मार्कण्डेय महा पुराण
81
देवीमाहात्म्यश्रश्म्नमश्चण्डिकायै सावर्णिःसूर्यतनयोयोमनुःकथ्यतेऽष्टमः। निशामयतदुत्पत्तिविस्तरागदतोमम॥१
मार्कण्डेयजी बोले-
सूर्य पुत्र सावर्णिक की जो कि आठवें मनु कहे जाते हैं उत्पत्ति को मैं विस्तार पूर्वक कहताहूँ, सुनिये ॥१॥
महामायानुभावेनयथामन्वन्तराधिपः। सबभूवमहाभागःसावर्णिस्तनयोरवेः॥२
जिस प्रकार कि महामाया के प्रभाव से वह महाभाग सावर्णिक मन्वंतर के स्वामी हुएयह सुनिये ||२||
स्वारोचिषेऽन्तरेपूर्वंचैत्रवंशसमुद्भवः। सुरथोनामराजाऽभूत्समस्तेक्षितिमण्डले॥३
रोचिप मनु के पुत्र चैत्रके वंश में सुरथ नाम राजा हुए जो कि समस्त पृथ्वी मण्डल पर राज्य करतेथे ॥३॥
तस्यपालयतःसम्यक्प्रजाःपुत्रानिवौरसान। बभूवुःशत्रवोभूपाःकोलाविध्वंसिनस्तथा॥४
पहिले स्वारोचिप मन्वंतर में स्वा फिर प्रजा को श्रौरस पुत्र की तरह पालते हुए उनके कोला- विध्वंसी लोग शत्रु होगये ॥ ४ ॥
वैरभवद्युद्धमतिमबलदण्डिनः। न्यूनैरपिसतैर्युद्धेकोलाविध्वंसिभिर्जितः॥५॥
उन प्रवल शत्रुओं के साथ राजा सुरथका घोर युद्ध हुआ और यद्यपि कोला- ध्वंसी लोग थोड़ी तादादजनकी ही विजय हुई ॥ ५ ॥
तस्य ततःस्वपुरमायातोनिजदेशाधिपोऽभवत्। श्राक्रान्तःसमहाभागस्तैस्तदाप्रबलारिभिः || ६ ||
फिर वहसुरथ अपने नगर में अपनेही देशके स्वामी होगये परन्तु वहाँभी उन प्रवल शत्रुओंने उनको घेर लिया॥ ६ ॥
श्रमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्यदुरात्मभिः। कोषोवलञ्चापहृतंतत्रापिस्वपुरेततः॥७
फिर इनके नगर में ही इनके कमज़ोर हो जानेपर इनके दुष्ट और दुरात्मा मंत्रियों और सेना
पतियों ने राज्य के खज़ाने और सेना पर अपनाश्रधिपत्य जमा लिया ||७||
ततोमृगयाव्याजेनहृतस्वाम्यःसभूपतिः। एकाकीहयमारुह्यजगामगहनंवनम्॥८॥
जब राजा सुरथ का.स्वामित्व क्षीण होने लगा तो श्राखेट के बहाने वह अकेले घोड़े पर सवार होकर दुर्गम वनमें चलेगये ||८||
सतत्राश्रममद्राक्षीद्द्विजवर्य्यस्यमेधसः। प्रशान्तश्वापदाकीर्णंमुनिशिष्योपशोभितम् || ९
उन्होंने उस वनमें द्विजवर्य मेधा का श्राश्रम देखा जो कि प्रशान्त, पशु-पक्षियों से व्याप्त तथा
मुनि के शिष्यों से शोभित था ||९ ||
तस्थौकञ्चित्सकालञ्चमुनिनातेनसत्कृतः। इतश्चेतश्चविचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे॥१०
मुनि से सत्कारप्राप्त करने पर वह राजा कुछ समय के लिये उसी श्राश्रममै ठहर गया, चह बहुधा उस मुनिके सुन्दर श्राश्रम में इधर-उधर घूमता रहता था ॥ १० ॥
सोऽचिन्तयत्तदातत्रममत्वाकृष्टचेतनः। मत्पूर्वैःपालितंपूर्वंमयाहीनंपुरंहितत्। मदभृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतःपाल्यतेनवा॥११॥
एकसमय वह राजा वहाँ पर ममतायुक्त होकर सोचने लगा कि जो नगर मेरे पूर्वजों ने बसाया था उस को मैं छोड़कर चला आयाहूँ, न मालूम मेरे अधर्मी नौकर लोग प्रजा का धर्म पूर्वक पालन करते हैं यानहीं ॥ ११ ॥
नजानेसप्रधानोमेशूरहस्तीसदामदः। ममवैरिवशंयातःकान्भोगानुपलप्स्यते ||१२||
मैं नहीं जानता कि मेरे मदयुक्त उस बलवान हाथी को शत्रु के वशमें होकर वह प्रधानखाना देता है या नहीं ॥ १२ ॥
येममानुगतानित्यंप्रसादधनभोजनैः। अनुवृत्तिंध्रुवंतेऽद्यकुर्व्वन्त्यन्यमहीभृताम् || १३
जो मेरी प्रसन्नता के लिये नित्य मेरे पास श्राकर धन और भोजनादि पाते थे वे आज अपनी आजीविका के लिये दूसरेराजाओं की सेवा करते होंगे ॥ १३ ॥
असम्यग्वचयशीलैस्तैःकुर्व्वद्भिःसततंव्ययम्। संचितःसोऽतिदुःखेनक्षयंकोषोगमिष्यति || १४
राजा अत्यन्तदुःखपूर्वक सोचने लगा कि जो खजाना मैंने बड़े परिश्रम से जमा किया था उसको नौकर लोग निरन्तर खर्च करके क्षीण कररहे होंगे ॥ १४ ॥
एतच्चान्यच्चसततंचिन्तयामासपार्थिवः। तत्रविप्राश्रमाभ्यासेवैश्यमेकंददर्शसः॥१५॥
यह तथा अन्य बातें वह राजा सोच रहा था कि इतने में उसने श्राश्रम के पास एक वैश्य को देखा ||१५||
सपृष्टस्तेनकस्त्वंभोहेतुश्चागमनेऽत्रकः। सशोकइवकस्मात्त्वंदुर्मनाइवलक्ष्यसे ||१६||
उसने वैश्य से पूछा कि तुम कौन हो और किस कारण से यहाँ आये हो तथा किस कारण से तुमउदास और शोकयुक्त प्रतीत होते हो ? ॥ १६ ॥
इत्याकर्ण्यवचस्तस्यभूपतेःप्रणयोदितम्। प्रत्युवाचसतंवैश्यःप्रश्रयावनतोनृपम्॥१७॥
राजा के यह वचन सुनकर वह वैश्य राजा को. प्रणाम कर विनयपूर्वक कहने लगा ॥ १७ ॥ वैश्यउवाच
समाधिर्नामवैश्योऽहमुत्पन्नोधनिनांकुले। पुत्रदारैर्निरस्तश्चधनलोभादसाधुभिः॥१८॥
वैश्य वोला--
धनियों के कुलमें उत्पन्न मैं समाधि नाम वैश्य हूँ और धन के लोभ से मेरे दुष्ट स्त्री पुत्रों ने मुझको घर से बाहर निकाल दिया है ॥ १८ ॥
विहीनश्चधनैर्दारैःपुत्रैरादायमेधनम्। वनमभ्यागतोदुःखीनिरस्तवाप्तवन्धुभिः॥१९
स्त्री पुत्रा--
दिकोंने मेरे धनको लेकर मुझे घरसे बाहर निकाल. दिया है इस कारण मैं दुःखी होकर भाई-बंधुओं से त्यागा हुआ इस वन में आया हूँ ॥ १९ ॥
सोऽहंनवेद्मिपुत्राणांकुशलाकुशलात्मिकाम्। स्वजनांनांचदाराणाञ्चात्रसंस्थितः॥२०॥
श्ररअव यहां रहते हुए मुझे स्त्री-पुत्रों और स्वजनोंकी कुशल क्षेम का कुछ भी पता नहीं है ॥ २० ॥
किंनुतेषांगृहेक्षेममक्षेमंकिंनुसाम्प्रतम्। कथंतेकिंनुसट्टत्ताःदुट्टत्ताकिंनुमेसुताः२१॥
मैं नहीं जानता कि घरपर उनकी कुशल है या नहीं तथा वे अच्छे कार्यों में प्रवृत्त हैं या नहीं ॥ २१ ॥ राजोवाच
यैर्निरस्तोभवigat: पुत्रदारादिभिर्धनैः। तेषुकिंभवतःस्नेहमनुवन्नातिमानसम् ||२२||
राजा बोले-
जिन स्त्री-पुत्रादि ने धन के लोभ से तुमकोघर,से निकाल दिया उनके स्नेह में तुम्हारे चित्त को,ममत्व क्यों हैं ? ॥ २२ ॥ वैश्यउवाच
एवमेतद्यथाप्राहभवानस्मद्गतंचचः। किंकरोमिनबध्नातिममनिष्ठुरतांमनः ||२३||
वैश्य वोला-
जिस तरह आपने कहा वह सत्य है, परन्तु मैं क्या करूँ मेरा मन वशमें नहीं है और उनके प्रतिनिष्ठुर नहीं होता ||२३||
यःसन्त्यज्यपितृस्नेहंधनलुब्धैर्निराकृतः। पतिस्वजनहार्द्दञ्चहार्दितेष्वेवमेमनः॥२४
जिन स्त्री पुत्रों ने धन केलोभ से पति और पितृ स्नेह को भुला दिया और.और मुझको घर से निकाल दिया उनके प्रति श्रवभी मेरे हृदय में ममता है ॥२४॥
किमेतन्नाभिजानामिजानन्नपिमहामते। यत्प्रेममवणंचित्तंविगुणेष्वपिबन्धुषु॥२५
हे महावुद्धि ! यह आश्चर्य है कि मैं यह सब जानता हुआ भी अन- जान होरहा हूं कारण- कि उन भाई-बन्धुत्रों में भी मेरी ममता है जिन्होंने मेरे प्रति शत्रु का सा कर्मकिया है ॥ २५ ॥
तेषांकृतेमेनिश्वासादौर्मनस्यंचजायते। करोमिकिंयन्नमनस्तेष्वमीतिषुनिष्ठुरम् ||२६||
उन्हीं के लिये मैं श्वास छोड़ा करता हूँ तथा दुःखी रहता हूँ। मैं क्या उपायकरूँ जिससे कि मेरा मन उनकी प्रीति छोड़कर उनकेप्रति निष्ठुर होजाय १ ॥ २६ ॥ मार्कण्डेयउवाच
ततस्तौसहितौविप्रतंमुनिंसमुपस्थितौ। समाधिर्नामवैश्योऽसौसचपार्थिवसत्तमः ||२७||
मार्कण्डेयजी बोले-
तब वे दोनों समाधि नाम वैश्य और नृपश्रेष्ठ, सुरथ उस मुनि के पास जाकर बैठे ॥ २७ ॥
कृत्वातुतौयथान्यायंयथार्हतेनसंविदम्। उपविष्टौकथाःकाश्विच्चक्रतुर्वैश्य - पार्थिवौ ||२८||
उनदोनों ने न्याय पूर्वक सुनि की पूजाकी और उनकी आज्ञा पाकर वे बैठगये । इसके बाद उन वैश्य और राजा ने कथा वार्ता कहना शुरू किया ॥२८॥ राजोवाच
भगवंस्त्वामहंप्रष्टुमिच्छाम्येकंवदस्वतत्। दुःखाययन्मेमनसःस्वचित्तायत्ततांविना ||२६||
राजा वोले-
हे भगवन् ! मैं आपसे एक बात पूछता हूँ । मेरा चित्त मेरे वश में नहीं है और इस कारण मेरे मन को दुःख होता है ॥ २६ ॥
ममत्वंममराजस्यराज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि। जानतोऽपियथाऽज्ञस्यकिमेतन्मुनिसत्तम॥३०॥
हे मुनिवर ! राज्य के सम्पूर्ण अङ्गों में मेरी ममता है । यह जानते हुए भी कि वह अब मेरा नहीं है मैं अज्ञान क्यों होताहूँ ? ॥ ३० ॥
श्रयंचनिकृतःपुत्रैर्दारैभृत्यैस्तथोज्झितः।। स्वजनेनचसन्त्यक्तस्तेषुहार्द्दींतथाप्यति॥३१॥
यह वैश्य भी स्त्री, पुत्र, सेवक और स्वजनों द्वारा धन के लोभ में घर से निकाला गया!है, परन्तु तो भी इसकी उनमें अत्यन्त प्रीति है ।३१
एवमेषतथाहंचद्वावप्यत्यन्तदुःखितौ। दृष्टदोषेऽपिविषयेममत्वाकृष्टमानसौ ||३२||
यह वैश्य और मैं दोनों बहुत दुःखी हैं कारण- कि हम दृष्टि-दोष से विषय को विपरीत समझकरममता के वश में हो रहे हैं ॥ ३२ ॥
तत्केनैतन्महाभागयन्मोहोज्ञानिनोरपि। ममास्यचभवत्येपाविवेकान्धस्यमूढ़ता ||३३||
हे महाभाग !यह किस तरह है कि ज्ञानियों को भी मोह होत है । मेरी और इस वैश्य की सी मूर्खता तो अविबेकी और अन्धों में होनी चाहिये ||३३|| ऋषिरुवाच
ज्ञानमस्तिसमस्तस्यजन्तोर्विषयगोचरे।
वेषयश्च महाभाग याति चैवं पृथक् पृथक् ||३४||
ऋषिबोले- हेमहाभाग ! विषयकेसमझनेमेंसबजीवों कोज्ञानहैपरन्तुयहविषयभीसबकाअलग२है ||३४||
देवान्धाःप्राणिनःकेचिद्रात्रावन्धास्तथापरे। केचिद्दिवातथारात्रौप्राणिनस्तुल्यदृष्टयः ||३५||
कुछ जीव दिन में अन्धे होते हैं धौर कुछ रात्रि में, तथा कुछ जीवों को दिन और रात्रि मेंसमान दिखाई देता है ॥ ३५ ॥
निनोमनुजासत्यंकिन्तुतेनहिकेवलम्। तोहिज्ञानिनःसर्व्वेपशु-पक्षि- मृगादयः ||३६||
सत्य वात तो यहकि केवल मनुष्यों को ही ज्ञान नहीं होता, यहज्ञान पशु पक्षी शौर मृगादिकों में भी होता है ॥३६॥
नंचतत्मनुष्याणांयत्तेषांमृग-पक्षिणाम्। ग्नुष्याणांचयत्तेषांतुल्यमन्यत्तथोभयोः ||३७|||
जो ज्ञान मनुष्यों को हैं वही मृग और पक्षियों को इस कारण मनुष्य और पशु-पक्षी ज्ञानमें वरावरहैं॥३७॥
नेऽपिसतिपश्यैतान्पतंगांबावचंचषु। णमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपिक्षुधा॥३८॥
देखिये, क्षुधा से पीड़ित पशु पक्षी यह है जानते हुए भी बच्चों के खाने से हमारी भूख नहीं
जायगी, मोह वश अपनी चोंचों से बच्चों के मुखमें आहार देते हैं ॥ ३८ ॥
नुषामनुजव्याघ्रसाभिलापाःसुतान्प्रति। लोभात्प्रत्युपकारायनन्वेतेकिंनपश्यसि ||३६||
हे मनुष्यों में सिंह ! क्या आप नहीं देखते कि ज्ञान होते हुए भी मनुष्य प्रत्युपकार की श्राशा से पुत्रों को पालते हैं ? ॥३६॥
स्थापिममतावर्तेमोहगर्तेनिपातिताः। मायामभावेणसंसारस्थितिकारिणः ||४०||
संसार के पालने वाले ईश्वरकी महामायाके प्रभाव से मनुष्य ममता और मोह के गर्त में गिरते हैं. ॥४०
नात्रविस्मयःकाय्र्योयोगनिद्राजगत्पतेः। हामायाहरेश्चैतत्तयासंमोह्यतेजगत्॥४१॥
इसलिये इसमें सन्देह न करना चाहिये कि महा- माया जगत् के स्वामी जो विष्णु हैं उनकी योग
निद्रा है और इसी से यह जगत् मोहित होरहा है॥ ४१ ॥
निनामपिचेतांसिदेवीभगवतीहिसा। लादाकृष्यमोहायमहामायाप्रयच्छति ||४२ || |
वह देवी भगवती ज्ञानियों के चित्तको भीवलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती है ॥ ४२ ॥
नया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् । नेपाप्रसन्नावरदानृणांभवतिमुक्तये ||४३||
उसी देवी ने इस चराचर जगत् को सृजा है तथा वह ही प्रसन्न होकर मुक्ति के लिये मनुष्यों को बल देती है ॥ ४३ ॥
ना विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी । पुंसारबन्धहेतुश्चसैवसर्व्वेश्वरेश्वरी ||४४ ||
वह देवी परम विद्या है तथामुक्ति की कारणभूत और सनातनी है । वह देवीही सांसारिक बन्धनों की कारण और सव ईश्वरों की ईश्वरी है ॥ ४४ ॥ राजोवाच
भगवन्काहिसादेवीमहामायेतियांभवान्। त्रवीतिकथमुत्पन्नासाकर्म्मास्याश्चकिंद्विज॥४५॥
राजा बोले-हे भगवन् ! वह देवी कौन है जिसको किआप महामाया कहते हैं । हे द्विज ! वह कैसे पैदा हुई और उसके कर्म क्या हैं ? ॥ ४५ ॥
यत्स्वभावाचसादेवीयत्स्वरूपायदुद्भवा। तत्सर्व्वंश्रोतुमिच्छामित्वत्तोब्रह्मविदांवर॥४६
हे ब्रह्मके जानने वालों में श्रेष्ठ सुनि ! उस देवी का जो स्व- भाव और स्वरूपहै और जिस तरह कि वह उत्पन्न हुई है वह सब मैं आपसे सुनना चाहता हूँ ॥४६॥
ऋषिरुवाच
नित्यैवसाजगन्मूर्त्तिस्तथासर्व्वमिदंततम्। तथापितत्समुत्पत्तिर्वहुधाश्रूयतांमम || ४७||
ऋषि बोले-
वह जगत्मूर्ति नित्य है और उसी से यहसव है | तो भी उसकी उत्पत्ति संक्षेप में मुझसे सुनो॥४७॥
देवानांकार्य्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवतिसायदा। उत्पन्नेतितदालोकेसानित्याप्यभिधीयते॥४८
यद्यपि वह देवताओं की कार्यसिद्धि के लिये संसार में प्रादुर्भूत होती है तो भी उसको नित्याकहते हैं ॥ ४८ ॥
योगनिद्रांयदाविष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते। श्रास्तीर्यशेषमभजत्कल्पान्तेभगवान्प्रभुः॥४६॥
कल्प के अन्त में जगत् में प्रलय होने पर जब भगवान् विष्णु योगनिद्रा में प्राप्त होकर शेष पर शयन कर रहे थे ||४६||
द्वावसुरौघोरौविख्यातौमधुकैटभौ।
विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ ॥ ५०॥
तब विष्णु के कान के मल से दो भयङ्कर दैत्य जो कि मधु औरकैटभ के नाम से विख्यात हुए निकले और ब्रह्माजी का वध करने को तैयार हुए ॥ ५० ॥
सनाभिकमलेविष्णोःस्थितोब्रह्माप्रजापतिः। दृष्ट्वातावसुरौचोग्रौप्रसुतंचजनार्द्दनम्॥५१
प्रजापतिब्रह्मा विष्णु के नाभि कमलमें वैठे हुए थे । उन्होंने उन दोनों भयङ्कर असुरों को देखा परन्तु भगवान्विष्णु को सोया हुआ देखकर ॥ ५१ ॥
तुष्टावयोगनिद्रांतामेकाग्रहृदयस्थितः। विबोधनार्थायहरेर्हरिनेत्रकृतालया॥५२॥
ब्रह्माजी ने एकाग्र चित्त होकर भगवान् के नेत्रों में स्थित योग निद्रा की हरि के जगाने के निमित्त स्तुति की ॥ ५२॥
विश्वेश्वरींजगद्धात्रींस्थितिसंहारकारिणीम्। निद्रांभगवतींविष्णोरतुलांतेजसःप्रभुः॥५३
वह योगनिद्रा विश्वेश्वरी, जगद्धात्री, स्थिति संहार कारिणी तथा तेजस्वी भगवान् विष्णु की अतुला भगवती थीं ॥ ५३ ॥ ब्रह्मोवाच
त्वंस्वाहात्वंस्वधात्वंहिवषट्कारःस्वरात्मिका। सुधात्यमक्षरेनित्येत्रिधामात्रात्मिकास्थिता॥५४
ब्रह्माजी घोले--
हे निद्रे ! श्रापही स्वाहा, श्रापही स्वधा तथा श्रापही वपट्कार स्वरूपिणी हो । आप सुधा हो
और नित्य अक्षरों में तीन प्रकार की मात्रात्रों केरूप से स्थित हो ॥ ५४ ॥
श्रद्धमात्रास्थितानित्यायाऽनुच्चार्याविशेषतः। त्वमेवसात्वंसावित्रीत्वंदेवीजननीपरा ||५५||
हे देवी! आप श्रर्द्धमात्रा स्वरूप से स्थित हैं, नित्या हैं तथा जिसका विशेष रूप से उच्चारण न किया जासके वह श्राप ही हैं । श्रापही सावित्री और परम जननी हैं ॥ ५५ ॥
त्वयैवधार्यतेसर्व्वंत्वयैतत्सृज्यतेजगत्। त्वयैतत्पाल्यतेदेवित्वमत्स्यन्तेचसर्व्वदा॥५६॥
यह सव श्राप ही से धारण किया जाता है और श्राप ही ने इस जगत का निर्माण किया है तथा आपही इस जगत् के पालन और नाश करनेवाली हैं ||५६||
विसृष्टौसृष्टिरूपात्वंस्थितिरूपाचपालने।
तथा संहतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ॥ ५७॥
हेजगन्मये ! सृष्टिकोउत्पन्नकरनेमेंश्रापसृष्टि- रूपा, पालनकरनेमेंस्थितिरूपातथाअन्तकरने मेंसंहाररूपाहोकरस्थितहैं॥५७॥
महाविद्यामहामायामहामेधामहास्मृतिः। महामोहाचभवतीमहादेवीमहासुरी || ५८ ||
श्रापही महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महा- मोहा, महादेवी और महासुरी हैं ॥ ५८ ॥
प्रकृतिस्त्वञ्चसर्व्वस्यगुणत्रयविभाविणी। कालरात्रिमहारात्रिमोहरात्रिथदारुणा ||५६ |
श्रपही सवकी त्रिगुणमयी प्रकृति तथा भयङ्कर कालरात्रि मोहरात्रि, महारात्रि भी आप ही हैं ॥ ५६ ॥
त्वंश्रीस्त्वमीश्वरीत्वंहीस्त्वंयुद्धिर्वोधिलक्षणा। लज्जापुष्टिस्तथातुष्टिस्त्वंशान्तिःक्षान्तिरेवच॥६०॥
श्रपही शोभा, ईश्वरी, लज्जा, बुद्धि, ज्ञान-लक्षुणा, लज्जा,पुष्टि, तुष्टि, शान्ति श्रोर क्षमा श्रादि हैं ॥ ६०॥
खड्गिनीशूलिनीघोरागदिनीचक्रिणीतथा। शंखिनीचापिनीचारण- भुपुण्डी- परिचायुधा॥६१॥
श्राप ही अपनी दशों भुजाओं में खड्ग, शूल, मुण्ड, गदाचक्र, शंख, चाप, वाण, भुशुण्डी और परिध धारणकिये हुए हैं ॥ ६१ ॥
सौम्यासौम्यतराशेप-सौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी। परापराणांपरमात्वमेवपरमेश्वरी || ६२ ||
श्राप सौम्य हैं और सौम्यतरा हैं तथा सौम्यों में भी शाप अत्यन्त सुन्दरी हैं तथाश्रापही पर, पर, परमा और परमेश्वरी हैं ॥ ६२ ॥
यच्चकिञ्चित्कचिद्वस्तुसदसद्वाखिलात्मिके। तस्यसर्व्वस्ययाशक्तिःसात्वंकिंस्तूयसेतदा६३ ||
हे समस्तात्मिके ! जहाँ पर जो कुछ सव असत् ।वस्तु है उस सब में शक्ति तुम्हीं हो, अतः ऐसीश्राप जो हैं उनकी कहाँ तक स्तुति की जाय ॥६३॥
ययात्वयाजगतस्रष्टाजगत्पाताऽत्तियोजगत्। सोऽपिनिद्रावशंनीतःकस्त्वांस्तोतुमिहेश्वरः॥६४॥
जो भगवान् विष्णु तुम्हारी शक्ति से ही जगत कीउत्पत्ति पालन और विनाश करते हैं, जब वह ही तुम्हारे वशीभूत होकर सोरहे हैं तो तुम्हारी स्तुतिकौन कर सकता है ? ॥६४॥
विष्णुःशरीरग्रहणमहमीशानएवच। कारितास्तेयतोऽतस्त्वांकःस्तोतुंशक्तिमान्भवेत्६५॥
जबकि विष्णु, मैं औरमहादेव आपकी श्राज्ञा से ही शरीर धारण करते हैं तोआप कीस्तुति करनेको कौनसमर्थ॥६५॥
सात्वमित्थंप्रभावैःस्वैरुदारैर्देविसंस्तुता। मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौमधुकैटभौ॥६६॥
हे देवि ! आपकी इन्हीं उदार प्रभावों से स्तुति की जाती है, आप इन दुष्ट मधु और कैटभ नाम दैत्योंको मोह प्राप्त कीजिये ||६६||
प्रवोधश्वजगत्स्वामीनीयतामच्युतोलघु। बोधचक्रियतामस्यहन्तुमेतौमहासुरौ ||६७||
श्राप इन दोनों महान्दैत्यों का वध करनेके लिये अच्युत भगवान् विष्णु को जगाइये ॥ ६७॥ ऋषिरुवाच
एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा । विष्णोःप्रबोधनार्थायनिहन्तुंमधुकैटभौ॥६८॥
ऋषि बोले-मधुकैटभ को मारने के लिये विष्णु को जगाने के निमित्त जब ब्रह्माजी ने इस प्रकार तामसी देवीकीस्तुतिकीतबवहभगवती॥६८॥
नेत्रास्य- नासिका - बाहु-हृदयेभ्यस्तथोरसः।
निर्गम्यदर्शनेतस्थौब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥६६॥
विष्णु भगवान् के नेत्र, नासिका, हृदय और छाती से निकल कर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी को दर्शन देने के निमित्तखड़ीहोगई॥६६॥
उत्तस्थौचजगन्नाथस्तयामुक्तोजनार्दनः।
एकार्णवेऽहिशयनात् ततः स ददृशे च तौ ॥७०॥
उस योगनिद्रा से मुक्त होकरभगवान्विष्णुशेपशय्यासेउठेऔरउन्होंने एकार्णव मेंउनदोनों राक्षसोंको देखा॥७०॥
मधुकैटभौदुरात्मानावतिवीर्य्यपराक्रमौ। क्रोधरक्तेक्षणावत्तुंब्रह्माणंजनितोद्यमौ॥७१
फिर वे दोनों दुष्टात्मा प्रति चलवान् और पराक्रमी कैटभ क्रोध से आँखें लाल कर ब्रह्माजी कोखानेकेलियेउद्यतहुए |॥७१॥
समुत्थायततस्ताभ्यांयुयुधेभगवान्हरिः।
पंचवर्षसहस्राणिवाहुप्रहरणोविभुः ||७२ ||
तब विष्णु भगवान् उठकर उन दोनों के साथ युद्ध करने लगे । विष्णु पाँचहजारवर्षतकउन
दोनोंदैत्योंसेबाहुयुद्ध किया ||१२||
तावप्यतिवलोन्मत्तौमहामायाविमोहितौ।
उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो त्रियतामिति केशवम् ॥७३॥
फिर वे दोनों बलसे उन्मत्त औरमहामायासेविमोहितहोकरभगवान्विष्णुसे वोले कि हम तुम से प्रसन्न हैं तुम वर माँगो ॥७३॥
भगवानुवाच
भवेतामद्यमेतुष्टौममचध्यावुभावपि। किमन्येनवरेणात्रएतावद्धिघृतंमम ||७४ ||
भगवान् बोले-
यदि तुम दोनों मुझ से प्रसन्न हो तो मुझेवर दो कि तुम दोनों मेरे हाथसे मारे जात्रो ॥७४॥ ऋषिरुवाच
वश्चिताभ्यामितितदासर्व्वमापोमयंजगत्। विलोक्यताभ्यांगदितोभगवान्कमलेक्षणः॥७५॥
ऋषि बोले-
इस प्रकार धोखे में आकर वे सब जगत मेंजल ही जल देखकर भगवान् कमलनयन से बोलेकि ॥ ७५ ॥
प्रीतौस्वस्तवयुद्धेनश्लाघ्यस्त्वंमृत्युरावयोः। 'आवांजहिनयत्रोत्रींसलिलेनपरिप्लुता ||७६ ||
हम तुम्हारे युद्ध से प्रसन्न हैं औरतुम्हारे हाथ से हमारी मृत्यु श्लाघ्य है इसलियेजहाँ पर जल न हो वहाँ हमको मारो ॥ ७६ ॥ ऋषिरुवाच
तथेत्युक्त्वाभगवताशंख-चक्र-गदाभृता। कृत्वाचक्रेणवैच्छिन्नेजघनेशिरसीतयोः॥७७॥
ऋषि बोले--
इस पर ' ऐसा ही होगा ' इस प्रकार कहकरशंख, चक्र, गदाधारी भगवान् विष्णु ने उन दोनों
का शिर अपनी जाँघ पर रख कर काट डाला ॥७७
एवमेषासमुत्पन्नाब्रह्मरणासंस्तुतास्वयम्। प्रभावमस्यादेव्यास्तुभूयःशृणुवदामिते॥७८॥
इसप्रकारदेवीकीउत्पत्तिहुईजिसकीकि स्तुति ब्रह्माजी ने की है । अव इस देवी का प्रभावसुनोमैंकहताहूँ॥७८॥
इति श्री मार्कण्डेयपुराण में सावर्णिक मन्वंतर मेंदेवीमाहात्म्यमेंमधुकैटभवधनाम८१वांश्र०स०।
Summary of chapter 80 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
The text outlines the divine setup of the Eighth Manvantara, listing its future Seven Sages, deva clans, and the righteous royal sons of Sāvarṇi Manu, serving as a seamless bridge to the sacred Devī Māhātmya.