मार्कण्डेय महा पुराण
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जड़ उवाच प्राग्वभूव महावीर्य्यः शत्रुजिन्नाम पार्थिवः । तुतीष यस्य यज्ञेषु सोमावाप्त्या पुरन्दरः ॥ १
सुमति ( जड़-पुत्र ) बोले- हे पिता ! प्राचीन काल में एक महा बलवान राजा शत्रुजित् नाम का था कि जिसके यज्ञों में स्वयं इन्द्र ने सोमरस पान किया था ॥ १ ॥ तस्यात्मजो महावीय्यों वभूवारिविदारणः । बुद्धि-विक्रम - लावण्यैर्गुरुशक्राश्विभिः समः ॥ २
उसका पुत्र चढ़ा चलवान और शत्रुओं का मर्दन करने वाला था । वुद्धि, विक्रम और सौन्दर्य में वह क्रमशः बृहस्पति, इन्द्र और अश्विनी कुमार के समान था ॥ २ ॥ स समानवयो- बुद्धि-सत्त्व-विक्रम चेष्टितैः ।
नृपपुत्रो नृपसुतैर्नित्यमास्ते समाहृतः ॥ ३ ॥ वह राजपुत्र नित्य ही समान श्रवस्था, बुद्धि और विक्रम वाले राजकुमारों से घिरा रहता था। कदाचिच्छास्त्रसम्भार- विवेककृतनिश्चयः कंदाचित् काव्यसंलाप - गीत - नाटकसम्भवैः ॥ ४ ॥
वे लोग कभी शास्त्र के विचार में, कभी काव्यं चर्चा में, कभी गाने-बजाने और खेल तमाशे में समय व्यतीत करते थे ॥ ४ ॥ तथैवाक्षविनोदैश्व शस्त्रास्त्रविनयेषु च । योग्यानियुद्धनागाश्व स्यन्दनाभ्यास तत्परः ॥ ५
तथा वे लोग कभी चौपड़, कभी हथियारों की मश्क, कभी हाथियों की लड़ाई तथा कभी रथों के अभ्यास में तत्पर रहा करते थे ॥ ५ ॥ रेमे नरेन्द्रपुत्रोऽसौ नरेन्द्रतनयैः सह । यथैव हि दिवा तद्वद्रात्रावपि मुदा युतः ॥
वह राजकुमार राजाओं के लड़कों के साथ जिस प्रकार दिन में उसीप्रकार रात्रि में आनन्द पूर्वक समय व्यतीत करता था ॥ ६ ॥ तेषान्तु क्रीड़तां तत्र द्विज-भूप - विशां सुताः । समानवयसः प्रीत्या रन्तुमायान्त्यनेकशः ॥ ७ ॥
उन क्रीड़ा करने वालों में वहाँ और भी ब्राह्मणों, राजाओं और वैश्यों के समान अवस्था वाले लड़के प्रीतिपूर्वक श्राते थे ॥ ७ ॥
कस्यचित्त्वथ कालस्य नागलोकान्महीतलम् । कुमारावागतौ नागौ पुत्रावश्वतरस्य तु ॥ ८
कुंछ समय व्यतीत होने पर पाताल लोक से अश्वतर नामक नाग के दो पुत्र नागकुमार पृथ्वी तल परश्रये ॥॥
ब्रह्मरूपप्रतिच्छन्नौ तरुणौ प्रियदर्शनौ । तौ तैनृपसुतैः सार्द्धं तथैवान्यैर्द्विजन्माभिः ॥ ६
वे दोनों ब्राह्मण के से रूप वाले, तरुण और देखने में सुन्दर नागकुमार राजकुमारों तथा अन्य द्विजा- तियों के पुत्रों के साथ सम्मिलित होगये ॥ ६ ॥ विनोदैर्विविधैस्तत्र तस्थतुः प्रीतिसंयुतौ । सर्व्वे च ते नृपसुतास्ते च ब्रह्मविशां सुताः ॥१०॥
वहाँ पर इस प्रकार सव राजकुमार तथा उनके साथी ब्राह्मणों और वैश्यों आदि के पुत्र प्रीति पूर्वक नाना प्रकार के विनोदों में रत रहते थे ॥ १० ॥ नागराजात्मजौ तौ च स्नानसंवाहनादिकम् ।
वस्त्रगन्धानुसंयुक्तां चक्रुर्भागभुजिक्रियाम् ॥ ११
वे दोनों नागकुमार भी स्नान, वाहन, वस्त्र, सुगन्ध किया तथा भोजन श्रादि एक साथ उनके सहित करते थे || ११|| अहन्यहन्यनुप्राप्ते तौ च नागकुमारकौ । ( श्राजग्मतुर्मुदा युक्तौ भीत्या सुनोर्महीपतेः ॥१२॥
दिनप्रति दिन वे नागकुमार प्रीतिपूर्वक श्रानन्द से उस राजकुमार के पास आते थे॥ १२ ॥ स च ताभ्यां नृपसुतः परं निर्धारणमाप्तवान् । विनोदैर्विविधैर्हास्य-संलापादिभिरेव च ॥ १३
विनोद, हास्य और विविध वार्तालाप होते होते एक दिन राजकुमार का उन नागपुत्रों से वियोग होगया ||१३|| विना ताभ्यां न बुभुजे न सस्नौ न पपौ मधु । न रराम न जग्राह शास्त्राएयात्मगुणद्धये ॥१४॥
परन्तु उसने उन दोनों के बिना न खाया, न पिया और न स्नान किया । तथा न घूमे और न अपनी उन्नति के निमित्त शास्त्रों की चर्चा ही की ||१४|| रसातले च तौ रात्रिं विना तेन महात्मना । निश्वासपरमौ नीत्वा जग्मतुस्तं दिने दिने ॥१५॥ पाताल में भी वे दोनों नागपुत्र उसके विना दिन रात ठरांडी श्वास लिया करते थे ॥ १५ ॥ अथ कालेन महता पिता पुत्रावपृच्छत । मर्त्यलोके परा प्रीतिर्भवतोः केन पुत्रकौ ॥१६॥
कुछ समय व्यतीत होने पर पिता ने अपने दोनों पुत्रों से पूछा, " हे पुत्रो ! तुम्हारी मर्त्यलोक में ऐसी प्रीति किस प्रकार हुई ॥ १६ ॥ दृष्टौ न चापि पाताले बहूनिदिवसानि मे । दिवा रजन्यामेवोभौ पश्यामि प्रियदर्शनी || १७ | |
मैं पाताल में बहुत दिन से देखता हूँ कि तुम लोग दिन रात मर्त्य लोक का ही ख्याल रखते हो ” ॥१७॥ जड़ उवाच इति पित्रा स्वयं पृष्टौ प्रणिपत्य कृताञ्जली । प्रत्यूचतुर्महाभागाबुरगाधिपतेः सुतौ ॥ १८ ॥
सुमति वोले- इस प्रकार पिता के पूछने पर वे दोनों महा भाग नागराज से इस प्रकार वोले ॥ १८ ॥ पुत्रावूचतुः पुत्रः शत्रुजितंस्तांत नाम्ना ख्यात ऋतध्वजः । रूपवानार्ज्जवोपेतः शूरो मानी प्रियंवदः ॥ १६ ॥
पुत्र चोला-- हे पिताजी ! शत्रुजित नाम के राजा का पुत्र ऋतध्वजं रूपवान, गुणवान् वीर, प्रतिष्ठायुक्त तथा मधुरभाषी है ॥ १६ ॥ श्रनापृष्टको वाग्मी विद्वान् मैत्रो गुणाकरः । मान्यमानयिता धीमान् हीमान् विनयभूषणः ||२०||
वह बिना पूछी बात का बनाने वाला, विद्वान, मित्रतायुक्त गुणवान्, ग्रहङ्कार रहित, दूसरों का मान करने वाला, विद्यावान, लज्जावान व विनय भूषण है ॥ २० ॥ तस्योपचारसम्प्रीति सम्भोगापहृतं मनः । नागलोके भुवो लोके न रतिं विन्दते पितः ॥ २१ ॥
उसके व्यव हार, प्रेम और उसके साथ विहार करने से हमारा मन उसमें अटक रहा है तथा हे पिता ! हम लोगों को विना उसके नागलोक और भूलोक अच्छा नहीं लगता है ॥ २१ ॥ तद्वियोगेन नस्तात निशा पातालशीतला । परितापाय तत्सङ्गादाह्लादाय रविर्दिवा ||२२|| हे तात! उसके विना हमको पाताल शीतल नहीं लगता और उसके सह में हमको इतनी प्रसन्नता होती है जितनी दिन को सूर्य से ॥ २२ ॥ पितोवाच पुत्रः पुण्यवतो धन्यः स यस्यैवं भवद्विधैः ।
परोक्षस्यापि गुणिभिः क्रियते गुणकीर्त्तनम् ||२३||
पिता बोले-
वह राजपुत्र धन्य है कि जिसका गुण कीर्तन आप लोग परोक्ष में भी कर रहे हैं ॥२३॥ सन्ति शास्त्रविदोऽशीलाः सन्ति मूर्खाः सुशीलिनः ।
शास्त्रशीलसमं मन्ये पुत्रौ धन्यतरन्तु तम् ||२४||
हे पुत्रो !मूर्ख अच्छा है, क्योंकि शास्त्र और शीलको मैं समान जो शास्त्र को जानकर निःशील हो उससे सुशील। मानता हूँ ||२४||
यस्य मित्रगुणान् मित्राण्यमित्राश्च पराक्रमम् ।
कथयन्ति सदा सत्सु पुत्रवांस्तेन वै पिता ||२५|| वही पिता पुत्रवान है कि जिसका पुत्र अपने मित्र के गुणों और पराक्रम की यथार्थ प्रशंसा करता है ॥ २५ ॥
तस्योपकारिणः कच्चिद्भवद्भ्यामभिवाञ्छितम् ।
किश्चिन्निष्पादितं वत्सौ परितोषाय चेतसः ||२६||
यदि उसके उपकार करने की तुम्हारी इच्छा है तो वह कार्य करो जिससे तुम्हारे और उसके मन को संतोष हो ||२६||
स धन्यो जीवितं तस्य तस्य जन्म सुजन्मनः । यस्यार्थिनो न विमुखा मित्रार्थो न च दुर्व्वलः २७॥
उसी का जीवन धन्य है और उसी का जीवन सुफल है जिसके यहाँ याचक विमुख नहीं जाते और जो मित्र के लिए दुर्वल न हो ||२७|| मदगृहे यत् सुवर्णादि रत्नं वाहनमासनम् । यच्चान्यत् प्रीतये तस्य तद्देयमविशङ्कया ॥२८॥
इसलिये हे पुत्रों ! !मेरे घर में जो कुछ सुवर्ण, रत्न, वाहन, आसन आदि अथवा और भी जो कुछ है वह तुम निःशङ्ग होकर प्रीति पूर्वक उसे दो ॥ २८ ॥ धिक् तस्य जीवितं पुंसो मित्राणामुपकारिणाम् । प्रतिरूपमकुर्व्वन् यो .. जीवामीत्यवगच्छति ||२६|| उसके जीवन को धिक्कार है जो अपने मित्र के उपकारी को दान देने में बाधा उपस्थित करता है ॥ २६ ॥
उपकार सुहृद्वर्गे योऽपकारश्च शत्रुषु ।
नृमेघो वर्षति प्राज्ञस्तस्येच्छन्ति सदोन्नतिम् ॥ ३०
जो लोग मित्रों का उपकार करते हैं तथा शत्रुओं का भी अपकार न कर उपकार करते हैं वे बादलों की तरह हैं जो हर जगह बरसते हैं तथा वे सदा उन्नतिशील होते हैं ॥ ३० ॥ पुत्रावूचतुः किं तस्य कृतकृत्यस्य कर्त्तुं शक्येत केनचित् । यस्य सर्व्वार्थिनो गेहे सर्व्वकामैः सदार्चिताः ॥ ३१ ॥
पुत्र बोले- हे पिता ! उन कृतार्थी का कोई क्या उपकार कर सकता है कि जिनके घर सम्पूर्ण अर्थी लोग सदैव सव कामनाओं को प्राप्त होते हैं ॥ ३१ ॥ यानि रत्नानि तद्गेहे पाताले तानि नः कुतः । वाहनासनयानानि भूषणान्यम्वराणि च ॥३२॥
जो रत्न, वाहन, आसन, यान, भूषण वस्त्र उनके घर हैं, वे पाताल में कहीं नहीं हैं ॥ ३२ ॥ विज्ञानं तत्र यच्चास्ति तदन्यत्र न विद्यते । प्राज्ञानामप्यसौ तात सर्व्वसन्देहहृत्तमः ॥ ३३ ॥
और विज्ञान जो उनके यहाँ है वह कहीं दूसरी जगह नहीं है । हे पिता ! वे तो पण्डितों के संदेहों को भी दूर करते हैं ||३३|| एकं तस्यास्ति कर्त्तव्यमसाध्यं तच्च नौ मतम् । हिरण्यगर्भ - गोविन्द शर्व्वादीनीश्वरादृते ॥३४॥
एक कर्तव्य उनके प्रति अवश्य है परन्तु वह असाध्य है ऐसा हमारा - मत है ! भगवान् गोविन्दकी कृपाके बिना वह पूरा होना कठिन है ॥ पितोवाच तथापि श्रोतुमिच्छामि तस्य यत् कार्य्यमुत्तमम् । असाध्यमथवा साध्यं किं वासाध्यं विपश्चिताम् ३५॥
पिता बोले- तो भी मैं उस उत्तम कार्यके सुनने की इच्छा करता हूँ | चाहे वह साध्य हो, या श्रसाध्य हो अथवा कष्ट साध्य हों ॥ ३५ ॥ देवत्वममरेशत्वं तत्पूज्यत्वञ्च मानवाः । प्रयान्ति चाञ्छितं वान्यद्वदृढ़ ये व्यवसायिनः ॥ ३६ ॥
जो लोग इढ़-कर्म होते हैं वे मनवांछित फल पाकर देवत्व और इन्द्रत्व को प्राप्त होकर पूजित होते हैं ॥ ३६ ॥ ' नाविज्ञातं न चागम्यं नाप्राप्यं दिवि चेह वा उद्यतानां मनुष्याणां यतचित्तेन्द्रियात्मनाम् ||३७||
उद्यमी और जितेन्द्रिय लोगों को उद्योग के आगे स्वर्ग और पाताल कुछ भी नहीं है ॥ ३७ ॥ योजनानां सहस्राणि व्रजन् याति पिपीलिकः । गच्छन् वैनतेयोऽपि पादमेकं न गच्छति ॥ ३८ ॥
जातीहुई चींटी भी सहस्रों योजन जा सकती है और न जाते हुए गरुड़जी एक पग भी नहीं चल सकते ॥ प्रयुक्तानां मनुष्याणां गम्यागम्यं न विद्यते । भूतलं क्व च धौवं स्थानं यत् प्राप्तवान् ध्रुवः । उत्तानपादनृपतेः पुत्रः सन् भूमिगोचरः ||३६||
प्रयुक्त मनुष्यों के लिये गस्य श्रगस्य कुछ नहीं है, कहाँ पृथ्वी और कहाँ वैकुण्ठ, जिसे उत्तानपाद राजा के पुत्र ध्रुव ने पाया है ॥ ३६॥ तत् कथ्यतां महाभाग कार्य्यवान् येन पुत्रकौ । स भूपालसुतः साधुर्येनानृएयं भवेत वाम् ||४०|| ये हे पुत्रो ! बताओ वह कार्य कौनसा है जिससे वह राजकुमार तुम्हारा ऋणी होजाय ||४०|| पुत्रावृततुः
तेनाख्यातमिदं तात पूर्व्वदृत्तं महात्मना । कौमारके यथा तस्य दृत्तं सद्वृत्तशालिनः ॥ ४१ ॥
पुत्र बोले- हे तात ! उस महात्मा सद्वृत्तशाली राज-कुमार की कुमारावस्था का एक वृत्तांत सुनिये || तन्तु शत्रुजितं तात पूर्व्वं कश्चिद्विजोत्तमः । गालवोऽभ्यागमद्धीमान् गृहीत्वा तुरगोत्तमम् ॥४२॥
हे तात ! उस शत्रुजित राजा के पास कोई श्रेष्ठ ब्राह्मण जिनका नाम गालव था, एक उत्तम घोड़ा लिये हुए आये ॥ ४२॥
प्रत्युवाच च राजानं समुपेत्याश्रमं मम ।
कोऽपि दैत्याधमो राजन् विध्वंसयति पापकृत् ||४३||
और उन्होंने राजा से कहा, "हे राजन् ! मेरे श्राश्रम पर एक अधम पापी दैत्य आकर उपाधि करता है. ॥ ४३ ॥
तत्तद्रूपं समास्थाय सिंहेभ वनचारिणाम् ।
अन्येषाञ्चाल्पकायानामहर्निशमकारणात् ॥४४॥
वह सिंह, हाथी तथा अन्य छोटे पशु व जङ्गली जानवरों का रूप धारण कर दिन रात अकारण ही ॥ ४४ ॥
समा-समाधिध्यानयुक्तस्य मौनव्रतरतस्य च ।
तथा करोति विघ्नानि यथा चलित मे मनः || ४५ |।
विस्थ, ध्यानयुक्त अथवा मौनव्रती लोगों के कार्यचधिस्थ, में विघ्न डालता है जिससे मेरे मनको दुःख होता||४५ ||
दग्धुं कोपाग्निना सद्यः समर्थस्त्वं वयं न तु । दुःखाज्जितस्य तपसो व्ययमिच्छामि पार्थिव ॥ ४६ ॥
यद्यपि मैं शीघ्र ही अपनी क्रोधाग्निसे उस को भस्म कर सकता हूँ तथापि हे राजन् ! मुझे दुःख से अर्जित किये हुए तप को क्षीण करने की इच्छा नहीं है ||४६||
एकदा तु मया राजन्नतिनिव्र्व्विणचेतसा । तत्क्लेशितेन निश्वासो निरीक्ष्यासुरमुज्झितः॥४७॥
हे राजन् ! एक बार मैं प्रति खिन्न चित्त होकर बैठा हुआ यह देखता था कि वह राक्षस किधर से आता है और क्या करता है ॥४७॥ ततोऽम्बरतलात् सद्यः पतितोऽयं तुरङ्गमः । वाक् चाशरीरिणी प्राह नरनाथ शृणुष्व ताम् ॥४८॥
उस समय श्राकाश से यह अश्व उतरा और आकाश- वाणी भी हुई जिसे हे राजन! आप सुनिये ॥ ४८ ॥ अश्रान्तः सकलं भूमेर्वलयं तुरगोत्तमः । समर्थ: क्रान्तुमर्केण तवायं प्रतिपादितः ॥४६॥
यह उत्तम घोड़ा विना परिश्रमके ही समस्त पृथ्वी की परिक्रमा करने को समर्थ है और इसे तुमको सूर्य ने प्रदान किया है ॥ ४६॥ पातालाम्बरतोयेषु न चास्य विहता गतिः । समस्तदिक्षु व्रजतो न भङ्गः पर्व्वतेष्वपि ॥ ५०।।
इसकी गति पाताल,श्राकाश जल आदि में भी नहीं रुकती है और यह सब दिशाओं में जाता हुआ पहाड़ों पर भी नहीं रुकता है ॥ ५० ॥
यतो भूवलयं सर्व्वमश्रान्तोऽयं चरिष्यति । श्रतः कुवलयो नाम्ना ख्यातिं लोके प्रयास्यति ॥ ५१
क्योंकि यह समस्त भूमण्डल पर श्रविश्रान्त होकर भ्रमण करेगा इस कारण यह कुवलयाश्व के नाम से जगत् में विख्यात होगा ।
क्लिश्यत्यहर्निशं पापो यश्च त्वां दानवाधमः । तमप्येनं समारुह्य द्विजश्रेष्ठ हनिष्यति ॥५२॥
हे विप्रवर ! जो नीच दैत्य तुमको दिन रात क्लेशित करता है उसको इस घोड़े पर बैठकर वह मारेगा जो ||१२|| शत्रुजिन्नाम भूपालस्तस्य पुत्र ऋतध्वजः । प्राप्यैतदश्वरत्नञ्च ख्यातिमेतेन यास्यति ॥५३॥
राजा शत्रुजित का पुत्र ऋतध्वज है, वह इस अश्वरत्नको प्राप्त कर ख्याति पावेगा ॥ सोऽहं त्वां समनुप्राप्तस्तपसो विघ्नकारिणम् । तं निवारय भूपाल भागभाङ्नृपतिर्यतः ॥५४॥
इसलिये मैं तुम्हारे पास आया हूँ । हे राजन् ! तुम प्रतापवान् हो, तप में विघ्न के कारण का तुम निवारण करो ॥ ५४ ॥ तदेतदश्वरत्नं ते मया भूप निवेदितम् पुत्रमाज्ञापय तथा यथा धर्मो न लुप्यते ||२५||
इसलिये इस श्रश्वरत्न को मैं तुम्हें देता हूँ । अपने पुत्र को आज्ञा दो जिससे : धर्म की रक्षा हो" ||५||
स तस्य वचनाद्राजा तं वै पुत्रमृतध्वजम् । तमश्वरत्नमारोप्य कृतकौतुकमङ्गलम् ॥ ५६।।
राजा ने उसके यह वचन सुनकर मङ्गल मुहूर्त में ऋतध्वज को अश्व पर सवार कराया ॥ ५६ ॥ श्रमेषयत धर्मात्मा गालवेन समं तदा । स्वमाश्रमपदं सोऽपि तमादाय ययौ मुनिः ॥५७॥ ||
और उसको धर्मात्मा गालव के साथ भेज दिया। वह मुनि भी उसको लेकर अपने आश्रम को श्राये ॥ ५७ ॥ इति श्रीमार्कण्डेय ० में कुवलयाश्व नामका बीसवाँ अध्याय समाप्त |
Summary of chapter 20 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
The heroic history of Prince Kuvalayāshva, also named Ritadhvaja, unfolds as he defends holy hermits from the harassments of demonic forces. Riding his celestial steed Kuvalaya gifted by a divine sage, the prince descended into subterranean realms to combat the demon Pātālaketu. His valiant protection of Vedic sacrifices earned him universal praise and the gratitude of the hermit sages.