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अहन्यहनि विमेन्द्र स तेषां मुनिसत्तमः चकाराहारपयसा तथा गुप्तचा च पोपणम्

मार्कण्डेयजी बोले- हे मुनिश्रेष्ठ जैमिनि ! दिन, दिन उन ब्राह्मणश्रेष्ठ शमीक मुनि ने दूध से उन बच्चों का यथाविधि पालन किया मासमात्रेण जग्मुस्ते भानोः स्यन्दनवर्त्मनि कौतूहलविलीलाक्षैष्टा मुनिकुमारकैः

एक महीना व्यतीत होने पर वे बच्चे कौतूहल पूर्वक मुनि बालकों के देखते-देखते एक दिन सूर्य के रथ तक उड़ गये दृष्ट्वा महीं मनगरां साम्भोनिधिसरिराम् रथचक्रमाणां ने पुनराश्रममागताः

सूर्य के रथ के पहिये के पास से उन्होंने पृथ्वी को नगर, समुद्र, नदी आदि से युक्त देखा तथा फिर श्रपने श्राश्रमको वे वापिस आगये श्रमान्नान्तरात्मानो महात्मानो वियोनिजाः ज्ञानञ्च प्रकटीभूतं तत्र तेषां प्रभावतः

वै महान् श्रात्मा वाले पक्षी परिश्रम से थकित होगये परन्तु सूर्य के पास तक पहुँचने के प्रभाव से उनको ज्ञान प्रगट हुआ ऋषेः शिष्यानुकम्पार्थं वदतो धर्म्मनिश्रयम् कृत्वा प्रदक्षिणं सर्व्वे चरणावभ्यवादयन्

जहाँ पर ऋषि शमीक अपने शिष्यों पर कृपा करके धर्म के तत्व को वर्णन करते थे वहाँ उन पक्षियों ने उनकी परिक्रमा कर उनके चरणों में प्रणाम किया ||५|| ऊ मरणादयोरान्मोक्षिताः स्मरस्त्रया मुने श्रावाम-भक्ष्य-पयसां त्वं नो दाता पिता गुरुः ||६

और वोले, “हे मुनि ! थापने हमको घोर मृत्यु से बचाया है तथा दूध पिला कर हमारा पालन किया है अतः हमारे दाता पिता, गुरु आप ही हैं गर्भस्थानां सूना माना पित्रा नैवापि पालिताः।  त्वया नो जीवितं दत्तं शिशवो येन रक्षिताः

जब हम गर्भ में ही थे हमारी मातां मरगई और न हमको पितां ने ही पाला है आपने हमें पुत्रों की तरह दूध पिला-पिलाकर पाला है और हमारी रक्षा की है ! क्षितावक्षततेजास्त्वं कृमीरणामिव शुप्यताम् गजघण्टां समुत्पाव्य कृतवान दुःखरेचनम्

इस पृथ्वी पर आपका तेज अक्षय है. कीड़ों की तरह सूखते हुए हमको आपने हाथी के घण्टे के नीचे से निकाल कर दुःख से मुक्त किया है कथं वद्धे युवा स्वस्थान द्रक्ष्याम्यहं कदा |

कदा भूमे मं प्राप्तान् द्रक्ष्ये वृक्षान्तरं गतान्

कब हम लोगों को चल की प्राप्ति होगी तथा अपने अपने स्थान को हम कंव देखेंगे और पृथ्वी के वृक्षों पर पहुँच कर कब हम वृक्षों के अन्तर्गत पक्षियों से मिलगे ? || कदा मे सहजा कान्तिः पांशुना नाशमेष्यति। एप पक्षानिलोत्थेन मत्समीपविचारिणाम् ||१०|| हमारी स्वाभाविक कांति हमको कब मिलेगी, नाना प्रकार की गर्द इत्यादि से हमारी सफाई कब होगी तथा हमारे पंखों से  हवा कब निकलेगी ? १०

इति चिन्तयता तात भवता प्रतिपालिताः ते साम्पतं प्रवृद्धाः स्मः प्रबुद्धाः करवाम किम् ११॥

अव हम यह सोचते हैं कि आपने हमारा पालन किया है, अब हम बड़े होगये हैं कृपा कर बताइये आपकी आज्ञा का पालन करें" ११ इत्यृषिर्वचनं तेषां श्रुत्वा संस्कारवत् स्फुटम् शिष्यैः परिवृतः सर्वैः सह पुत्रेण शृङ्गिणा

शमीक ऋषि ने इस प्रकार संस्कारयुक्त और स्पष्ट उन पक्षियों के वचनों को सुना उस समय ऋषि अपने शिष्यों व पुत्र के साथ बैठे हुये थे ||१२|| कौतूहलपरो भूत्वा रोमांचपटसम्वृतः उवाच तत्त्वतो ब्रूत प्रवृत्तेः कारणं गिरः १३

कुतूहलवश तथा रोमांचित होकर ऋषि ने तत्वपूर्वक उनसे उनकी उत्पत्ति का कारण पूछा १३ कस्य शापादियं प्राप्ता भवद्भिर्विक्रिया परा। रूपस्य वचसचैव तन्मे वक्तुमिहार्हथ १४

किसके शाप से तुम इस विकृत रूप में आये और ये रूप तथा वोलने की शक्ति तुम्हें किस प्रकार प्राप्त हुई यह सविस्तर बतलायी १४

पक्षिण ऊचुः

विपुलस्वानिति ख्यातः मागासीन्मुनिसत्तमः तस्य पुत्रद्वयं जज्ञे सुकृषस्तुम्बुरुस्तथा १५॥

पक्षी वोले- हे मुनिवर ! प्राचीन काल में विपुलखान नाम का एक पुरुष था जिसके दो पुत्र हुये जिनमें एक का नाम सुकुश और दूसरे का नाम तुम्बुरु था | सुकृषस्य वयं पुत्राश्चत्वारः संयतात्मनः तस्यर्षेर्विनयाचार-भक्तिनम्राः सदैव हि

सुकृश के हम जितेन्द्रिय चार पुत्र हुये हम लोगों की विनय, आचार, भक्ति और नम्रता सर्वदा ऋषियों की सी थी १६॥

तपश्चरणसक्तस्य शास्यमानेन्द्रियस्य च यथाभिमतमस्माभिस्तदा तस्योपपादितम् ॥१७॥

तपस्या करते हुये, तथा इन्द्रियों को जीतते हुये हमारे पिता, हम जिस वस्तु की अभिलाषा करते थे, उसी को उत्पादन. करते थे १७ समित्पुष्पादिकं सर्व्वं यच्चैवाभ्यवहारिकम् एवं तत्राथ वसतां तस्यास्माकञ्च कानने ॥१८॥

हमारे वन में जहाँ कि हम रहते  थे शमी के फूल आदि जो भी व्यावहारिक वस्तुएँ थीं सब मौजूद थीं १८ श्राजगाम महावर्ष्या भग्नपक्षो जरान्वितः श्राताम्रनेत्रः सस्तात्मा पक्षी भूत्वा सुरेश्वरः १६

एक दफा वहाँ राजा इन्द्र पक्षी के स्वरूप में श्राये उस समय वे विशाल काय, पंख टूटा हुआ, बुढ़ापा छाया हुआ, तांबे के से नेत्र वाले तथा डरे हुये से ऐसे रूप में थे १६ सत्य- शौच-क्षमाचारमतीवोदारमानसम् जिज्ञासुस्तमृषिश्रेष्ठमस्मच्छापभवाय च ॥२०॥

ऋषिश्रेष्ठ सुकुश के पास जो सत्यवादी पवित्र, क्षमावान्, सदाचारयुक्त एवं उदार चित्त थे, राजा इन्द्र शाप के भय से डरते हुए से उनकी परीक्षा के लिये श्राये २०

पयुवाच

द्विजेन्द्र मां क्षुधाविष्टं परित्रातुमिहार्हसि भक्षणार्थी महाभाग गतिर्भव ममातुला २१

इन्द्ररूपी पक्षी बोला- हे विप्रवर महाभाग ! मैं भिक्षार्थी और क्षुधा श्राप मेरी रक्षा करते में समर्थ हैं ॥२१॥ विंध्यस्य शिखरे तिष्ठन् पत्रिपरितेन वै पतितोऽस्मि महाभाग श्वसनेनातिरंहसा ॥२२॥

हे भगवन् !मै पीड़ित हूँ, मैं चलने फिरने में असमर्थ हूँ. मैं विंध्याचल पर्वत की चोटी पर रहता था, वहाँ से पक्षियों के राजाने  मुझे निकाल दिया और उन्हों इस प्रकार हटाया कि मैं गिर पड़ा २२ सोऽहं मोहसमाविष्टो भूमौ सप्ताहमस्मृतिः स्थितस्तत्राष्टमेनाह्ना चेतनां प्राप्तवानहम् ||२३||

मैं एक सप्ताह तक पृथ्वी पर अचेत पड़ा रहा आठवें दिन मुझे चेत हुआ || २३ || प्राप्तचेताः क्षुधाविष्टो भवन्तं शरणं गतः पक्ष्यार्थी विगतानन्दो दूयमानेन चेतसा ||२४||

होश आने पर भूख से व्याकुल होकर दुःखित मन हो श्रानन्द- रहित दशा में खाने की इच्छा से आपकी शरण में आया हूँ २४ वामजमते मत्त्राणायाचलां मतिम्

प्रयच्छ भक्ष्यं विमर्षे मारणयात्राक्षमं मम ||२५||

हे विमल मति वाले ! हे ब्राह्मणों में ऋषि ! मेरी रक्षा करने के निमित्त अचल मति वाले हो जाओ और मुझे भोजन को आहार दो  जिससे मेरी जीवनकी यात्रा का अन्त न हो ||२५||

स एवमुक्तः प्रोवाच तमिन्द्रं पक्षिरूपिणम् प्राणसन्धारणार्थाय दास्ये भक्ष्यं तवेप्सितम् २६

इस प्रकार कहे जाने पर ऋषि ने उन पक्षीरूपी इन्द्र से कहा, "तुम्हारी इच्छानुसार भोजन तुमको प्राण धारण करने के लिये दूँगा” २६ इत्युक्त्वा पुनरग्येनमपृच्छत् स द्विजोत्तमः आहार : कस्तवार्थाय उपकल्प्यो भवेन्मया स चाह नरमांसेन तृप्तिर्भवति मे परा ॥२७॥

वह ब्राह्मण श्रेष्ठ यह कहकर उससे पूछने लगे "तुम्हारे लिये कौनसा आहार हम प्रस्तुत करें " वह वोला कि मेरी तृप्ति मनुष्य का मांस भक्षण करने से होती है २७ ऋषिरुवाच

कौमारं ते व्यतिक्रान्तमतीतं यौवनञ्च ते वयसः परिणामस्ते वर्त्तते नूनमण्डज ॥२८॥

ऋषि बोले- हे पक्षी ! तुम्हारी कुमार अवस्था तथा जवानी बीत चुकी है और अब तुम इस बुढ़ापेकी अवस्था पर पहुँच चुके हो २८ यस्मिन् नराणां सर्व्वेषामशेपेच्छा निवर्त्तते स कस्मादवृद्धभावेऽपि सुनृशंसात्मको भवान् ||२६||

इस अवस्था में मनुष्यों की इच्छाओं की समाप्ति होजाती है इस लिये इस वृद्धावस्था में भी क्योंकर तुम इतने निर्दय श्रात्मा वाले हो  || क मानुपस्य पिशितं क वयश्वरमं तव सर्व्वया दुष्टभावानां प्रशमो नोपपद्यते ॥३०॥

कहाँ तुम्हारी बुढ़ापे की अवस्था और कहाँ नर-मांस खानेकी लालसा ? यह सत्य है कि दुष्टों की दुर्भावनाओं की शान्ति है कभी नहीं होती ३० अथवा किं ममैतेन मोक्तेनास्ति प्रयोजनम् प्रतिश्रुत्य सदा देयमिति नो भावितं मनः ॥३१॥

अथवा यह कि मुझे इन  सब बातों के कहने से क्या प्रयोजन है। जो कुछ तुमने माँगा है वह मुझे देना ही योग्य है ३१ इत्युक्त्वा तं स विद्रस्तथेति कृतनिश्चयः शीघ्रमस्मान् समाहूय गुणतोऽनुप्रशस्य च ३२

वह ब्राह्मण शिरोमणि ( सुकृश ) उससे ऐसा कह कर तथा तदनुसार निश्चय करके हम सबको शीघ्र बुलाकर हमारे गुणों की प्रशंसा करने लगे उवाच क्षुब्धहृदयो मुनिर्वाक्यं सुनिष्ठुरम् विनयावनतान् सर्वान् भक्तियुक्तान् कृताञ्जलीन् ३३॥

फिर विनय से झुके हुये और भक्ति पूर्वक हाथ जोड़े हुये हम से दुखित हृदय मुनिने निठुर वचन कहने शुरू किये ३३ कृतात्मानां द्विजश्रेष्ठा ऋणैर्मुक्ता मया सह जातं श्रेष्ठमपत्यं वो यूयं मम यथा द्विजाः ३४

हे पुत्रो ! तुम मुझ से उत्पन्न हुये श्रेष्ठ ब्राह्मणों की तरह उत्तम सन्तान कहलाने योग्य हो तथा मेरे ऋण से भी मुक्त | नहीं हुए हो ३४ गुरुः पूज्यो यदि मतो भवतां परमः पिता ततः कुरुत में वाक्यं निर्व्यलीकेन चेतसा

जिस प्रकार गुरु पूज्य है उसी प्रकार पिता भी परम पूज्य है इसलिये जो मैं कहूँ उसे बिना किसी छल के करो ३५ तद्वाक्यसमकालञ्च प्रोक्तमस्माभिरादृतैः यद्वक्ष्यति भवांस्तद्वै कृतमेवावधार्यताम् ||३६||

हम सब ने कहा कि जो कुछ आप आशा करेंगे उसको हम चादर पूर्वक शिरोधार्य करेंगे || ३६ ||

ऋषिरुवाच

मामेप शरणं प्राप्तो विहगः क्षुपान्वितः युष्मन्मांसेन येनास्य क्षणं तृप्तिर्भवत्विति तृष्णाक्षयश्थ रक्तेन तथा शीघ्रं विधीयताम् ||३७||

ऋषि बोले- यह पक्षी भूख और प्यास से व्याकुल होकर मेरी शरण में आया है। तुम्हारे मांस से इसकी क्षणभर में तृप्ति होजावेगी यह पक्षी तुम्हारे रक्त से अपनी तृपा शांत करेगा इसलिये शीघ्र तैयारहो जाओ ३७ ततो वयं प्रव्यथिताः प्रकम्मोदभूतसाध्वसाः कष्टुं कष्टमिति मोच्य नैतत् कर्मेति चाब्रुवन् ३८

इसके बाद हम लोग बहुत दुःखित हुए तथा भय से काँप गये और यह बोले, "यह काम बड़े कष्ट का है, हम से यह कर्म न होगा ३८ कथं परशरीरस्य हेतोर्देहं स्वकं बुधः

विनाशयेद्घातयेद्वा यथा ह्यात्मा तथा सुतः || ३६ | दूसरे के शरीर के लिये बुद्धिमान  अपने शरीर को क्यों नष्ट करे ? जैसा अपना शरीर है वैसा ही पुत्र का होता है ३६ पितृ देव-मनुष्याणां यान्युक्तानि ऋणानि वै। तान्यपाकुरुते पुत्रो न शरीरप्रदः सुतः ॥४०॥

मनुष्यों में पितृदेव का ऋणी तो पुत्र होता है परन्तु जो  शुक ऋण हों उनको चुकाना चाहिये, पुत्र को प्राणों की बलि न देना चाहिये ४० तस्मान्नैतत् करिष्यामो नो चीर्णं यत् पुरातनैः। जीवन् भद्राण्यवाप्नोति जीवन् पुण्यं करोति च४१

इसलिये हम ऐसा नहीं कर सकते, यदि जीवन है तो शरीर ॥ ४१

मृतस्य देहनाशश्च धर्म्माद्युपरतिस्तथा आत्मानं सर्व्वतो रक्ष्यमाहुर्धर्म्मविदो जनाः ४२

मर जाने पर तथा देह के नष्ट होजाने के कल्याणके निमित्तं बहुत पुण्य किया जा सकता पर धर्मादि का शुभाचरण किस प्रकार होगा ? इसलिए धर्म के तत्व को जानने वाले पुरुषों ने कहा है कि अपनी देह की सर्वथा रक्षा करनी चाहिये” ४२ इत्थं श्रुत्वा वचोऽस्माकं मुनिः क्रोधादिव ज्वलन्। प्रोवाच पुनरप्यस्मान निर्दहन्निव लोचनैः ॥४३॥

हमारा इस प्रकार वंचन सुनकर मुनि ने क्रोध से जलते हुए लाल-लाल आँखें कर हम से कहा ४३ प्रतिज्ञातं वचो महां यस्मान्नैतत् करिष्यथ तस्मान्मच्च्छापनिर्दग्धास्तिर्य्यग्योनौ प्रयास्यथ ४४

तुम लोगों ने पहिले वचन देकर प्रतिज्ञा की और अब कहते हो ऐसा नहीं करेंगे इसलिए मेरे शाप से भस्म होकर पक्षियों की योनि में पहुँचोगे ४४ एवमुक्त्वा तदा सोऽस्मांस्तं विहङ्गमथाब्रवीत् अन्त्येष्टिमात्मनः कृत्वा शास्त्रतश्चौद्गर्ध्वदेहिकम् ४५

हमसे यह कहकर वह उस इन्द्ररूपी पक्षी से बोले, "अपनी अंत्येष्टि शास्त्रानुकूल चूँकि तुमको विश्वास दिला करके श्राद्ध किये लेता हूँ ४५ भक्षयस्व सुविश्रब्धो मामत्र द्विजसत्तम आहारीकृतमेतत् ते मया देहमिहात्मनः ४६

हे पक्षिराज ! जा चुका है इसलिए तुम मुझको भक्षण करो और मेरी देह को अपना श्राहार बनायो ४६

एतावदेव विप्रस्य ब्राह्मणत्वं प्रचक्ष्यते यावत् पतगजात्यग्र्य स्वसत्यपरिपालनम् ॥४७॥

विप्र का ब्राह्मणत्व तभी . तक समझना चाहिये जब तक कि वह अपने वचन व सत्य का पालन करता है ४७ न यज्ञैर्दक्षिणावद्भिस्तत् पुण्यं प्राप्यते महत् कर्म्मणान्येन वा विप्रैर्यत् सत्यपरिपालनात् ४८

जो महान पुराय यज्ञ करने, दक्षिणा देने और तप करने से भी नहीं होता वह केवल ब्राह्मणों द्वारा सत्य वचन पालन करने ही से हो जाता है" ॥४८ इत्यृषेर्वचनं श्रुत्वा सोऽन्तर्विस्मयनिर्भरः  प्रत्युवाच मुनिं शक्रः पक्षिरूपधरस्तदा ४६

तव उस ऋषि के यह वचन सुनकर अत्यन्त विस्मय को प्राप्त हुए पक्षीरूप राजा इन्द्र मुनि से यह बोले॥ ४६

योगमास्थाय विमेन्द्र त्यजेदं स्वं कलेवरम् : जीवज्जन्तुं हि विजेंद्र न भक्षामि कदाचन ५०

हे विप्रवर ! योग की शरण लेकर अब मैं इस शरीर को छोड़ दूँगा व मैं कभी किसी जीव जन्तु को न खाऊँगा ॥५०॥ तस्यैतद्वचनं श्रुत्वा योगयुक्तोऽभवन्मुनिः तं तस्य निश्चयं ज्ञात्वा शक्रोऽप्याह स्वदेहभृत् ५१

उसके इस प्रकार वचन सुनकर सुकुश मुनि ने योगाभ्यास द्वारा विचारा उनके इस प्रकार निश्चय को देखकर इन्द्र अपने असली शरीर को धारण कर बोला भो भो विमेन्द्र बुध्यस्व बुध्या वोध्यं बुधात्मक न भक्षयस्व सुविश्रब्धो मामत्र द्विजसत्तम आहारीकृतमेतत् ते मया देहमिहात्मनः ४६

एतावदेव विप्रस्य ब्राह्मणत्वं प्रचक्ष्यते यावत् पतगजात्यग्र्य स्वसत्यपरिपालनम् ॥४७॥

न यज्ञैर्दक्षिणावद्भिस्तत् पुण्यं प्राप्यते महत् कर्म्मणान्येन वा विप्रैर्यत् सत्यपरिपालनात् ४८

इत्यृषेर्वचनं श्रुत्वा सोऽन्तर्विस्मयनिर्भरः  प्रत्युवाच मुनिं शक्रः पक्षिरूपधरस्तदा ४६

योगमास्थाय विमेन्द्र त्यजेदं स्वं कलेवरम् : जीवज्जन्तुं हि विजेंद्र न भक्षामि कदाचन ५०

तस्यैतद्वचनं श्रुत्वा योगयुक्तोऽभवन्मुनिः तं तस्य निश्चयं ज्ञात्वा शक्रोऽप्याह स्वदेहभृत् ५१

उसके इस प्रकार वचन

जिज्ञासार्थं मयाऽयं ते अपराधः कृतोऽनव ५२

हे ब्राह्मण श्रेष्ठ ! आप निष्पाप और बुद्धिमान हैं, आप अज्ञानियों को वोध कराने वाले हैं मैंने परीक्षा करने के हेतु यह अपराध अपने शिर पर लिया ५२ तत् क्षमस्वामलमते का चेच्छा क्रियतां तव पालनात् सत्यवाक्यस्य प्रीतिर्मे परमा त्वयि ५३ अतः हे स्वच्छ वुद्धिवाले महात्मन् ! मुझको क्षमा करो। आपकी क्या इच्छा है ? उस की पूर्ति की जाय आपके सत्य वचन पालन से श्राप में मेरी दृढ़ प्रीति होगई है ५३

अद्य ममृति ते ज्ञानमैन्द्रं प्रादुर्भविष्यति तपस्यथ तथा धर्मे न ते विघ्नो भविष्यति || ५४ ||

आज से आपका ज्ञान इन्द्र सम्वन्धी प्रगट होगा आप  तपस्या कीजिये, आपके धर्म में कोई विघ्न न होगा || ५४ इत्युक्त्वा तु गते शक्रे पिता कोपसमन्वितः प्रणम्य शिरसास्माभिरिदमुक्तो महामुनिः || ५५२|||

यह कहकर इन्द्र चले गये और क्रोध से एक्त महामुनि अपने पिता से हम शिर से प्रणाम कर यह बोले ५५

विभ्यतां मरणात् तात त्वमस्माकं महामते क्षन्तुमर्हसि दीनानां जीवितप्रियता हि नः ५६

हे पिता ! हे महान् बुद्धि वाले ! हम लोगों को जीवन प्रिय हैं हम दीनों को मरने के भय से आप मक्त करने को समर्थ हैं ५६ त्वगस्थिमांससङ्घाते पृयशोणितपूरिते कर्त्तव्या न रतिर्यत्र तत्रास्माकमियं रतिः ||५७

यह शरीर चर्म, हड्डी, मांस, पीव और रुधिर से पूर्ण है इसमें अधिक आसक्ति न होनी चाहिये हम इसमें अधिक रत होगये ||१७|| श्रूयतांच महाभाग यथा लोको विमुर्खात कामक्रोधादिभिर्दो पैरवशः प्रवलारिभिः ५८॥

हे महाभाग ! सुनिये. जिस तरह संसार में हर एक प्राणी काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि प्रबल शत्रुनों से मोहित होता हुआ श्रवश ५८ प्रज्ञामाकारसंयुक्तमस्थिस्थूणं पुरं महत् चर्म्मभित्तिमहारोधं मांसशोणितलेपनम् ५६

यह शरीर एक महलके सहशहै जिसमें सुद्दढ़ एक कोट के समान हैं चमड़ा जिसमें भीत : अर्थात् प्लास्टर के समान है ५६

नवद्वारं महायासं सर्व्वतः स्नायुवेष्टितम् नृपश्च पुरुपस्तत्र चेतनावानवस्थितः ॥६०॥

इसके समान है तथा मांस और रुधिर जिसका ले बड़े-बड़े दरवाज़े हैं जिनपर स्नायुत्रों का पहरा है इसका राजा जो उसके अन्दर बैठता है पुरुष है ६० मन्त्रिणां तस्य बुद्धिश्च मनचैव विरोधिना  यतेते वैरनाशाय तावुभावितरेतरम् ६१

  उसके दो मन्त्री हैं, वे हैं मैं एक दूसरे के विरोधी मन और बुद्धि, जहाँ एक दूसरे से झगड़ने लगते हैं वहाँ राजांका न हो जाता है ६१ नृपस्य तस्य चत्वारो नाशमिच्छन्ति विद्विपः

कामः क्रोधस्तथा लोभो मोहश्चान्यस्तथा रिपुः। ६२॥

उस राजा का नाश बहुत वैरी चाहते हैं उनमें काम, क्रोध, लोभ,  आदि तथा और भी दूसरे इस राजा के  शत्रु है।

यंदा तु स नृपस्तानि द्वाराण्यावृत्य तिष्ठति तदा सुस्थबलचैव निरातङ्कश्च जायते ६३

 यदि राजा अपने द्वारों को बन्द करके रक्षा हुआ बैठता है तो वह स्वस्थ, बलवान् और भय, रहित होता है ६३

जातानुरागो भवति शत्रुभिर्नाभिभूयते ६४॥

 वह सुखी रहता है और शत्रुओं से दलित नहीं होता है ६४

यदा तु सर्व्वद्वाराणि विवृतानि समुञ्चति रागो नाम तदा शत्रुत्रादिद्वारमृच्छति ॥६५॥

यदि वह सब द्वारों को खुले रखता है और वह राग नामक शत्रु उसके नेत्र द्वार में होकर प्रवेश करनेन करता है ६५ सर्व्वव्यापी महायामः पञ्चद्वारप्रवेशनः | तस्यानुमार्ग विशति त घोरं रिपुत्रयम् ६६॥ || वह राग नामक शत्रु  व्यापी होता हुआ पाँच द्वारों से प्रवेश चाहता है और उसके साथ तीन श्रीर शत्रु उसके मार्ग  द्वारा प्रविष्ट होना चाहते हैं ६६ प्रविश्याथ स वै तत्र द्वारैरिन्द्रियसंज्ञकैः

रागः संश्लेषमायाति मनसा च सहेतरः ||६७॥

श्रादिक अनेकों द्वारों से घुस कर मन तथा रिपुत्रों से सहकारिता प्राप्त कर लेता है ६७ इन्द्रियाणि मनश्चैव वशे कृत्वा दुरासदः द्वाराणि च वशे कृत्वा माकारं नाशयत्यथ ६८ ||

फिर वह इन्द्रियों और मन को वश में करके द्वारों को अधीन कर उस कोटको तोड़ता है ॥६ मनस्तस्याश्रितं दृष्ट्वा बुद्धिर्नश्यति तत्क्षणात् अमात्यरहितस्तत्र पौरवगज्झितस्तथा ६६

मन को उसके आश्रित देखकर बुद्धि भी उसी क्ष नष्ट हो जाती है और फिर चेतन पुरुष वि मन्त्रियों के अकेला रह जाता है ६६

..रिपुभिर्लब्धविवरः स नृपो नाशमृच्छति एवं रागस्तथा मोहो लोभः क्रोधस्तथैव च ॥७०॥

इसक जिसके शत्रुओंों ने छिद्रों को प्राप्त कर लिया ऐसा राजा नाश को प्राप्त होता है यह तो  का हाल कहा इसी प्रकार मोह, लोभ और क्रोध को समझना चाहिये ७०

वर्त्तन्ते दुरात्मानो मनुष्यस्मृतिनाशकाः रागात् क्रोधः प्रभवति क्रोधालोभोऽभिजायते ७१

मनुष्य की स्मृति अर्थात् बुद्धि को नाश करने वाले ये दुरात्मा रूप शत्रु हर समय मौजूद रहते हैं राग से क्रोध होता है और क्रोध से लोभ होता है ७१ तोभाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः। :मृतिभ्रंशादबुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति७२॥

लोभ से मोह और मोह से विभ्रम होता है। स्मृति के विभ्रम से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि नष्ट होने पर प्राणों का अपहरण हो जाता है ७२ एवं प्रनष्टबुद्धीनां रागलोभानुवर्त्तिनाम् तीविते च स लोभानां प्रसादं कुरु सत्तम ॥७३॥

हे मुनिश्रेष्ठ ! हम नए बुद्धि वालों, राग और लोभ के पीछे चलने वालों तथा जीवन के लोभ करने वालों पर कृपा कीजिये ७३ पोऽयं शापो भगवता दत्तः स न भवेत् तथा तामसीं गतिं कष्टां व्रजेम मुनिसत्तम ॥७४

हे मुनिवर ! जो यह शाप श्रपने दिया है वह न हो और हम तामसी गति को प्राप्तन हों” ७४

ऋषिरुवाच

न्मयोक्तं न तन्मिथ्या भविष्यति कदाचन मे वागनृतं प्राह यावदद्येति पुत्रकाः

ऋषि बोले- "जो मैंने कहा है वह कभी मिथ्या नहीं हो सकता हे पुत्रो ! मेरा वाक्य आज तक मिथ्या नहीं हुआ ७५ वमत्र परं मन्ये धिक् पौरुषमनर्थकम् प्रका कारितो येन वलादहमचिन्तितम् ७६

मैं यहाँ पर पुरुषार्थ से देव को अधिक मानता हूँ जिसने बल पूर्वक यह .. अर्थ रूप कार्य करा दिया ७६

रस्माच्च युष्माभिरहं प्रणिपत्य प्रसादितः स्मात् तिर्य्यक्त्वमापन्नाः परं ज्ञानमवाप्स्यथ ||७७||

अव जो कि तुमने मुझे प्रणाम कर प्रसन्न किया है इसलिये तुम पक्षी योनि में प्राप्त होकर भी परम ज्ञान से युक्त होगे || ७७ || आनदर्शितमार्गाश्च निद्ध तक्लेशकल्मषाः [त्मसादादसन्दिग्धाः परां सिद्धिमवाप्स्यथ ||७८ ||

ज्ञान द्वारा दिखाये हुए जितने मार्ग हैं उनपर चलने से तुम क्लेश और पाप से रहित होगे मेरे प्रसाद से निश्चय ही तुम परम सिद्धि को प्राप्त होगे" ७८ वं शप्ताः स्म भगवन् पित्रा दैववशात् पुरा तः कालेन महता योन्यन्तरमुपागताः ॥७६॥

हे भगवन् ! हे शमीक मुनि ! दैवयोग से पिता द्वारा इस प्रकार शापित हुए हम उस समय पक्षी योनि में पहुँच गये ७६ मध्ये वै भवता परिपालिताः यमित्थं द्विजश्रेष्ठ खगत्वं समुपागताः ||८०||

हे द्विजवर ! हम रणभूमि में. श्राकर उत्पन्न हुए और श्रापने हमारा पालनकिया, इस प्रकार हम पक्षीरूप में मौजूद हैं ८० त्यसाविह संसारे यो न दिष्टेन वाध्यते पामेव जन्तूनां दैवाधीनं हि चेष्टितम् ||८१

इस संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसको प्रारब्ध से बाधा न पहुँची हो सब जीव-जन्तु देव के ही श्रधीन वर्तन करते हैं ८१ मार्कण्डेय उवाच ति तेषां वचः श्रुत्वा शमीको भगवान् मुनिः स्युवाच महाभागः समीपस्थायिनो द्विजान् ||८२

मार्कण्डेयजी बोले-- इस प्रकार उनका वचन सुनकर महात्मा शमीक अपने पास बैठे हुए शिष्यों से वोले ॥८२॥

मेव मया प्रोक्तं भवतां सन्निवाविदम् मान्यपक्षिणो नैते केऽप्येते द्विजसत्तमाः युद्ध ऽपि न सम्प्राप्ताः पञ्चत्वमतिमानुषे ||८३

मैंने तुम लोगों को पहिले ही बताया था कि यह साधारण पक्षी नहीं है वरन कोई श्रेष्ठ जीव है जो कि ये मानवी रणभूमि में भी मृत्यु को प्राप्त न हुये ८३

प्रीतिमता तेन तेऽनुज्ञाता महात्मना 'मुः शिखरिणां श्रेष्ठं विध्यं द्रुमलतायुतम् ॥८४॥ फिर प्रेम पूर्वक उन महात्मा ने उन पक्षियों को आदेश किया कि पर्वतों में श्रेष्ठ तथा पेड़ों और लताओं के सहित विंध्याचल पर्वत पर आप लोग जाइये ८४

यावदद्य स्थितास्तस्मिन्नचले धर्म्मपक्षिणः तपःस्वाध्यायनिरताः समाधौ कृतनिश्चयाः ||८५

हे पक्षियो ! वहाँ जाकर रहकर तप, स्वाध्याय और समाधिमें निश्चय-. रूप से तत्पर रहिये || ८|| इति मुनिवरलब्धसत्क्रियास्ते मुनितनया विह- गत्वमभ्युपेताः गिरिवरगहनेऽतिपुण्यतोयेयतम - नसो निवसन्ति विन्ध्यपृष्ठे ८६ इस प्रकार शमीकमुनि की आज्ञा पाकर और उनसे सदुपदेश ग्रहण कर के वे पक्षीरूप मुनि-पुत्र अत्यन्त गहन विध्याचल - पर्वत की पीठ पर जहाँ अत्यन्त पवित्र जल वहता था प्रसन्न गन से रहने लगे ८६

इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में विन्ध्य प्राप्ति नाम तीसरा अध्याय समाप्त |