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कौटुकिरुवाच

 भगवन्कथितासम्यक्त्वयामन्वन्तरस्थितिः। क्रमाद्विस्तरतस्त्वत्तोमयाचैवावधारिता॥१॥

कौटुकिजी बोले-

हे भगवन् ! आपने मन्वन्तरों की स्थिति क्रम से विस्तार पूर्वक मुझ से कही तथा मैंने उसकोसुना ॥ १ ॥

ब्रह्माद्यमखिलंवंशंभूभुजांद्विजसत्तम। श्रोतुंममेच्छतःसम्यग्भगवन्प्रब्रवीहिमे॥२

हेमार्कण्डेयजी ! ब्रह्माजीजिसके आदिमेंहैं, उसवंशकेराजाओंकोमैं सुनना चाहताहूँ, आप भलीभाँति कहें॥२॥ मार्कण्डेय उवाच

शृणुवत्सनृपाणांत्वमशेषाणांसमुद्भवम्। चरितंचजगन्मूलमादौकृत्वाप्रजापतिम्॥३

मार्कण्डेयजी बोले-

हे वत्स, कौटुकि ! जगत के कारण ब्रह्मा जी उत्पत्ति और चरित्र तुम सुनो ॥३॥

श्रयंहिवंशोभूपालैरनेकक्रतुकर्तृभिः। संग्रामजिद्भिर्धर्मज्ञेःशतसंख्यैरलङ्कृतः॥४

यह वंश अनेक जिस वंश के आदि में हैं उसके अशेष राजाओं की यज्ञ करने वाले, संग्राम विजयी और धर्मज्ञ श्रनेकराजाओं से अलंकृत है ||४||

श्रुत्वाचैषांनरेन्द्राणांचरितानिमहात्मनाम्। उत्पत्तयश्चपुरुषःसर्व्वपापैःप्रमुच्यते || ५ ||

इन महात्मा राजाओं की उत्पत्ति और चरित्र सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ५ ॥

मनुर्यत्रतथेक्ष्वाकुरनरण्योभगीरथः। अन्येचशतशोभूपाःसम्यक्पालितभूमयः॥६

इस वंश में मनु, इक्ष्वाकु अनरण्य भगीरथ तथा अन्य सैकड़ों राजा ऐसे हैं जिन्होंने भली भाँति पृथ्वी का पालन कियाहै ॥ ६ ॥

धर्म्मज्ञायज्विनःशूराःसम्यक्परमवेदिनः। श्रुतेतस्मिन्पुमान्वंशेपापौघाद्विप्रमुच्यते॥७

वेराजाधर्मज्ञ, यज्ञकरनेवाले, वीरऔरहुए सबप्रकारवेदकेपरमज्ञाताथेउनकेवंश  चरित्रसुननेसेमनुष्यपाप समूहसे छूट जाता है॥७॥

तदयं श्रूयतां वंशो यतो वंशाः सहस्रशः ।

भिद्यन्ते मनुजेन्द्राणामवरोहा यथा बटात् ॥८

इस लिये श्रव इस वंश का हाल सुनो । इस वंश से हज़ारों और वंश इस प्रकार निकलेहैं

जिस प्रकार कि वड़ के पेड़ से हज़ारों शाखायेंनिकलती हैं ॥८ ॥

ब्रह्माप्रजापतिःपूर्वंसिसृक्षुर्विविधाःप्रजाः। अंगुष्ठाद्दक्षिणाद्दक्षमसृजद्विजसत्तम॥६॥

 हे क्रौष्टुकि जी ! प्रजापति ब्रह्मा ने पहिले ही पहिले विविध प्रकार के प्रजानों की सृष्टि उत्पन्न करने की इच्छा से अपनेदाहिने अँगूठे से दक्ष को उत्पन्न किया ॥ ६ ॥

वामांगुष्ठाचतत्पत्नींजगत्सूतिकरोविभुः।

ससर्ज भगवान् ब्रह्मा जगतां कारणं परम् ॥ १०॥

जगतकेपरमकारणभगवानब्रह्मानेवाँयेअँगूठेसे दक्षकीपत्नीकोउत्पन्नकिया॥१०॥

अदितिस्तस्य दक्षस्य कन्याऽजायत शोभना ।

कश्यपोदेवंमार्त्तण्डंसमजीजनत्॥११॥ |

उस स्त्री सेदक्षनेअदितिनामकन्याउत्पन्नकीऔर श्रदितिसे उसके पति कश्यप ने सूर्य देवता को उत्पन्नकिया॥११॥

ब्रह्मस्वरूपंजगतामशेषाणांवरप्रदम्। आदिमध्यान्तभूतंचसर्गस्थित्यन्तकर्मसु॥१२

फिर ब्रह्माजी ने उत्पत्ति, पालन, और प्रलय करने के निमित्त आदि, अन्त औरमध्य में रहने वाले, जगत के वरप्रद स्वरूप कोबनाया ॥ १२ ॥

यतोऽखिलमिदंयस्मिन्नशेषञ्चस्थितंद्विज। यत्स्वरूपंजगबेदंसदेवासुरमानुषम् ||१३||

हे द्विज ! उस स्वरूप में देवता, असुर और मनुष्य युक्त यह सम्पूर्ण जगत रोषरूप से स्थित है ॥ १३ ॥

यःसर्व्वभूतःसर्व्वात्मापरमात्मासनातनः। अदित्यामभवद्भास्वान्पूर्व्वमाराधितस्तया ||१४

 जो सर्वभूत, सर्वात्मा, परमात्मा, सनातन भास्वान् सूर्य हैं वे अदिति से जिसने कि पहिले उनकी श्राराधना की थीउत्पन्न हुए ॥१ ४ ॥ कौटुकिरुवाच

भगवन्श्रोतुमिच्छामियत्स्वरूपंविवस्वतः। यत्काररणञ्चादिदेवःसोऽभवत्कश्यपात्मजः॥१५॥

क्रौष्टुकि जी बोले:

हे भगवन् ! विवस्वान् के उस स्वरूप को सुनना चाहता हूं जिसके कारण कि श्रादि देवकश्यप के पुत्र होकर उत्पन्न हुए ||१५||

यथाचाराधितोदेव्यासोऽदित्याकश्यपेनच। आराधितेनचोक्तंयत्तेनदेवेनभास्वता॥१६॥

जिस प्रकार कि देवी अदिति और कश्यप ने उनकी आराधना की थी और आराधित होने पर जो कुछ- सूर्य देवने उनसे कहा था वह कहिये ॥ १६ ॥

प्रभावचावतीर्णस्ययथावन्मुनिसत्तम। भवताकथितंसम्यक्श्रोतुमिच्छाम्यशेषतः॥१७॥

हेमुनि मार्कण्डेयजी ! उनकेअवतारकाप्रभावआपने पहिलेअच्छीतरहकहाथा, अबमैंउसकोविस्तारपूर्वक सुननाचाहताहूँ॥१७॥

मार्कण्डेयउवाच

विस्पष्टापरमाविद्याज्योतिर्माशाश्वतीस्फुटा। कैवल्यंज्ञानमाविर्भूःप्राकाम्यंसंविदेवच॥१८॥

मार्कण्डेयजी बोले

स्पष्ट परम विद्या, शाश्वती और प्रकाशित ज्योति, कैवल्य ज्ञान, आविर्भाव, प्राकाम्य श्रीर संविंद ॥१८॥

बोधश्चावगतिश्चैवस्मृतिर्विज्ञानमेवच। इत्येतानीहरूपाणितस्यरूपस्यभास्वतः॥१६॥

वोध, अवगति, स्मृति और विज्ञानं, ये सब भगवान् सूर्य के रूप हैं ||१६||

श्रूयताञ्चमहाभागविस्तरागदतोमम। यत्पृष्टवानसिरवेराविर्भावोयथाभवत्॥२०॥

 हे महाभाग ! जो तुमने सूर्य का प्रकट होना पूछा सो मुझसे विस्तार पूर्वक सुनो ॥२०॥

निष्पभेऽस्मिन्निरालोकेसर्व्वतस्तमसावृते। बृहदण्डमभूदेकमक्षरंकारणंपरम् ||२१||

इस प्रभाहीन सम्पूर्णलोक में जब चारों ओर अन्धकार था. उस समय हुआ || २१ |

तद्विभेदतदन्तःस्थोभगवान्प्रपितामहः। पद्मयोनिःस्वयंब्रह्मायःस्रष्टाजगतांप्रभुः।२२||

उस अण्डे के फटने पर उसके अन्दरपरम कारण अक्षर रूप एक वृहत् श्रण्ड उत्पन्न से भगवान् पद्मयोनि जगतके सृष्टिकर्ता, पितामहस्वयं प्रभु ब्रह्माजी उत्पन्न हुए ॥ २२ ॥

तन्मुखादामितिमहानभूच्छन्दोमहामुने। ततोभूस्तुभुवस्तस्मात्ततश्चस्वरनन्तरम् ||२३||

हे कौटुकि मुनि ! ब्रह्मा के मुख से श्रोम' ऐसा महान् शब्द हुआ और उसी से भूः भुवः और स्वः शब्दों काप्रादुर्भाव हुआ || २३||

एताव्याहृतयस्तिस्रःस्वरूपंतद्विवस्वतः ओमित्यस्मात्स्वरूपात्तुसूक्ष्मरूपंरवेःपरम् | २४||

ये तीन व्याहृतियाँ भगवान् सूर्य का स्वरूप हैं और 'श्रोम' स्वरूप से सूर्य का सूक्ष्म रूप उत्पन्न हुआ || २४ ॥

ततोमहरितिस्थलंजनंस्थूलतरंततः। ततस्तपस्ततःसत्यमितिमूर्त्तानिसप्तधा ||२५||

 उस सूक्ष्म स्वरूप से स्थूल 'महान' की उत्पत्ति हुई और उस स्थूल से स्थूलतर 'जन' शब्द की उत्पत्ति हुई तथा उससे तप और उससे सत्य उत्पन्न हुआ । यही सातस्वरूप ॥ २५ ॥

स्थितानितस्यरूपाणिभवन्तिनभवन्तिच। स्वभावभावयोर्भावंयतोगच्छन्तिसंशयम् ||२६||

सूर्यदेवकेहैं।इनकाध्यानकरने सेसंशयात्मकभावस्वभावतयानष्टहोजातेहैं॥२६॥

आद्यन्तंयत्परंसूक्ष्ममरूपंपरमंस्थितम्। ओमित्युक्तमयाविप्रतत्परंब्रह्मतद्वपुः॥२७॥

हेविप्रक्रोष्टुकिजी ! सवसृष्टिकेआदिश्रन्त परमसूक्ष्मवपरमरूपहैं, उन्हींको'ओम्'तथा दूसरे नाम परब्रह्मसेपुकारतेहैं॥२७॥

इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंवंशानुकीर्त्तननाम१०१वाँअध्यायसमाप्त |