मार्कण्डेय महा पुराण
18
सुमति बोला- कस्यचित्त्वथ कालस्य कृतवीर्य्यात्मजोऽर्जुनः । कृतवीर्य्यं दिवं याते मन्त्रिभिः सपुरोहितैः ॥ १
कुछ समय बीतने पर राजा कृतवीर्य के स्वर्ग' लोक पहुँचने पर उसके पुत्र अर्जुन ने मन्त्रियों, पुरोहितों ॥ १ ॥ पौरवात्माभिषेकार्थं समाहूतोऽब्रवीदिदम् । नाहं राज्यं करिष्यामि मन्त्रिणो नरकेोत्तरम् । यदर्थं गृह्यते शुक्लं तदनिष्पादयन् वृथा ॥ २॥ और नगरनिवासियों से जो कि उसके राज्याभिषेक के लिये एकत्रित हुए थे, कहा कि मैं. ऐसे राज्य को जिसका परिणाम नरक है, न करूँगा, जिसमें कर वसूल किया जाता है और वचन निष्फल होता है ॥२॥ पण्यानां द्वादशं भागं भूपालाय वणिग्जनः । दत्त्वार्यरक्षिभिमार्गे रक्षितो याति दस्युतः ॥ ३
वैश्य सोग अपनी श्राय का वारहवां हिस्सा राजा को देते हैं जिससे कि राजा उनकी चौरादिक से तथा मार्गादि में रक्षा करता है ॥ ३ ॥ गोपाथ धृतनादेः पभागञ्च कृषीवलाः । दत्त्वान्यद्भूभुजे दद्य यदि भागं ततोऽधिकम् ॥ ४ ॥
और गोप भी घो. मडा तथा खेती त्रादि का छठा हिस्सा राजा को देते हैं और बाकी स्वयं खा लेते हैं ॥ ४ ॥
दद्य्र्यदि पण्यादीनामशेषाणां वणिजो गृहतस्ततः । इष्टापूर्त्तिविनाशाय तद्राज्ञर्थोौरघम्मिणः ॥ ५
वह राजा बरिकों से व्यापार पर कर वसूल करता है और बोरों को दण्ड के घन देर उनले धन ग्रहण करता है ॥ ५ ॥ यद्यन्यैः पाल्यते लोकस्तद्वृत्त्यन्तरसंश्रितः ! गृहतो बलिषड्भागं नृपतेर्नरको ध्रुवम् ॥ ६
एक से दूसरे का पालन करता है इसको वृत्त्यन्तरवृत्ति कहते हैं और बलि का हा भाग ग्रहण कर यदि होता है ॥ ६ ॥ निरूपितमिदं राज्ञः पूर्व्वं रक्षणवेतनम्। श्ररक्षश्रौरतचौर्य तनो नृपतेभवेत् ॥ ७
प्रजा की रक्षा करना राजा का धर्म प्रजा की रक्षा न की तो वह निश्चय ही नरकगामी है, यदि चोरों की चोरी आदि से प्रजा की रक्षा न हुई तो दोष राजा को होता है ॥ ७ ॥ तस्माइयदि तपस्तप्त्वा प्राप्स्ये योगित्वर्माप्सितम् । पुषः पालनसामर्थ्य युक्त एको महीपतिः ॥ ८ ॥
इसलिये मैं कहना जिससे मुझको पृथ्वी पालन की एक चक्र तपस्या करके अभिलषित योगीपन को प्राप्त वर्ती राजा के समान सामर्थ्य प्राप्त हो ॥ ८ ॥ पृथिव्यां शस्त्रष्टमान्यस्त्वहमेवद्धितंयुतः । तो भविष्ये नात्मानं करिष्ये पापभागिनम् ॥ ६
यदि मैं श्रीसम्पन्न प्रवल शस्त्रों से युक्त पृथ्वी का एक- मात्र राजा रहें तो राज्य करूँगा अन्यथा मैं पाप का भागी नहीं बनूंगा ॥ ६ ॥ पुत्र उवाच स्य तन्निचयं ज्ञात्वा मन्त्रिमव्यस्थितोऽत्रवीत् । ार्गो नाम महाबुद्धिर्मुनिश्रेष्ठो योतिः ॥१०॥
उसके इस निश्चय को जान कर मन्त्रियों के गर्ग ऋषि बोले ॥ १० ॥
इमति ने कहा- द्य'वं कर्तुकामस्त्वं राज्यं सम्यक् प्रशासितुम् । तिः शृणुष्व मे वाक्यं कुरुष्व च नृपात्मज ॥११॥
हे राजन् ! यदि आपको बीच में बैठे हुए महा वुद्धिमान, सुनिश्रेष्ट वयोवृद्ध भली प्रकार ही राज्य शासन करने की इच्छा है तो मेरे वचन को सुनकर तदनुसार कार्य करो ॥ ११ ॥ वायं महाभागं सद्रोणी कृताश्रयम् । मारायच भूपात पाति यो भुवनत्रयम् ॥१२॥
महाभाग दत्तात्रेयजी एक डोंगी बनाकर निवास का पालन करते हैं जाकर आराधना करो ॥ १२ ॥ रोगयुक्तं महाभागं सयंत्र समदर्शिनम् । वेष्णोरंशं जगद्धातुरवतीर्ण महीतले ॥१३ ॥
करते हैं । हे राजन् ! तुम उनकी जो तीनों लोकों वे दत्तात्रेयजी योगयुक्त, महाभाग, सब जगह स्थित और समदर्शी है । वे जगकर्ता विष्णु के अंश है ॥ १३ ॥ माराध्य सहस्राक्षः प्राप्तवान् पद्मात्मनः । तं दुरात्मभिर्देत्यैर्जयान व द्विती सुतान् ॥१४॥
कि जिनकी त्राराधना करके इन्हें ने अपना पत्र प्राप्त किया और दिति के पुत्र दैत्यों को जो दुरात्मा ये संहारा ॥ १४ ॥ अर्जुन उवाच त्यमारावितो देवैर्हेचात्रेयः प्रतापवान् । यञ्चापहृतं दैत्यैरिन्द्रत्वं प्राप वाकः ॥१५॥
अर्जुन बोला- किस प्रकार प्रतापवान दत्तात्रेयजी की देव- तानों ने श्राराधना की और किस प्रकार इन्द्र ने दैत्यों को मारकर इन्द्रत्व प्राप्त किया |||| वर्ग उवाच देवानां दानवानाञ्च युद्धमासीत् सुदारुणम् । त्यानामीश्वरो जम्भो देवानाञ्च शचीपतिः ||१६||
वर्ग वोले- देवतात्रों और दैत्योंका बड़ा भीषण युद्ध हुआ था जिसमें दैत्यों के नायक जन्म तथा देवताओं के सेनापति इन्द्र घे ॥ १६॥ युध्यमानानां दिव्यः संवत्सरो गतः । ततो देवाः पराभूता दैत्या विजयनोऽभवन ||१७||
विप्रचित्तिमुखैर्देवा दानवैस्ते पराजिताः । पलायनकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये || १८ ||
उनके परस्पर युद्ध कोपूरा एक दिव्य वर्ष व्यतोव होगया और उस चुंद्ध
में देवताओं का पराजय और दैत्यों की विजय हुई विप्रचित्ति श्रादि प्रमुख देवगण दैत्योंसे पराजित होकर पलायन कर गये और विजय के विषय में निरुत्साहित होगये ॥ १८ ॥
बृहस्पतिमुपागम्य दैत्यसैन्यवधेप्सवः । अमन्त्रयन्त सहिता वालिखिल्यैस्तथर्षिभिः ॥ १६ ॥
और वे बृहस्पतिजी के पास जहाँ वालखिल्यादि तथा अन्य ऋषि बैठे हुए थे, दैत्यों की सेना के नाश की अभिलाषा से पहुँचे ॥ १६ ॥ वृहस्पतिरुवाच दत्तात्रेयं महात्मानमत्रेः पुत्रं तपोधनम् । विकृताचरणं भक्त्या सन्तोषयितुमर्हथ ॥२०॥
वृहस्पतिजी वाले-- महात्मा श्रत्रि के पुत्र तपोधन दत्तात्रेयजी का उनको तुम सन्तुष्ट करने के योग्य हो ॥ ० ॥ स वो दैत्यविनाशाय वरदो दास्यते वरम् । ततो हनिष्यथ सुरा सहिता दैत्यदानवान् ॥२१॥
वह आचरण यद्यपि कुत्सित मालुम होता है, परन्तु दैत्योंके विनाशके लिये वरदानदेंगे उसी से देवता लोग दैत्यों और दानवों का वध करेंगे ॥ २१ ॥ गर्ग उवाच इत्युक्तास्ते तढ़ा जग्मुर्दत्तात्रेयाश्रमं सुराः । ददृशुश्च महात्मानं तं ते लक्ष्म्या समन्वितम् ||२२||
गर्ग बोले- उनसे यह कहे जाने पर वे देवगण दत्तात्रेयके श्राश्रमपर गये और वहाँ उन महात्माको लक्ष्मीजी के साथ वर्तमान देखा ॥ २२ ॥ उद्गीयमानं गन्धर्वैः सुरापानरतं मुनिम् । ते तस्य गत्वा प्रणतिमवदन् साध्यसाधनम् ||२३||
वे मुनि मद्यपान में लीन हो रहे थे और गन्धर्वगण वहाँ गान कर रहे थे । देवताओं ने वहाँ जाकर अपने प्रयोजन को साधने के लिये प्रणाम किया ॥ २३ ॥ चक्रुः स्तवञ्चोपजह र्भक्ष्यभोज्यस्रगादिकम् । तिष्ठन्तमनुतिष्ठन्ति यान्तं यान्ति दिवौकसः । आराधयामासुरधःस्थितास्तिष्ठन्तमासने ||२४|| | श्रर बहुत प्रकार से स्तुतिकी तथा भक्ष्य, भोज्य, माला श्रादि भेंट कीं । देवता लोग उनके जाने के साथ चलते थे और उनके बैठते ही बैठ जाते थे । देवताओं ने उनके श्रासन के नीचे बैठकर आराधना की ||२४|| स माह प्रणतान् देवान् दत्तात्रेयः किमिष्यते । मत्तो भवद्विर्येनेयं शुश्रूषा क्रियते मम ॥२५॥
दत्तात्रेयजी ने प्रणाम करते हुए देवताओं से कहा, "आप लोगों ने जो मुझ उन्मत्त की इतनी सेवाकी है सो मुझसे क्या चाहते हो !॥ २५ ॥ देवा ऊचुः दानवैर्मुनिशार्दूल जम्भाद्य भूर्भुवादिकम् । हृतं त्रैलोक्यमाक्रम्य क्रतुभागाश्च कृत्स्नशः ॥२६॥
देवता बोले- हे मुनिशार्दूल! जम्भ और भूर्भुवादिक राक्षसों ने तीनों लोकों पर आक्रमण करके हमारा सम्पूर्ण यज्ञ भाग हरण कर लिया है ॥ २६ ॥ तद्वधे कुरु युद्धिं त्वं परित्राणाय नोऽनघ । त्वत्प्रसादादभीप्स्यामः पुनः प्राप्तं त्रिपिष्टपम् || २७
हे निष्पाप ! आप हमारी रक्षा के निमित्त उसको वध करने का उपाय कीजिये, जिससे कि हम आपकी दयासे. पुनः अपना भाग प्राप्त करें ॥ २७ ॥ दत्तात्रेय उवाच मद्यासक्तोऽहमुच्छिष्टो न चैवाहं जितेन्द्रियः । कथमिच्छथ मत्तोऽपि देवाः शत्रुपराभवम् ॥२८॥
दत्तात्रेय बोले- मैं सुरापान में रत तथा मूंठा खाने वाला हूँ तथा मैं जितेन्द्रिय भी नहीं हूँ । हे देवताश्रो ! मुझ उन्मत्त से किस प्रकार शत्रु के विनाश की इच्छा रखते हो १ ॥२८॥ देवा ऊचुः अनघस्त्वं जगन्नाथ न लेपस्तव विद्यते । विद्याक्षालनशुद्धान्तर्निविष्टज्ञानदीधिते ॥२६॥
देवता वोले- हे जगत् के स्वामी ! आप निष्पाप तथा निर्लेप हैं, विद्या और ज्ञान के प्रवेश से आपका अन्तः-करण शुद्ध है ॥ २६ ॥ दत्तात्रेय उवाच प्रत्यमेतत् सुरा विद्या समास्ति समदर्शिनः । त्रस्यास्तु योषितः सङ्गादहमुच्छिष्टतां गतः ||३०||
दत्तात्रेय बोले-- हे देवता ! यह सत्य है कि मेरे पास सम- दश विद्या है, परन्तु इस न्त्री के सबसे मैं उच्छि यता को प्राप्त हूँ ||३०|| वीसम्भोगोहि दोषाय सातत्येनोपसेवितः । एवमुक्तास्ततो देवाः पुनर्वचनमब्रुवन् ||३१|
स्त्री सम्भोग दोष से मैं सेवा किये जाने के योग्य नहीं हूँ | यह वचन सुनकर फिर देवताओं ने ये शब्द कहे ||३१|| देवा ऊचुः त्रयं हिनश्रेष्ठ जगन्माता न दुष्यते । यथांशुमाला सूर्य्यस्य द्विज-चाण्डालसङ्गिनी ||३२|| देवता वोले- हे त्रिप्रवर! ये जगत की माता निर्दोषहै जिस प्रकार कि सूर्य की किरणे ब्राह्मण और चाण्डाल पर एक साथ पड़ती है ॥ ३२ ॥ गर्म उवाच एवमुक्तस्ततो देवैर्दत्तात्रेयाऽत्रवीदिदम् । महस्य त्रिदशान् सर्व्वान् यद्यं तद्भवतां मतम् ॥ ३३॥
वर्ग वोले—
इस प्रकार कहे जाने पर दत्तात्रेयजी हँसकर देवतात्रों से बोले कि हे देवताओ ! यदि श्राप लोगों का यही मत है तो ॥३३॥ तदाहूयासुरान् सर्व्वान् युद्धाय सुरसत्तमाः । इहानयत महदृष्टिगोचरं मा विलम्वत ||३४||
हे श्रेष्ठ देवतात्रो ! सब खुरों को युद्ध के लिये यहाँ बुला लाम्रो और उनको शीघ्र मेरे दृष्टिगोचर करायो ॥ ३४ ॥ मदृष्टिपातहुतभुक्-प्रक्षीणबलतेजसः येन नाशमशेषास्ते प्रयान्ति मम दर्शनान् ||३५||
मेरे दृष्टिपात से उन राक्षसों का वल और तेज जीए हो जावेगा और मुझे देखने ले वे नाश को प्राप्त होने ॥ ३५ ॥ वर्ग उवाच तस्य तद्वचनं श्रुत्वा देवैर्दैत्या महाबलाः । हवाय समाहूता जग्मुर्देवगणान् रुपा ||३६||
गर्ग बोले- दत्तात्रेय के यह वचन सुनकर देवताओं ने महाबली दैत्यको क्रोध करके युद्धके लिये बुलाया ॥ ३६ ॥ ते हन्यमाना दैतेयैर्देवा शत्रं भयातुराः । दत्तात्रेयाश्रमं जग्मुः समेताः शरणार्थिनः ||३७||
दैत्यों द्वारा मारे गये देवता शीघ्र भय से कातर होकर दत्तात्रेय के आश्रम में शरणार्थी हो कर चाये ॥ ३७ ॥ तमेव विविशुत्याः कालयन्तो दिवौकसः । दशुश्व महात्मानं दत्तात्रेयं महाबलम् ||३८||
जब दैत्य और देवता लोग उत्तात्रेय के निकट पहुँचे तो राक्षसों ने महाबली बैठी हुई जगत का कल्याण करने वाली, शुभा महात्मा दत्तात्रेय को देखा ॥ ॥ चामरावस्थितामिष्टामशेषजगतां शुभाम् । भार्थ्याञ्चास्य सुचाङ्गी लक्ष्मीमिन्दुनिभाननाम् ३६
उनके बाँईचोर उनकी स्त्री को जो चन्द्रमा के समान मुख वाली और सर्वाङ्ग सुन्दरी थी देखा ॥ ३६ ॥ नीलोत्पलाभनयनां पीनश्रोणिपयोधराम् । गदन्तीं मधुरां भाषां सर्व्वेर्योपिगुणैर्युताम् ॥४०॥
उनकी आँखें नीले कमल के समान और उनकी जाँघे और स्तन धे पुन ध चे मीठी बाणी बोलतीं और स्त्रियोचित सब गुणों से युक्त धीं ॥४॥ ते तां दृष्ट्ागतो दैत्याः साभिलाषा मनोभवम् । न कुरुतं धैर्यान्मनसा बोहुमातुराः ॥४१॥
दैत्य लोग उस स्त्री को देखकर कामयुक्त होगये और उसको प्राप्त करने की आतुरता में धैर्य को खोने लगे ॥ ४१ ॥ सुक्त्वा देवान् खियं तान्तु हर्तुकामा हतौजसः । न पापेन मुह्यन्तः संसक्तास्ते ततोऽनुवन् ॥ ४२
देवतात्रों को छोड़कर वे तेजहीन होकर उस स्त्री को हरण करने की इच्छा करनेलगे और उस पाप से गिरकर आपस में बोले ॥४२॥ स्त्रीरत्नमेतन् त्रैलोक्ये सारं नो यदि वै भवेद | कृतकृत्यास्ततः सर्व्व इति नो भारितं मनः ॥४३॥
तीनों लोकों में यह स्त्री रक्त सार रूप है, यदि यह हमारी हो. जायगी तो हम कृतार्थ होजायेंगे । यही हमारे मन की भावना है ॥ ४३ ॥
तस्मात् सर्व्वे समुत्क्षिप्य शिविकायां सुरार्द्दनाः । आरोग्य स्वमधिष्ठानं नयाम इति निश्चिताः ॥ ४४॥
इसलिये हम सब इस स्त्री को पालकी पर बैठाकर अपने स्थान को ले चलें - इस प्रकार राक्षसों ने निश्चय किया ॥४४॥ गर्ग उवाच सानुरागास्ततस्ते तु मोक्ताश्चेत्थं परस्: रम् । तस्यतां योषितां साध्वीं समुत्क्षिप्य स्मरर्द्दिताः॥ ४५ ॥
गर्ग बोले-
आपस में इस तरह एक दूसरेसे कहकर दैत्य उस साध्वी स्त्रोको कामदेवके वशीभूत हो लेश्राये॥ शिविकायां समारोप्य सहिता दैत्यदानवाः ।. शिरःसु शिविकां कृत्वा स्वस्थानाभिमुखं ययुः ॥ ४६ ॥
और उसको पालकी में बैठाकर सव दैत्य व दानव उस पालकी को शिरपर रखकर अपने स्थान की ओर चले ||४|| दत्तात्रेयस्ततो देवान् विहस्येदमथाब्रवीत् । दिष्ट्या वर्द्धथ दैत्यानामेषा लक्ष्मीः शिरोगता । सप्त स्थानान्यतिक्रान्ता नवमन्यमुपैष्यति ||४७||
फिर दत्तात्रेय ने हँसकर देव- तानों से कहा, यह कल्याणकारी है कि लक्ष्मी दैत्यों शिर पर गई। ये सात स्थान तक ठीक रहती हैऔर नवें स्थान पर दूसरे को प्राप्त होती है" ॥४७॥ देवा ऊचुः कथयस्व जगन्नाथ केषु स्थानेष्ववस्थिता । पुरुषस्य फलं किं वा मयच्छत्यथ नश्यति ||४८
देवता बोले- हे जगत के स्वामी ! ये तो कहिये कि किन स्थानों पर लक्ष्मी पुरुषोंको क्या-क्या फल अच्छा या बुरा देती है ? ॥ ४८ ॥ दत्तात्रेय उवाच तृणां पदे स्थिता लक्ष्मीर्निलयं सम्प्रयच्छति । सक्थ्नोच संस्थिता वस्त्रं तथा नानाविधं वसु ॥ ४६
दत्तात्रेय वाले- जब लक्ष्मी मनुष्य के पाँवपर रहती है तो उस मनुष्य के घर धन श्राता है और जब कमर पर स्थित रहती है तो नाना प्रकार के वस्त्र और श्रभूषण मिलते हैं ॥ ४६ ॥ कलत्रञ्च गुह्यसंस्था क्रोडस्थापत्यदायिनी । मनोरथान् पूरयति पुरुषाणां हृदि स्थिता ॥५०॥
जब गुह्य स्थानों में रहती है तो स्त्री प्राप्ति होती है और गोदमें हो तो संतान प्राप्त होती है । मनुष्यों के हृदयों में स्थित होकर ये उनके मनोरथों को पूर्ण करती है ॥ ५० ॥ लक्ष्मीर्लक्ष्मीवतां श्रेष्ठा कण्ठस्था कण्ठभूषणम् । अभीष्टवन्धुदाय तथाश्लेषं प्रवासिभिः ॥ ५१
यदि लक्ष्मी धनवानों के करठ में श्रेष्ठ करांठ का भूपण होजावे तो भाई, बन्धु, स्त्री तथा पुरवासियों से ' भी मिलाप कराती है ॥५१॥ सृष्टानुवाक्यलावण्यमाज्ञामवितथां सुखसंस्था कवित्वञ्च यच्छत्युदधिसम्भवा ॥५२॥
जब ये मुख पर स्थित होती है तो सुन्दर वाक्य, लावण्य, कवित्व आदि । प्रदान करती है ||५२|| शिरोगता सन्त्यजति ततोऽन्यं याति चाश्रयम् । सेयं शिरोगता चैतान् परित्यक्ष्यति साम्प्रतम् ॥ ५३
और जब ये शिरपर जाती है तो ये उसको छोड़कर दूसरे का श्राश्रय लेती हैं चूँकि ये राक्षसों के शिर पर गई हैं इसलिये इनको अभी छोड़ देगी ॥५३॥ प्रगृह्मास्त्राणि वध्यन्तां तस्मादेते सुरारयः । न भेतव्यं भृशञ्चैते मया निस्तेजसः कृताः । परदारावमर्पाच दग्धपुरया हतौजसः ॥ ५४
इसलिये तुम अपने अस्त्रों को धारण करो और इन राक्षसों को मारो। मेरी दृष्टिपात से ये लोग निस्तेज होगये हैं और परस्री हरण के दोष से इनके पुण्य दग्ध और ये पराक्रम हीन होगये हैं ॥ ५४ ॥ गर्ग उवाच ततस्ते विविधैरत्रैर्वध्यमानाः सुरारयः । मूर्द्विन लक्ष्म्या समाक्रान्ता विनेशुरिति नः श्रुतम्। ५५।
गर्ग बोले- तव विविध प्रकार के अस्त्रों से देवताओं ने दैत्यों का वध किया और लक्ष्मी भी उन लोगों के शिर से अलग होकर अन्तर्ध्यान होगई ॥ ५५ ॥ लक्ष्मीश्वोत्पत्य सम्प्राप्ता दत्तात्रेयं महामुनिम् । स्तूयमाना सुरैः सव्वै दैत्यनाशान्मुदान्वितः ॥५६॥ फिर लक्ष्मीजी प्रकट होकर महामुनि दत्तात्रेयजी के पास गई जिनकी कि दैत्यों के नाश होने के कारण प्रसन्न चित्त से देवता लोग स्तुति कर रहे थे ॥ ५६ ॥
प्रणिपत्य ततो देवा दत्तात्रेयं मनीषिणम् । नात्तपृष्ठमनुप्राप्ता यथापूर्व्वं गतज्वराः ॥ ५७ ॥
तब सब देवता लोग विद्वान दत्तात्रेय को प्रणाम करके स्वर्ग को गये और पूर्ववत् भय रहित होकर रहने लगे ॥ ५७ ॥ तथा त्वमपि राजेन्द्र यदीच्छसि यथेप्सितम् । प्राप्तुमैश्वर्य्यमतुलं तूर्णमाराधयस्व तम् ॥ ५८ ॥ इस लिये हे राजन् ! यदि तुम भी अतुल ऐश्वर्य को प्रात करने की अभिलाषा रखते हो तो मुनि दत्ता- त्रेय की सेवा करो ||५|| इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में गर्ग वाक्य नाम अठारहवाँ अध्याय समाप्त |
Summary of chapter 18 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
Maharshi Garga instructs King Āyus on the supreme glory and worshipping of Avadhūta Dattātreya to overcome worldly affliction and royal distress. Garga explains that sincere refuge taken at the lotus feet of Dattātreya bestows all material prosperity, moral strength, and ultimate spiritual liberation. Inspired by this teaching, King Āyus undertook devout worship and obtained a heroic, righteous son.