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क्रौष्टुकिरुवाच  

भगवन्कथितंसर्व्वंविस्तरेणत्वयाभम। . स्वरोचिपस्तुचरितंजन्मस्वारोचिपस्यतु॥१॥

कौटुकिजी बोले-

हे भगवन् ! आपने मुझसे स्वरोचि और उस के पुत्र स्वारोचिप के जन्म का वर्णन विस्तारपूर्वक कहा ॥ १ ॥

यातुसापद्मिनीनामविद्याभोगोपपादिका। तत्संश्रयायेनिधयस्तानमेविस्तरतोवद॥२॥

भोगों को उत्पन्न करनेवाली जो पद्मिनी नामक विद्या है, उसके श्राश्रित जो निधियांहैं

उनका मुझसे विस्तार पूर्वक वर्णन करो ॥ २ ॥

अष्टौयेनिधयस्तेषांस्वरूपंद्रव्यसंस्थितिः। भवताभिहितंसम्यक्श्रोतुमिच्छाम्यहंगुरो॥३

मार्कण्डेयउवाच हेगुरुदेव ! श्राठोंनिधियोंकेस्वरूपऔरद्रव्योंकरकेउनकीजोस्थितिहैउसकोमैंअच्छीतरहआपसे सुनना चाहता हूँ ॥३॥

पद्मिनीनाम: याविद्यालक्ष्मीस्तस्याश्चदेवता। तदाधाराश्चनिधयस्तन्मेनिगदतःशृणु॥४॥

मार्कण्डेयजी बोले-

पद्मिनी नामक विद्या की देवता लक्ष्मीजी और वे ही उन निधियों की श्राधारभूत हैं, सुनिये॥४॥

यंत्रपद्म- महापद्मौतथामकर-कच्छौ। मुकुन्दोनन्दकचैवनीलःशङ्खोमोनिधिः ||५॥

पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप, मुकुन्द, नन्द,नील और शंख ये आठों निधियां लक्ष्मीजी के पास रहती हैं ||५ ||

सत्यामृद्धौभवन्त्येतेसिद्धिस्तेषांहिजायते। एतेह्यष्टौसमाख्यातानिधयस्तवक्रोष्टुके॥६॥

सतोगुण युक्त जिसको ऋद्धियाँ प्राप्त होती है उन्हीं को ये निधियाँ भी उत्पन्न होजाती  हे कौटुकि ! ये ही आठों निधियाँ हैं जो तुमको सुनाई ॥ ६ ॥

देवतानांप्रसादेनसाधुसंसेवनेनच। एभिरालोकितंवित्तंमानुषस्यसदांमुने॥७॥

 हे मुनि ! जो लोग देवताओं को प्रसन्न करते हैं अथवा साधु-सेवा करते हैं उनधन को ये निधियाँ देखती हैं ॥ ७ ॥

याहकस्वरूपंभवतितन्मेनिगदतःशृणु। पैनोनामनिधिःपूर्वंमयस्यभवतिद्विज॥८॥

हे द्विज ! इननिधियों के स्वरूप मुझसे सुनो। पद्मिनी नामकनिधि पहिले मय नामक राक्षस के घरमें रहती थी॥ ८ ॥

सुतस्यतत्सुतानाश्चतत्पौत्राणाञ्चनित्यशः। दाक्षिण्यसारंपुरुषस्तेनचाधिष्ठितोभवेत्॥६

वह उसके पुत्रों, पौत्रों और प्रपौत्रों से बहुतप्रसन्न रहकर उनके घरमें सदैव रहती थी ॥ ६ ॥

त्त्वाधारोमहाभोगोयतोऽसौसात्त्विकोनिधिः॥१०॥

भोगों को उत्पन्न करनेवाली है, अतः यह सात्विक इस निधि का आधार सतोगुण है तथा यह महाननिधि कहलाती है ॥ १० ॥

वर्ण-रूप्यताम्रादिधातूनाञ्चपरिग्रहम् | करोत्यतितरांसोऽथतेषांचक्रयविक्रयम्॥११॥

यह सौना, चाँदी औरताँबा आदि धातुओं को देने वाली है तथा जिस मनुष्य पर इसका प्रभाव है वह इन धातुओं की.बहुत खरीद या विक्री करता है ॥ ११॥

करोतिचतथायज्ञान्दक्षिणाञ्चप्रयच्छति। भांदेवनिकेतांश्चसकारयतितन्मनाः ||१२||

 वह मनुष्य. यज्ञ करता है तथा दक्षिणा देता है।  उससे प्रभावित होकर वह देवसभा व मन्दिर बनवाता है १२ ||

सत्त्वाधारोनिधिश्चान्योमहापद्मइतिश्रुतः। सत्त्वप्रधानोभवतितेनचाधिष्ठितोनरः॥१३

दूसरी निधि सतोगुण प्रधान महापद्म है । उससे प्रभावित मनुष्य सतोगुण प्रधान होजाता है ॥ १३ ॥

करोतिपथरागादि - रत्नानाञ्चपरिग्रहम्। शैक्तिकानांप्रबालानांतेषांचक्रय-विक्रयान्॥१४॥

यह निधि पद्मराग आदि रत्नों को प्राप्त कराती तथा मोती, मूंगा आदि की खरीद और बिक्री भी कराती है ॥ १४ ॥

ददातियोगशीलेभ्यस्तेषामावसथांस्तथा। प्रकारयतितच्छीलःस्वयमेवचजायते || १५||

 उन योगशील पुरुषों को यह हव्यों का स्थान बनाती है ।  यह निधि मनुष्य केशील को बनाती है ||१५||

उत्प्रसूतास्तथाशीलाःपुत्रपौत्रक्रमेणच। पूर्वार्द्धमात्र : सप्तासौपुरुषांश्चनमुञ्चति॥१६

तथा उसके पुत्र और पौत्रों में भी वैसाही शील उत्पन्न करती है तथाउस पुरुष को सात पुश्त तक नहीं छोड़ती ॥१६॥

तामसोमकरोनामनिधिस्तेनावलोकितः। पुरुषोऽथतमःप्रायःसुशीलोऽपिहिजायते।१७॥

तीसरी मकर नामक तामसी निधिहै, उससे प्रभा- विन मनुष्य सुशील होतेहुए भी तमोगुणी होजाताहै ॥१७॥

वारणखड्गष्टिधनुषांचर्म्मणाञ्चपरिग्रहम्। [सनानांचेकुरुतेयातिमैत्रीञ्चराजभिः॥१८॥

वह ढाल, तलवार तथा धनुषबाण धारण हैकरता है और उसकी रुचि राजाओं के साथ मैत्रीकरने में रहती है ||१८||

ददातिशौर्य्यवृत्तीनांभूर्भुजांयेचतत्प्रियाः। क्रयविक्रयेचशस्त्राणांनान्यत्रप्रीतिमेतिच॥१६

उस मनुष्य की वृत्ति शुरवीरों की सी होती है और वह ऐसे ही लोगों कोप्रिय होता है ।

 इसकी प्रीति शस्त्रों के क्रय-विक्रयमें ही होती है अन्यत्र नहीं ॥ १६ ॥

एकस्यैवभवत्येषनचतस्यानुजानुगः। द्रव्यार्थंदस्युतोनाशंसंग्रामेचापिसव्रजेत् ||२०||

यह निधि एकही मनुष्य तक सीमित रहती है और वह मनुष्यधन के लिये किसी चोर से अथवा संग्राममें माराजाता है ॥ २० ॥

कच्छपश्चनिधिर्योऽसौनरस्तेनाभिवीक्षितः। तमःप्रधानोभवतियतोऽसौतामसोनिधिः ||२१||

चौथी कच्छप निधि है । इसकाजिस मनुष्य पर प्रभाव होता है वह तमोगुणी होजाता है क्योंकि यह तामसी निधि है ॥२१॥

व्यवहारानशेषांस्तु पुण्यजातैः करोति च ।

कर्म्मस्थानखिलांचैव न विश्वसिति कस्यचित् ॥ २२

परंतुइसका व्यवहार पुण्यशील लोगों से होता है औरयह सम्पूर्ण कर्मों के करने वाले मनुष्यों को प्रभा- वित करती है। इससे प्रभावित पुरुष को किसीका विश्वास नहीं होता ||२२||

समस्तानियथाङ्गानिसंहरत्येवकच्छपः। तथाविष्टभ्यचित्तानितिष्ठत्यायतमानसः ||२३||

जिस प्रकार कच्छपअपने श्रङ्गों को समेट लेता है उसी तरह वह पुरुष सब वस्तुओं से अपना मन हटाकर धन में लगाताहै ॥ २३ ॥

नददातिनवाभुङ्क्तेतद्विनाशभयाकुलः। निधानमुर्व्वयांकुरुतेनिधिःसोऽप्येकपूरुषः ||२४||

  वह मनुष्य न तो देता है और न स्वयं खाता है और धन के विनाश होजाने के भय से

व्याकुल रहता है। यह निधि उससे पृथ्वी में धनगढ़वाती है जो कि एक पुश्त तक ही चलता है ।२४॥

रजोगुणमयश्चान्योमुकुन्दोनामयोनिधिः। יनरोऽवलोकितस्तेनतद्गुणोभवतिद्विज ||२५||

पाँचवीं निधि मुकुन्द नामक रजोगुणमयी है ।  हेद्विज ! यह जिस मनुष्य को देखती है वह गुणी होता है ॥२५॥

- मृदङ्गानामातोद्यस्यपरिग्रहम्। करोतिगायतांवित्तंनृत्यताञ्चप्रयच्छति॥२६

वह मनुष्य वीणा, वेणु और मृदनश्रादि का संग्रह करता है तथा गायकों और नाचने वालों को धन देता है ||२६||

वन्दिनामथसूतानांविद्यानांलास्यपांठिनाम्। ददात्यहर्निशंभोगान्भुङ्क्तेतैश्वसमंद्विज||२७||

हे द्विज ! वह बंदिजनोंभाटों, चारणों और नटों आदि को सदा भोजन दिया करता है तथा श्रापभी उनके साथ भोजनकरता है || २७||

कुलटास्वरतिवास्यभवत्यन्यैश्चतद्विधैः। प्रयातिसङ्गमेकंचयंनिधिर्भजतेनरम् ||२८||

इसकी कुलटा स्त्रियों में तथा वैसेही अन्य वेश्यागामी पुरुषों से प्रीति रहती है, यहनिधि मनुष्य की एक पुश्त तक चलती है ॥ २८ ॥

रजस्तमोमयश्चान्योनन्दानाममहानिधिः। उपैतिस्तम्भमधिकंनरस्तेनावलोकितः ||२६||

छठवीं महानिधि नन्द नामक है जो रजोगुण और तमोगुण से युक्त है। यह जिस मनुष्य पर दृष्टिकरती है वह ॥ २६ ॥

समस्तधातुरत्नानांपुण्यधान्यादिकस्यच। परिग्रहंकरोत्येषतथैवक्रयविक्रयम्॥३०

समस्त धातुत्रों, रत्नों औरधनों आदि का संग्रह करता है तथा उनका क्रयऔर विक्रय करता है ॥ ३० ॥

आधार: स्वजनानांचआगताभ्यागतस्यच। सहतेनापमानोक्तिंस्वल्पामपिमहामुने॥३१

वह अपने स्वजनों,अतिथियों और अभ्यागतोंका पालन करता है तथा वह थोड़ी भी अपमान की बात नहीं कहता है ॥३१

स्तूयमानश्चमहतींप्रीतींवनातियच्छति। यंयमिच्छतिवैकामंमृदुत्वमुपयातिच॥३२॥

  वह विनम्र होकर सबके साथ प्रीति रखता है और जिस-जिस बात की वह कामना करता है वह पूरीहोजाती है ॥ ३२ ॥

बढ्योभार्य्याभवन्त्यस्यसूतिमत्योऽतिशोभनाः। रतयेसप्तचनरान्निधिर्नन्दोऽनुवर्त्तते॥३३॥

कमल के समान इस सुन्दरपुरुष को सी स्त्रियाँ प्राप्त होती हैं ।  यह नन्दवहुतनामक निधि सात पुश्तों तक चलती है ॥ ३३ ॥

प्रवर्द्धमानोऽथनरमष्टभागेनसत्तम। दीर्घायुष्टुञ्चसर्वेषांपुरुषाणांप्रयच्छति ||३४||

हे कौटुकि ! यह आठ अङ्गों से वृद्धि को प्राप्त हुई,सब मनुष्यों को दीर्घायु कर देती है ॥ ३४ ॥ वन्धूनामेवभरणंयेचदूरादुपागताः। तेषांकरोतिवैनन्दःपरलोकेनचादृतः ||३५||

 वह मनुष्य दूर से आये हुए भाई-बन्धुओं का भरण करता है । नन्द से प्रभावित मनुष्य परलोक कोनहीं मानता ॥ ३५ ॥

भवत्यस्यनचस्नेहःसहवासिषुजायते। पूर्वमित्रेषुशैथिल्यंप्रीतिमन्यैःकरोतिच॥३६॥

उसकी प्रीति पुरवासियों सेनहीं होती है। पुराने मित्रों से उसकी प्रीति मेंश्राती वह अन्य नये मित्रों सेशिथिलता है तथाप्रीति करता है ||३६||

तथैवसत्त्व - रजसीयोविभर्त्तिमहानिधिः। सनीलसंज्ञस्तत्सङ्गीनरस्तच्छीलवान्भवेत् ||३७||

सातवीं निधि सतोगुण और रजोगुण से युक्त नील नामक है जिसका सङ्गीपुरुष सत्सङ्गी होता है ॥ ३७ ॥

वस्त्र- कार्पासधान्यादि-फलपुष्पपरिग्रहम्। मुक्ताविद्रुम-शंखानांशुक्त्यादीनांतथासुने ||३८||

काष्ठादीनांकरोत्येपयच्चान्यज्जलसम्भवम्। क्रयविक्रयमन्येषांनान्यत्ररमतेमनः || ३६

वह वस्त्र, कपास, धान्य, फल, पुष्प आदि का संग्रह करता है तथा  मोती, मूंगा, शंख, सीप, काष्ट तथा अन्य वस्तुयें जो जल से पैदा होती हैं उनका भी संग्रह और क्रय-विक्रय करता है, उसका मन अन्यत्र नहीं लगता ॥ ३८-३६॥

तड़ागान्पुष्करिण्योऽथतथारामान्करोतिच। बन्धञ्चसरितांवृक्षांस्तथारोपयतेनरः॥४०॥

   वह मनुष्य तालाब, बावड़ी तथा बारा लगवाता है । वह नदियों के बांध वनवातातथा वृक्ष लगाता है ||४०|

अनुलेपनपुष्पादि-भोगंभुक्त्वाभिजायते। त्रिपौरुषश्चापिनिधिनीलोनामैपजायते॥४१

वह मनुष्य चन्दन, पुष्पऔर भोग आदि को लेकर अति प्रसन्न होता है । यह नील नामक निधि तीन पुश्त तक चलती है.॥ ४१ ॥

रजस्तमेामयश्चान्यःशंखसंज्ञोहियोनिधिः। तेनापिनीयतेविप्रतद्वगुणित्वंनिधीश्वरः॥४२॥

आठवीं शंख नामक निधि रजोगुण और तमोगुण से युक्त है । हे विप्र ! जिस पर इसकी

दृष्टि होती है वह गुणी होजाता है ॥ ४२ ॥

एकस्यैवभवत्येषनरंनान्यमुपैतिच।

स्य शंखो निधिस्तस्य स्वरूपं क्रोष्टुके शृणु ॥ ४३

यहएकपुरुषकेश्राश्रितरहकरदूसरेकेपासनहींजाती है।हेकौटुकिजी ! जिसमनुष्यकेपासशंखनिधिहो उसका स्वरूप सुनो ॥ ४३ ॥

[एकएवात्मनासृष्टमन्नंभुङ्क्तेतथाम्बरम्। कदन्नथुक्परिजनोनचशोभनवस्त्रधृक्।४४

 वह मनुष्य अपना-पैदा किया हुआ न खाता है तथा अपनेही उपार्जित वस्त्र पहिनता है । वह कभी दूसरे का नहीं खाता और न अच्छे कपड़े पहिनता है ॥ ४४ ॥

ददातिसुहृद्वाभ्रातृ-पुत्र - स्नुषादिषु।

पोपणपरःशंखीनरोभवतिसर्व्वदा ||४५ ||

वह मित्र, पत्नी, भाई, पुत्र, वहिन आदि को अनंवस्त्र नहीं देता । शंख निधि वाला पुरुष सदाअपने ही पोपण में तत्पर रहता है ||४५ ||

येतेनिधयःख्यातानराणामर्थदेवताः। मिश्रावलोकनान्मिश्राःस्वभावफलदायिनः || ४६ ||

ये निधियांमनुष्यों की अर्थ देवता कहलाती हैं । यदि एक सेअधिक निधि की दृष्टि मनुष्य पर पड़े तो एक से अधिक निधि का ही फल मनुष्य को होता है ॥ ४६॥

पंथाख्यातस्वभावस्तुभवत्येवविलोकनात्। सर्व्वेषामाधिपत्येचश्रीरेषाद्विजपद्मिनी ||४७|||

जितनी निधियों की दृष्टि पड़ती है उतनी निधियों.का ही फल होता है।  जहां सब निधियों का समारोह हो वहाँ पद्मिनी नाम विद्या भी होती है ॥४७॥ इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंनिधिनिर्णयनाम६८वां [अ०] समाप्त |