मार्कण्डेय महा पुराण
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मार्कण्डेयउवाच
तांलब्ध्वातथापत्नींसुमनांसुमहामुने। गम्यसपितुःपादौमातुश्चक्षितिपात्मजः॥१
मार्कण्डेय वोले-
हे कौटुकिजी ! तब राजकुमार दम ने जो कि अपने साथ अपनी स्त्री सुमनी को ले आये थे ।
अपने पिता और माता के चरणों में प्रणाम किया.॥ १ ॥
चतौश्वशुरौसुभ्रूर्ननामसुमनातदा। भ्यांतौचतदाविप्रआशीभिरभिनन्दितौ॥२॥
सुन्दरी सुमना ने भी अपने सास, श्वसुर, को प्रणाम किया । हे विप्र | माता पिताने उन दोनों
को प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया ॥ २ ॥
होत्सवथसञ्जज्ञेनरिष्यन्तस्यवैपुरे | तदारेचसम्प्राप्तेदशार्णाधिपतेःपुरात् || ३
जब राज-
कुमार दम अपनी पत्नी को लेकर दशार्ण देश से आये तब महाराज नरिष्यन्त के नगर में बड़ाउत्सव हुआ ||३||
म्बन्धिनंदशार्णेशंजितांश्चपृथिवीश्वरान्। वापुत्रेणमुमुदेनरिष्यन्तोमहीपतिः॥४॥
महाराज नरिष्यन्त अपने पुत्र से यह सुनकर कि उसने बहुतसे राजाओं को जीत : कर दशार्ण देश के राजा को अपना सम्बन्धी बनाया है, बहुत प्रसन्न हुए ॥ ४ ॥
sपिरेमेसुमनयामहाराजसुतोदमः। रोद्यान- वनोद्देश- प्रासाद- गिरिसानुषु॥५॥
फिर राजकुमार दम सुमना के साथ सुन्दर उद्यानों, वनप्रदेशों, महलों और पर्वतों पर रमण करते रहे ॥ ५ ॥
थिकालेनमहतारममाणादमेनसा। वागर्भसुमनादशार्णाधिपतेःसुता॥६
फिरबहुत काल तक दम के साथ विहार करते-करते. दशार्ण राज की पुत्री सुमना गर्भवती होगई ॥ ६ ॥
sपिराजानरिष्यन्तोभुक्तभोगोमहीपतिः। यःपरिणतिंप्राप्यदमंराज्येऽभिषिच्यच॥७
राजा नरिष्यन्त भी अनेक भोगों को भोग कर वृद्धावस्था को प्राप्त हुए । तब वे राजकुमार दमंको राजतिलक देकर ॥७ ॥
नंजगामेन्द्रसेनापत्नीचास्ययशस्विनी। नमस्यविधानेनसतत्रसमतिष्ठत॥८॥
श्रपनी यशस्विनी पत्नी इन्द्रसेना के साथ वनको गये और वहाँ वानप्रस्थ में स्थित होकर रहने लगे ॥ ८ ॥
क्षिणात्यःसुदुर्व्वतःसंक्रन्दनसुतोवने। उष्मान्समृगान्हन्तुंययावल्पपदानुगः॥६
एक दार उसी वन में दक्षिण का रहने वाला, संक्रन्दन का पुत्र, दुष्टात्मा वपुष्मान् मृगया करता हुआ जा पहुँचा ॥६
तंदृष्ट्वानरिष्यन्तंतापसंमलपङ्किनम्। द्रसेनाञ्चतत्पत्नींतपसातिसुदुर्बलाम्॥१०॥
वह तपस्वी नरिष्यन्त को भस्म लगाये हुए तथा तप से अत्यन्त निर्वल हुई उनकी पत्नी इन्द्रसेनाको देखकर ॥१०॥
अच्छकस्त्वंभोविमःक्षत्रियोवावनेचरः। नमस्थमनुप्राप्तोवैश्योवाममकथ्यताम्॥११
पूछने लगा कि मुझे बताओं तुम कौन हो, ब्राह्मण, क्षत्रिय या वानप्रस्थमें स्थितः वैश्य हो ? ॥ ११॥
श्रोमौनव्रतीभूपोनहितस्योत्तरंददौ। द्रसेनाचतत्सर्व्वमाचष्टास्मैयथातथम्॥१२
महाराज नरिष्यन्त ने जो मौन. व्रत धारण किये हुएथे उसको कुछ उत्तर न दिया फिर इन्द्रसेना ने उसको सचसच सच वृत्तान्त सुना दिया ॥१२॥ मार्कण्डेयउवाच
त्वातश्चनरिष्यन्तंवपुष्मान्पितरंरिपोः। शोऽस्मीतिवदन्कोपात्जटासुपरिगृह्यच॥१३॥
मार्कण्डेयजी बोले-
जय वपुष्मान्ने यह मालूम किया कि वह उस के शत्रु का पिता नरिष्यन्त है तब उसने क्रोध से
उनकी जटायें पकड़ ली और कहा कि मैं आ गयाहूं ॥ १३ ॥
हेतिचेन्द्रसेनायांरुदन्त्यांवाध्यगद्रदम्। हर्षकोपात्खड्गञ्चवाक्यञ्चेदमुवाचह॥१४॥
तव इन्द्रसेना हाय-हाय करके रोने लगी और उसकी हिलकी बंध गई । क्रोध से तलवार
खींचकर वपुष्मान ने यह कहा ॥ १४ ॥ हाज्जितःसमरेयेनयेनमेसुमनाहृता।
दमस्य तस्य पितरं हनिष्येऽवतु तं दमः ॥१५॥
जिसनेकियुद्धमेंमुझेजीताऔरजोकिमेरीसुमनाको हरणकरलेगयाउसकेपिताकामैंबधकरतावह हो तो यहाँ श्रावे ॥१५॥ येनाखिलमहीपाल - पुत्राःकन्यार्थमागताः। श्रवधूताहनिष्येऽहंपितरंतस्यदुर्म्मतेः॥१६॥
उस कन्या के श्राये हुए सब राजकुमारों को जिसने कि किया और भगा दिया उस दुष्ट के पिता कोमारता हूँ ||१६|| योधनेपुस्वरूपेणदमोयस्यदुरात्मनः संदंमोवारयत्वेपहन्मितस्यरिपोर्गुरुम्॥१७॥
जिस दुष्ट दम को देखते ही का दमन होजाता है उस दमके पिताको मैं वह आकर इसकी रक्षा करे ॥ १७ ॥ मार्कण्डेयउवाच इत्युक्त्वासदुराचारोवपुष्मानवनीपतिः। लन्दन्त्यामिन्द्रसेनायांशिरश्चिच्छेदतस्यच॥१८॥
मार्कण्डेयजी वाले
यह कहकर उस दुरात्मा वपुष्मान ने के रोते हुए महाराज नरिष्यन्त का शिर काट लिय॥ १८ ॥ ततोधिग्धिङ्मुनिजनाश्रन्येचवनवासिनः। तमूचुःसचतंदृष्ट्वाजगामस्वपुरंवनात्॥१६॥
फिर सब मुनि लोग व अन्य उसको धिक् धिक् कहने लगे और वपुष्मान् फिर अपने नगर को चला गया ॥ १६ ॥
गतेतस्मिन्विनिश्वस्यसेन्द्रसेनावपुष्मति। प्रेषयामासपुत्रस्यसमीपंशूद्रतापसम् ||२०||
वपुष्मान के चलें जाने पर इन्द्रसेना ने एक श्वास ली और अपने के पास एक शूद्र तपखी को भेजा ॥ २० ॥
गच्छेथाआशुमेपुत्रंदमंब्रूहिवचोमम।। अभिज्ञोह्यसिमत्-वृत्तान्तंप्रोच्यतेऽत्रकिम्२१
उसने उस तपस्वी से कहा, "तुम शीघ्र जाओ मेरे पति की मृत्यु का जो कुछ वृत्तान्त है वह में
पुत्र दम से कहो, तुमने सब स्वयं देखा है, मैं तुम्से क्या कहूँ ॥ २१ ॥
तथापिवाच्यःपुत्रोमेयदब्रवीम्यतिदुःखिता। लङ्घनामीदृशींप्राप्तांविलोक्यैतांमहीपतेः॥२२॥
तो भी मेरे पुत्र से यह कहन जो कुछ कि मैं अत्यन्त दुःख से कह रही हूँ राजा की ऐसी दशा मुझसे देखी नहीं जाती॥२२॥
सभर्त्ताऽधिकृतोराजाचतुणपरिपालकः। त्वमाश्रमाणांकिंयुक्तंतापसान्यन्नरक्षसि॥२३
मेरे पति ने तुमको चारों आश्रमों का पालन करने के वास्ते राजा बनाया था फिर यह कितनी अनु चित बात है कि तुम आश्रमवासी तपस्वियों रक्षा नहीं करते ? ॥ २३ ॥
भर्त्ताममनरिष्यन्तस्तापसस्तपसिस्थितः। विलपन्त्यास्तथानाथोयथानास्तितथात्वयि२४॥
मेरे स्वामी नरिष्यन्तं तपस्वी होकर तपस्या में स्थित थे, अव मैं ऐसे विलाप करती हूँ जैसे कि वह जिसका कोई न हुँ॥ २४ ॥
थाकृष्यकेशेषुवलादपराधंविनाततः। हतोवपुष्मताख्यातिमितितेभूपतिर्गतः ||२५||
यह विख्यात होते हुए भी कि तुम राजाह वपुष्मान ने तुम्हारे पिता को बिना किसी अपरा
के बलपूर्वक केश पकड़ कर खींचा और माडाला ॥ २५ ॥
एवंस्थितेतत्क्रियतांयथाधम्र्मोनलुप्यते। तथाचनैववक्तव्यमतोऽस्मात्तापसीह्यहम् ||२६||
ऐसी स्थिति में तुम वही करो जिर से धर्मका लोप न हो । सुझे कुछ न कहना चाहि.
क्योंकि मैं तपखिनी हूँ ||२६||
पितावृद्धस्तपस्वीचनापराधेनदूषितः। निहतोयेनयत्तस्यकर्त्तव्यंतद्विचिन्त्यताम् ||२७||
तुम्हारे वृद्ध तपस्व पिता को जिसने विना किसी अपराध के माराउसकी भी वही गति हो, इसपर तुमको विचाकरना चाहिये ||२७||
सन्तितेमन्त्रिणोवीराःसर्व्वशास्त्रार्थकोविदाः। तेंःसहालोच्ययत्कार्य्यमेवम्भूतेकुरुष्वतत्॥२८॥
तुम्हारे मन्त्रिगण वीर सब शास्त्रों के जानने वाले हैं उनके साथ परामन करके जो उचित हो वह करो ॥ २८ ॥
नास्माकमधिकारोऽत्रतापसानांनराधिप। कुरुष्वैतदितीत्थंत्वमेवंभूपतिभाषितम्॥२६॥
हे राजन्हम तपस्वियों का यह अधिकार नहीं है, इसक प्रतीकार तुमको ही करना है कारण यह राजा वकर्तव्य है ||२६||
विदूरथस्यजनकोयवनेनयथाहृतः। तथायंतवपुत्रस्यकुलंतेनविनाशितम् ||३०||
जिस प्रकार विदूरथ के पिता यवन ने मारा था उसी प्रकार तुम्हारे पिता वपुष्मान् ने मारा है । विदूरथ ने यवन के कुलनाश कर दिया था ||३०||
जम्भस्यासुरराजस्यपितादष्टोभुजङ्गमैः। तेनाप्यखिलपाताल-वासिनाःपन्नगाहताः॥३१
मार्कण्डेयजी बोले
असुरराज जम्भ को सर्पों ने काटा था इस कारण जम्भ ने समस्त पातालवासी नागों को मार डाला ॥ ३१ ॥
पराशरेणपितरंशक्तिञ्चरक्षसाहतम्। श्रुत्वाग्नौपातितंकृत्स्नंरक्षसामभवत्कुलम् ||३२||
पराशर ने जिनके कि पिता शक्ति को राक्षस ने मार डाला था यह सुनकर समस्त राक्षस कुल को अनि मै भोंक कर भस्म कर दिया ॥ ३२ ॥
अन्यस्यापिस्ववंशस्यलंघनाक्रियतेहिया। तांनालंक्षत्रियःसोढुंकिंपुनःपितृमारणम्३३ | |
और भी किसी प्रकार की खुटाई को जो कि उसके साथ कीजाय एक क्षत्रिय नहीं सह सकता हैं, पिता के वध के -आगे क्या है ? ||३३||
नायंपितातेनिहतोनास्मिनशस्त्रंनिपातितम् त्वामत्रनिहतंमन्येत्वयिशस्त्रंनिपातितम् ||३४||
ये तुम्हारे पिता नहीं मारे गये से यह तुम हो जो मर गये हो तथा तुम्हारे ऊपर
हैं और न उनपर कोई अस्त्र ही गिरा है, मेरे मत ही शस्त्र का प्रहार हुआ है ॥ ३४ ॥
विभेत्यस्यहिकःशस्त्रंन्यस्तंयेनवनौकसाम्।
तव भूपस्य पुत्रस्य मारिते तु विभेतु वा ||३५||
जिस पापी नेतपस्वीपरहथियारचलायाहैउसकोवधकरने मैंक्याडरतेहो ? ||३५|| i
तवेयंलंघनायुक्तायदस्मिंस्तत्समाचर। वपुष्मतिमहराजसभृत्य - ज्ञाति-वान्धवे ||३६||
जिस प्रकार वपुष्मान् ने तुम्हारी दुर्गति की है उसी प्रकार भाई बन्धुओं और जाति वालों सहित उसकी हो ऐसा तुमको प्रयत्न करना चाहिये ||३६||
मार्कण्डेय उवाच
इतिसंक्रान्तसन्देशमिन्द्रसेनाविसृज्यतम्। पतिदेहमुपाश्लिष्यविवेशानंमनस्विनी ||३७||
इसप्रकारसंदेशदेकरइन्द्रसेनानेउसशुद्र तापसकोविदाकियाऔरवहमनस्विनीस्वयं अपनेपतिकेशवकेसाथअग्निमेंप्रवेशकरगई।३७॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में दम चरित्र (२)नामका१३४वांअध्यायसमाप्त |
Summary of chapter 134 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
Prince Dama attends the Svayaṃvara of Princess Sumanā, daughter of King Dashārṇa. Sumanā places the victory garland around Dama's neck, prompting jealous rival kings led by Vapushmat to launch an unrighteous attack, whom Dama valiantly defeats.