76

मार्कण्डेयउवाच

इत्येतत्कथितंतुभ्यंपञ्चमन्वन्तरंमया। चाक्षुपस्यमनोःपष्ठंश्रूयतामिदमन्तरम्॥१

इस प्रकार मैंने आपसे पाँचों मन्वन्तरों का वर्णन किया । अथ छठे मन्वन्तर चाक्षुप को सुनो॥ १ ॥

अन्यजन्मनिजातोऽसौचक्षुषःपरमेष्ठिनः। चाक्षुपत्वमतस्तस्यजन्मन्यस्मिन्नपिद्विज || २

हे द्विज ! पूर्व जन्म में यह परमेष्ठी चक्षुप के पुत्र थे अतः इस जन्म में यह चाक्षुप कहलाये ||२||

मित्रस्यराजर्षेर्भद्राभार्यामहात्मनः। जज्ञेसुतंसुविद्वांसंशुचिजातिस्मरंविभुम्॥३

राजर्षि श्रनमित्र की स्त्री से एक विद्वान और पवित्र पुत्र उत्पन्न हुआ जिसको कि पहिले जन्म की यादथी ॥ ३ ॥

जातंमातानिजोत्सङ्गेस्थितमुल्लाप्यतंपुनः। परिष्वजतिहार्देनपुनरुल्लापयत्यथ॥४॥

 जब ये उत्पन्न हुए तो माता ने इनको अपनी गोद में लेकर इनका दुलार किया तथा

प्यार करके वह इनको हृदय से चिपटातींथीं ॥ ४ ॥

जातिस्मरःसजातोवैमातुरुत्सङ्गमास्थितः। जहासतंतदामातासंक्रुद्धावाक्यमब्रवीत्॥५

माता की गोद में उनको पूर्व जन्म कीयाद आई और वे हँसने लगे।  इस पर मांताक्रोधित होकर उनसे कहने लगी ||५||

भीतास्मिकिमिदंवत्सहासोयद्वदनेतव। अकाजबोधःसज्जातःकच्चित्पश्यसिशोभनम्॥६

 हे वत्स ! तुम्हारे मुख पर यह हँसी कैसी ? इसको देखकर मैं डरती हूं।  तुमको यह समय बोध किस प्रकार हुआ ||६|| पुत्रउवाच

मांमिच्छतिपुरोमार्जारीकिंनपश्यसि। 'अन्तर्द्धानगताचेयंद्वितीयाजातहारिणी॥७

पुत्र बोला:-

क्या तुम नहीं देखतीं कि सामने खड़ी हुई मार्जारी मुझे खाना चाहती है और दूसरी अन्तर्द्धानहुई यह जातहारिणी हैं ॥ ७ ॥

पुत्रप्रीत्याचभवतीसहार्छामामवेक्षती। उल्लाप्योल्लाप्यबहुशःपरिष्वजतिमांयतः॥८

पुत्र-प्रेम से बाईहोकर तुम मुझको देखती हो और बहुत प्रकार से मेरा लाड़ चाव कर मुझे गले से लगाती हो ॥ ८ ॥

उद्भूतप्पुलकास्नेह-सम्भवात्राविलेक्षणा। ततोममागतोहासःशृणुचाप्यत्रकारणम्॥६

मार्कण्डेयजीबोले- अत्यन्तस्नेहसेतुम्हाराशरीरपुलकितहोरहाऔरनेत्रोंमेंआँसूहैं।तुम्हारीइसप्रीतिकोदेखकरमुझेहँसीआगई, अबइसकाकारणसुनो॥६॥

स्वार्थेप्रसक्तामार्जारीप्रसक्त'मामवेक्षते। तथान्तर्द्धानगाचैवद्वितीयाजातहारिणी॥१०॥

स्वार्थ के वशीभूत होकर यह विल्ली मुझको देख रही है और उसी प्रकार यह जातहारिणी भी

अपने स्वार्थ के लिये ही छिपी हुई मेरी ओर देखरही है ॥ १० ॥

स्वार्थायस्निग्धहृदयेयथैवैतेममोपरि। प्रवृत्तेस्वार्थमास्थायतथैवप्रतिभासिमे॥११

जिस प्रकार स्वार्थ से वे मुझेदेखती हैं उसी तरह मैं तुम्हारी प्रीतिभी समझताहूँ ॥ ११ ॥ किन्तुमदुपभोगायमाजरीजातहारिणी।

वन्तुक्रमेणोपभोग्यंमत्तःफलमभीप्स्यसि || १२||

 मेद केवल इतना ही है कि बिल्ली और जातहारिणी तो मुझे फौरन ही खाजाना चाहती

हैं और तुम धीरे धीरे मुझसे उपकार चाहतीहो ॥ १२ ॥

नमांजानासिकोऽप्येषनचैवोपकृतंमया। सङ्गतंनातिकालीनंपश्चसप्तदिनात्मकम्॥१३॥

 तुम नहीं जानती हो कि मैं कौन हूँ और तुम्हारा उपकार मुझसे न होगा । मेरी उत्पत्ति इन पाँच सात दिन की ही नहीं है ॥ १३ ॥

तथापिस्निह्यसेसाखापरिष्वजतिचाप्यति। तातेतिवत्सभद्रेतिनिर्व्यलीकंब्रवीषिमाम्॥१४

तौ भी तुम मुझसे इतना स्नेह करती हो औरतात, वत्स, भद्रादि कह कर अपने शरीर से चिपटाती हो ॥ १४ ॥ मातोवाच

नत्वामुपकारार्थंवत्सप्रीत्यापरिष्वजे। नचेदेतद्भवत्प्रीत्यैपरित्यक्तास्मयहंत्वया। स्वार्थोमयापरित्यक्तोयस्तत्तोमेभविष्यति॥१५

माता बोली:-

 हे वत्स ! मैं कुछ उपकार चाहने के लिये तुमको प्यार नहीं करती थी. तुम मुझसे प्रीति

छोड़ सकते हो, और तुमसे यदि मेरा कोई स्वार्थ भी सधे तो उसको मैं छोड़ती हूँ ॥ १५ ॥ मार्कण्डेयउवाच

इत्युक्त्वासातमुत्सृज्यनिष्क्रान्तासूतिकागृहात् जड़ाङ्गवाकरणंशुद्धान्तःकरणात्मकम्॥१६॥

मार्कण्डेयजी बोले—

जब यह कहकर वह उसे छोड़ कर सूतिका' गृह से निकल गई तो उस जड़ वाले, शुद्धात्माबालक को ॥ १६ ॥

जहारतंपरित्यक्तसातदाजातहारिणी। साहृत्वातंतदावालंविक्रान्तस्यमहीभृतः। प्रसृतंपत्नीशयनेन्यस्यतस्याददेसुतम् ||१७||

जिसको कि उसकी माता ने छोड़ दिया था जातहारिणी उठाकर 'लेगई और उसे राजा विक्रम की प्रसूता स्त्री की शय्या पर रख दिया तथा उसकी जगह उस स्त्री के पुत्रकोउठाकर लेगई ॥ १७ ॥

तमप्यन्यगृहेनीत्वागृहीत्वातस्यचात्मजम्। तृतीयंभक्षयामाससाक्रमाज्जातहारिणी॥१८

फिर उस पुत्र को दूसरे घर में ले गई और वहाँ से जिस वालक को लाई वह तीसरा वालक जातहारिणी द्वारा भक्षण करलिया गया ||१८|

हृत्वाहृत्वातृतीयन्तुभक्षयत्यतिनिर्घृणा। करोत्यनुदिनंसातुपरिवर्त्तंतथान्ययोः॥१६

 इसी प्रकार निर्दयी जातहारिणी एक चालक को दूसरे घर और दूसरे को तीसरे घर ले जाकर बदलती है और अन्त में तीसरे कोखाजाती है ॥ १६ ॥

विक्रान्तेऽपिततस्तस्यसुतस्यैवमहीपतिः। कारयामाससंस्कारान्राजन्यस्यभवन्तिये ||२०||

राजा विक्रान्त ने भी उस पुत्रके राजाओं के से संस्कार कराये ॥ २० ॥

श्रानन्देतिचनामास्यपिताचक्रेविधानतः। मुदापरमयायुक्तोविक्रान्तःसनराधिपः॥२१॥

उसवालक के पिता राजा विक्रान्त ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उसका नाम विधि पूर्वकआनन्द रक्खा॥ २१ ॥

कृतोपनयनंतन्तुगुरुराहकुमारकम्। जनन्याःप्रागुपस्थानंक्रियताञ्चाभिवादनम्॥२२

उपनयन संस्कार करते हुए गुरु ने कुमार से कहा कि पहिले अपनी माता को प्रणाम करस्तुति करो ॥ २२ ॥

सगुरोस्तद्वचःश्रुत्वाविहस्यैवमथाब्रवीत्। वन्द्यामेकतमामाताजननीपालनीतुकिम्॥२३॥

 वह वालक गुरु के यह वचन सुन कर हँसा और बोला कि कौन सी माता की वन्दना करूँ, पालने वाली को अथवा जननेवाली की ॥ २३ ॥ गुरुरुवाच

नन्वियंतेमहाभागंजननीजारुथात्मजा। विक्रान्तस्याग्रमहिषीहैमिनीनामनामतः ||२४||

गुरु बोले:-

हे महाभाग ! विक्रान्त महाराज की जो यह सबसे श्रेष्ठ रानी हैमिनी है वही तुम्हारी माता हैउसकी बन्दना करो ||२४|| आनन्दउत्राच

इयंजनित्रीचैत्रस्यविशालग्रामवासिनः। विमाग्रयवोधपुत्रस्ययोऽस्यांजातोऽन्यतोवयम्२५॥

आनन्द बोला:-

यह हैमिनी तो विशाल नगर के निवासी चैत्रकी माता है ।  वह चैत्र बोध नाम ब्राह्मण का पुत्रकहलाता है, मेरी माता तो दूसरी है ॥ २५ ॥ गुरुरुवाच

कुतस्त्वंकथयानन्दचैत्रःकोवात्वयोच्यते। सङ्कटंमहदाभातिवजातोऽत्रब्रवीषिकिम् ||२६||

गुरु बोले:-

हे श्रानन्द ! यह तुम क्या कहते हो, यह चैत्र कौन है तथा तुम कहाँ उत्पन्न हुए हो, मुझसे

कहो। मुझे तुम्हारी वानोंसे बड़ा संकट होगया है ॥२६

 आनन्दउवाच

जातोऽहमवनीन्द्रस्यक्षत्रियस्यगृहेद्विज। तत्पत्न्यांगिरिभद्रायामाददेजातहारिणी ||२७||

श्रानन्द वोला:

मैं महाराज चक्षुष की भार्यां गिरिभद्रा से क्षत्रिय के घर उत्पन्न हुआ हूँ । मुझे जातहारिणीयहाँ उठाकर ले आई ॥ २७ ॥

तयात्रमुक्तोहैमिन्यागृहीत्वाचसुतञ्चसा। वोधस्यद्विजमुख्यस्यगृहेनीतवतीपुनः॥२८॥

वह मुझे हैमिनी के- पास छोड़ कर इसके पुत्र को ब्राह्मण श्रेष्ठ बोध के.घर लेगई ॥ २८ ॥

भक्षयामासचसुतंतस्यवोद्विजन्मनः। सतत्रद्विजसंस्कारैःसंस्कृतोहैंमिनीसुतः ||२६||

श्ररब्राह्मण बोध के पुत्र को वह जातहारिणी भक्षण कर गई। उस ब्राह्मण ने हैमिनी के पुत्र को ब्राह्मणोचित संस्कारों से पालाहै || २६ ॥

वयमत्रमहाभागसंस्कृतागुरुणात्वया। मयातववचःकार्य्यमुपैमिकतमांगुरो॥३०॥

 हें महाभाग ! आप गुरु हैं और आपने - ही मेरा संस्कार कराया है। मैं आपकी आज्ञा कों शिरोधार्य करता हूँ कहिये, मैं किसको मातासमझू॥ ३० ॥ गुरुरुवाच

श्रतीवंगहनंवत्ससङ्कटंसहदागतम्। नवेद्मिकिञ्चिन्मोहेनभ्रमन्तीवहिबुद्धयः॥३१

गुरु चोले:

हे वत्स ! अत्यन्त कठिन संकट उपस्थित होगया है, मोह से मेरी बुद्धि चक्कर खाती

और मेरी समझ में कुछ नहीं आता ॥ ३१ ॥ श्रानन्दउवाच

मोहस्यावसरःकोऽत्रजगत्येवंव्यवस्थिते।

कः कस्य पुत्रो विप्रर्षे को वा कस्य न वान्धवः॥ ३२ ॥

आनन्द बोला:–

हे ब्रह्मर्षि ! इस संसार की जसी स्थिति उसमें मोह की क्या आवश्यकता है, यहाँ कौन

किसका पुत्र है और कौन किसी का बन्धु है॥३२॥

आरभ्यंजन्मनोनृणांसम्वन्धित्वमुपैतियः। अन्येसम्बन्धिनोविममृत्युनासंनिवर्तिताः ||३३||

जोमनुष्यजन्मधारणकरतेहीसम्बन्धस्थापित करता है वह मरते ही सब सम्बन्धों को मिटादेताहै ||३३||  

अत्रापिजातस्यसतःसम्वन्धीयोऽस्यवान्धवैः।

सोऽप्यस्तंमन्ते देहस्य प्रयात्येपोऽखिलक्रमः ॥३४॥

यहाँ भी यही बात है जन्म के समयजिनभाईबन्धुओंसेसम्वन्धस्थापितहोताहैं. मरने पर वह सब छूट जाता है ॥ ३४ ॥

तो ब्रवीमि संसारे वसतः को न बान्धवः । कोवापिसंततंबन्धुःकिंवोविभ्राम्यतेमतिः : ३५||

इसलियेमैं कहता हूँ कि संसार में कौन किसी का वन्धु औरकौननहींहै।आपव्यर्थक्योंभ्रममेंपड़ते  हैं ३५

पितृद्वयंमयाप्राप्तमस्मिन्नेवहिजन्मनि।

मातृद्वयंचंकिंचित्रंयदन्यद्देहसम्भवे॥३६॥॥

इसी जन्म में मुझको दो पिता और दो माताएँमिलीं, इसमेंभीक्याआश्चर्यहै ? ॥३६॥

सोऽहंतपःकरिष्यामित्वयायोह्यस्यभूपतेः। विशालग्रामतःपुत्रश्चैत्रआनीयतामिह ||३७||

अतः मैं तो तप करूँगा और आप विशाल नगर इस राजा के पुत्र को ले आइये ||३७|| आनीयतामिह ||३७|| मार्कण्डेयउवाच

ततःसविस्मितोराजासभार्य्यःसहबन्धुभिः। तस्मान्निवर्त्यममतामनुमेनेवनायतम् ||३८||

मार्कण्डेयजी बोले-

तब वह राजा अपनी स्त्री और भाई-बन्धुओं सहित विस्मय को प्राप्त हुआ और उसमें से अपनी

ममता हटाकर उसको वन जाने की अनुमति देदी ||३८||

चैत्रमानीयतनयंराज्ययोग्यंचकारसः। सम्मान्यब्राह्मणंयेनपुत्रयुद्धयासपालितः || ३६

फिर राजा विक्रान्त ने अपने पुत्र चैत्र को बुलाकर उसको राज्य दे दिया और उस ब्राह्मण

को भी जिसने कि उसे पुत्र समझकर पाला थासम्मानित किया || ३६||

सोऽप्यानन्दस्तपस्तेपेबालएवमहावने। कर्म्मणांक्षपणार्थायविमुक्तःपरिपन्धिनाम् ||४०||

और वह चालक श्रानन्दभी वन में उन कर्मों का नाश करने के लिये जो मुक्ति-मार्ग में बाधक हैं तपस्या करने लगा ||४०||

तपस्यन्तंततस्तञ्चप्राहदेवःप्रजापतिः। किमर्थंतप्यसेवत्सतपस्तीव्रंवदस्वतत्॥४१||

 फिर प्रजापति ब्रह्माजी ने तपस्या करते हुए उस बालक से पूछा, "हे वत्स ! तुम यह उग्र तपस्याकिस लिये कर रहे हो, कहो " ॥ ४१ ॥ श्रानन्दउवाच

आत्मनःशुद्धिकामोऽहंकरोमिभगवंस्तपः। बन्धायममकर्माणियानितत्क्षपणोन्मुखः॥४२॥

आनन्द बोला--

हे भगवन् ! मैं अपनी आत्मा की शुद्धि के हेतु तथा उन कर्मोंके नाश करनेके लिये जोकि सांसारिकबन्धनों में डालते हैं तपस्या कर रहा हूँ ॥ ४२ ॥ ब्रह्मोवाच

क्षीणाधिकारोभवतिमुक्तियोग्योनकर्म्मवान्। सत्त्वाधिकारवान्मुक्तिमवाप्स्यतिकथंभवान्।४३

ब्रह्माजी बोले-

जिसका कर्म क्षीण हो जाता है वही मुक्ति के योग्य होता है, कर्मवान् की मुक्ति नहीं होती, इसलिये तुम सत्याधिकारी होकर मुक्तिको प्राप्तकरो ||४३

भवतामनुनाभाव्यंषष्ठेनब्रजतत्कुरु। लंतेतपसातस्मिन्कृतेमुक्तिमवाप्स्यसि॥४४॥

तुम जानो, तपस्या करने से तुमको कोई लाभ नहीं । तुम छठवें मनु होकर उसी कारण सेमुक्ति प्राप्त करोगे ॥ ४४ ॥ मार्कण्डेयउवाच

इत्युक्तोब्रह्मणासोऽपितथेत्युक्त्वामहामतिः। तत्कर्माभिमुखोयातस्तपसेोविररामह || ४५||

मार्कण्डेय बोले-

ब्रह्माजी के यह कहने पर उस महामति ने उन से कहा कि मैं ऐसा ही करूँगा और फिर उसने

तपस्या छोड़कर ब्रह्माजी के बताये हुए कर्मों मेंअपनी प्रवृत्ति की ॥ ४५ ॥

चाक्षुषेत्याहतंब्रह्मातपसेोविनिवर्त्तयन्। पूर्व्वंनाम्नाबभूवाथप्रख्यातचाक्षुषोमनुः॥४६॥

 तप से निवारण करते समय ब्रह्माजी ने उनसे चानुस कहा था, श्रौर यही उनका पहिला नाम था, इस कारण वे चानुपमनु कहलाये ||४६||

 उपयेमेविदर्भाससुतामुग्रस्यभूभृतः। तस्याञ्चात्पादयामासपुत्रान्प्रख्यातविक्रमान्४७॥

उन्होंने राजा उग्र की कन्या विदर्भा से अपना विवाह किया और उससे प्रतिबलवान् पुत्र उत्पन्न किये ॥ ४७ ॥

तस्यमन्वन्तरेशस्ययेऽन्तरत्रिदशाद्विज। येचर्षयस्तथैवेन्द्रोयेसुताश्वास्यतान्शृणु॥४८॥

उस मनु केमन्वन्तर में जो देवता, ऋषि, इन्द्र और उस मनु के पुत्र हुए उनको सुनो ॥ ४८ ॥

श्रीनामसुरास्तत्रतेषामेकोटकोगणः। प्रख्यातकर्म्मणांविप्रयज्ञेहव्यभुजामयम्॥४६

उस मन्वन्तर मेंआर्या नाम के देवता हुए और उनमें आठ देवता- विप्रओं का एक गण होता था । हे बिन ! ये देवतायामें हव्य भोजी प्रसिद्ध थे ॥ ४६ ॥

प्रख्यातबलवीर्याणांप्रभामण्डलदुदुहशाम्। द्वितीयथप्रसूताख्योदेवानामष्टकोगणः ||५० ||

प्रसिद्धबलवालेतथाप्रभामण्डलकेसदृशनेत्रवालेदेवताओंकेदूसरेश्रष्टकगणप्रसूतनामकेहुए॥५०॥

तथैवाष्टकएवान्योभव्याख्यादेवतागण: चतुर्थश्चगणस्तत्रयूथगाख्यस्तथाष्टकः॥५१॥

इसीप्रकार देवगणों का तीसरा अष्टक भव्य नाम वाला था और चौथा अष्टक यूथग कहलाता था ॥ ५१ ॥

लेखसंज्ञास्तथैवान्येतत्रमन्वन्तरेद्विज। पञ्चमेचगणेदेवास्तत्संज्ञामृताशिनः ||५२

हे द्विज ! उस मन्वन्तर में पाँचवें देवगण लेखनाम वाले हुए। ये देवता अमृतपायी थे ॥ ५२ ॥

शतंक्रतूनामाहृत्ययस्तेषामधिपोऽभवत्। मनोजवस्तथैवेन्द्रःसंख्यातोयज्ञभागभुक्॥५३

इनके स्वामी मनोजव नाम इन्द्र हुए जिन्हों ने कि सौ यज्ञ किये थे और जो यज्ञ-भागके भोक्ताहुए ||५३||

सुमेधाविरजाचैवहविष्मानुन्नतोमधुः। अतिनामासहिष्णुश्चसप्तासन्नितिचर्षयः॥५४

सुमेधा, विरजा, हविष्मान्, उन्नत, मधु, प्रतिनामा और सहिष्णु ये उस मन्वन्तर के सातसप्तर्षि हुए ||५४||

उरु- पूरु - शतद्युम्नप्रमुखाःसुमहाबलाः। चाक्षुषस्यमनेोःपुत्राःपृथिवीपतयेोऽभवन् || ५५||

महावली उरू, पुरु और शतद्य् स्न उस चाक्षुष मनु के पुत्र हुए जिन्होंने कि सम्पूर्णपृथ्वीका स्वामित्व किया ||५५||

एतत्तेकथितंषष्ठमयामन्वन्तरंद्विज। चाक्षुषस्यतथाजन्मचरितञ्चमहात्मनः || ५६ ||

 हे द्विज ! इस प्रकार जो आपने पूछा था वह छठा मन्वन्तर आपको कह सुनाया और इसके साथ महात्मा चाक्षुपका चरित्रभी आपको सुना दिया ॥ ५६ ॥

साम्प्रतंवर्त्ततेयोऽयंनाम्नावैवस्वतोमनुः। सप्तमेयेऽन्तरेतस्यदेवाद्यास्तान्शृणुष्वमे ||५७||

तथाइससमयजोमन्वन्तरवैवस्वतनामवर्तमानहैवहसातवाँ  न्वन्तरहैअबउसकेदेवतादिकोमुझसेसुनो॥५७ इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंचाक्षुषमन्वन्तरमें७६वाँअ०समाप्त।