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मार्कण्डेयउवाच

इन्द्रसेनासमाज्ञप्तःसगत्वाशूद्रतापसः। समाचष्टेयथाप्रोक्तंदमायनिधनंपितुः॥१

मार्कण्डेयजी बोले-

इन्द्रसेना से श्राज्ञा पाकर उस शुद्र तापस ने दम के पास जाकर जिस प्रकार कि उससे महा

राज दम के पिता की मृत्यु के विषय में कहा गया था सव उनको कह सुनाया ॥ १ ॥

तापसेनसमाख्यातेदमस्तेनपितुर्वधे। क्रोधेनातीवजज्वालहविषेवानिरुद्धतः॥२

उस तपस्वी से अपने पिता के वध का समाचार सुनकर महाराज हविष्य पड़ने से अग्नि प्रज्वलित होजाती है ॥ २ ॥

सतुक्रोधाग्निनाधीरोदह्यमानोमहामुने। करंकरेणनिष्पिष्यवाक्यमेतदुवाचह॥३॥

दम की क्रोधाग्नि इस तरह भड़क उठी जिस तरह हे महामुनि कौटुकिजी ! वे धैर्यवान् महाराज क्रोध की अग्नि से दग्ध होने लगे और दोनों हाथ मीड़ कर यह वचन बोले ||३||

अनाथइवमेतातोमयिपुत्रेतुजीवति। घातितःसुनृशंसेनपरिभूयकुलंमम॥४

मुझे पुत्र के जीवित होते हुए भी मेरे पिता को निर्दयी वपुष्मान ने मेरे कुल का अपमान करके अनाथ की तरह मारा है ॥ ४ ॥

न्यायवादोजनेतस्याप्येषक्लैव्यात्क्षमाम्यहम् दुशान्तौशिष्टानांपालनेऽधिकृतावयम्। पितरंचापिनिहतंदृष्ट्वाजीवन्तिशत्रवः ||५

यदि मैं इसको क्षमा करता हूँ तो न्यायवादी लोग मुझको नपुंसक कहेंगे, हमारा अधिकार दुष्टों को पिता को मार कर यदि शत्रु जीवित रहता हो तो मिटाने और सज्जनों का पालन करने के लिये है,॥ ५ ॥

किमेतेबहुनाहातातेतिचकिंपुनः। विलापेनात्र यत् कृत्यं तदेषोऽत्र करोम्यहम् || ६ ||

फिर हा तात, हा तात ! इस प्रकार बहुत कहने और विलाप करने से क्या है । अब जो

करने योग्य कार्य है उसे मैं करता हूँ ॥ ६ ॥

यद्यहंतस्यरक्तेनदेहोत्थेनवपुष्मतः। नकरोमिगुरोस्तृप्तिंतत्प्रवेक्ष्येहुताशनम्॥७॥

यदि.वपुष्मान के शरीर में से निकाले हुए रक्त से अपने- पिता की तृप्ति न करूँ तो मैं अग्नि में प्रवेश करजाऊँगा ||७||

तच्छोणितेनोदककर्म्मतस्यतातस्यसंख्ये विनिपातितस्य।मांसेनसम्यद्विजभोजनञ्चन चेत्प्रवेक्ष्यामिहुताशनंतत्॥८॥

यदिवपुष्मान्केरुधिरसेअपनेमृत  पिताकातर्पणनकरूँऔरयुद्धमेंउसकोमार |करउसकामाँ सब्राह्मणोंकोश्राद्धमेंनखिलाऊँ।

तोमैंअग्निमेंप्रवेशकरजाऊँगा॥८॥ साहाय्यमस्यासुर-देव-यक्ष-गन्धर्व्व - विद्याधर- |

सिद्धसंघाः।कुर्व्वन्तिचेत्तानपिचात्रपूगै -

भस्मीकरोम्येषरुपासमेतः॥६॥

अगर उसकी सहायता पर राक्षस देवता, यक्ष, गन्धर्व,विद्याधर और  सिद्धों के समूह भी होंगे तो उनकोभी अपने अस्त्रों की अग्नि से भस्म कर दूँगा ॥ ६ ॥

निःशूरमाधम्मिकममशस्तंतंदाक्षिणात्यं समरेनिहत्य।भोक्ष्येततोऽहंपृथिवीञ्चकृत्स्नां वह्निप्रवेक्ष्याम्यनिहत्यतंवा॥१०॥

या तो मैं उस कायर, अधर्मी, दुष्ट दक्षिण- निवासी वपुष्मान् को समर में मार कर सम्पूर्ण पृथ्वी पर राज्य करूँगा अन्यथा अग्नि में प्रवेश कर के मरजाऊँगा || १० |

सुदुर्म्मतिंतापसद्धमौनिनंवनस्थितंशान्त- वचोविविग्नम्।हन्ताहमद्याखिलवन्धुमित्र - पदाति-हस्त्यश्व-बलैःसमेतम्॥११॥

जिस दुष्टने मेरे वृद्ध तपस्वी, मौना- वलम्वी, वनवासी, शान्तवाची पिता को मारा हैं. उसको मैं उसके सब भाई, बन्धु, मित्र, पैदल, घोड़ों और सेना सहित मारूँगा ॥ ११ ॥

एपोऽहमादायधनुःसखड्गोरथीतथैवारि-पलं। समेत्य।करोमिवैयत्कदनंसमस्ताः श्यन्तुमेदेवगणाःसमेताः॥१२॥

 मैं धनुष,बारा और तलवार लेकर तथा रथ पर श्रारूढ़ हो कर जिस तरह शत्रु का सेना सहित दलन करता- हूँ वह सब लोग देवताओं सहित अवश्य देखें ॥१२.

योयःसहायेोभविताद्यतस्यमयासमेतस्यणाय भयः।तस्याशुनिःशेषकुलक्षयाय समुद्यतोऽहंनिजवाहुसैन्यः॥१३॥

जो उस वपुष्मान् की सहायता करेगा उससे युद्ध | करने के लिये और उसके समस्त कुल का नाश करने के लिये मैं अपनी भुजाओं से, तयार हूँ ॥ १३ ॥

यदिकुलिशकरोऽस्मिनसंयुगेदेवराजः पितृपतिरथचोग्रंदण्डमुद्यम्यकोपात्। धनपति - वरुणारक्षितुंतंयतन्ते निशितशरवरौधैर्घातयिष्येतथापि॥१४॥

यदि उस युद्ध में वज्र लेकर इन्द्र, उग्र दराड लेकर, क्रोध करते हुए यमराज, कुवेर, वरुण और सूर भी उसकी रक्षा करने का प्रयत्न करेंगे तो उनके भी मैं अपने तीक्ष्ण बाणों से मारूँगा ॥ १४ ॥

नियतमतिरदोषःकाननाखण्डलौको- निपतितफलभक्षःसर्व्वभूतेषुमैत्रः। प्रभवतिमयिपुत्रेहिंसितोयेनतातः

पिशितरुधिरतृप्तास्तस्य सन्त्वद्य गृधाः ||१५||

मुभ पुत्र के होते हुए जिसने नियमशील, निर्दोष, वन वासी, गिरे हुए फल खाने वाले, सब प्राणियों - मित्र ऐसे मेरे पिता को मारा है उसके मांस रुधिर से गिद्ध तृप्त हों ||१५|| इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंदमचरित्र (३) नाम१३५वाँअध्यायस०।