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मार्कण्डेयउवाच

तस्मादण्डाद्विभिन्नात्तुब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः। ऋचोबभूवुःप्रथमंप्रथमाद्वदनान्मुने॥१॥

हे मुनि फिर अण्डे के फटने पर श्रव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी के पूर्व मुख से ऋग्वेद की ऋचायें उत्पन्नहुईं ॥१॥

जवापुष्पनिभाःसद्यस्तेजोरूपान्तसंहताः। पृथक्पृथग्विभिन्नाश्चरजोरूपवहास्ततः॥२

मार्कण्डेयजी बोले–

 वे ऋचायें गुड़हल के फूल के समान 'अलग-अलग रजोगुणी रूप धारण किये हुए थीं

और वे सव अंत भाग में तेजयुक्त थीं ॥२॥

यजूंषिदक्षिणाद्वक्त्त्रादनिरुद्धानिकाञ्चनम्। यादृग्वर्णंतथावर्णान्यसंहतिधराणिच॥३

ब्रह्माजी के दक्षिण मुख से यजुर्वेद के मंत्र उत्पन्न हुए । उन का वर्ण सुवर्ण के समान था ॥ ३ ॥

पश्चिमंयद्विभोर्वक्त्रंब्रह्मणःपरमेष्ठिनः। आविर्भूतानिसामानिततश्छन्दांसितान्यथ॥४॥

परमेष्ठि ब्रह्मा के पश्चिम मुख से सामवेद के मन्त्र तथा छन्द उत्पन्नहुए ॥ ४ ॥

श्रथर्वाणमशेषञ्चभृङ्गाजनचयप्रभम् यावद्वघोरस्वरूपंतदाभिचारिकशान्तिकम् || ५॥

श्रथर्ववेद के मंत्र जो श्रभिचारिक और शान्तिक क्रियाओं को बतलाते हैं, भौंरों के समूह

के समान कृष्णवर्ण तथा भयानक स्वरूप वाले ॥५

उत्तरात्प्रकटीभूतंवदनात्तस्यवेधसः। सुखसत्त्वतमःप्रार्यंसौम्यासौम्यस्वरूपवत्॥६

ब्रह्माजी के उत्तर मुख से प्रगट हुए। वे मंत्र संता- गुण और तमोगुण युक्त सुन्दर व कुत्सित श्राकृतिवाले थे ॥ ६ ॥

ऋचोरजोगुणाःसत्त्वंयजुषाञ्चगुणामुने। तमोगुणानिसामानितमःसत्त्वमथर्व्वसु॥७

' हे कौटुकिमुनि ! ॠग्वेद रजोगुण युक्त, यजुर्वेद सतोगुणयुक्त, सामवेद तमोगुणयुक्त

तथा अथर्ववेद सतोगुण और तमोगुण युक्त है।७॥

एतानिज्वलमानानितेजसाऽप्रतिमेनवै। 'पृथक्पृथगवस्थानंभाञ्जिपूर्व्वमिवाभवन्॥८

अतुल तेज से जाज्वल्यमान होकर वे पृथक २ पहिले की भांति प्रगट हुए ॥८॥

ततस्तदाद्यंयत्तेजमित्युक्त्वाभिशब्दयते। तस्यस्वभावादयत्तेजस्तत्समादृत्यसंस्थितम्॥६

फिर पहिले तेज के साथ श्रम् शब्द का तेज मिश्रित होकर स्थितहुआ ॥ ६ ॥

यथायजुर्म्मयंतेजस्तद्वत्साम्नांमहामुने। एकत्वमुपयातानिपरेतेजसिसंश्रये॥१०॥

  हे महामुनि ! फिर वह मिश्रितं तेज यजुर्वेद के तेज के साथ मिला और इसके बाद

सामवेद के तेज के साथ मिल गया ॥ १० ॥

शान्तिकंपौष्टिकञ्चैवतथाचैवाभिचारिकम्। ऋगादिषुलयंब्रह्मन्त्रितयंत्रिष्वथागमत्॥११॥

हे ब्रह्मन् ! फिर शान्तिक पौष्टिक और अभिचारिक. तेज ॠग्, यजुः और साम में मिलगये ॥ ११ ॥

"ततोविश्वमिदंसद्यस्तमोनाशात्सुनिर्मलम्। विभावनीयंविप्रर्षेतिर्य्यगृदुर्ध्वमधस्तथा॥१२॥

 हे 'विप्रर्षि ! तम के नाश होजाने से यह जगत् निर्मल होगया ।  इसीप्रकार तिर्यक् और ऊर्ध्व तथानिम्न आदि को समझना चाहिये ॥१२॥

ततस्तन्मण्डलीभूतंछान्दसंतेजउत्तमम्। परेणतेजसाब्रह्मन्नेकत्वमुपयातितत्॥१३

हेब्रह्मन् !इसकेबादवेदोंकावहउत्तमतेजजोएकदूसरे केसाथमिलकरएकसमूहमेंहोंगयाथा॥१३॥

आदित्यसंज्ञामगमदादावेव यतोऽभवत् । विश्वस्यास्यमहाभागकारणञ्चान्ययात्मकम्॥१४

आदित्य नाम से विख्यात हुआ । हे महाभागयहीतेजविश्वकाश्रव्ययात्मककारणहै॥१४॥

प्रातर्मध्यन्दिनेचैवतथाचैवापराह्निके। त्रयीतपतिसाकालेऋग्यजुःसामसंज्ञिता ||१५||

ऋग, यजुः और साम तेज क्रमशः प्रातः, मध्याह अपराह्न काल में तपित होता है ||१५||

ऋचस्तपन्तिपूब्बा'मध्याह्नेचयजूंषिवै। सामानिचापराह्नवैतपन्तिमुनिसत्तम॥१६॥

हे मुनि सत्तम ! ऋग्वेद की ऋचायें पूर्वाह्न में, यजुर्मंन्त्र मध्याह्न और साम छन्द अपराह्न में तप्त होते हैं ॥१७

शान्तिकंऋक्षुपूर्व्वाङ्खेयजुःष्वन्तरपौष्टिकम्। विन्यस्तंसाम्निसायाहआभिचारिकमन्ततः॥१७॥

तेज के समय पूर्वाह्न में, पौष्टिक कर्म यजुर्वेज के समय मध्याह में और अभिचारिक

कर्म श्रभिचारिक मन्त्र से सामतेजके समय संध्याको किये जाते हैं ॥१७॥

मध्यन्दिनेऽपराह्नचसमेचैवाभिचारिकम्। अपराह्नपितृणान्तुसाम्नाकार्य्याणितानिवै१८॥

श्रभिचारिक कर्म पूर्वाह्न, मध्याह्न और अपराह्न में भी किया जाता है परन्तु पितरों का कर्म सामवेद के मन्त्रों से अपराह्न कालमें ही किया जाता है ॥ १८ ॥

विसृष्टौऋङमयोब्रह्मास्थितोविष्णुर्यजुर्म्मयः। रुद्रःसाममयोऽन्तेचतस्मात्तस्याशुचिर्ध्वनि: १६॥

सृष्टि करने वाले ब्रह्मा रजोगुणी ऋग्तेजमय हैं, तथा पालन करने वाले विष्णु सतोगुणी यजुर्मय हैं साम तेजमय रुद्र अन्त करने वाले तमोगुणी हैं, अतः सामवेद कीध्वनि अपवित्र है १६

तदेवंभगवान्भास्वान्वेदात्मावेदसंस्थितः। वेदविद्यात्मकचैवपरःपुरुषउच्यते ||२०||

इस प्रकार भगवान सूर्य वेदात्मा, वेदसंस्थित, वेदविद्यात्मक परम पुरुषकहलाते हैं ||२०||

सर्ग - स्थित्यन्तहेतुश्चरजःसत्वादिकान्गुणान्। श्राश्रित्यब्रह्मविष्ण्वादि-संज्ञामभ्येतिशाश्वतः२१

उत्पत्ति, पालन और प्रलय के अनुसार वे रजोगुणी, सतोगुणी और तमोगुणी होकर क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहे जाते हैं

लमर्त्यमूर्त्तिः । विश्वाश्रयं ज्योतिरवेद्यधर्म्मा ॥२१॥ देवैःसदेव्यःसतुवेदमूर्त्तिरमूर्त्तिराद्योऽखि - | वेदान्तगम्यःपरमःपरेभ्यः॥२२॥

देवताओं से सदा पूजित, वेदमूर्ति, श्रादि अमूर्ति, विश्वकीश्राश्रयज्योतिरूप, श्रवैद्यधर्मा औरवेदान्तगम्यभगवान्सूर्यपरसेभीपरेहैं॥२२॥

इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंमार्त्तण्डमाहात्म्यनाम१०२वाँप्र०स०।