भविष्य पुराण

साम्बद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना, कुष्ठरोगसे मुक्ति तथा सूर्यस्तवराज कथन

राजा शतानीकने पूछा-मुने ! साम्बने किस  प्रकार भगवान् सूर्यकी आराधना की और उसभयंकर रोगसे कैसे मुक्ति पायी ? इसे आप कृपाकर बतायें।

सुमन्तु मुनिने कहा-राजन् !आपने बहुत  उत्तम कथा पूछी है। इसका मैं विस्तारसे वर्णन करता हूँ, इसके सुननेसे सभी पाप दूर हो जाते हैं। नारदजीके द्वारा सूर्यभगवान्का माहात्म्य सुनकर साम्बने अपने पिता श्रीकृष्णचन्द्रके पास जाकर विनयपूर्वक प्रार्थना की-'भगवन्! मैं अत्यन्त

दारुण रोगसे ग्रस्त हूँ। बयोधारा बहुत गोषधिोका सेवन करनेपर भी मुझे शान्ति नहीं मिल रही है। अब आप आज्ञा दें कि मैं वनमें जाकर तपस्याद्वारा अपने इस भयंकर रोगसे छुटकारा प्राप्त करूं।' पुत्रका वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्णाने आज्ञा दे  दी और साम्ब अपने पिताकी आज्ञाके अनुसार सिन्धुके उत्तरमें चन्द्रभागा नदीके तटपर लोकप्रसिद्ध मित्रवन नामके सूर्यक्षेत्रमें जाकर तपस्या करने लगे। वे उपवास करते हुए सूर्यकी आराधनामें तत्पर हो गये। उन्होंने इतना कठोर तप किया कि उनका अस्थिमात्र ही शेष रह गया। वे प्रतिदिन इस गुह्य स्तोत्रसे दिव्य, अव्यय एवं प्रकाशमान आदित्यमण्डलमें स्थित भगवान् भास्करकी स्तुति करने लगे-

प्रजापति परमात्मन्! आप तीनों लोकोंके नेत्र-स्वरूप हैं, सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि हैं, अतः आदित्य नामसे विख्यात हैं। आप इस मण्डलमें महान् पुरुषरूपमें देदीप्यमान हो रहे हैं। आप ही अचिन्त्यस्वरूप विष्णु और पितामह ब्रह्मा हैं। रुद्र, महेन्द्र, वरुण, आकाश, पृथ्वी, जल, वायु, चन्द्र,  मेघ, कुबेर, विभावसु, यमके रूपमें इस मण्डलमें  देदीप्यमान पुरुषके रूपसे आप ही प्रकाशित हैं। यह आपका साक्षात् महादेवमय वृत्त अण्डके समान है। आप काल एवं उत्पत्तिस्वरूप हैं। आपके मण्डलके तेजसे सम्पूर्ण पृथ्वी व्याप्त हो रही है। आप सुधाकी वृष्टिसे सभी प्राणियोंको  परिपुष्ट करते हैं। विभावसो। आप ही अन्तःस्थ म्लेच्क्षजातीय एवं पशु-पक्षीको योनिमें स्थित प्राणियोंकी रक्षा करते हैं। गलित कुष्ठ आदि रोगोंसे ग्रस्त तथा अन्ध और बधिरोंको भी आप ही रोगमुक्त करते हैं। देव! आप शरणागतके रक्षक हैं। संसार-चक्र-मण्डलमें निमग्न निर्धन, अल्पायु व्यक्तियोंकी भी सर्वदा आप रक्षा करते हैं। आप प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं। आप अपनी लोलामात्रसे ही सबका उद्धार कर देते हैं। आपऔर रोगसे पीड़ित मैं स्तुतियोंके द्वारा आपकी स्तुति करनेमें असमर्थ हूँ। आप तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदिसे सदा स्तुत होते रहते हैं। महेन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व, अप्सरा, गुह्यक आदि स्तुतियोंके द्वारा आपकी सदा आराधना करते रहते हैं। जब ऋक् यजु और सामवेद तीनों आपके मण्डलमें हौ स्थित हैं तो दूसरी कौन-सी पवित्र अन्य स्तुति आपके गुणोंका पार पा सकती है? आप ध्यानियोंके परम ध्यान और मोक्षार्थियोंके मोक्षद्वार हैं। अनन्त तेजोराशिसे सम्पन्न आप नित्य अचिन्त्य, अक्षोभ्य, अव्यक्त और निष्कल हैं। जगत्पते ! इस स्तोत्रमें में जो कुछ भी मैंने कहा है, इसके द्वारा आप मेरी भक्ति तथा दु:खमय परिस्थिति (कुष्टरोगकी बात)- को जान लें और मेरी विपत्तिको दूर करें*।

सूर्यभगवान्ने कहा- जाम्बवतीपुत्र ! मैं तुम्हारी  स्तुतिसे प्रसन्न हूँ, वत्स! मुझसे जो तुम चाहते हो वह कहो।

*आदिरेष हि भूतानामादित्य इति संजितः ।

त्रैलोक्यचक्षुरेवात्र परमात्मा प्रजापतिः॥

एप वै मण्डले ह्यस्मिन् पुरुषो दीप्यते महान् ।

एष विष्णुरचिन्त्यात्मा ब्रह्मा चैप पितामहः॥

रुद्रो महेन्द्रो वरुण आकाशं पृथिवी जलम् ।

वायुः शशाङ्कः पर्जन्यो धनाध्यक्षो विभावसुः॥

य एष मण्डले ह्यस्मिन् पुरुषो दीप्यते महान् ।

एकः साक्षान्महादेवो वृत्रमण्डनिभः सदा॥

कालो ह्येष महाबाहुर्निबोधोत्पत्तिलक्षणः ।

य एष मण्डले ह्यस्मिस्तेजोभिः पूरयन् महीम्॥

भ्राम्यते व्यवच्छिनो वातैोऽमृतलक्षणः ।

नातः परतरं किंचित् तेजसा विद्यते क्वचित् ॥

पुष्णाति सर्वभूतानि एप एव सुधामृतैः ।

अन्त:स्थान् म्लेच्छजातीयांस्तिर्यग्योनिगतानपि ॥

कारुण्यात् सर्वभूतानि पासि त्वं च विभावसो ।

श्वित्रकुष्ठ्यन्धवधिरान् पंगूश्चापि तथा विभो।।

प्रपत्रवत्सलो देव कुरुते नीरुजो भवान् ।

चक्रमण्डलमग्नांच निर्धनाल्पायुपस्तथा ॥

साम्बने कहा-भगवन्! आपके चरणों में मेरी दूढ़ भक्ति हो, यही वर चाहता हूँ।

सूर्यभगवान्ने कहा-ऐसा ही होगा! मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ, सुव्रत! द्वितीय वर माँगो।

साम्बने कहा-भगवन्! मेरे शरीरमें रहनेवाला यह मल-कुष्ठ आपकी कृपासे दूर हो जाय, गोपते! मेरा शरीर सर्वथा शुद्ध निर्मल हो जाय।

भगवान् सूर्यने कहा-ऐसा ही होगा। भगवान् सूर्यके ऐसा कहते ही साम्बके शरीरसे कुष्ठरोग वैसे ही दूर हो गया जैसे सर्पके शरीरसे केंचुल । वह दिव्य रूपसम्पन्न हो गया। साम्ब भगवान् सूर्यको प्रणामकर उनके सम्मुख खड़े हो गये।

सूर्यदेवने कहा-साम्ब ! प्रसन्न होकर मैं और भी वर देता हूँ। आजसे मेरा यह स्थान तुम्हारे नामसे प्रसिद्ध होगा। लोक में तुम्हारी अक्षय कीर्ति होगी। जो व्यक्ति तुम्हारे नामसे मेरा स्थान बनायेगा, उसे सनातन लोक प्राप्त होगा। इस चन्द्रभागा नदीके तटपर मेरी स्थापना करो। मैं तुझे स्वप्रमें दर्शन देता रहूँगा। इतना कहकर सूर्यभगवान् प्रत्यक्ष दर्शन देकर अन्तर्धान हो गये।

इस साम्बकृत स्तोत्रको जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक तीनों कालमें पढ़ता है अथवा सात दिनों में एक सौ इक्कीस बार पाठ और हवन करता है तो राज्यकी कामना करनेवाला राज्य, धनकी कामना करनेवाला धन प्राप्त कर लेता है और रोगसे पीड़ित व्यक्ति वैसे ही रोगमुक्त हो जाता है, जैसे साम्ब कुष्ठरोगसे मुक्त हो गये।

सुमन्तु मुनि बोले-राजन्! तपस्याके समय रोगसे दुर्बल साम्बने सूर्यकी स्तुति उनके सहस्त्रनामसे की थी। उसे दुःखी देखकर स्वप्नमें भगवान् सूर्यने साम्बसे कहा-'साम्ब ! सहस्रनामसे मेरी स्तुति करनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं अपने अतिशय गोपनीय, पवित्र और इक्कीस शुभ नामोंको बताता हूँ। प्रयत्नपूर्वक उन्हें ग्रहण करो, उनके पाठ करनेसे सहस्त्रनामके पाठका फल प्राप्त होगा। मेरे इक्कीस नाम इस प्रकार हैं

(१) बिकर्तन (विपतियोंको काटने तथा नष्ट करनेवाले), (२) विवस्वान् (प्रकाश-रूप), (३) मार्तण्ड (जिन्होंने अण्डमें बहुत दिन निवास किया ), (४) भास्कर, (४) भास्कर, (५) रवि, (६) लोकप्रकाशन, (७) श्रीमान्, (८) लोकचक्षु (९) अहेश्वर, (१०) लोकसाक्षी, (११) त्रिलोकेश (१२) कर्ता, (१३) हो, (१४) तमिसहा (अन्धकारको नष्ट करनेवाले), (१५) तपन, (१६) तापन, (१७) शुचि (पवित्रतम), (१८) सप्तापवाहन, (१९) गभस्तिहस्त (किरणे ही जिनके हाथस्वरूप है), (२०) ब्रह्मा और (२१) सर्वदेवनमस्कृत

साम्ब! ये इक्कीस नाम मुझे अतिशय प्रिय हैं। यह स्तवराजके नामसे प्रसिद्ध है। यह स्तवराज

प्रत्यक्षदर्शीवं देव समुद्धरसि लीलया।

का मे शक्तिः स्तवैः स्तोतुमार्तोहं रोगपीडितः।।

स्तूपसे स्वं सदा देवबंद्यविशिचादिभिः ।

महेन्द्रसिद्धगन्धर्वैरप्सरेभिः सगुह्मकैः।।

स्तुतिभि कि पवित्रा तब देव समीरितः ।

यस्य ते ऋग्यजुः साम्रां त्रितयां मण्डलस्थितम्।।

ध्यानिनां त्वं परं ध्यानं मोश्वद्वारं च मोक्षिणम्।

अनन्ततेजसाक्षोभ्यो द्वाचिन्ताव्यत्त्कनिष्फलः।।

यदयं व्याहतः किंचत् स्तोत्रेस्मिञ्चगतः पतिः।

आर्ति भक्तिं च विज्ञाय तत्सवं ज्ञातुमर्हसि।।

* बैंकलेनी विवाद मर्तबडी भास्करी रविः ।

लोकप्रकाशकः श्रीमाँल्लोकचक्षुर्ग्रहश्वरः।।

लोकमांशी शताः कर्म इनां तमिलहा।

तपनस्तापन  श्वैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः।।

शरीरको नीरोग बनानेवाला, धनकी वृद्धि करनेवाला और यशस्कर है एवं तीनों लोकोंमें विख्यात है। महाबाहो! इन नामोंसे उदय और अस्त दोनों संध्याओंके समय प्रणत होकर जो मेरी स्तुति करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। मानसिक, वाचिक और शारीरिक जो भी दुष्कृत हैं, वे सभी एक बार मेरे सम्मुख इसका जप करनेसे विनष्ट हो जाते हैं। यही मेरे लिये जपने योग्य तथा हवन एवं संध्योपासना है। बलिमन्त्र, अर्घ्यमन्त्र, धूपमन्त्र इत्यादि भी यही है। अन्नप्रदान, स्रान, नमस्कार, प्रदक्षिणामें यह महामन्त्र प्रतिष्ठित होकर सभी पापोंका हरण करनेवाला और शुभ करनेवाला है। यह कहकर जगत्पति भगवान् भास्कर कृष्णपुत्र साम्बको उपदेश देकर वहीं अन्तर्धान हो गये। साम्ब भी इस स्तवराजसे सप्ताश्ववाहन भास्करकी स्तुति कर नीरोग, श्रीमान् और उस भयंकर शारीरिक रोगसे सर्वथा मुक्त हो गये। (अध्याय १२७-१२८)