कार्तिकेयजीने कहा- ब्रह्मन्! आप राजाओंके शरीरके अङ्गोंके लक्षणोंको बतानेकी कृपा करें।
ब्रह्माजी बोले- मैं मनुष्योंमें राजाओंके अमौके लक्षणोंको संक्षेपमें बताता हूँ। यदि ये लक्षण साधारण पुरुषों में भी प्रकट हों तो वे भी राजाके समान होते हैं, इन्हें आप सुनें-
जिस पुरुषके नाभि, स्वर और संधिस्थान- ये तीन गम्भीर हों, गुख, ललाट और वक्षःस्थल- ये तीन विस्तीर्ण हों, वक्षःस्थल, कक्ष, नासिका, नरख, मुख और कृकाटिका-ये छ: उन्नत अर्थात् ऊंचे हों, उपस्थ, पौड, ग्रीवा और जंघा-ये चार हस्त्र हों, नेत्रों के प्रान्त, हाथ, पैर, तालु, ओठ, जिह्वा तथा नख-ये सात रक्तवर्णके हों, नेत्र, भुजा, नासिका तथा दोनों स्तनोंका अन्तर-ये पाँच दीर्घ हों और दन्त, केश, अङ्गुलियोंके पर्व, त्वचा तथा नख-ये पाँच सूक्ष्म हों, वह ससदीपवती पृथ्वीका राजा होता है। जिसके नेत्र कमलदलके समान और अन्तमें रक्तवर्णक होते हैं, वह लक्ष्मीका स्वामी होता है। शहदके समान् पिङ्गल नेहवाला पुरुष महात्मा होता है। सूखी आँखवाला डरपोक, गोल और चक्रके समान घूमनेवाली आँखवाला चोर, केकड़े के समान आँखवाला क्रूर होता है। नील कमलके समान नेत्र होनेपर विद्वान् श्यामवर्णके नेत्र होनेगर सौभाग्यशाली, विशाल नेत्र होनेपर भाग्यवान, स्थूल नेत्र होनेपर राजमन्त्री और दीन नेत्र होनेपर दरिद्र होता है। भौहें विशाल होनेपर सुखी, ऊँची होनेपर अल्पायु और विषम यश बहुत लम्बी होनेपर दरिद्र और दोनों भौहाँक मिले हुए होनेपर धनहीन होता है। मध्यभागमे नीचेकी ओर झुकी भौंहवाले परदाराभिगामी होते हैं। बालचन्द्रकलाके समान भौंहें होनेपर राजा होता है। ऊँचा और निर्मल ललाट होनेपर उत्तम पुरुष होता है, नीचा ललाट होनेपर स्तुति किया जानेवाला और धनसे युक्त होता है, कहीं ऊँचा और कहीं नीचा ललाट होनेपर दरिद्र तथा सीपके समान ललाट होनेपर आचार्य होता है। स्निग्ध, हास्ययुक्त्य और दीनतासे रहित मुख शुभ होता है, दैन्यभावयुक्त तथा आँसुओंसे युक्त आँखोंवाला एवं रूखे चेहरेवाल श्रेष्ठ नहीं है। उत्तम पुरुषका हास्य कम्पनरहित धीरे-धीरे होता है। अधम व्यक्ति बहुत शब्दवे साथ हँसता है। हंसते समय आँखको मूंदनेवाला व्यक्ति पापी होता है। गोल सिरवाला पुरुष अनेक गौओंका स्वामी तथा चिपटा सिरवाला माता-पिताको मारनेवाला होता है। घण्टेकी आकृतिके समान सिरवाला सदा कहीं-न-कहीं यात्रा करता रहता है। निम्र सिरवाला अनेक अनर्थोको करनेवाल होता है।
इस प्रकार पुरुषों के शुभ और अशुभ लक्षणोंको मैंने आपसे कहा। अब स्त्रियोंके लक्षण बतलात हूँ। (अध्याय २७)
Summary of chapter 133 of the Bhavishya Purāṇa is as follows:
Guided by Sūrya's own instruction, Sāmba established the sacred Sūrya temple at Sāmbapura (Mitravanā) — the site later renowned as the great Sūrya tīrtha of Bhārata. The installation of the Viśvakarman-carved image, the consecration ceremony, the selection of the Māgī priests from Śākadvīpa as the hereditary temple servants, and the full pūjā vidhi to be followed at the temple are narrated. This chapter is the Purāṇic origin of the famous Sūrya temple tradition.