मार्कण्डेय महा पुराण
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जैमिनिरुवाच संशयं द्विजशार्दूलाः प्रब्रूत मम पृच्छतः । श्राविर्भाव तिरोभावौ भूतानां यत्र संस्थितौ ॥ १ ॥
जैमिनिजी बोले- हे पक्षिराज | जो मुझे संशय है उसको भी मैं पूछता हूँ सो कहिये, इस संसार में जो जन्म मरणकी स्थिति है ॥१॥ कथं सज्जायते जन्तुः कथं वा स विवद्ध ते । कथं वेादरमध्यस्थ स्तिष्ठत्यङ्गनिपीड़ितः ॥ २ ॥
सो यह जीव किसप्रकार उत्पन्न होता है, किस तरह वह बढ़ता है, किस तरह वह उदर मैं पीड़ा सहता हुआ ठहरता है ! ॥ २ ॥ निष्क्रान्तिमुदरात् प्राप्य कथं वा वृद्धिमृच्छति । उत्क्रान्तिकाले च कथंचिद्भावेन नियुज्यते ॥ ३
उदरं से किस प्रकार बाहर होकर वृद्धि को प्राप्त होता है ? स्थित होता है ॥ ३ ॥ कृत्स्नेा मृतस्तथाश्नाति उभे सुकृत- दुष्कृते । कथं ते च तथा तस्य फलं सम्पादयन्त्युत ॥ ४
अपने सुकृत व दुष्कृत का पेट से बाहर थाने के समय वह किस भाव में. फल किस प्रकार पाता है तथा मरने के बाद वह किस प्रकार भोग करता है ? ॥ ४ ॥ कथं न जीर्य्यते तत्र पिण्डीकृत इवाशये ।
स्त्रीकेोष्ठे यत्र जीर्य्यन्ते भुक्तानि सुगुरुण्यपि । भक्ष्याणि यत्र ना जन्तुर्जीर्यते कथमल्पकः ॥ ५ ॥
स्त्रीके गर्भाशयमें पिराडी के समान रहने वाला यह छोटा सां जीव स्त्री के कोष्ठ मैं क्यों नहीं जल जाता जिसमें अति कठिन वस्तु भी पच जाती हैं ? ॥ ५ ॥
एतन्मे ब्रूत सकलं सन्देह क्तिविवज्जितम् । तदेतत् परमं गुह्यं यत्र मुह्यन्ति जन्तवः ।। ६
इस लिए मुझको कहकर संदेह रहित कर दीजिये, कारण कि यह विषय गुप्त है और इसकी बावत . लोग भ्रम में हैं ॥ ६ ॥ पक्षिण ऊचुः प्रश्नभारोऽयमतुलस्त्वयास्मासु निवेशितः । दुर्भाव्यः सर्व्वभूतानां भावाभावसमाश्रितः ॥ ७
पक्षी बोले- हे जैमिनि ऋषि ! आपने इस प्रश्न का अतुल भार हम पर रख दिया है। यह प्रश्न भाव और प्रभाव के संयुक्त तथा दुर्भाव्य है ||७|| तं शृणुष्व महाभाग यथा माह पितुः पुरा । पुत्रः परमम्र्मात्मा सुमतिर्नाम नामतः ॥ ८ ॥
हे महाभाग !- परम धर्मात्मा सुमति नाम पुत्र ने पूर्वकाल में जो कुछ अपने पिता से कहा था वह सुनो ॥ ८ ॥ ब्राह्मणेो भार्गवः कश्चित् सुतमाह महामतिः ।
कृतोपनयनं शान्तं सुमतिं जड़रूपिणम् ॥ ६ ॥
एक विद्वान् भृगुवंशी ब्राह्मण का अहरूप एक पुत्र सुमति नाम वाला था। पिता ने उसका यज्ञोपवीत संस्कार कराया ॥ ६ ॥
वेदानधीष्व सुमते यथानुक्रममादितः । गुरुशुश्रूषणे व्यग्रो भैक्षान्नकृतभोजनः ॥१०॥
पिता ने अपने पुत्र से कहा, "हे सुमति ! क्रम पूर्वक वेदों को पढ़ो और गुरू की सेवा में रहकर भिक्षा मांगकर भोजन किया करो ॥ १० ॥ ततो गार्हस्थ्यमास्थाय चेष्ट्वा यज्ञाननुत्तमान् । इष्टमुत्पादयापत्यमाश्रयेथा वनं ततः ॥ ११ ॥
इसके बाद ग्रहस्थ धर्म में प्रविष्ट होकर उत्तम यज्ञों को करते हुए पुत्र उत्पन्न करो और फिर उसके बाद वनवास ग्रहण करो ॥ ११ ॥ वनस्थश्च ततो वत्स परिव्रानिष्परिग्रहः । एवमाप्स्यसि तद्ब्रह्म यत्र गत्वा न शोचसि || १२ ||
फिर वाराप्रस्थ में जाकर सन्यास ग्रहण करो । इससे ब्रह्म में पहुंचोगे जहां जाकर शोक रहित होजाओगे ॥ १२ ॥ पक्षिण ऊचुः इत्येवमुक्तो बहुशो जड़त्वान्नाह किंचन । पितापि तं सुबहुशः प्राह प्रीत्या पुनः पुनः ॥ १३
पक्षी वोलें- इस प्रकार बहुत कुछ समझाये जाने पर भी वह जड़ पुत्र कुछ न बोला । पिता ने भी प्रीति पूर्वक बार बार कहां ॥ १३ ॥ इति पित्रा सुतस्नेहात् मलोभि मधुराक्षरम् । स चोद्यमानो बहुशः प्रहस्येदमथाब्रवीत् ॥ १४
पुत्र-स्नेह से मीठे अक्षरों में पिता के बहुत बार कहने पर सुमति हँस कर यह बोला ||१४|| तातैतद्वद्दृशोऽभ्यस्तं यत् त्वयाद्योपदिश्यते । तथैवान्यानि शास्त्राणि शिल्पानि विविधानि च १५
हे तात ! आपने जो अभी उपदेश किया है इसका मैंने बहुत अभ्यास किया है । इसी प्रकार शिल्प विद्या आदि अन्य शास्त्रों का भी अध्ययन किया है ॥ १५ ॥ जन्मनामयुतं साग्रं मम स्मृतिपथं गतम् । निर्व्वेदाः परितोषाश्च क्षयवृद्धय दये रताः ॥ १६
मेरे स्मृति पटल पर हज़ारों जन्मों का वृतान्त श्रङ्कित है। निर्वेद और परितोष आदि ज्ञानभी मुझे प्राप्त हैं ॥१६॥ शत्रु मित्रकलत्राणां वियोगाः सङ्गमास्तथा । मातरो विविधा दृष्टाः पितरो विविधास्तथा ॥ १७॥
मुझे. श्रनेकों शत्रु, मित्र और स्त्री आदिकोंकावियोग तथा मात भी हुईं ॥ १७ ॥ अनुभूतानि सौख्यनि दुःखानि च सहस्रशः । बान्धवा बहवः प्राप्ताः पितरश्च पृथग्विधाः ॥ १८ ॥
मैंने हजारों ही तरह के दुख तथा संयोग प्राप्त हुआ और अनेकों पिता तथा मातायें सुखों का अनुभव किया है। तथा अनेक प्रकार के वन्धु तथा पिता मेरे हुए हैं ॥ १८ ॥ विएसूत्र पिच्छिले स्त्रीणां तथा कोष्ठे मयोषितम् । पीड़ाश्च सुभृशं प्राप्ता रोगाणाञ्च सहस्रशः ॥ १६ ॥
श्रनेक स्त्रियों के गर्भ में जिनमें विष्ठा और मूत्र भरा है मैं रहा हूँ तथा सहस्रों रोग और पीढ़ायें मुझको हुई ॥१६॥
गर्भदुःखान्यनेकानि बालत्वे यौवने तथा । वृद्धतायां तथाप्तानि तानि सर्व्वाणि संस्मरे ||२०||
जितने भी दुःख मैंने वाल्य, यौवन और वृद्ध अवस्थाओं में उठाये हैं वे सब मुझे याद हैं ||२०|| ब्राह्मण-क्षत्रिय-विशां शूद्राणाञ्चापि योनिषु । पुनश्च पशुकीटानां मृगाणामथ पक्षिणाम् ॥ २१
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र, पशु, कीट, मृग तथा पक्षियों की अनेक योनियों में मैं उत्पन्न हुआ ॥ २१ ॥ तथैव राजभृत्यानां राज्ञाञ्चाहवशालिनाम् । समुत्पन्नोऽस्मि गेहेषु तथैव तव वेश्मनि ॥ २२॥
तथा राजसेवकों और बलशाली राजात्रों के घर में मेरा जन्म हुआ । अन्त में मैं आपके घर में जन्मा हूँ ॥ २२ ॥ भृत्यतां दासताञ्चैव गतोऽस्मि बहुशो नृणाम् । स्वामित्वमीश्वरत्वंच दरिद्रत्वं तथा गतः ॥ २३ ॥
मैं बहुत से मनुष्यों की दासता में रहा हूँ और इसी प्रकार वहुतों का स्वामी । मैं कभी घनी हुआ और कभी दरिद्री ||२३|| हतं मया हतश्चान्यैर्हतं मे घातितं तथा । दत्तं ममान्यैरन्येभ्यो मया दत्तमनेकशः ||२४||
कभी मैंने मारा है और कितनी ही बार में दूसरों से मारा गया हूँ । कभी मुझे दूसरों ने दान दिया है और कभी मैंनें' दूसरों को दान दिया है ॥ २४ ॥ -मार-सुहृद्धस्रातृ-कलत्रादिकृतेन च ।
तुष्टोऽसकृत् तथा दैन्यमश्रुधौताननो गतः ॥ २५॥ पिता, माता, मित्र, भाई, स्त्री से कितनी बार संतुष्ट हुआ हूँ और कभी-कभी इनके वियोग में रोया हूँ ||२५|| एवं संसारचक्रेऽस्मिन् भ्रमता तात सङ्कटे । ज्ञानमेतन्मया प्राप्तं मोक्षसम्प्राप्तिकारकम् ||२६||
हे तात!. इस प्रकार इस संसार चक्र में कष्ट पूर्वक भ्रमण करते-करते मुझे यह ज्ञान जो मोक्ष प्राप्ति का साधन है मिला ॥ २६ ॥ विज्ञाते यत्र सर्वोऽयमृग्यजुः सामसंज्ञितः । क्रियाकलापो विगुणो न सम्यक् प्रतिभाति मे ||२७||
उस ज्ञान के कारण मुझे वह क्रिया कलाप जो ॠग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद में से क्या प्रयोजन, जबकि मुझे ज्ञान उत्पन्न हो वर्णित है अच्छा नहीं लगता है ॥२७॥ तस्मादुत्पन्नबोधस्य वेदैः किं मे प्रयोजनम् । गुरुविज्ञानतृप्तस्य निरीहस्य सदात्मनः ||२८||
मुझको वर्णित है अच्छा नहीं लगता गया है और मैं गुरु के ज्ञान से तृप्त हुआ निरभि- लापी तथा आत्मज्ञानी हूँ ॥ २८ ॥ पद्मकार क्रिया- दुःख-सुख हर्ष -रसैश्च यत् । गुणैश्च वज्र्जितं ब्रह्म तत् प्राप्स्यामि परं पदम् ॥ २६
छः प्रकारे की क्रिया दुःख, सुख, हर्प, रस, गुण इन सब से परे परब्रह्म पद को प्राप्त करूँगा ॥ २६ ॥ रस-हर्ष भयोद्वेग-क्रोधामर्ष-जरातुराम् विज्ञातां श्वमृगग्राहि-संघपाशशताकुलाम् ||३०||
रस, हर्ष, भय, उद्वेग, क्रोध, श्रम और जरा से व्याकुल, मनुष्य शत पाश में बंधे हुए श्वान और मृगों के समान हैं ||३०|| तस्माद्वयास्याम्यहं तात त्यक्त्वेमां दुःखसन्ततिम् । त्रयीधर्म्ममधर्म्माढ्यं किम्पाकफलसन्निभम् ||३१||
इसलिये मैं इस प्रकार दुःख उत्पन्न करने वाली सन्तति को पैदा न कर परम पद को जाऊँगा । तीनों वेदों द्वारा कहे हुए धर्मरूपी धर्म का अवलम्बन करने के बरावर पाप और कौन सा है ? ॥ ३१ ॥ पक्षिण ऊचुः तस्य तद्वचनं श्रुत्वा हर्षविस्मयगद्गदम् ।
पिता माह महाभागः स्वसुतं हृष्टमानसः || ३२
पक्षी बोले- उसका वह वचन सुनकर हर्ष और आश्चर्य से गद्गद होकर पिता ने प्रसन्न होकर अपने पुत्र से पूछा ॥ ३२ ॥ पितोवाच किमेतद्वदसे वत्स कुतस्ते ज्ञानसम्भवः । केन ते जड़ता पूर्व्वमिदानीञ्च प्रबुद्धता ||३३|||
पिता बोले-- हे वत्स ! यह तुम क्या कहते हो, तुमको ज्ञान: कैसे हुआ ? कहाँ तुम्हारी पुरानी जड़ता और कहाँ यह विकसित ज्ञान १ ||३३||
किन्तु शापविकारोऽयं मुनिदेवकृतस्तव । यत् ते ज्ञानं तिरोभूतमाविर्भावमुपागतम् ||३४||
क्या किसी मुनि या देवता के शाप के कारण ये विकारथा ? तुम्हारा छिपा हुआ ज्ञान व किस प्रकार प्रगट हुआ ? | श्रोतुमिच्छामि तत् सर्व्वं परं कौतुहलं हि मे । सर्व्वं तद्ब्रूहि मे वत्स यथावृत्तं पुरा तव ॥ ३५॥
हे वत्स ! मैं तुम्हारा पूर्व वृत्तान्त सब सुनना चाहता हूँ । मुझे अत्यन्त कौतूहल है, तुम सब. हाल कहो ॥ ३५ ॥ पुत्र उवाच शृणु तात यथा वृत्तं ममेदं सुख-दुःखदम् । ( यश्चाहमासमन्यस्मिन् जन्मन्यस्मत्परन्तु यत् ||३६||
पुत्र बोला- हे तात ! सुनिये कि जिस प्रकार मेरा सुख और दुखपूर्ण वृत्तान्त एक जन्म से दूसरे जन्म पर्यन्त मुझे स्मरण रहा ॥ ३६ ॥ हमासं पुरा विप्रो न्यस्तात्मा परमात्मनि । आत्मविद्याविचारेषु परां निष्ठामुपागतः ||३७||
मैं प्राचीन काल में परमात्मा में लीन एक ब्राह्मण था जो आत्म-ज्ञान के निरन्तर विचार से परम निष्ठा को प्राप्त हुआ ||३७|| सततं योगयुक्तस्य सतताभ्याससङ्गमात् । सत्संयोगात् स्वस्त्रभावाद्विचारविधिशोधनात्॥ ३८ ॥
निरन्तर योगयुक्त तथा योग का अभ्यास करने से सत्सङ्ग में रहने से अच्छी प्रकृति व विचारविधि शोधन से ॥ ३८ ॥ तस्मिन्नेव परा प्रीतिर्ममासीदयुञ्जतः सदा । आचार्यताश्च सम्प्राप्तः शिष्यसन्देहहृत्तमः ॥ ३६ ॥ मुझे परब्रह्म में परम प्रीति हुई. और मैं उसके साथ संलग्न होगया । इसके बाद मैं आचार्यत्व को प्राप्त कर शिष्यों के सन्देहों कीनिवृत्ति करने लगा ||३६||
ततः कालेन महता ऐकान्तिकमुपागतः । अज्ञानाकृष्ट सदभावो विपन्नश्च प्रमादतः ॥४०॥
फिर कुछ काल व्यतीत होने पर अज्ञानता के कारण मेरा सात्विकी भाव निकल गया और मैं मोह को प्राप्त होकर मृत्यु के. वश हुआ ||४०|| उत्क्रान्तिकालादारभ्य स्मृतिलोपो न मेऽभवत् । यावदन्दं गतंचैव जन्मनां स्मृतिमागतम् ॥४१॥
अनेक जन्मों की बातें मुझे याद है, किस-किस जन्म में कितने-कितने वर्ष जीवित रहा यह मुझको स्मरण है ॥ ४१ ॥ पूर्वाभ्यासेन तेनैव सोऽहं तात जितेन्द्रियः । यतिष्यांमि तथा कर्त्तुं न भविष्ये यथा पुनः ॥४२॥
हे तात ! उसी पूर्व के अभ्यास से मैं जितेन्द्रिय हूँ और इस तरह यत्न करना चाहता हूँ कि जिससे मुझे फिर अज्ञान न हो ||४|| ज्ञानदानफलं ह्य तद्यज्जातिस्मरणं मम । न ह्य ेतत् प्राप्यते तात त्रयीधम्र्माश्रितैर्नरैः ॥ ४३
मेरे ज्ञान के दान का फल यही है कि मुझे सव जन्मों का वृत्तान्त स्मरण है । ऐसी स्थिति त्रयी धर्म में श्राश्रित मनुष्यों को प्राप्त नहीं है ॥ ४३ ॥ सोऽहं पूर्वाश्रमादेव निष्ठाधर्म्यमुपाश्रितः । एंकान्तित्वमुपागम्य यतिष्याम्यात्ममीक्षणे ॥ ४४
मुझे पूर्व के आश्रम के कारण देवनिष्ठा धर्म प्राप्त है और अब मैं एकान्त वास कर अपनी मोक्ष का यत्न करूँगा ||४४|| तद्ब्रूहि त्वं महाभाग यंत् ते सांशयिकं हृदि । एतावतापि ते प्रीतिमुत्पाद्यानृण्यमाप्नुयाम् ||४५||
इसलिये हे महाभाग ! जो कुछ तुम्हें संशय हो उसे कहो, उसकी निवृत्ति कर मैं आपके ऋण से मुक्त हो जाऊँगा ॥ ४५ ॥ पक्षिण ऊचुः पिता माह ततः पुत्रं श्रद्दधत् तस्य तद्वचः । भवता यद्वयं पृष्टाः संसारग्रहणाश्रयम् ||४६ || पक्षी बोले- हे जैमिनिजी ! जो प्रश्न आपने हमसे पूछे हैं वही प्रश्न पिताने उस अपने पुत्रसे श्रद्धापूर्वक पूंछे ।। पुत्र उवाच शृणु तात यथा तत्त्वमनुभूतं मयाऽसकृत् । संसारचक्रमजरं स्थितिर्यस्य न विद्यते ॥ ४७ ॥
पुत्र बोला- हे पिता ! जिस तत्व को मैंने अनुभव किया है उसको सुनिये | यह संसारचक बड़ा अजरहै इस में किसी की स्थिति नहीं है अर्थात् इस संसार में सव चक्रवत् घूमते हैं ॥ ४७ ॥ सोऽहं वदामि ते सर्व्वं तवैवानुज्ञया पितः । उत्क्रान्तिकालादारभ्य यथा नान्यो वदिष्यति ॥ ४८
हे पिता आपकी श्राज्ञा से उस सव वृत्तान्त को उत्पत्ति के समय से मरण पर्यन्त कहूँगा कि जिस प्रकार कोई दूसरा न कह सकेगा ॥ ४८ ॥ उष्मा प्रकुपितः काये तीत्रवायुसमीरितः । भिनत्ति मर्म्मस्थानानि दीप्यमानो निरिन्धन ||४|||
शरीर में स्थित ऊष्मा तीव्र वायु से प्रेरित हुई कुपित होकर मर्म स्थानों को काटती है और बिना ईंधन के ही अग्नि प्रज्वलित करती है ॥ ४६ ॥ उदानो नाम पवनस्ततश्चोद्ध प्रवर्त्तते । । भुक्तानामम्धुभक्ष्याणामधोगतिनिरोधकृत् ॥५०॥
उदान नाम की वायु जो कुछ खाया या पिया जाता है उसे नीचे की ओर ले जाती है ॥ ५० ॥ ततो येनाम्बुदानानि कृतान्यन्नरसास्तथा । दत्ता: स तस्य आह्लादमापदि प्रतिपद्यते ॥ ५१॥
अन्न और जल जो कि भोजन और पान में दिया जाता है उससे मनुष्य को श्रह्लाद हो जाता है ॥ ५१ ॥ अन्नानि येन दत्तानि श्रद्धापूतेन चेतसा । सोऽपि तृप्तिमवाप्तोति विनाप्यन्नेन वै तदा ॥ ५२ ॥
जो मनुष्य श्रद्धा से पवित्र चित्त होकर अन्न का दान करता है वह 'मरने पर विना अन्न के भी तृप्ति को प्राप्त होता है ॥ येनावृतानि नोक्तानि प्रीतिभेदः कृतो न च । आस्तिकः श्रधान स सुखं मृत्युमृच्छति ॥५३॥
जो झूठ नहीं बोलते हैं, करते, जो जो किसीका अपकार नहीं श्रास्तिक और श्रद्धावान हैं वे सुखपूर्वक मृत्युको प्राप्त होते हैं ॥ ५३ ॥ देवब्राह्मणपूजा यां ये रता नानुसूयवः । शुक्ला बंदान्या हीमन्तस्ते नराः सुखंमृत्यवः ॥५४॥
जो लोग ब्राह्मण और देवतात्रों की पूजा करते हैं, किसी की निन्दा नहीं करते, सात्विक तथा उचित भाषण करने वाले हैं,. ऐसे महानुभाव सुख से मृत्यु को प्राप्त करते हैं । यो न कामान्न संरम्भान द्वेषामुत्सृजेत् । री सौम्यचः स सुखं मृत्युमृच्छति ॥५५॥
जो लोग अपने स्वार्थ के लिये धर्मको नहीं छोड़ते हैं, निष्कपट हैं. उचित कर्म करते हैं और यौने वे सुख पूर्वक मरते हैं ॥ ५५ ॥ वारिदायिनो दाहं क्षुधाश्चानन्नदायिनः । प्राप्नुवन्ति नराःकाले तस्मिन् मृत्यावुपस्थिते ॥ ५६
जो लोग प्यासे को पानी और भूखे को अन्न देते हैउनको मृत्यु के बाद अन्न और वाद अन्न और पानी मिलता है ' ॥ ५६ ॥ शीतं जयन्तीन्धनदास्तापं चन्दनदायिनः । प्राणनी वेदनां कष्टां ये चानुद्व ेगकारिणः ॥ ५७॥
जो लोग पानी और भूखे को न देते हैं उनको मृत्ल के जाड़ों में ईंधन देते हैं उनको मरते समय ठण्डनंहीं लगती है तथा जो लोग चन्दन देते हैं उनको उस समय गर्मी नहीं लगती है ॥ ५७ ॥ मोहाज्ञानप्रदातारः प्राप्नुवन्ति महद्भयम् । | वेदनाभिरुग्राभिः प्रपीड्यन्तेऽधमा नराः ॥ ५८ ॥
जो मोह श्रीर ज्ञान फैलाते हैं वे दुष्ट मनुष्य उग्र वेदनाओं से पीड़ित होते हुए महान् भय को प्राप्त होते हैं ॥ ५८ ॥ कूटसाक्षी मृपावादी यथासदनुशास्ति वै । ते मोहमृत्यवः सर्व्वे तथा वेदविनिन्दकाः ||५६
जो भूठी गवाही देता है, भंठ बोलता है, अनुचित श्रादेश करता है, तथा वेद की निन्दा करने वाले लोग ये सब मृत्युकाल में मूर्च्छाग्रस्त होते हैं ॥ ५६ ॥ विभीपणा: पूतिगन्धाः कूटमुद्गरपाणयः । आगच्छन्ति दुरात्मानो यमस्य पुरुषास्तदा ||६०||
ऐसे मनुष्यों के लिये यमराज के भयानक, दुर्गन्ध- युक्त, हाथ में मुदुगर लिये हुए तथा दुष्टात्मा दूत श्राते हैं ॥ ६०॥ मासेषु दृकपथं तेषु जायते तस्य वेपथुः । क्रन्दत्यविरतं सोऽथ भ्रातृ - मातृ- सुतानथ ॥ ६१
उन दूतों को श्राते हुए देखकर वह मनुष्य काँपने लगता है तथा भाई, माता, पिता, पुत्र आदि को सम्बोधन कर रोता है ॥ ६१ ॥ सास्य वागस्फुटा तात एकवर्णा विभाव्यते । दृष्टिय भ्राम्यते त्रासाच्छ्रासाच्छुप्यत्यथाननम् ६२ ॥
उस समय हे तात ! वह मनुष्य विक्षिप्त की तरह श्रस्त व्यस्त बोलने लगता है, उसकी दृष्टि चक्कर खा जाती है तथा उसका श्वास और मुँह सूख जाता है ॥ ६२ ॥ ऊर्ध्वश्वासान्वितः सोऽथदृष्टिभङ्गसमन्वितः । ततः स वेदनाविष्टस्तच्छरीरं विमुञ्चति ॥ ६३ ॥
ऊर्द्ध श्वास लेता हुआ, दृष्टि भंग होकर श्रीर वेदना से युक्त वह मनुष्य शरीर त्याग देता है ॥६३॥ वाय्यग्रसारी तद्रूपं देहमन्यत् प्रपद्यते । तत्कर्म्मजं यातनार्थं न माठ - पितृसम्भवम् । तत्प्रमाणवयोवस्था संस्थानः प्राग्भवं यथा ॥ ६४
और वायु के साथ उसी हालत में दूसरे शरीर में जो बिना मा बाप के उत्पन्न हुआ है कर्मजन्य यातना भोगने के लिये है जाता है अवस्था और उम्र उसकी पहिले शरीर में थी उसे इस शरीर में भी मालुम होती है ॥६४॥ ततो दूतो यमस्याशु पाशैर्वधाति दारुणैः । दण्डमहारसम्भ्रान्तं कर्यते दक्षिणां दिशम् ||६५||
अनन्तर यमदूत उसे शीघ्र कठिन पाशों से डण्डे से मारता हुआ दक्षिण दिशा की ओर जाता है ॥६५॥ कुश-कण्टक-वल्मीक-शंकु-पापाणकर्कशे 1 तथा प्रदीप्तज्वलने कचिच्छुभ्रतोत्कटे ॥६६॥
जो मार्ग कुश, काँटा, वल्मीक, पाण ध्यादि से पूर्ण है तथा जिसमें कहीं श्रा । बरसती है और जो कहीं अग्निखण्डों से उत्कं हो रहा है ॥ ६६ ॥ मदीप्तादित्यतप्ते च दद्यमाने तदंशुभिः । कृप्यते यमदूतैश्चाशिवसन्नादभीपणैः ॥६७॥
जिसमें कहीं सूर्य की तपन है तथा उसकी किरणों से शरीर जलता ऐसे मार्ग से यमदूत मनुष्य को घसीटते हुए भयानक दुःसह शब्द कहते हुए ले जाते हैं ॥ ६७ विकृष्यमाणस्तैयार र्भक्ष्यमाणः शिवाशतैः । प्रयाति दारुणे मार्गे पापकर्म्मा यमक्षयम् ||६८
इस प्रकार यमदूतों का घसीटा हुआ तथा गीदड़ों का जो मार्ग में पढ़ते है खाया हुत्रा,. पापी मनुष्य कठिन मार्ग से जाता है ॥ ६८ ॥ छत्रोपानन्मदातारो ये च वस्त्रमदा नराः । ते यान्ति मनुजा मार्ग तं सुखेन तथान्नदाः ॥ ६६ ॥
परन्तु छत्री, जूता, वस्त्र, अन्न श्रादिक दान करने वार मनुष्य सुख पूर्वक उत्तम मार्ग से जाते हैं ॥ ६६ ॥ एवं लेशाननुभवन्नवशः पापपीड़ितः । नीयते द्वादशाहेन धर्म्मराजपुरं नरः ॥७०॥ उसी प्रकार क्लेश पाता हुआ, परवश और पाप दुःखित वह मनुष्यः वारहवें दिन यमपुरी को जाया जाता है ॥ ७० ॥
कलेवरे दह्यमाने महान्तं दाहमृच्छति । ताड्यमाने तथैवार्त्ति विद्यमाने च दारुणाम् ॥ ७१ में अत्यन्त दाह होता है तथा पीटे और छेदे जाने के कारण उसका शरीर श्रार्त हो जाता है ॥ ७१ ॥
क्लिद्यमाने चिरतरं जन्तुर्दुःखमवाप्नुते । । स्वेन कर्म्मविपाकेण देहान्तरगतोऽपि सन् ॥ ७२ ॥ अपने कर्म के फल से जीव अनेक दुःख पाता तथा दूसरी योनि में प्रवेश करता है ॥ ७२ ॥
तत्र यद्वान्यवास्तोयं प्रयच्छन्ति तिलैः सह । यच्च पिण्डं प्रयच्छन्ति नीयमानस्तदश्नुते ||७३
उस समय उसके जो भाई बन्धु तिलों के साथ जल दान करते हैं और पिंड देते हैं वह उसको प्राप्त होता है ||७३ ||
लाभ्यङ्गो वान्धवानामङ्गसंवाहनञ्च यत् । तेन चाप्याय्यते जन्तुर्यच्चाश्नन्ति स वान्धवाः ॥७४॥
और भी वान्धव जो तेल लगाते हैं और स्नान कराते हैं और जो खाते हैं वह सब उसको प्राप्त होता है और इससे उसको श्रानन्द मिलता है ॥ ७४ ॥
भूमौ स्वपदिभर्नात्यन्तं क्लेशमाप्नोति वान्धवैः । दानं ददद्विभव तथा जन्तुराप्याय्यते मृतः ॥७५॥
भाई बन्धु भूमि पर सोकर जो तकलीफ उठाते हैं तथा दानादिक करते हैं उससे उस मृतक प्राणी को आनन्द मिलता है ॥ ७५ ॥
तीयमानः स्वकं गेहं द्वादशाहं स पश्यति । उपभुङ्क्ते तथा दत्तं तोयपिण्डादिकं भुवि ॥७६॥ यमदूत के साथ जाता हुआ वह वारह दिन तक अपने घर को देखता है और उसके निमित्त दिये हुए पिण्ड और जल को भक्षण करता है ॥ ७६ ॥
द्वादशाहात् परं घोरमायसं भीषणाकृतिम् । म्यं पश्यत्यथो जन्तुः कृष्यमाणः पुरं ततः॥७७॥ बारह दिन के बाद वह घोर और भयानक प्राकृतिवाला यमदूत उस नीचे सुख किये हुए प्राणी को यमपुरी को ले जाता है ॥ ७७ ॥
मित्रोऽतिरक्ताक्षं भिन्नाञ्जनचयप्रभम् । मृत्यु कालान्तकादीनां मध्ये पश्यति वै यमम्॥७८॥
क्षणमात्र में वह यमराज को देखता है जिसकी लाल-लाल आँखें हैं, जिसकी कान्ति काजल के ढेर के समान है, और वैठा हुआ है ॥ ७८ ॥
इंष्ट्राकरालवदनं भ्रकुटीदारुणाकृतिम् । विरूपैभाषणैर्वक्रदृतं व्याधिशतैः प्रभुम् ॥७६॥
जिसका मुख दाँतोंके कारण कराल है और जिसकी भोहें भयानक हैं और जो विरूप, भीषण, वक्र तथा अनेक व्याधियों से चारों ,ओर से घिरा हुआ बैठा है ॥ ७६ ॥
जो काल, मृत्यु और अन्तक आदिकों के बीच में
दण्डासक्तं महावाहुं पाशहस्तं सुभैरवम् । तन्निर्दिष्टां ततो याति गतिं जन्तुः शुभाशुभाम् ॥८०॥
और जिसके हाथ में दण्ड है, जिसकी भुजायें बड़ी बड़ी हैं, जिसके हाथ में पाश है और जो भयानक है ऐसे यमराज के आदेशानुसार वह जीव शुभ और अशुभ गति को प्राप्त होता है ॥ ८० ॥ रौरवे कूटसाक्षी तु याति यचानृतो नरः । तस्य स्वरूपं गढ़तो रौरवस्य निशामय ||८१
जो मनुष्य झूठी गवाही देता है या मिथ्या भाषण करता उसको रौरव नरक प्राप्त होता है, अव उस रौरव नरक का हाल सुनिये ॥ ८१ ॥ योजनानां सहस्र े द्वे रौरवौ हि प्रमाणतः । जानुमात्रममा रणश्च ततः श्वभ्रः सुदुस्तरः ||८२|||
रौरव नरक का विस्तार दो सहस्त्र योजन है और जाँघ तक उस की ज़मीन गहरी है ॥ ८२ ॥ त्राङ्गारयोपेतं कृतञ्च कृतञ्च धरणीसमम् | नाज्वल्यमानस्तीव्रं रेण तापिताङ्गारभूमिणा ||८३
वह पृथ्वी अङ्गारों से भरी हुई है और तीव्ररूप से तप्त हुई जलती रहती है
मध्ये पापकर्माणं विमुञ्चन्ति यमानुगाः ।
दह्यमानस्तीरेण वह्निना तत्र धावति ॥ ८४।।
यमदूत लोग पापी को उस रौरव के बीच में डाल देते हैं और वह पापी तीव्र अग्नि से!
जलता हुआ इधर उधर दौड़ता है || ८४॥
दे पदे च पादोऽस्य शीर्य्यते जीर्य्यते पुनः ।
प्रहोरात्रेणोद्धरणं पादन्यासच गच्छति ॥८५॥ हवं सहस्रमुत्तीर्णो योजनानां विमुच्यते । तोऽन्यं पापशुद्धयर्थं तादृङ्गनिरयमृच्छति ॥ ८६ ॥
पदपद पर उसका पाँव गल गलकर गिरता है तथा दिन रात सइसी प्रकार गल गल कर वह फिर ठीक हो जाताहै | इसीप्रकार सहस्रों योजन वह फिरता रहताहै, इसके बाद यमदूत उसे पाप शुद्धि के निमित्त नरक का भोग कराने के वास्ते ले जाते हैं ॥ ८६ ॥
ततः सर्व्वेषु निस्तीर्णः पापी तिर्य्यक्त्वमश्नुते । कृमि-कीट-पतङ्गषु श्वापदे मशकादिषु ॥ ८७
इसके बाद सब नरकों से निकल कर वह पापी पक्षियों, कृमि, कीट, पतङ्ग, कुत्ता और मच्छरों की योनि में जाता है || ८७ ॥ गत्वा गजदुमाद्येषु गोष्वश्वेषु तथैव च । अन्यासु चैव पापासु दुःखदासु च योनिषु ॥ ८८
और हाथी, वृक्ष, गाय और घोडे इत्यादि तथा अन्य पापयुक्त दुःखद योनियों में जाता है |
मनुषं प्राप्य कुब्जो वा कुत्सितो वामनोऽपिवा । चण्डालपुक्कसाद्यासु नरो योनिषु जायते ८६ ॥
फिर मनुष्य योनि में प्राप्त होकर कुरूप, कुवड़ा, चाण्डाल, डोम आदि गर्हित योनियों में जन्म पाता है ॥ ८ ॥ अवशिष्टेन पापेन पुण्येन च समन्वितः । ततश्वारोहणीं जातिं शूद्र-वैश्य नृपादिकाम् ॥ ६०
पाप का तय हो जाने पर तथा पुण्य के उदय होने पर वह क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि योनियों में जन्म लेता है ६० ॥ विमदेवेन्द्रतांचापि कदाचिदवरोहणीम् । एवन्तु पापकर्माणो नरकेषु पतन्त्यधः ॥ ६१ ॥
इसके बाद कभी ब्राह्मण और देवता के घर में जन्म लेता है । यह वृत्तान्त उन पापियों का है जो नरकों में गिरते हैं ॥ ६१ यथा पुण्यकृतो यान्ति तन्मे निगदतः शृणु । ते यमेन विनिर्दिष्टां यान्ति पुण्यां गतिं नराः॥ ६२
जिस प्रकार पुराय आत्मा लोग यमपुरी को जाकर धर्मराज की श्राज्ञा से पुण्य गति को प्राप्त होते हैं वह सुनो ॥ ६२ ॥ प्रगीतगन्धर्व्वगणाः प्रवृत्ताप्सरसांगणाः । हारनूपुरमाधुर्य्य-शोभितान्युत्तमानि च ॥ ६३ ॥
गन्धव के गायन से युक्त, अप्सराओं के नृत्य से पूर्णं, तथा हार, नूपुर के माधुर्य की शोभा से युक्त ॥ ६३ ॥ मयान्त्याशु विमानानि नानादिव्यस्रगुज्ज्वलाः । तस्माच्च प्रच्युता राज्ञामन्येषांच महात्मनाम् ||१४||
विमानों पर बैठकर धर्मात्मा लोग दिव्य मालाओं से भूषित होकर स्वर्ग को जाते हैं, फिर वहाँ से पृथ्वी पर आकर राजाओं या अन्य महा-त्मानों के ॥ ६४ ॥ जायन्ते च कुले तत्र सदवृत्तपरिपालकाः ।
भोगान् सम्प्राप्नुवन्त्युग्रांस्ततो यान्त्यूर्ध्वमन्यथा ॥ कुल में उत्पन्न होकर सद्वृत्ति के पालक होते हैं और अच्छे अच्छे भोग भोग कर पुनः स्वर्ग को जाते हैं ॥ ६५ ॥
अवरोहणींच सम्माप्य पूर्व्ववद्वयान्ति मानवाः । एतत् ते सर्व्वमाख्यातं यथा जन्तुर्विपद्यते ।
अतः शृणुष्व विप्रर्षे यथा गर्भ प्रपद्यते ॥ ६६ ॥ |
इस प्रकार वे जीव पृथ्वी पर आते हैं और फिर स्वर्ग को जाते है । हे पिता ! मैंने यह सब वृत्तान्त आप से कहा कि जिस तरह जीव को सुख और दुःख होता है व जिस प्रकार जीव गर्भ में प्राप्त होता है वह वृत्तान्त सुनिये ॥ ६६ ॥ इति श्रीमार्कण्डेय पुराण में पिता-पुत्र सम्वाद (१) नामक दसवां अध्याय समाप्त |
Summary of chapter 10 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
The dialogue between a wise father and his enlightened son Jaḍa unveils the intricate process of human birth, embryology, and physical existence. The son describes how the subtle jīva enters the womb through the father's seed, develops month by month through the mother's nourishment, and endures immense confinement within the maternal womb. Remembering all past births while in the womb, the soul vows to practice devotion and righteousness, yet upon facing the agony of physical birth, the illusory power of māyā causes the newborn to forget its divine origin.