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मदालसोवाच

श्रतः परं शृणुष्व त्वं वज्र्ज्यावर्ज्यप्रतिक्रियाम् भोज्यमन्नं पर्युषितं स्नेहाक्तं चिरसम्भृतम्

मदालसा बोली- हे तर्क ! व तुम यह सुनो कि कौनसी है। घी से पकी हुई सामग्री चाहे वह देरकी तयार वस्तु ग्रहण करने योग्य तथा कौनसी वस्तु वर्जित की हुई ही क्यों न हो खानी चाहिये ||१||

स्नेहाचापि गोधूम-यव-गोरसविक्रियाः शशकः कच्छपो गोधा श्वावित् खड्गोऽथ पुत्रक

गेहूँ और जौ के सामान घी में न सिक कर दूध में तैयार किये गये हों तो भी खाने योग्य हैं हे पुत्र ! खर- गोश, कछुआ, गोह, साही और गैंडा || २ ||

मक्ष्या होते तथा वज्ज्या ग्रामशकर - कुक्कुटौ पितृदेवादिशेषश्च श्राद्धे ब्राह्मणकाम्यया पोक्षितंचौषधार्थञ्च खादन् मांसं न दुष्यति

इनको खाना चहिये | सूर और मुर्गा पितर और देव-  ताओं को अर्पित किया हुआ, तथा श्राद्धमें ब्राह्मण के निमित्त का पदार्थ नहीं खाना चाहिये मन्त्रित और औषधिरूप मांस खाने में दोष नहीं है

राङ्खाश्मस्त्रर्णरूप्याणां रज्जूनामथ वाससाम् शाकमूलफलानाञ्च तथा विदलचर्म्मणाम्

शंख, पाषाण, सोना, चाँदी, रस्सी, कपड़ा, शाक, कन्दमूलफल तथा बिना पत्ते और छालकी वस्तुयें ॥४॥

मणि-वज्र-प्रवालानां तथा मुक्ताफलस्य च गात्राणाञ्च मनुष्याणामभ्युना शौचमिप्यते

मणि, वज्र, प्रवाल, मुक्ता तथा मनुष्योंके शरीर जल से शुद्ध होते हैं

यथायसानां तोयेन ग्रावणः सङ्घर्षणेन च सस्नेहानाञ्च भाण्डानां शुद्धिरुप्पेन वारिणा

लोहे के हथियारों की शुद्धता जल से तथा शान पर घिसने से होती है। घी और तेल से सने हुए चर्तनों की शुद्धि गर्म जल से होती है

शूर्पधान्याजिनानांच मुपलोलखलस्य च संहतानांच वस्त्राणां प्रोक्षणात् संचयस्य च

यव, धान्य, अजिन वस्त्र, मूसल और श्रोखली तथा वस्त्र यह सब धोने से शुद्ध होते हैं

वल्कलानामशेषाणामम्बुमृच्छौचमिष्यते 1 तृणकाष्ठौषधीनांच प्रोक्षणाच्छुद्धिरिष्यते

सम्पूर्ण बल्कल बस्त्र जल के छींटे देने से शुद्ध हो जाते हैं तथा तृण काठ और श्रौषधियाँ भी जल से शुद्ध होती हैं

श्राविकानां समस्तानां केशानांचापि मेध्यता | सिद्धार्थकानां कल्केन तिलकल्केन वा पुनः

समस्त भेड़ों का ऊन स्वयं शुद्ध है। तिलका तेल लगाकर स्नान करने से भी शुद्धता होती है

साम्बुना तात भवति उपघातवतां सदा तथा कार्पासिकानाञ्च विशुद्धिजलभस्मना ॥१०॥

चोट लगे मनुष्यों की शुद्धि जल से तथा सूती कपड़ों की शुद्धि क्षार लगाकर जल से होती है ॥१०॥

दारु- दन्तास्थि - शृङ्गाणां तत्क्षणाच्छुद्धिरिष्यते पुनःपाकेन भाण्डानां पार्थिवानांच मेध्यता ११॥

लकड़ी दाँत, अस्थि और सींग अपने स्थान से हटते ही  शुद्ध होजाते हैं और मिट्टी के बर्तनों की शुद्धि दुबारा पकाने से हो जाती है ॥११॥

शुचिर्भैक्ष्यं कारुहस्तः पण्यं योषिन्मुखं तथा रथ्यागतमविज्ञातं दासवर्गादिनाहृतम् १२

भिक्षा में प्रांत वस्तु, कारीगर का हाथ, बाज़ार की चीज़ और स्त्रियों का मुख सदैव शुद्ध है तथा गली से लाई हुई चीज, वह चीज़ जो ज्ञांत न हो तथा दासों द्वारा लाई हुई वस्तु १२

वाक्प्रशस्तं चिरातीतमनेकान्तरितं लघु अतिप्रभूतं वालंच वृद्धातुरविचेष्टितम् ॥१३

च्छे नाम वाली, बहुत दिन की पुरानी, अन्य वस्तुओं के साथ लाई हुई और छोटी वस्तु, अत्यन्त प्रवल मनुष्य, बालकवृद्ध और दुखित मनुष्य द्वारा किये हुए  काम ||१३||

कर्मान्ताङ्गारशालाच स्तनन्धयसुताः स्त्रियः सुचिन्यश्च तथैवापः स्रवन्त्योऽगन्धबुदबुदाः ॥१४॥

वर, धर्मशाला तथा स्तन पीने वाला वालक और पिलाने वाली स्त्री, बहता हुआ सुगन्धित और फेन रहित जल यह सब शुद्ध हैं १४

भूमिर्विशुध्यते कालाद्दाह- मार्ज्जन- गोक्रमैः लेपादुलेखनात् सेकाद्वश्म संमार्ज्जनार्श्वनात् ॥१५॥

केशकीटावपन्ने च गोघ्राते मक्षिकान्विते मृदम्बुभस्मना तात प्रोक्षितव्यं विशुद्धये ||१६||

पृथ्वीकी शुद्धि अनि से, बुहारी देने से, गोवर लीपने से, गोड़ने से अथवा छिड़काव करने से होती है और घर बुहार कर देवता के पूजन करने से शुद्ध होता है | जिस वस्तु में बाल अथवा कीड़े पड़गये हों, किसी अन्य पशु ने संघ लिया हो अथवा जिसमें मक्खी गिर गई हो उसको मिट्टी, जल या राख से साफ़ करना चाहिये || १६||

औदुम्बराणामम्लेन क्षारेण त्रपु - सीसयोः भस्माम्बुभिश्च कांस्यानां शुद्धिः प्लावो द्रवस्य च१७

तांवा खटाई से, शीसा राख से स्वच्छ होता है कांसा जल और राखके गलने से शुद्ध होता है और वहने वाला पदार्थ वहा देने से शुद्ध होता है १७

श्रमेध्यातस्य मृत्तोयैर्गन्धापहरणेन च श्रन्येषांचैव तद्वद्रन्यैर्वर्णगन्धापहारतः ॥१८

अपवित्र वस्तु को मिट्टी से या उसकी दुर्गन्ध दूर करके शुद्ध करे, अन्य प्रकार की वस्तुओं को भी उसी प्रकार के हव्यों से तथा उनकी दुर्गन्ध दूर करके शुद्ध करे १८

शुचि गोतृप्तिकृत् तोयं प्रकृतिस्थं महीगतम् तथा मांसंच चण्डाल-कव्यादादिनिपातितम् १६

 जो जल प्राकृतिक रूप से पृथ्वी पर स्थित है और एक गाय को तृप्त करनेके लिये पर्याप्त है वह पवित्र है इसी प्रकार चाण्डाल और व्याघ्रादि द्वारा मारे गये पशुओं का मांस भी पवित्र है ||१६||

रथ्यागतंच चेलादि तात वाताच्छुचि स्मृतम् ||२०||

 हे तांत | गली में पड़ा हुआ वस्त्र भी वायु के लगने से शुद्ध हो जाता है ||२०||

रजोऽग्निरश्वो गौश्छाया रश्मयः पवनो मही विमुषो मक्षिकाद्या दुष्टसङ्गाददोषिणः |

 धूलि, अग्नि, घोड़ा, गाय, छाया, सूर्य की किरणें, पवन, पृथ्वी, ब्राह्मणका वीर्य और मक्खी आदि यह अस्पृश्य वस्तु के संसर्ग होने पर भी दोष रहित हैं ||२१||

अजाश्वौ मुखतो मेथ्यौ न गोवत्सस्य चाननम् मातुः प्रस्रवणं मेध्यं शकुनिः फलपातने ||२२||

 वकरी और घोड़े की. मुख शुद्ध है गाय के बछड़े का नहीं जब तक बछड़ा दूध पीता है वह भी शुद्ध है पक्षी द्वारा गिराया हुआ फल भी शुद्ध है ||२२||

आसनं शयनं यानं नावः पथि तृणानि च • सोमय्यांशु पवनैः शुध्यन्ते तानि पण्यवत् ||२३||

 आसन, शय्या वाहन, नाव और रास्ते के तृणं तथा बाजार की वस्तुयें चन्द्रमा और सूर्य की किरणों से तथा पवन से शुद्ध होजाती हैं २३

रथ्यावसर्पण-स्नान-क्षुत्पान-"ज्ञानकर्मसु

चामेच्च यथान्यायं वासो विपरिधाय च २४॥

गली में चलने फिरने पर, स्नान के समय, भूख प्यासकी निवृत्ति..करने के समय तथा वीर्यपात के समय कपड़े बदल कर विधिपूर्वक श्राचमन करे २४

स्पृष्टानामप्यसंसर्गैविरथ्याकर्द्दमाम्भसाम्

पोष्टरचितानांच मेध्यता वायुसङ्गमात् ||२५||

गली अथवा कीचड़, पानी के संसर्ग से स्पर्श हुई वस्तुभी वायु के संसर्ग मात्र से पवित्र हो जाती है ॥२५॥

प्रभूतोपहतादन्नादग्रमुद्धृत्य सन्त्यजेत् शेषस्य प्रोक्षणं कुर्य्यादाचम्याद्भिस्तथा मृदा || २६।।

अपने हाथसे तैयार की हुई भोजनकी सामग्री में से अग्रभाग निकालकर शेपको श्रभिमंत्रित करे फिर जलको मृत्तिकासे स्पर्शकर श्राचमन करे २६

उपवासंस्त्रिरात्रन्तु दुष्टभक्ताशिनों भवेत्

अज्ञाते. ज्ञानपूर्व्वन्तु तद्दोपोपशमेन तु ||२७||

अनजान में अथवा जानकारी में यदि दूषित अन्न खाले तो उसके दोषकी शांतिके लिये तीन रात्रि उपवास करे २७

उदक्या-श्व-शृगालादीन सूतिकान्त्यावसायिनः स्पृष्ट्वा स्नायीत शौचार्थं तथैव मृतहारिणः २८

 रजस्वलास्त्री, कुत्ता, गीदड जापेवाली स्त्री, चांडाल यादि तथा मुर्दे को लेजाने वाले इन सबसे छू जाने पर स्नान करे २८

नारं स्पृष्ट्वास्थि सस्नेहं स्नातः शुध्यति मानवः श्राचम्यैव तु निःस्नेहंगामालभ्यार्कमीक्ष्य वा २६

मृत की हड्डी छूकर पुरुष तेल लगाकर स्नान करने से शुद्ध होता है और यदि तेल न लगावे तो श्राचमन करे अथवा गायको स्पर्शकर सूर्य का दर्शन करे |

न लङ्घयेत् तथैवासृष्ठीवनोद्वर्त्तनानि च नोद्यानादौ विकालेषु प्राज्ञस्तिष्ठेत् कदाचन ||३०

श्रौर, रुधिर, थूक, खखार, वमन आदिको लाँघकर न चले तथा बुद्धिमान मनुष्य कभी कुसमय चारा वीचे में न ठहरे ३०

न चालपेज्जनद्विष्टां वीरहीनां तथा स्त्रियम्

गृहादुच्छिष्टविण्मूत्र- पादास्मांसि क्षिपेद्वहिः ॥३१

मनुष्य को निंदित कर्म वाली विधवा स्त्री से वार्तालाप न करनी चाहिये । ठन, विष्ठा, सूत्र और पाँवों की धोंवन को घरसे बाहर फेंके ३१

पंच पिण्डाननुदुद्धृत्य न स्नायात परवारिणि स्नायीत देवखातेषु गङ्गा-हद-सरित्सु च ॥३२॥

पाँच पिंडों को दिये विना देव- खात, गङ्गा तथा अन्य पुण्यवती नदियों में खान न करें ३२

देवता - पितृ - सच्छास्त्र - यज्ञ-मन्त्रादिनिन्दकः कृत्वा तु स्पर्शनालापं शुध्येतार्कावलोकनात् ||३३|||

देवता, पितृ, सत्शास्त्र तथा यज्ञों श्रीर मन्त्र आदिकों के निन्दकों को स्पर्श करके अथवा उनसे बातचीत करने पर अपने को सूर्य का दर्शन करके शुद्ध करे २३

अवलोक्य तथोदक्यामन्त्यजं पतितं शवम् विधर्मिम-सूतिका-पएंड-विवस्त्रान्त्यावसायिनः॥ ३४॥

रजखला स्त्री, अन्त्यज, पापी, मृतक, विधर्मी, जापेवाली स्त्री, नपुंसक, वस्त्रहीन तथा चाण्डाल श्रादिको देखकर ||३४||

सूतनिर्यात का चैव परदाररताश्च ये एतदेव हि कर्त्तव्यं माज्ञैः शोधनमात्मनः ||३५||

तथा प्रसूती स्त्री की सहचरी स्त्री और पर- स्त्री में रत पुरुष को देखकर भी इसी प्रकार चतुर मनुष्य आत्म शुद्धि करे ३५

भोज्यं सूतिका-पण्ड मार्जार खु-श्व-कुक्कुटान्

पतिताविद्धचण्डाल- मृतहारांथ धर्म्मवित् ||३६||

श्रभोज्य प्रभूती स्त्री, नपुंसक, बिल्ली, चूहा, कुत्ता, मुर्गा, पापी, कोढ़ी, चाण्डाल और मुर्दा उठाने वाले से यदि धर्मात्मा पुरुष ३६

संस्पृश्य शुध्यते स्नानादुदक्या ग्रामशूकरौ तद्वच सूतिकाशौच-दूषितान् पुरुषानपि ||३७||

छू जाय तो स्नान करने से शुद्ध होता है इसी प्रकार रजखला स्त्री, सूअर या प्रसूती के स्पर्श-दोष से शौच करना चाहिये||२७||

यस्य चानुदिनं हानिगृहे नित्यस्य कर्मणः

यश्च ब्राह्मणसन्त्यक्तः किल्विषी स नराधमः || ३८

जो ब्राह्मण को सताता है उसके घर में दिन पर दिन हानि होती है, वह नराधम पापी है ३८ नित्यस्य कर्म्मणो हानि न कुव्र्वीत कदाचन तस्य त्वकरणे बन्धः केवलं मृतजन्मसु ॥३६ ।।

मृत्यु अथवा जन्म से ब्राह्मण को दश दिन, क्षत्रिय को कभी नित्यकर्म न छोड़े, उसका केवल मौत या जन्म के समय निषेधं हैं ३६

दशाहं ब्राह्मणस्तिष्ठेद्दा नहोमादिवज्जितः

क्षत्रियो द्वादशाहंच वैश्यो मासार्द्धमेव च ॥४०॥

चारह दिन और वैश्य को पन्द्रह दिन तक सूतक, मानना चाहिये ४० और शूद्र को एक महीने तक अपना कर्म न करके सूतक मानना चाहिये

शूद्रस्तु मासमासीत निजकर्म्मविवज्जितः ततः परं निजं कर्म्म कुर्युः सर्व्वे यथोदितम् ४१ |

इसके अनन्तर सबको यथोचित रूप से जो जिस का फर्म है करना चाहिये ४१

प्रेताय सलिलं देयं वहिर्दग्ध्वा तु गोत्रिकः प्रथमेऽह्नि चतुर्थे च सप्तमे नवमे तथा ४२

मृतक दाह करने पर सगोत्रों को चाहिये कि प्रेत को पहिले, चौथे; सातवें और नौवें दिन पानी दें ४२

भस्मास्थिचयनं कार्य्यं चतुर्थे गोत्रिकै दिने ऊर्ध्वं संचयनात् तेषामङ्गस्पर्शो विधीयते ||४३||

सगोत्रों की चौथे दिन भस्म और अस्थियों का सञ्चय करना चाहिये, इस सञ्चयके बाद उनके स्पर्श का विधान कहा है ||४३|

सोदकैस्तु क्रियाः सर्व्वा कार्य्याः संचयनात् परम् स्पर्श एव सपिण्डानां मृताहनि तथोभयोः ४४

अस्थि सञ्चयके बाद समा नोदक भी सब क्रियायें करे और सपिंड स्पर्शमात्र करें तथा जिस दिन मृत्यु हुई हो उस दिन समाः ( नोदक और सपिंड दोनों क्रियायें करें १४४

अन्वेकमृक्षमाशस्त्र-तोयोदवन्धन - वह्निषु 1 विषमपातादिसृते पायो नाशकयोरपि ४५||

आत्मघाती, शस्त्र से मारा हुआ, जलमें डूबा हुआ, अनि से जलकर विषपान करके अथवा ऊंचे से गिरकर मरा हुआ || ४५

वाले देशान्तरस्थे च तथा मत्रजिते मृत्ते सद्यःशौचमथान्यैश्च त्र्यहमुक्तमशौचकम् ४६

और चालक, परदेशी, परिव्राजक इनके मरने पर सद्यः अर्थात् फ़ौरन शौच मानना चाहिये तथा कुछ लोगों का मत है कि यह शौच तीन दिनका होना चाहिये ॥४६॥

सपिण्डानां सपिण्डस्तु सृतेऽन्यस्मिन् मृतो यदि पूर्णाशौचसमाख्यातैः कार्य्यास्त्वत्र दिनैः क्रियाः ४७

पक सपिंडके मरने पर सपिंडों में से दूसरा और मर जाय तो उन्हीं दिनों में पहिले और पिछले की शौच क्रिया साथ २ करदे ४७

एष एव विधिदृष्टो जन्मन्यपि हि सुतके सपिण्डानां सपिण्डेषु यथावत् सोदकेषु च ४८

जिस प्रकार सपिण्डों में सपिण्डों की क्रियायें है उसी प्रकार समानोदकों की भी है। इसी तरह जन्म का सूतक भी माना गया है ||४||

जाते पुत्रे पितुः स्नानं सचेलन्तु विधीयते ||४६

पुत्रके उत्पन्न होने पर पिता वस्त्रों सहित स्नान करे ||४६ ||

तत्रापि यदि चान्यस्मिन् जाते जायते चापरः तत्रापि शुद्धिद्दिष्टा पूर्व्वजन्मवतो दिनैः ||५०

यहाँ भी यदि एक का जन्म होनेपर उसी कुल में दूसरे का जन्म होजावे तो दोनों की शुद्धि साथ-२ होगी ५० दशद्वादशमासार्द्ध-माससंख्यैर्दिनैर्गतैः| स्वाः स्वाः कर्म्मक्रियाः कुर्युः सर्व्वे वर्णा यथाविधि

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का क्रमशः दस, चारह, पन्द्रह दिन और एक महीनेका सूतक माना गया है वे और सब वर्गों के लोग विधि पूर्वक अपने-अपने वर्ण के अनुसार क्रियायें सम्पन्न करें ५१

प्रेतमुद्दिश्य कर्त्तव्यमेकोद्दिष्टं ततः परम् | दानानि चैव देयानि ब्राह्मणेभ्यो मनीषिभिः॥५२॥

इसके. बाद प्रेत का उद्देश्य करके एकोद्दिष्ट करे तथा ब्राह्मणों और पण्डितों को दान दें || ५२

यद्वयदिष्टतमं लोके यच्चापि दयितं गृहे तत्तद्गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता ||५३ |||

अक्षय पुण्य की इच्छा से जो कुछभी अच्छी वस्तु संसार में है अथवा घर में जो कुछ प्रिय है वह गुणवान् को दे ५३

पूर्णैस्तु दिवसः स्पृष्ट्वा सलिलं वाहनायुधम् प्रतोददण्डौ च तथा सम्यम्वर्णाः कृतक्रिया :|| ५४ ||

क्रिया के दिन पूरे होने पर जल, सवारी और शस्त्र को स्पर्श करें। जिस किसी को दण्ड दे उसे न्याय पूर्वक दण्ड़ दे तथा अपने वर्ण के अनुसार भली भांति क्रियायें करे ५४

स्ववर्णधर्म्मनिर्दिष्टमुपादानं तथा क्रियाः कुर्य्यः समस्ताः शुचिनः परत्रेहं च भूतिदाः ॥५५॥

 अपने वर्ण के धर्मानुसार क्रियायें करे क्योंकि ये समस्त पवित्र क्रियायें इस लोक और परलोक में सिद्ध की देने वाली हैं ॥५५॥

अध्येतव्या त्रयी नित्यं भवितव्यं विपश्चिता धर्म्मतो धनमाहाय्यं यष्टव्यंचापि यत्नतः ५६

 नित्य त्रिवेद अर्थात् ऋ  करे धर्म से धनोपार्जन कर यत्नपूर्वक यश करे साम और यजुर्वेद पढ़े और ज्ञानियों की संगति, || ५६||

यच्चापि कुर्व्वतो नात्मा जुगुप्सामेति पुत्रक तत् कर्त्तव्यमशङ्केन यन्न गोप्यं महाजने

हे पुत्र ! वह कर्म करे जिससे अपनी ज़िन्दा न हो जो कर्म बड़े लोगों ने किये हैं उन्हीं को निस्सन्देह होकर करो ५७

एवमाचरतो वत्स पुरुषस्य गृहे सतः

धर्म्मार्थ- कामसम्प्राप्तयां परत्रेह च शोभनम् ५८

हे वत्स ! इस प्रकार आचरण करने से गृहस्थी पुरुष को इस लोक और परलोक में धर्म, अर्थ, काम की प्राप्तिं होती है ५८ इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में अनुशासन में वर्ज्यावर्ण्य कथन नाम ३५वाँ अध्याय समाप्तः