इस विधिका उपदेश किया, वही तिलधेनु-दानको विधि मैंने आपसे कहो है। तिलधेनुका दान करना पवित्र, पुण्य और माङ्गल्यप्रद तथा कीर्तिवर्धक है। श्राद्धके समय ब्राह्मणोंको इस माहात्म्यका श्रवण करानेसे अनन्त पुण्य प्राप्त होता है। गौ, घर, शय्या और कन्या एक व्यक्तिको ही देनी चाहिये, क्योंकि विभाजनसे दोनोंको अधोगतिकी प्राप्ति होती है और विलय करनेसे सात कुल दुर्गतिको प्राप्त - करते हैं। इस दानके प्रभावी दान करनेवाला
उत्तम विमानमें बैठकर साक्षात् विष्णुभगवान् के समीप पहुँच जाता है। माष अथवा कार्तिककी पूर्णिमा, चन्द्र-सूर्य-ग्रहण, अयन-संक्रान्ति, विषुव- योग, व्यतीपात-योग, वैशाख अथवा मार्गशीर्षकी पूर्णिमा और गजच्छाया-योगमें तिलधेनुका दान प्रशस्त माना गया है। (अध्याय १५२)