नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवी सरस्वती व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
'बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि श्रीनारायण तथा श्रीनर अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनके नित्य-सखा नरस्वरूप नर श्रेष्ठ अर्जुन), उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती और उनकी लीलाओंके वक्ता महर्षि वेदव्यासको नमस्कार कर जय* -आसुरी सम्पत्तियोंका नाश करके अन्त:करणपर दैवी सम्पत्तियोंको विजय प्राप्त करानेवाले वाल्मीकीय रामायण, महाभारत एवं अन्य सभी इतिहास-पुराणादि सद्ग्रन्थोंका पाठ करना चाहिये।
जयति पराशरसूनुः सत्यवतीहृदयनन्दनो व्यासः ।
यस्यास्यकमलगलितं वाङ्मयममृतं जगत् पिबति॥
'पराशरके पुत्र तथा सत्यवतीके हृदयको आनन्दित करनेवाले भगवान् व्यासकी जय हो, जिनके मुखकमलसे नि:सृत अमृतमयी वाणीका यह सम्पूर्ण विश्व पान करता है।'
यो गोशतं कनकशृङ्गमयं ददाति
विप्राय वेदविदुषे च बहुश्रुताय।
पुण्यां भविष्यसुकथां शृणुयात् समग्रां
पुण्यं समं भवति तस्य च तस्य चैव ।।
'वेदादि शास्त्रोंके जाननेवाले तथा अनेक विषयोंक मर्मज्ञ विद्वान् ब्राह्मणको स्वर्णजटित सींगोंवाली सैकड़ों गौओंको दान देनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, ठीक उतना ही पुण्य इस भविष्यमहापुराणकी उत्तम कथाओंके श्रवण करनेसे प्राप्त होता है।'
एक समय व्यासजीके शिष्य महर्षि सुमन्तु तथा वसिष्ठ, पराशर, जैमिनि, याज्ञवल्क्य, गौतम, वैशम्पायन, शौनक, अङ्गिरा और भारद्वाजादि महर्षिगण पाण्डववंशमें समुत्पन्न महाबलशाली राजा शतानीककी सभामें गये। राजाने उन ऋषियोंकाअर्घ्यादिसे विधिवत् स्वागत-सत्कार किया और उन्हें उत्तम आसनोपर बैठाया तथा भलीभांति उनका पूजन कर विनयपूर्वक इस प्रकार प्रार्थना की-'हे महात्माओ! आपलोगोंके आगमनसे मेरा जन्म सफल हो गया। आपलोगोंके स्मरणमात्रसे ही मनुष्य पवित्र हो जाता है, फिर आपलोग मुझे दर्शन देनेके लिये यहाँ पधारे हैं, अत: आज मैं धन्य हो गया। आपलोग कृपा करके मुझे उन
*'जय' शब्दकी व्याख्या प्राय: कई पुराणों में आयी है। भविष्यपुराणक बाहापर्वक चौथे ध्याय (प्रलोक ८६ से ८८) में इसे विस्तारसे समझाया गया है, वहाँ देखना चाहिये।
पवित्र एवं पुण्यमयी धर्मशास्त्रकी कथाओंको सुनायें, जिनके सुननेसे मुझे परमगतिकी प्राप्ति हो।'
ऋषियोंने कहा- हे राजन्! इस विषयमें आप हम सबके गुरु, साक्षात् नारायणस्वरूप भगवान् वेदव्याससे निवेदन करें। वे कृपालु हैं, सभी प्रकारके शास्त्रोंके और विद्याओंके ज्ञाता हैं। जिसके श्रवणमात्रसे मनुष्य सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है, उस 'महाभारत' ग्रन्थके रचयिता भी यही हैं।
राजा शतानीकने ऋषियोंके कथनानुसार सभी शास्त्रोंके जाननेवाले भगवान् वेदव्याससे
प्रार्थनापूर्वक जिज्ञासा की-प्रभो! मुझे आप धर्ममयी पुण्य-कथाओंका श्रवण करायें, जिससे मैं पवित्र हो जाऊँ और इस संसार-सागरसे मेरा उद्धार हो जाय।
व्यासजीने कहा- 'राजन्! यह मेरा शिष्य सुमन्तु महान् तेजस्वी एवं समस्त शास्त्रोंका ज्ञाता है, यह आपकी जिज्ञासाको पूर्ण करेगा।' मुनियोंने भी इस बातका अनुमोदन किया । तदनन्तर राजा शतानीकने महामुनि सुमन्तुसे उपदेश करनेके लिये प्रार्थना की हे द्विज श्रेष्ठ! आप कृपाकर उन पुण्यमयी कथाओंका वर्णन करें, जिनके सुननेसे सभी पाप नधे हो जाते हैं और शुभ फलोंकी प्राप्ति होती है।
महामुनि सुमन्तु बोले- राजन्! धर्मशास्त्र सबको पवित्र करनेवाले हैं। उनके सुननेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। बताओ, तुम्हारी क्या सुननेकी इच्छा है?
राजा शतानीकने कहा- ब्राहाणदेव! वे कौनसे धर्मशास्त्र हैं, जिनके सुननेसे मनुष्य, पापोंसे मुक्त हो जाता है।
सुमन्तु मुनि बोले- राजन् ! मन् विष्णु यम, अङ्गिरा, वसिष्ठ, दक्ष, संवर्त, शातातप, पराशर, आपस्तम्ब, उशना, कात्यायन, बृहस्पति, गौतम, शङ्ख, लिखित, हारीत तथा अत्रि आदि ऋषियोंद्वारा रचित मन्वादि बहुत-से धर्मशास्त्र हैं। इन धर्मशास्त्रोंको सुनकर एवं उनके रहस्योंको भलीभाँति हृदयङ्गमकर मनुष्य देवलोकमें जाकर परम आनन्दको प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
शतानीकने कहा- प्रभो ! जिन धर्मशास्त्रोंको आपने कहा है, इन्हें मैंने सुना है। अब इन्हें पुन: सुननेकी इच्छा नहीं है। कृपाकर आप चारों वर्णो के कल्याणके लिये जो उपयुक्त धर्मशास्त्र हो उसे मुझे बतायें।
सुमन्तु मुनि बोले-हे महाबाहो! संसारमें निमग्न प्राणियोंके उद्धारके लिये अठारह महापुराण, श्रीरामकथा तथा महाभारत आदि सद्ग्रन्थ नौकारूपी साधन हैं। अठारह महापुराणों तथा आठ प्रकार के व्याकरणोंको भलीभाँति समझकर सत्यवतीके पुत्र वेदव्यासजीने 'महाभारतसंहिता' की रचना की, जिसके सुननेसे मनुष्य ब्रह्महत्याके पापोंसे मुक्त हो जाता है। इनमें आठ प्रकारके व्याकरण ये हैं- ब्राह्म, ऐन्द्र, याम्य, रौद्र, वायव्य, वारुण, सावित्र्य तथा वैष्णव । ब्रह्म, पदा, विष्णु, शिव, भागवत, नारदीय, मार्कण्डेय, अग्नि, भविध्य, ब्रह्मवैवर्त, लिङ्ग, वाराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड तथा ब्रह्माण्ड-ये अठारह महापुराण हैं। ये सभी- चारों वर्णोक लिये उपकारक हैं। इनमेंसे आप क्या सुनना चाहते हैं?
राजा शतानीकने कहा-हे विप्र! मैंने महाभारत सुना है तथा श्रीरामकथा भी सुनी है, अन्य पुराणोंको भी सुना है, किंतु भविष्यपुराण नहीं सुना है। अत: विप्र श्रेष्ठ। आप भविष्यपुराणको मुझे सुनायें, इस विषय में मुझे महत, कौतूहल है।
सुमन्तु मुनि बोले-राजन्! आपने बहुत उत्तम बात पूछी है। मैं आपको भविष्यपुराणकी कथा सुनाता हूँ, जिसके श्रवण करनेसे ब्रह्महत्या आदि बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं और अश्वमेधादि यज्ञोंका पुण्यफल प्राप्त होता है तथा अन्तमें सूर्यलोककी प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं। यह उत्तम पुराण पहले ब्रह्माजीद्वारा कहा गया है। विद्वान् ब्राह्मणको इसका सम्यक् अध्ययन कर अपने शिष्यों तथा चारों वर्गों के लिये उपदेश करना चाहिये। इस पुराणमें श्रौत एवं स्मार्त सभी धर्मोंका वर्णन हुआ है। यह पुराण परम मङ्गलप्रद, सद्बुद्धिको बढ़ानेवाला, यश एवं कीर्ति प्रदान करनेवाला तथा परमपद-मोक्ष प्राप्त करानेवाला है-
इदं स्वस्त्ययनं श्रेष्ठमिर्द बुद्धिविवर्धनम्।
इद यशस्यं सततमिदं निःश्रेयसं परम्॥
इस भविष्यपुराणमें सभी धर्मोका संनिवेश हुआ है तथा सभी कर्मोके गुणों और दोषों के फलोंका निरूपण किया गया है। चारों वर्षों तथा आश्रमोंके संदाचारका भी वर्णन किया गया है, क्योंकि 'सदाचार ही श्रेष्ठ धर्म है ऐसा श्रुतियोंने कहा है, इसलिये ब्राह्मणको नित्य आचारका पालन करना चाहिये, क्योंकि सदाचारसे विहीन ब्राहाण किसी भी प्रकार वेदके फलको प्राप्त नहीं कर सकता। सदा आचारका पालन करनेपर तो वह सम्पूर्ण फलोंका अधिकारी हो जाता है, ऐसा कहा गया है। सदाचारको ही मुनियोंने धर्म तथा तपस्याओंका मूल आधार माना है, मनुष्य भी इसीका आश्रय लेकर धर्माचरण करते हैं। इस प्रकार इस भविष्यमहापुराणमें आचारका वर्णन किया गया है। तीनों लोकोंकी उत्पत्ति, विवाहादि संस्कार-विधि, स्त्री-पुरुषोंके लक्षण, देवपूजाका विधान, राजाओंके धर्म एवं कर्तव्यका निर्णय, सूर्यनारायण, विष्णु, रुद्र, दुर्गा तथा सत्यनारायणका माहात्म्य एवं पूजा-विधान, विविध तीर्थोंका वर्णन, आपद्धर्म तथा प्रायश्चित्त-विधि, संध्याविधि, स्रान, तर्पण, वैश्वदेव, भोजनविधि, जातिधर्म, कुलधर्म, वेदधर्म तथा यज्ञ-मण्डलमें अनुष्ठित होनेवाले विविध यज्ञोंका वर्णन हुआ है।
हे कुरश्रेष्ठ शतानीक ! इस महापुराणको ब्रह्माजीने शंकरको, शंकरने विष्णुको, विष्णुने नारदको, नारदने इन्द्रको, इन्द्रने पराशरको तथा पराशरने व्यासको सुनाया और व्याससे मैंने प्राप्त किया। इस प्रकार परम्परा प्राप्त इस उत्तम भविष्यमहापुराणको मैं आपसे कहता हूँ, इसे सुनें।
इस भविष्यमहापुराणकी श्लोक संख्या पचास हजार है २ । इसे भक्तिपूर्वक सुननेवाला ऋद्धि, वृद्धि तथा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको प्रास करता है। ब्रह्माजीद्वारा प्रोक्त इस महापुराणमें पाँच पर्व कहे गये हैं-
(१) ब्राहा, (२) वैष्णव, (३) शैव, (४) त्वाष्ट्र तथा (५) प्रतिसर्गपर्व। पुराणके सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरित-ये पाँच लक्षण बताये गये हैं तथा इसमें चौदह विद्याओंका भी वर्णन है। चौदह विद्याएँ इस प्रकार है-चार
1-आचारः प्रथमो धर्मः श्रुत्युत्त्कश्च नरोत्तम। तस्मादस्मिन् समायुत्त्को नित्यं स्यादात्मवान् द्विजः।।
आचाररद्विच्युतो विप्रो न वेदफलमश्वते। आचारेण च संयुत्त्कः सम्पूर्णफलभाक् स्मृतः।।
एवमाचारतो दृष्द्वा धर्मस्य मुनयो गतिम्। सर्वस्य तपसो मूलमाचारं जगृहुः परम्।।
अन्ये च मानवा राजत्राचारं संश्रिता सदा। एवमस्मिन् पुराणे तु आचारस्य तु कीर्तनम्।।(ब्राह्मपर्व)
2-वर्तमान समयमें भविष्यपुराणका जो संस्करण उपलब्ध है, उसमें ब्राह्म, मध्यम, प्रतिसर्ग तथा उत्तर नामक चार सर्ग मिलते हैं, और श्लोक-संख्या भी पचास हजारके स्थानपर लगभग उठ्ठाईस हजार हैं। इसमें भी कुछ अंश प्रक्षिप्त माने जाते हैं।
3-सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।।
वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम्। चतुर्दशभिर्विद्याभिर्भूषितं कुरुनन्दन।।
वेद (ऋक्, यजुः, साम, अथर्व), वेदाज (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द, ज्योतिष), मीमांसा, न्याय, पुराण तथा धर्मशास्त्र। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद तथा अर्थशास्त्र-इन चारोंको मिलानेसे अठारह विद्याएँ होती है।
सुमन्तु मुनि पुनः बोले- हे राजन्! अब मैं भूतसर्ग अर्थात् समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका वर्णन करता हूँ, जिसके सुननेसे सभी पापोंकी निवृत्ति हो जाती है और मनुष्य परम शान्तिको प्राप्त करता है।
हे तात! पूर्वकालमें यह सारा संसार अन्धकारसे च्याप्त था, कोई पदार्थ दृष्टिगत नहीं होता था, अविज्ञेय था, अतळ था और प्रसुप्त-सा था। उस समय सूक्ष्म अतीन्द्रिय और सर्वभूतमय उन परब्रह्म परमात्मा भगवान् भास्करने अपने शरीरसे नानाविध सृष्टि करनेकी इच्छा की और सर्वप्रथम परमात्माने जलको उत्पन्न किया तथा उसमें अपने वीर्यरूप शक्तिका आधान किया। इससे देवता, असुर, मनुष्य आदि सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ। वह वीर्य जलमें गिरनेसे अत्यन्त प्रकाशमान सुवर्णका अण्ड हो गया। उस अण्डके मध्यसे सृष्टिकर्ता चतुर्मुख लोकपितामह ब्रह्माजी उत्पन्न हुए।
नर (भगवान्) से जलको उत्पत्ति हुई है, इसलिये जलको नार कहते हैं। वह नार जिसका पहले अयन (स्थान) हुआ, उसे नारायण कहते हैं। ये सदसद्रूप, अव्यक्त एवं नित्यकारण हैं, इनसे जिस पुरुष-विशेषको सृष्टि हुई, वे लोकमें ब्राके नामसे प्रसिद्ध हुए। ब्रह्माजीने, दोर्घकालतक तपस्या की और उस अण्डके दो भाग कर दिये। एक भागसे भूमि और दूसरेसे आकाशको रचना की, मध्य में स्वर्ग, आतों दिशाओं तथा वरूणका निवास-स्थान अर्थात् समुद्र मनाया। फिर महदादि तत्त्वोंकी तथा सभी प्राणियोंकी रचना की।
परमात्माने सर्वप्रथम आकाशको उत्पन्न किया और फिर क्रमसे वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इन तत्त्वोंकी रचना की। सृष्टिके आदिमें ही ब्रह्माजीने उन सबके नाम और कर्म वेदोंके निर्देशानुसार ही नियत कर उनकी अलग-अलग संस्थाएं बना दी। देवताओंके तुषित आदि गण, ज्योतिष्टोमादि सनातन यज्ञ, ग्रह, नक्षत्र, नदी, समुद्र, पर्वत, सम एवं विषम भूमि आदि उत्पन्न कर कालके विभागों (संवत्सर, दिन, मास आदि) और ऋतुओं आदिकी रचना की। काम, क्रोध आदिकी रचना कर विविध कर्मोके सदसद्विवेकके लिये धर्म और अधर्मकी रचना की और नानाविध प्राणिजगत्की सृष्टि कर उनको सुख-दुःख, हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वोंसे संयुक्त किया। जो कर्म जिसने किया था तदनुसार उनकी (इन्द्र, चन्द्र, सूर्य आदि) पदोंपर नियुक्ति हुई। हिंसा, अहिंसा, मृदु, क्रूर, धर्म, अधर्म, सत्य, असत्य आदि जीवोंका जैसा स्वभाव था, वह वैसे ही उनमें प्रविष्ट हुआ, जैसे विभिन्न ऋतुओंमें वृक्षोंमें पुष्प, फल आदि उत्पन्न होते हैं।
इस लोककी अभिवृद्धि के लिये ब्रह्माजीने अपने मुखसे ब्राह्मण, बाहुओंसे क्षत्रिय, ऊर अर्थात् जंघासे वैश्य और चरणोंसे शूदोंको उत्पन्न किया। ब्रह्माजी के चारों मुखोंसे चार वेद उत्पन हुए। पूर्व मुखसे ऋग्वेद प्रकट हुआ, उसे वसिष्ठ-मुनिने ग्रहण किया। दक्षिण मुखसे यजुर्वेद जापान हुआ, उसे महर्षि याज्ञवल्क्यने ग्रहण किया।पश्चिम-मुखसे सामवेद निःसृत हुआ, उसे गौतम-ऋषिने धारण किया और उत्तर-मुखसे अथर्ववेद प्रादुर्भूत हुआ, जिसे लोकपूजित महर्षि शौनकने ग्रहण किया। ब्रह्माजीके लोकप्रसिद्ध पञ्चम(ऊर्ध्व) मुखसे अठारह पुराण, इतिहास और यमादि स्मृति-शास्त्र उत्पन्न हुए।
इसके बाद ब्रह्माजीने अपने देहके दो भाग किये। दाहिने भागको पुरुष तथा बायें भागको स्त्री बनाया और उसमें विराट् पुरुषकी सृष्टि की। उस विराट् पुरुषने नाना प्रकारकी सृष्टि रचनेकी इच्छासे बहुत कालतक तपस्या की और सर्वप्रथम दस ऋषियोंको उत्पन्न किया, जो प्रजापति कहलाये। उनके नाम इस प्रकार हैं-(१) नारद, (२) भृगु, (३) वसिष्ठ, (४) प्रचेता, (५) पुलह, (६) क्रतु, (७) पुलस्त्य, (८) अत्रि, (९) अङ्गिरा और (१०) मरीचि। इसी प्रकार अन्य महातेजस्वी ऋषि भी उत्पन्न हुए। अनन्तर देवता, ऋषि, दैत्य और राक्षस, पिशाच, गन्धर्व, अप्सरा, पितर, मनुष्य, नाग, सर्प आदि योनियोंके अनेक गण उत्पन्न किये और उनके रहने के स्थानों को बनाया। विद्युत्, मेघ, वज्र, इन्द्रधनुष, धूमकेतु (पुच्छल तारे), उल्का, निर्घात (बादलोंकी गड़गड़ाहट)और छोटे-बड़े नक्षत्रोंको उत्पन्न किया। मनुष्य, किंनर, अनेक प्रकारके मत्स्य, वराह, पक्षी, हाथी, घोड़े, पशु, मृग, कृमि, कोट, पतंग आदि छोटे-बड़े जीवोंको उत्पन्न किया। इस प्रकार उन भास्करदेवने त्रिलोकीकी रचना की।
हे राजन्! इस सृष्टिकी रचना कर सृष्टिमें जिन-जिन जीवोंका जो जो कर्म और क्रम कहा गया है, उसका मैं वर्णन करता हूँ, आप सुनें।
हाथी, व्याल, मृग और विविध पशु पिशाच, मनुष्य तथा राक्षस आदि जरायुज (गर्भसे उत्पन्न होनेवाले) प्राणी हैं। मत्स्य, कछुवे, सर्प, मगर तथा अनेक प्रकारके पक्षी अण्डज (अण्डेसे उत्पन्न होनेवाले) है। मक्खी, मच्छर, खाटमल आदि जीव स्वेदज है अर्थात् पसीनेकी उष्मासे उत्पन्न होते हैं। भूमिको उद्भेदकर उत्पन्न होनेवाले वृक्ष, ओषधियाँ आदि उद्भिज्ज सृष्टि हैं। जो फलके पकनेतक रहें और पीछे सूख जायें या नष्ट हो जायें तथा बहुत फूल और फलवाले वृक्ष हैं वे ओषधि कहलाते हैं और जो पुष्पके आये बिना ही फलते हैं, वे वनस्पति हैं तथा जो फूलते और फलते हैं उन्हें वृक्ष कहते हैं। इसी प्रकार गुल्म, वल्ली, वितान आदि भी अनेक भेद होते हैं। ये सब बीजसे अथवा काण्डसे अर्थात् वृक्षको छोटी-सी शाखा काटकर भूमिमें गाड़ देनेसे उत्पन्न होते हैं। ये वृक्ष आदि भी चेतना- शक्तिसम्पन्न हैं और इन्हें सुख-दुःखका ज्ञान रहता है, परंतु पूर्वजन्मके कौके कारण तमोगुणसे आच्छन्न रहते हैं, इसी कारण मनुष्योंकी भांति बातचीत आदि करने में समर्थ नहीं हो पाते२
इस प्रकार यह अचिन्त्य चराचर जगत् भगवान् भास्करसे उत्पन्न हुआ है। जब वह परमात्मा निद्राका आश्रय ग्रहण कर शयन करता है, तब यह संसार उसमें लीन हो जाता है और जब निद्राका त्याग करता है अर्थात् जागता है, तब सब सृष्टि उत्पन्न होती है और समस्त जीव पूर्वकर्मानुसार अपने-अपने कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं। वह अव्यय परमात्मा सम्पूर्ण चराचर संसारको जाग्रत् और शयन दोनों अवस्थाओद्वारा बार-बार उत्पन्न और विनष्ट करता रहता है।
परमेश्वर कल्पके प्रारम्भमें सृष्टि और कल्पके
१-यत्तन्मुखं महाबाहो पञ्चम लोकविश्रुतम् । अष्टादश पुराणानि सेतिहासानि भारत।।
निर्गतानि ततस्तस्मान्मुखात् कुरुकुलोदह । तधान्याः स्मृतपश्चापि यमाचा लोकपूजिताः ॥ (ब्राह्मपर्व)
२-ओषध्यः फलपाकान्ता नानाविधफलोपागाः । अपुष्पा फलवन्तो ये ते वनस्पतयः स्मृताः ॥
पुष्यिणः फलिन व वृक्षास्तूभवतः स्मृताः ।
तमसा बहुरूपेण वेष्टिताः कर्महेतुना ।।
अन्त: संज्ञा भवन्त्यों सुखदुःखसमन्विता: । (ब्राह्मपर्व २।७३)
अन्तमें प्रलय करते हैं। कल्प परमेश्वरका दिन है। इस कारण परमेश्वरके दिनमें सृष्टि और रात्रि में प्रलय होता है। हे राजा शतानीक। अब आप काल-गणनाको सुनें-
अठारह निमेष (पलक गिरनेके समयको निमेष कहते हैं)-की एक काष्ठा होती है अर्थात् जितने समयमें अठारह बार पलकोंका गिरना हो, उतने कालको काष्ठा कहते हैं। तीस काष्ठाकी एक कला, तीस कलाका एक क्षण, बारह क्षणका एक मुहूर्त, तीस मुहूर्तका एक दिन-रात, तीस दिन-रातका एक महीना, दो महीनोंकी एक ऋतु, तीन ऋतुका एक अयन तथा दो अयनोंका एक वर्ष होता है। इस प्रकार सूर्यभगवान्के द्वारा दिन-रात्रिका काल विभाग होता है। सम्पूर्ण जीव रात्रिको विश्राम करते हैं और दिन में अपने-अपने कर्ममें प्रवृत्त होते हैं।
पितरोंका दिन-रात मनुष्योंके एक महीनेके बराबर होता है अर्थात् शुक्ल पक्षमें पितरोंको रात्रि और कृष्णा यक्षमें दिन होता है। देवताओंका एक अहोरात्र (दिन-रात) मनुष्योंके एक वर्षके बराबर होता है अर्थात् उत्तरायण दिन तथा दक्षिणायन रात्रि कही जाती है। हे राजन्। अब आप ब्रह्माजीके रात दिन और एक-एक युगके प्रमाणको सुनें- सत्ययुग चार हजार वर्षका है, उसके संध्यांशके चार सौ वर्ष तथा संध्याके चार सौ वर्ष मिलाकर
इस प्रकार चार हजार आठ सौ दिव्य वर्षाका एक सत्ययुग होता है । इसी प्रकार त्रेतायुग तीन हजार वर्षोंका तथा संध्या और संध्यांशके छ: सौ वर्ष कुल तीन हजार छ: सौ वर्ष, द्वापर दो हजार वर्षोंका संध्या तथा संध्यांशके चार सौ वर्ष कुल दो हजार चार सौ वर्ष तथा कलियुग एक हजार वर्ष तथा संध्या और संध्यांशके दो सौ वर्ष मिलाकर बारह सौ वर्षोंके मानका होता है। ये सब दिव्य वर्ष मिलाकर बारह हजार दिव्य वर्ष होते हैं। यही देवताओंका एक युग कहलाता है।
देवताओंके हजार युग होनेसे ब्रह्माजीका एक दिन होता है और यही प्रमाण उनकी रात्रिका है। जन ब्रह्माजी अपनी रात्रिके अन्त में सोकर उठते हैं तब सत्-असत् रूप मनको उत्पन्न करते हैं। वह मन सृष्टि करनेकी इच्छासे विकारको प्राप्त होता है, तब उससे प्रथम आकाशतत्त्व उत्पन्न होता है। आकाशका गुण शब्द कहा गया है। विकारयुक्त आकाशसे सब प्रकारके गन्धको वहन करनेवाले पवित्र वायुकी उत्पत्ति होती है, जिसका गुण स्पर्श है। इसी प्रकार विकारवान् वायुसे अन्धकारका नाश करनेवाला प्रकाशयुक्त तेज उत्पन्न होता है, जिसका गुण रूप है। विकारवान् तेजसे जल, जिसका गुण रस है और जलसे गन्यगुणवाली पृथ्वी उत्पन्न होती है। इसी प्रकार सृष्टिका क्रम चलता रहता है।
* एक संक्रान्तिासे दूसरी सूर्य-संक्रान्तितकके समयको सौर मास कहते हैं। बारह सौर मासोका एक सौर वर्ष होता है और मनुष्य-मानका यही एक सौर वर्ष देवताओंका एक आहोरात्र होता है। ऐसे ही तीस अहोरात्रोंका एक मात्र और बारह मामौका एक दिव्य वर्ष होता है।
पूर्वमें बारह हजार दिव्य वर्षाका जो एक दिव्य युग बताया गया है, वैसे ही एकहत्तर युग होनेसे एक मन्वन्तर होता है। ब्रह्माजीके एक दिनमें चौदह मन्वन्तर व्यतीत होते हैं।
सत्ययुगमें धर्मके चारों पाद वर्तमान रहते हैं अर्थात् सत्ययुगमें धर्म चारों चरणोंसे (अर्थात् सर्वाङ्गपूर्ण) रहता है। फिर, त्रेता आदि युगों में धर्मका बल घटनेसे धर्म क्रमसे एक-एक चरण घटता जाता है, अर्थात् त्रेतामें धर्मके तीन चरण, द्वापरमें दो चरण तथा कलियुगमें धर्मका एक ही चरण बचा रहता है और तीन चरण अधर्मक रहते हैं। सत्ययुगके मनुष्य धर्मात्या, नीरोग, सत्यवादी होते हुए चार सौ वर्षोंतक जीवन धारण करते हैं। फिर त्रेता आदि युगोंमें इन सभी वर्षाका एक चतुर्थांश न्यून हो जाता है, यथा त्रेताके मनुष्य तीन सौ वर्ष, द्वापरके दो सौ वर्ष तथा कलियुगके एक सौ वर्षतक जीवन धारण करते हैं। इन चारों युगोंके धर्म भी भिन्न-भिन्न होते हैं। सत्ययुगमें तपस्या, त्रेतामें ज्ञान, द्वापरमें यज्ञ और कलियुग में दान प्रधान धर्म माना गया है।
परम द्युतिमान् परमेश्वरने सृश्किी रक्षाके लिये अपने मुख, भुजा, ऊरु और चरणोंसे क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र-इन चार वर्णोको उत्पन्न किया और उनके लिये अलग अलग कौंको कल्पना की। ब्राहाणोंके लिये पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ करना यज्ञ कराना तथा दान देना और दान लेना-ये छ: कर्म निथित किये गये हैं। पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना तथा प्रजाओंका पालन आदि कर्म क्षत्रियोंके लिये नियत किये गये हैं। पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना, पशुओंकी रक्षा करना, खेती व्यापारसे धनाजन करना-ये काम वैश्योंके लिये निर्धारित किये गये और इन तीनों वोको सेवा करना-यह एक मुख्य कर्म का नियत किया गया है।
पुरुषकी देहमें नाभिसे ऊपरका भाग अत्यन्त पवित्र माना गया है। उसमें भी मुख प्रधान है। ब्राह्मण ब्रह्माके मुख (उत्तमाङ्ग)-से उत्पन हुआ है, इसलिये ब्राह्मण सबसे उत्तम हैं, यह वेदकी वाणी है। ब्रह्माजीने बहुत कालतक तपस्या करके सबसे पहले देवता और पितरोंको हव्य तथा कव्य पहुँचानेके लिये और सम्पूर्ण संसारको रक्षा करने- हेतु ब्राह्मणको उत्पन्न किया। शिरोभागसे उत्पन्न होने और वेदको धारण करनेके कारण सम्पूर्ण संसारका स्वामी धर्मतः ब्राह्मण ही है। सब भूतों (स्थावर-जङ्गमरूप पदार्थों) में प्राणी (कीट आदि) श्रेष्ठ हैं, प्राणियोंमें बुद्धिसे व्यवहार करनेवाले पशु आदि श्रेष्ठ हैं। बुद्धि रखनेवाले जीवोंमें मनुष्य श्रेष्ठ हैं और मनुष्योंमें ब्राह्मण, ब्राह्मणोंमें विद्वान्, विद्वानोंमें कृतबुद्धि और कृतबुद्धियोंमें कर्म करनेवाले तथा इनसे ब्रह्मवेत्ता-ब्रह्मज्ञानी श्रेष्ठ हैं। ब्राह्मणका जन्म धर्म-सम्पादन करनेके लिये है और धर्माचरणसे ब्राह्मण ब्रह्मत्व तथा ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है।
राजा शतानीकने पूछा-हे महामुने! ब्रह्मलोक और ब्रहात्व अति दुर्लभ हैं, फिर ब्राह्मणमें कौनसे ऐसे गुण होते हैं, जिनके कारण वह इन्हें प्राप्त करता है। कृपाकर आप इसका वर्णन करें।
सुमन्तु मुनि बोले-हे राजन्! आपने बहुत ही उत्तम बात पूछी है, मैं आपको वे बातें बताता हूँ, उन्हें ध्यानपूर्वक सुनें।
जिस ब्राह्मणके वेदादि शास्त्रोंमें निर्दिष्ट गर्भाधान, पुंसवन आदि अड़तालीस संस्कार विधिपूर्वक हुए हों, वही ब्राह्मण ब्रह्मलोक और ब्रह्मत्वको प्राप्त करता है। संस्कार ही ब्रह्मत्व-प्रासिका मुख्य कारण है, इसमें कोई संदेह नहीं।
राजा शतानीकने पूछा- महात्मन्! वे संस्कार कौनसे हैं, इस विषयमें मुझे महान् कौतूहल हो रहा है। कृपाकर आप इन्हें बतायें।
सुमन्तुजी बोले-राजन्! वेदादि शास्त्रोंमें जिन संस्कारोंका निर्देश हुआ है, उनका मैं वर्णन करता हूँ-गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चूडाकर्म, उपनयन, चार प्रकारके वेदव्रत, वेदनान, विवाह, पञ्चमहायज्ञ (जिनसे देवता, पितरों, मनुष्य, भूत और ब्रह्मकी तृप्ति होती है), सप्तपाकयज्ञ-संस्था-अष्टकाद्वय, पार्वण, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री (शूलगव) तथा आश्वयुजी, ससहविर्यज्ञ-संस्था-अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श-पौर्णमास, चातुर्मास्य, निरूढ- पशुबन्ध, सौत्रामणी और सप्तसोम-संस्था-अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, घोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आसोर्याम--ये चालीस ब्राह्मणके संस्कार हैं। इनके साथ ही ब्राह्मणमें आठ आत्मगुण भी अवश्य होने चाहिये, जिससे ब्रहाकी प्राप्ति होती है। ये आठ गुण इस प्रकार हैं-
अनसूया दया क्षान्तिरनायासं च मङ्गलम्।
अकार्पण्यं तथा शौचमस्पृहा च कुरूद्वह॥
(ब्राह्मपर्व २११५५)
अनसूया (दूसरोंके गुणोंमें दोष-बुद्धि नहीं रखना), दया, क्षमा, अनाथास (किसी सामान्य बालके पोछे जानकी बाजी न लगाना), मङ्गल (माङ्गलिक वस्तुओंका धारण), अकार्पण्य (दीन वचन नहीं बोलना और अत्यन्त कृपण न बनना), शौच (बाह्याभ्यन्तरको शुद्धि) और अस्पृहा-ये आठ आत्मगुण हैं।' इनकी पूरी परिभाषा इस प्रकार है-
गुणीके गुणोंको न छिपाना अर्थात् प्रकट करना, अपने गुणोंको प्रकट न करना तथा दूसरेके दोर्षोंको देखकर प्रसन्न न होना अनसूया है। अपने-परायेमें, मित्र और शत्रुमें अपने समान व्यवहार करना और दूसरेका दुःख दूर करनेकी इच्छा रखना दया है। मन, वचन अथवा शरीरसे कोई दुःख भी पहुँचाये तो उसपर क्रोध और वैर न करना क्षान्ति है। अभक्ष्य वस्तुका भक्षण न करना, निन्दित पुरुषोंका सङ्ग न करना और सदाचरणमें स्थित रहना शौच कहा जाता है। जिन शुभ कर्मोके करनेसे शरीरको कष्ट होता है, उस कर्मको हठात् नहीं करना चाहिये, यह अनायास है। नित्य अच्छे कार्योको करना और बुरे कर्मोका परित्याग करना—यह मङ्गल गुण कहलाता है। बड़े कष्ट एवं परिश्रमसे न्यायोपार्जित धनसे उदारतापूर्वक थोड़ा बहुत नित्य दान करना अकार्पण्य है। ईश्वरकी कृपासे प्राप्त थोड़ी सी सम्पत्तिमें भी संतुष्ट रहना और दूसरेके धनकी किचित् भी इच्छा न रखना अस्पृहा* है । इन आउ गुणों और चूर्वोक्त संस्कारोंसे जो ब्राह्मण संस्कृत हो वह ब्रह्मलोक तथा ब्रह्मत्वको प्राप्त करता है। जिसकी गर्भ शुद्धि हो, सब संस्कार विधिवत् सम्पन्न हुए हों और वह जा र धर्मका पालन करता हो तो उसे अवश्य मुक्ति प्राप्त होती है। (अध्याय १२)
*न गुणान् गुणिनो हन्ति न स्तात्यात्मगुणानपि।
प्रह्रप्यते नान्यदोधैरनसूया प्रकीर्तिता।।
अपरे बन्धुणे या मित्र देष्टर या सदा।
आत्मवद्वर्तनं यत् स्यात् सा दया परिकीर्तिता।।
चाचा मनसि काये च दु:नीत्यादिलेन च।
न कुप्यति न चाप्रीतिः सा क्षमा परिकीर्तिता।।
अभक्ष्यपरिहारश्च संसर्गश्चाप्यनिन्दितैः।
आचारे च व्यवस्थानं शौचमेतत् प्रकीर्तितम्।।
शरीरं पीड्यते बैन शुभेनापि च कर्मणा।
अत्यन्तं तत्र कुर्वीत अनायासः स उच्यते।।
प्रशस्ताचरणं नित्यप्रशस्तविवर्जनम्।
एतद्धि मङ्गलं प्रोत्त्कं मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः।।
स्तोकादपि प्रदातव्यमदीनेनान्तरात्मना।
अहन्यहनि यत्किंचिदकार्पण्यं तदुच्यते।।
यथोत्पत्रेन संतुष्टः स्वल्पेनाप्यथ वस्तुना।
अहिंसया परस्वेपु साडस्पृहा परिकीर्तिता।।
Summary of chapter 1 of the Bhavishya Purāṇa is as follows:
The opening chapter establishes the sacred transmission of the Bhaviṣya Purāṇa. Sumanta Maharṣi arrived at the court of King Śatānīka accompanied by great sages — Vasiṣṭha, Parāśara, Jaimini, Yājñavalkya, Gautama, Vaiśampāyana, Śaunaka, Āṅgira, and Bhāradvāja. At the king's earnest entreaty, Vyāsa himself appeared and appointed Sumanta as narrator. Sumanta then imparted the Brahma Parva in full. The chapter establishes the five-parva structure of the Purāṇa and proceeds to the cosmology: Nārāyaṇa creates first from water, then the golden cosmic egg, then Brahma emerges. The fourfold varṇa system arises from Brahma's four faces — the Ṛgveda from the east face (taught by Vasiṣṭha), Yajurveda from the south (Yājñavalkya), Sāmaveda from the west (Jaimadagni), Atharvaveda from the north (Sumantu). The four yugas, their characteristic dharmas, and the full cycle of cosmic time are laid out. The Purāṇa itself is declared the supreme means of svasti, wisdom, fame, and liberation.