राजा युधिष्ठिरने कहा-जनार्दन! आपके श्रीमुखसे पञ्चमी-व्रतोंका विधान सुनकर बहुत प्रसन्नता हुई। अब आप षष्ठीव्रतोंका विधान बतलायें। मैंने सुना है कि षष्ठीको भगवान् सूर्यको पूजा करनेसे सभी व्याधियाँ शान्त हो जाती हैं और सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! सर्वप्रथम मैं विशोक-षष्ठी-व्रतका विधान बतलाता हूँ। इस तिथिको उपवास करनेसे मनुष्यको कभी शोक नहीं होता। माघ मासके शुक्ल पक्षको पक्षमीको प्रभातकालमें उठकर दन्तधावन करे, कृष्ण तिलोसे मान आदिद्वारा पवित्र हो कृशर (खिचड़ी)-का भोजन करे, रात्रिमें ब्रह्मचर्यपूर्वक रहे। दूसरे दिन षष्ठीको प्रभातकालमें उठकर स्नान आदिसे पवित्र हो जाय। सुवर्णका एक कमल बनाये, उसे सूर्यनारायणका स्वरूप मानकर रक्तचन्दन, रतकरवीर-पुष्ण और रक्तवर्णके दो वस्त्र, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उनका पूजन करे। तदनन्तर हाथ जोड़कर इस मन्त्रसे प्रार्थना करे-
यथा विशोकं भवनं त्वयैवादित्य सर्वदा।
तथा विशोकता मे स्यात् त्वद्भक्तिर्जन्मजन्मनि ।।
(उत्तरपर्व ३८।७)
"हे आदित्यदेव! जैसे आपने अपना स्थान शोकसे रहित बनाया है, वैसे ही मेरा भी भवन सदा शोकरहित हो तथा जन्म-जन्ममें मेरी आपमें भक्ति बनी रहे।'
इस विधिसे पूजनकर षष्ठीको ब्राहाण-भोजन कराये। गोमूत्रका प्राशन करे। फिर गुड़, अन्न, उत्तम दो वस्त्र और सुवर्ण ब्राह्मणको प्रदान करे। सप्तमीको मौन होकर तेल और लवणरहित भोजन करे तथा पुराण भी श्रवण करे। इस प्रकार एक वर्षपर्यन्त दोनों पक्षोंकी षष्ठीका व्रतकर अन्त में शुक्ल ससमीको सुवर्ण-कमलयुक्त कलश, श्रेष्ठ सामग्रियोंसे युक्त उत्तम शय्या और पयस्विनी कपिला गौ ब्राह्मणको दान करे। इस विधिसे कृपणता छोड़कर जो इस व्रतको करता है, वह करोड़ों वर्षोंसे भी अधिक समयतक शोक, रोग, दुर्गति आदिसे मुक्त रहता है। यदि किसी कामनासे यह व्रत किया जाय तो उसकी वह कामना अवश्य पूर्ण होती है और यदि निष्काम होकर व्रत करे तो उसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। जो इस शोक-विनाशिनी विशोक-षष्ठीको एक बार भी उपवास करता है, वह कभी दुःखी नहीं होता और इन्द्रलोकमें निवास करता है। (अध्याय ३८)