[भारतमें पहले सभी ग्राम-नगरोंकी सभी दिशाओंमें कुछ दूरतक गोचर भूमि रहती थी। उसमें गायें स्वच्छन्द-रूपसे चरती थी और वह भूमि सर्वसामान्यके भी घूमने-फिरनेके उपयोगमें आती थी। छोटे-छोटे बालक भौ उसमें क्रौड़ा करते थे। यह प्रथा अभी कुछ दिनों पहलेतक थी, पर अब वह सर्वथा लुप्त हो गयी है, इससे गो-धनकी बड़ी हानि हुई है। जिसका फल प्रकृति अनावृष्टि, भीषष्ण महर्षता (महंगी), दुष्कालकी स्थिति, भूकम्प, महायुद्ध और सर्वत्र निर्दोष लोगोंकी हत्याके रूपमें परोक्ष तथा प्रत्यक्ष रूपसे दे रही है। इसकी निवृत्तिका एकमात्र समाधान है प्राचीन पुराणोक्त सदाचार, गो-सेवा और आस्तिकतापूर्ण आध्यात्मिक दृष्टिका पुनः अनुसंधान और अनुसरण करना। भला, आजको दशावे, जहाँ किसीको भी किसी भी स्थिति में तनिक भी शान्ति नहीं है, इससे अधिक और चिन्ताको वात क्या हो सकती हैं। इस दृष्टिस यह अध्याय विशेष महत्वका है और सभी पाठकोंको अत्यन्त प्रयतपूर्वक अपने-अपने ग्राम नगरोंके चतुर्दिक गोचरका या गो-प्रचार-भूमिका उत्सर्ग कर गो-संरक्षण में हाथ बंटाना चाहिये ।- सम्पादक]
सूतजी कहते हैं-ब्राह्मणो! अब मैं गोचर- भूमिके विषयमें बता रहा हूँ, आप सुनें। गोचर- भूमिके उत्सर्ग-कर्ममें सर्वप्रथम लक्ष्मीके साथ भगवान् विष्णुको विधिके अनुसार पूजा करनी चाहिये। इसी तरह ब्रह्मा, रुद्र, करालिका, वराह, सोम, सूर्य और महादेवजीका क्रमशः विविध उपचारोंसे पूजन करे। हवन-कर्ममें लक्ष्मीनारायणको तीन-तीन आहुतियाँ घीसे दे। क्षेत्रपालोंको मधुमिश्रित एक-एक लाजाहुति दे। गोचर भूमिका उत्सर्ग करके विधानके अनुसार यूपकी स्थापना करे तथा उसको अर्चना करे। वह यूप तीन हाथका ऊँचा और नागफणों से युक्त होना चाहिये। उसे एक हाधसे भूमिके मध्य में गाड़ना चाहिये। अनन्तर 'विश्वेषाः' ( १६।२।६) इस मन्त्रका उच्चारण करे और 'नागाधिपतये नमः', 'अच्युताय नमः' तथा 'भौमाय नमः' कहकर यूपके लिये लाजा निवेदित करे। 'मयि गृहाम्य' (यजुः १३ । १) इस मन्त्रसे रुद्रमूर्तिस्वरूप उस यूपकी पञ्चोपचार पूजा करे। आचार्यको अन्न, वस्त्र और दक्षिणा दे तथा होता एवं अन्य चिजोको भी अभीष्ट दक्षिणा दे। इसके बाद उस गोचरभूमिमें रन छोड़कर इस मन्त्रको पढ़ते हुए गोचरभूमिका उत्सर्ग कर दे-
शिवलोकस्तथा गावः सर्वदेवसुपूजिताः॥
गोभ्य एषा मया भूमिः सम्प्रदत्ता शुभार्थिना।
(मध्यमपर्व ३।२।१२-१३)
"शिवलोकस्वरूप यह गोचरभूमि, गोलोक तथा गौएँ सभी देवताओंद्वारा पूजित हैं, इसलिये कल्याणकी कामनासे मैंने यह भूमि गौओंके लिये प्रदान कर दी है।'
इस प्रकार जो समाहित-चित्त होकर गौओंके लिये गोचरभूमि समर्पित करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोको पूजित होता है। गोचरभूमिमें जितनी संख्या में तृण, गुल्म उगते हैं, उतने हजारों वर्षतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। गोचर भूमिकी सीमा भी निश्चित करनी चाहिये। उस भूमिको रक्षाके लिये पूर्व में वृक्षोंका रोपण करे । दक्षिण में सेतु (मेड़) बनाये । पश्चिम में कैंटीले वृक्ष लगाये और उत्तर में कुपका निर्माण करे। ऐसा करनेसे कोई भी गोचर भूमिकी सोमाका लङ्घन नहीं कर सकेगा। उस भूमिको जलधारा और घाससे परिपूर्ण करे। नगर या ग्रामके दक्षिण दिशामें गोचर भूमि छोड़नी चाहिये। जो व्यक्ति किसी अन्य प्रयोजनसे गोचरभूमिको जोतता, खोदत्ता या नाट करता है, वह अपने बुलोको पातको बनाता है और अनेक ब्रह्म-हत्याजास आक्रान्त हो जाता है।
जो भलीभाँति दक्षिणाके साथ गोचर्म-भूमिका* दान करता है, वह उस भूमिमें जितने तृण हैं, उतने समयतक स्वर्ग और विष्णुलोकसे च्युत नहीं होता। गोचरभूमि छोड़नेके बाद ब्राह्मणोंको संतुष्ट करे। वृषोत्सर्गमें जो भूमि-दान करता है, वह प्रेतयोनिको प्राप्त नहीं होता। गोचर-भूमिके उत्सर्गके समय जो मण्डप बनाया जाता है, उसमें भगवान् वासुदेव और सूर्यका पूजन तथा तिल, गुड़की आठ-आठ आहुतियोंसे हवन करना चाहिये। देहि मे'(यजु ३।५०) इस मन्त्रसे मण्डपके ऊपर चार शुक्ल घट स्थापित करे । अनन्तर सौर-सूक्त और वैष्णव-सूक्तका पाठ करे। आठ वटपत्रोंपर आठ दिक्पाल देवताओंके चित्र या प्रतिमा बनाकर उन्हें पूर्वादि आठ दिशाओंमें स्थापित करे और पूर्वादि दिशाओंके अधिपतियों-इन्द्र, अग्नि, यम, निति आदिसे गोचरभूमिकी रक्षाके लिये प्रार्थना करे। प्रार्थनाके बाद चारों वर्णो की, मृग एवं पक्षियोंकी अवस्थितिके लिये विशेषरूपसे भगवान् वासुदेवकी प्रसन्नताके लिये गोचरभूमिका उत्सर्जन करना चाहिये। गोचरभूमिके न-भ्रष्ट हो जानेपर, घासके जीर्ण हो जानेपर तथा पुनः घास उगाने के लिये पूर्ववत् प्रतिष्ठा करनी चाहिये, जिससे गोचरभूमि अक्षय बनी रहे। प्रतिष्ठाकार्यके निमित्त भूमिके खोदने आदिमें कोई जोच जन्तु मर जाय तो उससे मुझे पाप न लगे, प्रत्युत धर्म ही हो और इस गोचरभूमिमें निवास करनेवाले मनुष्यों, पशु-पक्षियों, जीव- जन्तुओंका आपके अनुग्रहसे निरन्तर कल्याण हो ऐसी भागवानी प्रार्थना करनी चाहिये। अनन्तर गोचरभूमिको त्रिगुणित पवित्र धागेद्वारा सात बार आवेष्टित कर दे। आवेष्टनके समय 'सुत्रामाणंपृथिवीं' (१०। ६३ । १०) इस ऋचाका पाठ करे। अनन्तर आचार्यको दक्षिणा दे। मण्डपमें ब्राह्मणोंको भोजन कराये। दीन, अन्ध एवं कृपणोंको संतुष्ट करे। इसके बाद मङ्गल-ध्वनिके साथ अपने घरमें प्रवेश करे। इसी प्रकार तालाब, कुआँ, कूप आदिकी भी प्रतिष्ठा करनी चाहिये, विशेषरूपसे उसमें वरुणदेवकी और नागोंकी पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मणो! अब मैं छोटे एवं साधारण उद्यानोंकी प्रतिष्ठाके विषयमें बता रहा हूँ। इसमें मण्डल नहीं बनाना चाहिये। बल्कि शुभ स्थान में दो हाथके स्थण्डिलपर कलश स्थापित करना चाहिये। उसपर भगवान् विष्णु और सोमकी अर्चना करनी चाहिये। केवल आचार्यका वरण करे। सूत्रसे वृक्षोंको आवेष्टित कर पुष्प मालाओंसे अलंकृत करे । अनन्तर जलधारासे वृक्षोंको सींचे। पाँच ब्राह्मणों को भोजन कराये । वृक्षोंका कर्णवेध संस्कार करे और संकल्पपूर्वक उनका उत्सर्जन कर दे। मध्य देशमें यूप स्थापित करे और दिशा-विदिशाओं तथा मध्य देशमें कदली वृक्षका रोपण करे एवं विधानपूर्वक घीसे होम करे। फिर स्विष्टकृत् हवन कर पूर्णाहुति दे। वृक्षके मूलमें धर्म, पृथ्वी, दिशा, दिक्पाल और यक्षकी पूजा करे तथा आचार्यको संतुष्ट करे। दक्षिणामें गाय दे। सब कार्य विधान के अनुसार परिपूर्ण कर भगवान सूर्य को अर्ध्व प्रदान करे। (अध्याय2-3)
*गवां तं वृष हैको यत्र तिहत्ययन्जितः ।
यो जति विख्यातं दत्वं सवाषनाशनम् ।
जिस गोदरभूमिमें सौ गायें और एक बैल गातन्त्र रूपसे विन्दरण करते हों, यह भूमि गोधर्म-भूमि कहलाती है। ऐसी भूमिका दान करने में सभी पापोंका नाश होता है। अन्य बृहस्पति, वृद्धहारीत, शावातप आदि स्मृति महासे प्रायः ३.००० हाथ लम्बी-चौड़ी भूमिका संजा गोचर्म है।