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 मार्कण्डेयउवाच

  ततःप्रसन्नोभगवानभानुराहाखिलंजनम्। त्रियतांयदभिप्रेतंमत्तःप्राप्तुंद्विजादयः॥१॥

मार्कण्डेयजी बोले-

तव उन सब लोगों से प्रसन्न होकर भगवान सूर्य बोले, "हे ब्राह्मणो ! बोलिये, आप लोग मुझ

से क्या प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं" ॥ १ ॥

ततस्तेप्रणिपत्योचुर्विप्रविमादयोजनाः।

ससाध्वसमशीतांशुमवलोक्यपुरःस्थितम्। ततस्तंप्रणिपत्योचुर्वरदंजगदीश्वरम्॥२

इस. पर वे ब्राह्मणादिक लोग सूर्य भगवान् को शान्त रूप से अपने सन्मुख देखकर उन वरदायी जगदीश्वर को प्रणाम कर वोले ॥ २ ॥ प्रजाऊचुः

भगवन्यदिनोभक्त्याप्रसन्नस्तिमिरापह | दशवर्षसहस्राणिततोनोजीवतांनृपः॥३॥

प्रजाजन बोले-

हे अन्धकारनाशक भगवन् ! यदि आप हमारी भक्ति से प्रसन्न हैं तो हमारे राजा राज्यवर्द्धन दस हजार वर्ष और जीवित रहें ॥ ३ ॥

निरामयोजितारातिःसुकेशःस्थिरयौवनः। दशवर्षसहस्राणिजीवतांराज्यवर्द्धनः॥४

  हम यही वर माँगते हैं कि राज्यवर्द्धन निरामय, शत्रुजित, सुकेश और स्थिर यौवन वाले होकर दस हज़ार वर्षश्रौर जीवित रहें ॥ ४ ॥ मार्कण्डेयउवाच

तथेत्युक्त्वाजनान्भास्वान्दुद्दशोऽभून्महामुने। तेऽपिलब्धवराहृष्टाःसमाजग्मुर्जनेश्वरम्॥५

मार्कण्डेयजी बोले-

हे महामुनि ! " ऐसा ही होगा" यह उन लोगों लोग भी वर प्राप्ति के कारण श्रानन्दित होकरसे कह कर भगवान् सूर्य अदृश्य होगये और वेंराजा के पास गये ||५||

यथावृत्तञ्चतेतस्मैनरेन्द्रायन्यवेदयन्। वरंलब्ध्वासहस्रांशाःसकाशादखिलंद्विज || ६

हे द्विज ! फिर उन लोगों ने सूर्य भगवान् से जिस प्रकार वर प्राप्त किया था वह सब कथा राजा से कह सुनाई ॥ ६ ॥

तच्छ्रुत्वाजहृषेतस्यसापत्नीमानिनीद्विज। सचराजाचिरंदध्यौनाहकिंचिच्चतंजनम्॥७॥

 हे द्विज ! उस वृत्तान्त को सुनकर राजा की पत्नी मानिनी की अत्यन्त हर्ष हुआ और वह राजा किसी सें कुछ न कहकर ध्यान करने लगा ॥ ७ ॥

ततःसासानिनीभूपंहर्षापूरितमानसा | दिष्ट्यायुषामहीपालवर्द्धस्वेत्याहतपतिम् ||८

हर्ष से उत्फुल्ल होकर वह मानिनी राजा से वोली, "हे स्वामिन् ! बड़े भाग्य से आपकी आयु बढ़ी है यहऔर भी बढ़े ||८ || तथातयामुदाभर्त्तामानिन्याथसभाजितः। नाहकिंचिन्महीपालश्चिन्ताजड़मनाद्विज॥६

मानिनी के प्रसन्न होकर इस प्रकार कहने पर भी राजा कुछ न बोले वरन् वे चिन्तासे और भी जड़ होगये ||६||

साःपुनःप्राहभर्त्तारंचिन्तयानमधोमुखम्। कस्मान्नहर्षमभ्येषिपरमाभ्युदयेनृप॥१०॥

फिर वह अपनेस्वामी को चिन्ता से मुख नोचा किये हुए देखकरबोली, "हे भगवन् ! इस खुशी के समय में भीहर्ष नहीं होता" ॥१०॥

दशवर्षसहस्राणिनीरुजःस्थिरयौवनः। भावीत्वमद्यप्रभृतिकिंतथापिनहृप्यसे॥११॥

दस हज़ार वर्ष तक निरोगऔर स्थिर यौवन रहने की खबर पर भी आपको हर्ष क्यों नहीं होता है ? ॥११॥

किन्तुतत्कारणंब्रूहियच्चिन्ताकृष्टमानसः। परमाभ्युदयेऽपित्वंसम्प्राप्तेपृथिवीपते || १२ ||

 हे राजन् ! इस अभ्युदय के समय में भी आपका चित्त चिन्ता से युक्त हुआ है, इसका कारण मुझसे कहिये ॥ १२ ॥

राजोवाच

कथमभ्युदयोभद्रेकिंसभाजयसेचमाम्। प्राप्तौदुःखसहस्राणांकिंसभाजनयिष्यते॥१३

राजा वोले-

हे भद्रे ! यह प्रसन्नता किस प्रकार हुई, तुम जीवित रहने में मुझको हजारों दुःख सहन करने

मुझको क्या समझाती हो ? दस हजार वर्ष तकपड़ेंगे ॥ १३ ॥

शवर्षसहस्राणिजीविष्याम्यहमेककः॥ न त्वं तव विपत्तौ मे किं न दुःखं भविष्यति ॥१४॥

मैंअकेलादसहजारवर्षतकजीवित रहूँगा परन्तु तुम तो बीचमें ही मर जाओगी ॥१४॥

मानिनीबोली-

पुत्रान्पौत्रान्प्रपौत्रांश्चतथान्यानिष्टवान्धवान्। पश्यतोमेमृतान्दुःखंकिमल्पंहिभविष्यति॥१५॥

पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, इष्टमित्र और बान्धवों को मरते देखकर क्या मुझको कम दुःख होगा ! ॥ १५ ॥

भृत्येषुचातिभक्तेषुमित्रवर्गेतथामृते। भद्रेदुःखमपारंमेभविष्यतितुसन्ततम्॥१६

  है भद्रे । श्रत्यन्त भक्त, सेवकों और मित्रवर्गों के निरन्तर मरते रहने से मुझको अपार दुःख होता रहेगा ॥ १६ ॥

यैर्मदर्थंतपस्तप्तंकृशैर्धमनिसन्ततैः। तेमरिष्यन्त्यहंभोगीजीवामीतिनंधिक्कथम्॥१७

जिन लोगों ने मेरे लिये अत्यन्त कृश होकर तप किया है वे तो मर जाँय और मैं भोग हे वरारोहे ! यह श्रभ्युदय नहीं वरन् आपत्ति है । भोगूँ, यदि मैं ऐसा करूँ तो मुझे धिक्कार है ||१७||

सेयमापद्वरारोहेप्राप्तानाभ्युदयोमम। कथंवामन्यसेनत्वंयत्सभाजयसेऽद्यमाम्॥१८

तुम इसे ऐसा क्यों नहीं मानती हो जो मुझको समझाने का प्रयत्न कर रही हो ॥ १८ ॥ मानिन्युवाच

महाराजयथात्थत्वंतथैवंनात्रसंशयः। मया, पौरवदोषोऽयंप्रीत्यानालोकितस्तव॥१६

हे महाराज ! जो श्राप कहते हैं वह सब सत्य । यह मेरा और नागरिकों का दोष है जो कि

हम लोगों ने आपके प्रेम में आकर न देखा ॥ १६ ॥

एवंगतेऽत्रकिंकार्य्यंनरनाथविचिन्त्यताम्। नान्यथाभावियत्प्राहप्रसन्नोभगवान्रविः||२०||

हे राजन् ! ऐसी दशा में क्या करना चाहिये यह सोचिये, जो कुछ भगवान् सूर्य ने प्रसन्न होकर

कहा है वह मिथ्या नहीं हो सकता ||२०||

राजोवाच

उपकारःकृतःपौरःप्रीत्याभृत्यैश्चयोमम। कथंभोक्ष्याम्यहंभोगान्गत्वातेषामनिष्कृतिम्२१॥

राजा बोले-

भूत्यों और प्रजाओं ने बड़े प्रेम से जो उपकार किया है सो उन भोगों को मैं उनके मरनेपर किसप्रकार भोगूंगा ॥२९॥

सोऽहमद्यप्रभृत्याद्रिंगत्वानियतमानसः। तपस्तप्स्येनिराहारोभानोराराधनोद्यतः ||२२||

श्रतः मैं आज से ही पर्वतपर जाकर नियम से निराहार रहकर, सूर्यकी श्रारा- धना में उद्यत होकर तप करूँगा ||२२||

दशवर्षसहस्राणियथाहंस्थिरयौवनः। तस्यप्रसादाद्देवस्यजीविष्यामिनिरामयः ||२३||

दस हजार वर्ष तक स्थिर यौवन होकर जीवित रहने का वर पाने के कारण मैं सूर्यदेव की कृपा से ऐसी दशा में भी सकुशल जीवित रहूँगा || २३ ||

तथायदिप्रजाःसर्व्वाःभृत्यास्त्वञ्चसुताश्चमे पुत्राःपैत्राःप्रपौत्राथसुहृदश्चवरानने॥२४

यदि सव प्रजा सेवक, तुम, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, इष्टमित्र ॥ २४

जीवन्त्येवंप्रसादंनःकरोतिभगवान्रविः। ततो'हंभविताराज्येभक्ष्येभोगांस्तथामुदा ||२५||

जीवित रहें ऐसी कृपा भगवान् सूर्य करदें तो मैं सहर्ष राज्य करके भोगों का उपयोग करूँगा ॥२५॥

नचेदेवंकरोत्यर्कस्तदद्रौतत्रमानिनि। तपस्तप्स्येनिराहारोयावज्जीवितसंक्षयः॥२६॥

 हे मानिनी ! यदि सूर्यदेव ऐसी कृपा न करेंगे तो मैं उस पर्वतपर आजीवन निराहार रहकर तपस्याकरता रहूँगा ||२६|| मार्कण्डेयउवाच

इत्युक्तासातदातेनतथेत्याहनराधिपम्। जगामतेनचसमंसाऽपितंधरणीधरम् ||२७||

मार्कण्डेयजी बोले-

राजाके इस प्रकार कहने पर मानिनीने भी 'ऐसाही हो' यह कहा वह भी राजाके साथ तप करनेको गई ॥२७॥

सतदायतनंगत्वाभार्य्ययासहपार्थिवः। मानोराराधनंचक्रेशुश्रूषानिरतोद्विज ||२८||| निराहारकुशःसाचयथासौपृथिवीपतिः।

तेपेतपस्तथैवोत्रंशीतवातातपक्षमा॥२६॥

हेद्विज ! उसराजानेस्त्रीसहितउसमन्दिरमें जाकरसेवामेंनिरतहोकरसूर्यदेवकीआराधना की।उसराजानेविनाआहारकेकृशहोकर, श्रौरशीत, वायुऔरधूपकोसहनकरकेउग्रतपस्याकी ॥ २८-२६ ॥

 तस्यपूजयतोभानुंतप्यतश्चतपोमहत्। साग्रेसंवत्सरेयातेततःप्रीतोदिवाकरः ||३०|||

 इस प्रकार सूर्य की पूजा और महान तप करते हुए राजा को पूरा एक वर्ष व्यतीत हो: गया तव सूर्यदेव प्रसन्न हुए ॥ ३० ॥

समस्तभृत्यपौरादि-पुत्राणाञ्चकृतेद्विज। ददौयथाभिलषितंवरंद्विजवरोत्तम ||३१||

हे द्विज श्रेष्ठ  सव सेवकों, प्रजायों और पुत्र पौत्रों के लिये जो वर राजा ने माँगा था. सूर्यदेव ने वही प्रदान किया||३१|

लब्ध्वावरंसनृपतिःसमभ्येत्यात्मनःपुरम्। : चकारमुदितोराज्यंप्रजाधर्मेणपालयन् ||३२||

और वर पाकर राजा अपने नगर में आया. प्रसन्न होकर प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करता हुआराज्य करने लगा ||३२|

ईजेयज्ञान्सचबहून्ददौदानान्यहर्निशम्। मानिन्यासहितोभोगान्बुभुजेचसधर्म्मवित्३३||

उस धर्मज्ञ राजा ने बहुत से यज्ञ किये और दिन रात्रि खूब दान दिये। उसने. मानिनी सहित बहुत से भोगों का उपभोग किया ||३३

दशवर्षसहस्राणिपुत्रपौत्रादिभिःसह। भृत्यैःपौत्रैःसमुदितःसोऽभवत्स्थिरयौवनः ||३४||

पुत्र, पौत्र, भृत्य और प्रजाओं सहित वह दस हजार वर्ष के लिये स्थिर यौवनवाला होगया ||३४||

तस्येतिचरितंदृष्ट्वाप्रमतिर्नामभार्गवः। विस्मयाकृष्टहृदयोगाथामेतामगायत॥३५॥

इसका इस प्रकार चरित्र देखकर भृगुवंशी प्रभति नाम विप्र ने विस्मय से श्रकृष्ट चित्त होकर इसप्रकार गीत गाया ॥ ३५ ॥

भानुभक्तेरहोशक्तिर्यद्राजाराज्यवर्द्धनः। श्रायुषोवर्द्धनोजातःस्वजनस्यतथात्मनः ||३६||

श्रहा ! सूर्य की भक्ति में बड़ी शक्ति है जिससे कि राजा राज्यवर्द्धन की उस

स्वजनों सहित आग बढ़ गई ||३६||

इतितेकथितंविप्रयत्पृष्टोऽहंतयाविभो। आदिदेवस्यमाहात्म्यमादित्यस्यविवस्वतः ||३७||

   हे कौटुकि ! जो आपने श्रादिदेव सूर्य भगवान् का माहात्म्य पूछा सो मैंने इस प्रकार वर्णन कर दिया ॥ ३७ ॥

विप्रैस्तदखिलंश्रुत्वाभानोर्माहात्म्यमुत्तमम्। पठंचमुच्यतेपापैःसप्तरात्रकृतैःनरः ||३८||

जो मनुष्य सूर्यदेव के इस उत्तम माहात्म्य को ब्राह्मणों से सुनते हैं वे सात रात्रि तक ऐसा करने

पर पापों से छूट जाते हैं ॥ ३८ ॥

रोगीधनवानाढ्यःकुलेमहतिधीमताम्। जायतेचमहाप्राज्ञोयथैतद्धारयेद्बुधः ||३६||

  जो ज्ञानी लोग इस माहात्म्य को धारण करेंगे वे नीरोगी, धनवान्होगा ॥३६॥

मन्दाचयेऽत्राभिहताभास्वतोमुनिसत्तम। जापःप्रत्येकमेतेषांत्रिसन्ध्यंपातकापहः॥४०॥

हे मुनिसत्तम ! इस माहात्म्य में मैंने और वुद्धिमान् होंगे तथा उनका जन्म बड़े कुल में

सूर्यदेव के सब मन्त्रों को कहा है। उनमें से एक- एक मन्त्र तीनों काल में पापों का नाश करने वालाहै ॥ ४० ॥

समस्तमेतन्माहात्म्यंयत्रचायतनेरवेः। पठ्यतेतत्रभगवान्सान्निध्यंनविमुञ्चति॥४१॥

जिस घर में भगवान सूर्य का यह माहात्म्य पढ़ा जाता है  वहाँ से भगवान् सूर्य अपनासान्निध्य नहीं छोड़ते ॥ ४१ ॥

तस्मादेतत्त्वयाब्रह्मन्भानोर्माहात्म्यमुत्तमम्। धार्य्यंमनसिजायंचमहतपुण्यमभीप्सतः॥४२॥

  हे ब्रह्मन् ! इसलिये आप सूर्य के इस उत्तम माहात्म्य को मनमें धारण वीजिये, इससे आपका महान् पुण्य होगा ॥ ४२ ॥

सुवर्णशृङ्गीमतिशोभनाङ्गीपयस्विनीगांहे

प्रददातियोहि।शृणोतिचैवहममव नरःसमंतयोःपुण्यफलंद्विजाग्रय ||४३||

द्विजाग्रघ ! सुदर्श के सींग वाली, अत्यन्त जो फल होता है वही फल तीन दिन तक इस

सुन्दर शरीर वाली और दुधारू गायके दान करने - माहात्म्य को सुनने से होता है ४३ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंभानुमाहात्म्यनाम११०वाँअ०समाप्त।