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मार्कण्डेयउवाच

एवंविमुक्तरोगातुकन्यकातंमुदान्विता।

स्वरोचिषमुवाचेदंशृणुष्ववचनंप्रभो॥१

मार्कण्डेयजी बोले-

वे दोनों सखियां रोग से छूटगई  और उनमेंसे एक ने प्रसन्नता पूर्वक स्वरोचि से कहा, "हेप्रभो ! सुनो" ॥१ ॥

मन्दारविद्याधरजानाम्नाख्याताविभावरी। उपकारिन्स्वमात्मानंप्रयच्छामिप्रतीच्छमाम् ||२||

 मैं मन्दार नाम विद्याधर की कन्या विभावरीहूँ, आप उपकारी हैं. इसलिये अपने

को आपके समर्पण करती हूँ, श्राप मुझे स्वीकार करें ॥ २ ॥

विद्याञ्चतुभ्यंदास्यामिसर्व्वभूतरुतानिते। ययाभिव्यक्तिमेष्यन्तिप्रसादपुरगोभव॥३

 मैं आपको एक विद्या भी देती हूँ  जिससे सब जीवों की बोली का ज्ञान आपको होजायगा । आप मुझपर प्रसन्न हों ॥३॥

मार्कण्डेयउवाच

एवमस्त्वितितेनोक्तेधर्मज्ञेनस्वरोचिषा। द्वितीयातुतदाकन्याइदंवचनमब्रवीत्॥४

मार्कण्डेयजीबोले- उसकेइसप्रकारकहनेपरधर्मात्मास्वरोचिने  उससे " एवमस्तु" कहा और उसे श्रङ्गीकार करलिया।

दूसरीसखीभीइसप्रकारकहनेलगी॥४॥

कुमारब्रह्मचार्य्यासीत्पारोनामपितामम। ब्रह्मर्षिःसुमहाभागोवेदवेदाङ्गपारगः॥५॥

हे कुमार ! वेद वेदाङ्ग के जानने वाले, भाग्यवान्ब्रह्मपिं ब्रह्मचारी पार मुनि मेरे पिता हैं ॥ ५ ॥

तस्य पुंस्कोकिलालाप - रमणीये मधौ पुरा । आजगामाप्सराभ्यासंप्रख्यातापुजिकस्तना ||६||

एकसमय कोकिलों की ध्वनि से परम रमणीक वसंत ऋतुमेंपुञ्जिकस्तनामअप्सराउनकेपासआई६॥

कामवक्तव्यतांनीतःसतदामुनिपुङ्गवः। तत्संयोगेऽहमुत्पन्नातस्यामत्रमहाचले॥७

उस महापर्वत पर कामासक्त होकर मुनिने उससे भोग किया, और उस संयोग से मेरा जन्म हुआ॥ ७ ॥

विहायमांगतासाचमातास्मिन्निर्जनेवने बालामेकांमहीपृष्ठेव्यालश्वापदसंकुले || ८

मुझको उस निर्जन बन में जहाँ सर्प और सिंह भरे हुए थे, पृथ्वी पर अकेला छोड़कर मेरीमाता चली गई ॥ ८ ॥ ततःकलाभिःसोमस्यवर्द्धन्तीभिरवक्षयम्। श्राप्याय्यमानाहरहद्वृद्धिंयातास्मिसत्तम॥६

 फिर जिस तरह चन्द्रमा कलात्रों से दिन-दिन बढ़ता है  उसी तरह मैं वृद्धिको प्राप्त होती गई ॥ ६ ॥

ततःकलावतीत्येतन्ममनाममहात्मना। गृहीतायाःकृतंपित्रागन्धर्व्वेणशुभानना ||१०||

 इसी कारण मेरे पिता ने मेरा नाम कलावती रक्खा और इसके बाद मुझेएक गन्ध पालने के लिये पिता से मांग कर लेगया ॥ १० ॥

नंदत्तातदातेनयाचितेनमहात्मना। देवारियालिनाशप्तस्ततोमेघातितःपिता॥११

 फिर मेरे पिता से एक राक्षस ने मुझे माँगा । उनको न देने पर उस राक्षसने उन्हें सोतेसमय शूल से मार डाला ॥ ११ ॥

ततोऽहमतिनिर्वेदादात्मव्यापादनोद्यता निवारिताशम्भुपत्न्यासत्यासत्यप्रतिश्रवा ||१२||

इससे मैं प्रतिनिराश होकर आत्मघात करनेपर उद्यत हुई तो उससमय शिवजी की पत्नी सतीने मुझको ऐसा करनेसे रोका ||१२|| माशुचःसुभ्रुभर्त्तातेमहाभागोभविष्यति। स्वरोचिर्नामपुत्रमनुस्तस्यभविष्यति॥१३॥

  हे सुन्दरी ! तू सोच मत कर तेरेस्वामी महाभाग स्वरोचि होंगे और उनके पुत्र मनुहोंगे ॥ १३ ॥

आज्ञाचनिधयःसर्व्वेकरिष्यन्तितवाहताः। यथाभिलषितंवित्तंप्रदास्यन्तिचतेशुभे॥१४

हे शुभे ! सम्पूर्ण निधियां तेरी आज्ञाको मानेंगी और तुमको मनवांछित धनादि देगी ||१४

यस्यांवत्सेप्रभावेणविद्यायास्तांगृहाणमे। पद्मिनीनामविद्ययंमहापद्माभिपूजिता ||१५||

महापद्म से पूजित पद्मिनी नाम विद्या मैं तुम्हें देतीहूँ, इसको ग्रहण करो, इसी विद्या के प्रभाव से  सब निधियां तुम्हारी होंगी: ॥१५॥

इत्याहमांदक्षसुतासतीसत्यपरायणा। स्वरोचिस्त्वंध्रुवंदेवीनान्यथासावदिष्यति॥१६

दक्षकन्या सती ने मुझसे ऐसा कहा था । स्वरोचि निश्चय ही तुम हो । देवी असत्य नहीं कह॥१६॥

साहंप्रारणप्रदायाद्यंतांविद्यांस्वंतथावपुः। प्रयच्छामिप्रतीच्छत्वंप्रसादसुमुखोंमम॥१७॥

सत्य-परायणा वह कलावती मैं हूँ, उस विद्या तथाशरीर को मैं आपके अर्पण करती हूँ । आप स्व

कार करके मुझपर प्रसन्न हों ॥ १७ ॥

.. मार्कण्डेयउवाच

एवमस्त्वितितामाहसतुकन्यांकलावतीम्। विभावर्य्याःकलावत्याःस्निग्धदृष्ट्यानुमोदित: १८

मार्कण्डेयजी बोले-

 स्वरोचि उस कन्या कलावतीसे बोले कि ऐलाई होगा । विभावरी तथा कलावती के खिग्ध प्रेम मेंस्वरोचि बहुत प्रसन्न हुए ॥ १८ ॥

जंग्राहचततःपाणीसतयोरमरद्युतिः। नदत्सुदेवतूर्येषुनृत्यन्तीष्वप्सरःसुच॥१६॥

देवताओं की सकान्ति वाले स्वरोचि ने उन दोनों के साथविवाहकरलिया ।उस विवाह में देवताओं ने वाजे बजायेंऔर अप्सरायें नाची ॥ १६ ॥

इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंस्वरोचिषमन्वन्तर (३) नाम६४वाँअध्यायसमाप्त।