मार्कण्डेय महा पुराण
06
पक्षिण ऊचुः
रामः पार्थे परां मीतिं ज्ञात्वा कृष्णस्य लाङ्गली । चिन्तयामास बहुधा किं कृतं सुकृतं भवेत् ॥ १ ॥
पक्षी वोले-- बलरामजी श्रीकृष्ण और अर्जुन में परम प्रीति को जानकर यह सोचने लगे कि मुझे कौनसा काम ऐसा करना चाहिये जिससे पुण्य हो ॥ १ ॥ कृष्णेन हि विना नाहं यास्ये दुर्योधनान्तिकम् । पाण्डवान् वा समाश्रित्य कथं दुर्योधनं नृपम् ॥ २
कृष्ण के विना दुर्योधन की तरफ जाना उचित पाण्डवों की ओर जाना अच्छा नहीं है ॥ २ ॥ जामातरं तथा शिष्यं घातयिष्ये नरेश्वरम् । तस्मान्न पार्थं यास्यामि नागि दुर्योधनं नृपम् ॥ ३
एक नहीं । इसी प्रकार राजा दुर्योधन को छोड़कर थोर जामाता है और दूसरी ओर शिष्य और ॥ जाऊँगा और न दुर्योधन की ओर ॥ ३ ॥
तीर्थेष्वाप्लावयिष्यामि तावदात्मानमात्मना । कुरूणां पाण्डवानां यावदन्ताय कल्पते ॥ ४
इसलिये राजा का वध | इसलिये मैं न तो अर्जुन की ओर जब तक कौरवों और पाण्डवों का युद्ध समाप्त हो तब तक तीर्थाटन कर अपनी आत्मा को पवित्र करूँगा ॥ ४ ॥ इत्यामन्त्र्य हृषीकेशं पार्थ- दुय्र्योधनावपि । जगाम द्वारकां शौरिः स्वसैन्यपरिवारितः ॥ ५
इस प्रकार श्रीकृष्ण, अर्जुन और दुर्योधन से मिलकर अपनी सेना सहित बलदेवजी ॥ द्वारकापुरी को गये ॥ ५ ॥ गत्वा द्वारवतीं रामो हृष्टपुष्टजनाकुलाम् । स्वगन्तव्येषु तीर्थेषु पौ पानं हलायुधः ॥ ६
वलदेवजी ने द्वारकापुरी में जिसमें हृष्ट पुष्ट और सुखी मनुष्य रहते हैं जा कर मंदिरा पान किया ॥ ६ ॥ पीतपानो जगामाथ रचतोद्यानमृद्धिमत् । हस्ते गृहीत्वा समां रेवतीमप्सरोपमाम् ॥ ७
मंदिरा पान करके वे रेवत वनमें गये और वहाँ जाकर उन्होंने मदोन्मत्त रेवतीको जो अप्सराके तुल्यथी हाथ से पकड़ लिया। स्त्री कदम्ब कमध्यस्थो ययो मत्तः गढ़ा स्खलन | ददर्श च वनं वीरो रमणीयमनुत्तमम् ॥ ८
वे वीर बलरामजी स्त्रियों के मध्य में स्थित होकर तथा उन्मत्त हो डिगसिगाते हुए पाँचों से । और उन्होंने रमणीक एवं उत्तम बनको देखा || || सर्व्वर्त्तुफलपुष्पाढ्यं शाखामृगगणाकुलम् । पुण्यं पद्मवनोपेतं सपल्वलमहावनम् || ६ ||
वह महावन सव ऋतुओं के फल, पुष्प, शाखा, मृग समूह तथा पवित्र कमल और सुन्दर वाव-लियों से युक्त था ॥ ६ ॥
स शृण्वन् प्रीतिजननान् बहून् मदकलान् शुभान् । श्रोत्ररम्यान सुमधुरान् शब्दान् खगमुखेरितान् १०
वहाँ पक्षियों के मुख से उच्चारित मधुर शब्द जो सुन्दर, शुभ, मदोन्मत्तकरने वाले और कर्ण मधुर थे सुने ||१०||
सर्व्वर्चुफलभाराढ्यान् सर्व्वचुकुमुमोज्ज्वलान् । अपश्यत् पादपांस्तत्र विहगैरनुनादि तान् ॥ ११॥
( उन्होंने ) सव ऋतु के स्वच्छ फूलों और फलों से लदा और पशु पक्षियों के शब्द से निनादित वन को देखा ॥ ११ ॥ श्राम्रानाम्रातकान् भव्यान नारिकेलान् सतिन्दुकान् । श्राविकांस्तथा जीरान् दाड़िमानवीजपूरकान् १२ ॥
सुन्दर ग्राम, श्रमरा, नारियल तिंद्व, वेल, अञ्जीर, अनार और नीबू ॥ १२ ॥ पनसान् लकुचान् मोचान् नीपांश्चातिमनोहरान् । पारावतांश्च कङ्कोलान् नलिनानम्लवेतसान् ॥१३॥
कटहल, वड़हल, मोचरस, कदम और मनोहर पारावत, कङ्कोल, नलिन और ॥ १३ ॥
भल्लातकानामलकांस्तिन्दूकांश्च महाफलान् । इंगुदान् करमर्द्दश्च हरीतक - विभीतकान् ॥१४॥
भल्लातक, तिंदुक और महाफल, इंगु कमरदर्द, हर्र और बहेड़े ||१४||
एतानन्यथ स तरून् ददर्श यदुनन्दनः । तथैवाशोक- पुन्नाग केतकी-चकुलानथ ॥१५॥
यदुनन्दन वलदेवज ने इनको तथा इसी प्रकार अन्य वृक्ष जैसे पुन्नाग, केतकी और मौलसिरी को भी देखा ॥ १ चम्पकान् सप्तपर्णैश्च कर्णिकारान् समालतीन् । पारिजातान् कोविदारान् मन्दारान् वदरांस्तथा १६ |
चम्पा, सप्तपर्ण, कनेर, मालती, पारजात, कोवि मंदार और बेर ॥ १६ ॥
पाटलान् पुष्पितान् रम्यान् देवदारुडमांस्तथा । शालांस्तालांस्तमालांश्चकिंशुकान्वज्जुलान्वरान् १७॥
पाटल आदि सुन्दर पुष्प तथा देवदारु आदि वृक्ष, शाल, ताल, तमाल, परास व सुन्दर बञ्जुल ॥ १७ चकोरेः शातपत्रैश्च भृङ्गराजैस्तथा शुकः । कोकिलैः कलविङ्केश्व हारीतैजीवजीवकैः ||१८||
चकोर, शातपत्र, भोरे, तोते, कोयल, मैना, हारीत तथा जीवजीवक ॥ १८ ॥
प्रियपुत्रैश्चातकैश्च तथान्यैर्विविधैः खगैः । श्रोत्ररम्यं सुमधुरं कूजद्भिश्चाप्यधिष्ठितम् ||१६||
तथा पपीहा और अन्य अनेक प्रकार के पक्षी अपने प्रिय पुत्रों सहित बैठे हुए बड़ी श्रुति मधुर और मीठी वाणी बोल रहे थे ॥ १६ ॥
सरांसि च मनोज्ञानि प्रसन्नसलिलानि च । कुमुदैः पुण्डरीकैश्च तथा नीलोत्पलैः शुभैः ॥२०॥
चड़े स्वच्छ जल वाले मनोहर तालाब थे जिनमें सुन्दर स्वच्छ कुमुदिनी व लाल और नीले कमल खिल रहे थे ॥ २० ॥
कहारैः कमलैश्चापि श्राचितानि समन्ततः । कादम्वैश्चक्रवाकैश्च तथैव जलकुक्कुटैः ॥२१॥
जिनमें कल्हार और कमल इत्यादि चारों तरफ खिल रहे थे । तथा कदस्य, चकवा और बतस्त्र ॥ २१ ॥ कारण्डवैः प्लवैहसैः कूम्र्मैर्मद्रगुभिरेव च । एभिश्चान्यैश्च कीर्णानि समन्ताब्जलचारिभिः २२॥
और कारराङ, प्लव, हंस, कछुओं मछलियों तथा और भी अनेक जलचरों से तालाव चारों ओर से पूर्ण थे ॥ २२ ॥ क्रमेणेत्थं वनं शौरिर्वीक्षमाणो मनोरमम् । जगामानुगतः स्त्रीभिर्लतागृहमनुत्तमम् ||२३||
बलरामजी क्रम से इस सुन्दर वन को देखते हुए स्त्रियों के साथ एक अत्यन्त उत्तम लतागृह में गये || २३ || स ददर्श द्विजांस्तत्र वेदवेदाङ्गपारगान् । कौशिकान् भार्गवांश्चैव भारद्वाजान् सगौतमान् २४||
उन्होंने वहाँ पर वेद वेदाङ्ग में पारङ्गत कौशिक, भार्गव, भारद्वाज और गौतम वंशी ब्राह्मणों को देखा ॥ २४ ॥ विविधेषु च सम्भूतान् वंशेषु द्विजसत्तमान् । कथाश्रवणवद्धोत्कानुपविष्टान् महत्सु च ||२५||
और भी अनेक वंशीय श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ बैठे हुए कथा सुन रहे थे ॥ २५ ॥ कृष्णाजिनोत्तरीयेषु कुशेषु च दृषीषु च । सुतञ्च तेषां मध्यस्थं कययानं कथाः शुभाः ॥ २६
नृगछालाओं, कुशाओं अथवा घास-पात पर बैठे हुए उन ब्राह्मणों के बीच में स्थित सूतजी शुभ कथा सुना रहे थे ॥ २६ ॥ पौराणिकीः सुरर्षीणामाद्यानां चारिताश्रयाः । दृष्ट्वा रामं द्विजाः सर्व्वे मधुपानारुणेक्षणम् ||२७||
वे कथायें पुराण संबन्धी तथा प्राचीन देवताओं और ऋषियों के चरित्र सम्वन्धी थीं । वे सब ब्राह्मण मदिरा के नशे में चूर बलरामजी को देख कर || २७ ॥ मत्तोऽयमिति मन्वानाः समुत्तस्थुस्वरान्विताः । पूजयन्तो हलधरमृते तं सूतवंशजम् ॥२८॥
और यह समझ कर कि यह मतवाले हो रहे हैं. शीघ्र ही उनके स्वागतार्थं उठ बैठे परन्तु सूतजी न उठे||२८|| ततः क्रोवसमाविष्टो हली सुतं महाबलः । विजघान विवृत्ताक्षः क्षोभिताशेषदानवः । २६ ||
सूत के इस प्रकार अवहेलना करने पर महावली बलदेवजी ने जिनकी श्रख क्रोध से विगड़ रही श्रीं सूत को राक्षस की भांति मार डाला ॥ २६ ॥ ध्यास्यति पदं ब्राह्मं तस्मिन् सुते निपातिते । निष्क्रान्तास्ते द्विजाः सर्वे वनात् कृष्णाजिनांवराः ३
सूत के मरने को ब्रह्म-हत्या समझ कर वे ऋषि सब अपने-अपने मृगचर्म को लेकर वनको छोड़ कर चले गये ॥ ३० ॥ अवधूतं तथात्मानं मन्यमानो हलायुधः । प्रचिन्तयामास सुमहन्मया पापमिदं कृतम् ||३१||
चलरामजी अपने उन्मादको समझ कर सोचने लगे कि मैंने यह बड़ा पाप किया ॥ ३१ ॥ त्राह्मं स्थानं गतो ह्येष यत् सुतो विनिपातितः। तथाहीमे द्विजाः सर्व्वे मामवेक्ष्य विनिर्गताः ॥३२॥
ब्राह्मण के स्थान में आकर हमने सुतजी का वध किया । इसी कारण से ये सव मुनि लोग मुझको देखकर अर्थात् मुझसे घृण करके इस वन को छोड़ कर चले गये हैं ॥ ३२ ॥ शरीरस्य च मे गन्धो लोहस्येवासुखावहः ।
आत्मानञ्चावगच्छामि ब्रह्मघ्नमिव कुत्सितम् ||३३|| मेरे शरीर में से मृतात्मा की सी दुर्गन्धि आती है, इस कुत्सित ब्रह्महत्या के पापको क्या करूँ ?||३३|| धिगमर्ष तथा मद्यमतिमानमभीरुताम् । यैराविष्टेन सुमहन्मया पापमिदं कृतम् ||३४||
मेरे क्रोध, मदिरा पान, अभिमान और कायरता को धिक्कार है कि जिसके श्रावेश में मैंने यह महान् पाप किया ॥ ३४ ॥ तत्क्षयार्थं चरिष्यामि व्रतं द्वादशवार्षिकम् । स्वकर्म्मख्यापनं कुर्व्वन् प्रायश्चित्तमनुत्तमम् ||३५||
श्रव इस पाप के नाश करने को बारह वर्ष तक व्रत तथा उत्तम प्रायश्चित्त करूँगा ॥ ३५ ॥
अथ येयं समारब्धा तीर्थयात्रा मयाधुना । एतामेव प्रयास्यामि प्रतिलोमां सरस्वतीम् ||३६||
श्रव मैं तीर्थ यात्रा करूँगा और पहिले प्रतिलोमा सरस्वती तीर्थ पर जाकर अपनी आत्मा को पवित्र करूँगा || ३६
तो जगाम रामोऽसौ प्रतिलोमां सरस्वतीम् । ततः परं शृणुष्वेमं पाण्डवेयकथाश्रयम् ||३७||
श्रतः बलरामजी प्रति- लोमा अर्थात् सरस्वती तीर्थको गये । श्रव पांडवों के पुत्रों की कथा को सुनो ॥३७॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में बलदेव ब्रह्महत्या कथन नाम छठा अध्याय समाप्त ।
Summary of chapter 6 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
The tragedy of the five sons of Draupadī being slain by Ashvatthāmā during the night after the battle of Kurukshetra is explained through karmic cause and divine decree. The celestial birds describe how these five young warriors were formerly the noble Vishvedevas who had previously incurred a curse for opposing Muni Vishvāmitra. Their early departure from the mortal realm allowed them to be liberated from their earthly form once their cosmic purpose of assisting the Pāṇḍavas in establishing righteousness was fulfilled.