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पुत्र उवाच निषेकं मानवं स्त्रीणां वीजं प्राप्तं रजस्यथ विमुक्तमात्रो नरकात् स्वर्गाद्वापि प्रपद्यते

पुत्र ( सुमति) ने कहा-- जिस समय पुरुष का वीर्य स्त्री के रज. सं मिलता है उसी समय स्वर्ग अथवा नरक से वह जीव आकर उसमें प्रविष्ट हो जाता है तेनाभिभूतं तत् स्थैय्यं याति वीजद्वयं पितः कललत्वं बुद्बुदत्वं ततः पेशित्वमेव च

पिता ! वह रज और वीर्य इकट्ठा होकर स्थि होता है और फिर उबल कर बुलबुले के स होकर पिंड वन जाता है पेश्यां यथाणुवीजं स्यादङ्करस्तद्वदुच्यते श्रङ्गानांच तथोत्पत्तिः पंचानामनुभागशः | ३| जिस तरह ख़तरं अंकुर उत्पन्न होता है उसी तरह वीर्य के पिंड रे अंकुर निकलता है और उस पिंडमें से पाँच भा होकर पाँच अङ्ग उत्पन्न होते हैं

उपाङ्गान्यङ्गुली-नेत्र-नासास्य-श्रवणानि च `प्ररोहं यान्ति चाङ्गभ्यस्तद्वत् तेभ्यो नखादिकम् ॥४॥

अंगुली, नेत्र, नासिका, कान और नख श्रादि उत्पन्न होते हैं त्वचि रोमाणि जायन्ते केशाश्चैव ततः परम् समं समृद्धिमायाति तेनैवोद्भवकोषकम्

इसके बाद त्वचा और उसमें रोम आदि उत्पन्न होते हैं और फिर शिर के बाल होते हैं फिर जिस प्रकार जीव बढ़ता है उसी प्रकार स्त्री का उदर भी बढ़ता है नारिकेलफलं यद्वत् सकोषं दृद्धिमृच्छति तद्वत् प्रयात्यसौ दृद्धिं सकोषोऽधोमुखः स्थितः

नारियल के फल के समान वह जीव स्त्री के उदर में नीचे मुख किये हुए वृद्धि को प्राप्त होता है तले तु जानु - पाश्वभ्यां करौ न्यस्य स वर्द्धते अंगुष्ठौ चोपरि न्यस्तौ जान्वोरग्रे तथांगुली

उस की दोनों जंघाय पाश्र्वों के साथ रहती हैं और दोनों हाथ जाँघ और पार्श्व के बीच में रहकर बढ़ते हैं। अंगूठा ऊपर की ओर रहता है और अंगुलियाँ जधाओं से आगेकी ओर निकली रहती ॥ जानुपृष्ठे तथा नेत्र जानुमध्ये च नासिका स्फिचौ पाणिद्वयस्थे च बाहुजते वहिः स्थिते || ८

उसी प्रकार जानु की पीठ पर उसकी आँखें रहती हैं और जाँघों के मध्य में उसकी नासिका होती है, दोनों भुजायें पावों से सटी रहती हैं एवं दृद्धिं क्रमादयाति जन्तुः स्त्रीगर्भसंस्थितः अन्यसत्त्वोदरे जन्तोर्यथा रूपं तथा स्थितिः

स्त्री के गर्भ में स्थित जीव इस प्रकार वृद्धि को प्राप्त होता है और भी जन्तु होती है काठिन्यमग्निना याति भुक्तपीतेन जीवति पुण्यापुण्याश्रयमयी स्थितिर्जन्तोस्तथोदरे १०

कठिन अग्नि के साथ रहता हुआ जिस रूप के होते हैं उसी प्रकार उनकी स्थिति जो स्त्री खाती या पीती है वही वह जीव खाता और पीता है। उदर में भी उसको शुभाशुभ कर्म का फल भोगना पड़ता है १० नाड़ी चाप्यायनी नाम नाभ्यां तस्य निबध्यते स्त्रीणां तथान्त्रपिरे सा निबद्धोपजायते ।११.

और आप्यायनी नाम की नाड़ी से जो स्त्री के अन्दर है उस जीव और पिया हुआ अन्न पानादि स्त्री के पेट में घूमता की तोंदी बंधी रहती है ११ क्रामन्ति भुक्तपीतानि स्त्रीणां गर्भोदरे यथा तैराप्यायितदेहोऽसौ जन्तुवृद्धिमुपैति वै ।।१२

जिस तरह खाया है उसी प्रकार जीव भी घूमता रहता है और स्त्री के खाद्य से ही उसकी भी वृद्धि होती है १२ स्मृतीस्तस्य प्रयान्त्यस्यवढ्यः संसारभूमयः ततो निर्वेदमायाति पीड्यमान इतस्ततः १३

गर्भ में इधर उधर घूमते रहने से उसको पिछले जन्मों की सब दुनियाँ और भूमियों का स्मरण रहता है १३ पुननैवं करिष्यामि मुक्तमात्र इहोदरात् तथा तथा यतिष्यामि गर्भ नाप्स्याम्यहं यथा १४

इस गर्भ से मुक्त होते ही फिर ऐसा कोई कार्य नहीं करूँगा और वही यत्न करूँगा जिससे इस गर्भ में पुनः न श्राना पड़े इति चिन्तयते स्मृत्वा जन्मदुःखशतानि वै यानि पूर्व्वानुभूतानि दैवभूतानि यानि वै १५॥

यह चिन्ता करता हुआ और सैकड़ों जन्मों का स्मरण कर जो कुछ दैवगति अथवा कर्म फल से हुआ उसका उसको ज्ञान होजाता है. १५ ततः कालक्रमाज्जन्तुः परिवर्त्तत्यधोमुखः नवमे दशमे वापि मासि सज्जायते यतः १६

फिर काल के क्रम से वह नीचे मुख किया हुआ जीव नवमें या दस महीने को प्राप्त होता है १६ निष्क्राम्यमाणो वातेन प्राजापत्येन पीड्यते निष्क्राम्यते च विलपन् हृदि दुःखनिपीड़ितः १७॥

उसके निकलने की इच्छा होने पर प्राजापत्य की प्रेरणा से वायु उसको निकालती है और वह निकल कर पीड़ित हुआ विलाप करता है १७ निष्क्रान्तवोदरान्मूर्च्छामसह्यां प्रतिपद्यते प्राप्नोति चेतनांचासौ वायुस्पर्शसमन्वितः १८

उदर से निकलते ही वह असा मूर्छा को प्राप्त समय उसको चेत भी होजाता है १८ ततस्तं वैष्णवी माया समास्कन्दति मोहिनी

तया विमोहितात्मासौ ज्ञानभ्रंशमवाप्नुते ||१६||

तब वैष्णवी हो जाता है परन्तु फिर वायु के स्पर्श से उसी माया जो मोहिनी है उसको श्राच्छादित कर देती है और उससे विमोहित हो जाने से उसका ज्ञान नष्ट हो जाता है १६ भ्रष्टज्ञानो बालभावं ततो जन्तुः प्रपद्यते ततः कौमारकावस्थां यौवनं वृद्धतामपि ||२०||

ज्ञान भ्रष्ट हो जाने पर जीव बालभाव को प्राप्त होता है और फिर कुमार अवस्था, यौवन और वृद्धता को || २० || पुनश्च मरणं तद्वज्जन्म चाप्तोति मानवः ततः संसारचक्रेऽस्मिन् भ्राम्यते घटियन्त्रवत् ॥२१॥

वह मरता है और फिर जन्म पाता है। इसी प्रकार संसार रहता है २१ कदाचित् स्वर्गमाप्नोति कदाचिन्निरयं नरः नरकचैव स्वर्गच कदाचिश्च मृतोऽश्नुते ||२२||

कभी वह स्वर्ग में और फभी चक्र में मनुष्य रहटा के समान ऊपर नीचे घूमता नरक में जाता है और कभी नरक में तथा कभी स्वर्ग में जीता और मरता है २२ कदाचिदत्रैव पुनर्जातः स्वं कर्म्म सोऽश्नुते कदाचिदभुक्तकर्मा च मृतः स्वल्पेन गच्छति ॥२३॥

कभी इस पृथ्वी पर शरीर त्याग कर अपने कर्मानुसार दूसरे जन्म में जाता है और कभी अपने कर्म का भोग करके थोड़े ही काल में मृत्यु पाता है २३ कदाचिदल्पैश्च ततो जायतेऽत्र शुभाशुभैः स्वर्लोके नरके चैव भुक्तमायो द्विजोत्तम ||२४||

हे पिताजी ! कभी शुभ और कभी अशुभ कर्म करने. से प्रारब्ध वश जीव जीता और मरता है श्रीर कर्मों का फल भोगता हुआ कभी स्वर्ग और कभी : नरक को जाता है २४ नरकेषु महद्दुःखमेतद्यत् स्वर्गवासिनः दृश्यन्ते तात मोदन्ते पात्यमानाश्च नारकाः ||२५||

हे पिता ! नरकके महान् दुःखों को देखकर स्वर्गवासी प्रसन्न होते और नारकी दुःखित होते हैं || २५ || स्वर्गेऽपि दुःखमतुलं यदारोहणकालतः प्रभृत्यहं पतिष्यामीत्येतन्मनसि वर्त्तते २६

जो लोग स्वर्ग में 'जाते हैं उनको भी अतुल दुःख इस चिन्तामें होता है कि कहीं हम भी इस अग्नि में न गिरें २६ नारकांचैव सम्प्रेक्ष्य महद्दुःखमवाप्यते · एतां गतिमहं गन्तेत्यहर्निशमनिवृतः ॥२७ | नारकी लोगों को देखकर महान् दुःख को प्राप्त होते हैं और दिन रात यही सोचते हैं कि कहीं हमारी भी यह गति न हो जाय २७

गर्भवासे महद्दुःखं जायमानस्य योनितः जातस्य बालभावे च दृद्धत्वे दुःखमेव च २८

उस जीव को गर्भ में अथवा गर्भ से निकल कर, बाल्यावस्था अथवा बुढ़ापे में सर्वथा दुःख ही दुःख है ॥२८॥ कामेर्ष्या - क्रोधसम्वन्धं यौवने चातिदुःसहम् दुःखमाया वृद्धता च मरणे दुःखमुत्तमम् ॥२६

काम, क्रोध, ईर्ष्या आदि से यौवन में भी अति दुःख है। बुढ़ापे में भी प्रायः दुःख ही दुःख है, | इससे मरण का दुःख उत्तम है ॥६॥ कृष्यमाणस्य याम्यैश्च नरकेषु च पात्यतः पुनश्च गर्भो जन्माथ मरणं नरकस्तथा ||३०||

फिर यमदूतों द्वारा घसीटे जाकर नरकों में गिरते हैं, फिर गर्भ में जन्म लेकर मरते हैं और नरक में जाते हैं ३० एवं संसारचक्रेऽस्मिन् जन्तवो घटियन्त्रवत् भ्राम्पन्ते प्राकृतैर्वन्धैर्वद्ध्वा बध्यन्ति चासकृत् ३१॥

इसी भांति इस संसार - जाल में घटीयन्त्र की तरह जीव प्रकृति के बन्धनों से बँधा हुआ घूमता फिरता है ३१ नास्ति तात सुखं किश्चिदत्र दुःखशताकुले तस्मान्मोक्षाय यतता कथं सेव्या मया त्रयी ३२

हे पिताजी ! यहाँ पर सुख किंचितमात्र भी नहीं है, और सैकड़ों दुःख लगे रहते हैं इसलिये मोक्ष के : लिये यत्न करने वाला में त्रयी धर्म का पालन क्या करूँ १ ३२ इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में पिता-पुत्र सम्वाद (२) नामका ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त |