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जड़ उवाच प्राग्वभूव महावीर्य्यः शत्रुजिन्नाम पार्थिवः तुतीष यस्य यज्ञेषु सोमावाप्त्या पुरन्दरः

सुमति ( जड़-पुत्र ) बोले- हे पिता ! प्राचीन काल में एक महा बलवान राजा शत्रुजित् नाम का था कि जिसके यज्ञों में स्वयं इन्द्र ने सोमरस पान किया था तस्यात्मजो महावीय्यों वभूवारिविदारणः बुद्धि-विक्रम - लावण्यैर्गुरुशक्राश्विभिः समः

उसका पुत्र चढ़ा चलवान और शत्रुओं का मर्दन करने वाला था वुद्धि, विक्रम और सौन्दर्य में वह क्रमशः बृहस्पति, इन्द्र और अश्विनी कुमार के समान था स समानवयो- बुद्धि-सत्त्व-विक्रम चेष्टितैः

नृपपुत्रो नृपसुतैर्नित्यमास्ते समाहृतः वह राजपुत्र नित्य ही समान श्रवस्था, बुद्धि और विक्रम वाले राजकुमारों से घिरा रहता था। कदाचिच्छास्त्रसम्भार- विवेककृतनिश्चयः कंदाचित् काव्यसंलाप - गीत - नाटकसम्भवैः

वे लोग कभी शास्त्र के विचार में, कभी काव्यं चर्चा में, कभी गाने-बजाने और खेल तमाशे में समय व्यतीत करते थे तथैवाक्षविनोदैश्व शस्त्रास्त्रविनयेषु च योग्यानियुद्धनागाश्व स्यन्दनाभ्यास तत्परः

तथा वे लोग कभी चौपड़, कभी हथियारों की मश्क, कभी हाथियों की लड़ाई तथा कभी रथों के अभ्यास में तत्पर रहा करते थे रेमे नरेन्द्रपुत्रोऽसौ नरेन्द्रतनयैः सह यथैव हि दिवा तद्वद्रात्रावपि मुदा युतः

वह राजकुमार राजाओं के लड़कों के साथ जिस प्रकार दिन में उसीप्रकार रात्रि में आनन्द पूर्वक समय व्यतीत करता था ॥ तेषान्तु क्रीड़तां तत्र द्विज-भूप - विशां सुताः समानवयसः प्रीत्या रन्तुमायान्त्यनेकशः

उन क्रीड़ा करने वालों में वहाँ और भी  ब्राह्मणों, राजाओं और वैश्यों के समान अवस्था वाले लड़के प्रीतिपूर्वक श्राते थे

कस्यचित्त्वथ कालस्य नागलोकान्महीतलम् कुमारावागतौ नागौ पुत्रावश्वतरस्य तु

कुंछ समय व्यतीत होने पर पाताल लोक से अश्वतर नामक नाग के दो पुत्र नागकुमार पृथ्वी तल परश्रये ॥॥

ब्रह्मरूपप्रतिच्छन्नौ तरुणौ प्रियदर्शनौ तौ तैनृपसुतैः सार्द्धं तथैवान्यैर्द्विजन्माभिः

वे दोनों ब्राह्मण के से रूप वाले, तरुण और देखने में सुन्दर नागकुमार राजकुमारों तथा अन्य द्विजा- तियों के पुत्रों के साथ सम्मिलित होगये विनोदैर्विविधैस्तत्र तस्थतुः प्रीतिसंयुतौ सर्व्वे च ते नृपसुतास्ते च ब्रह्मविशां सुताः ॥१०॥

वहाँ पर इस प्रकार सव राजकुमार तथा उनके साथी ब्राह्मणों और वैश्यों आदि के पुत्र प्रीति पूर्वक नाना प्रकार के विनोदों में रत रहते थे १० नागराजात्मजौ तौ च स्नानसंवाहनादिकम्

वस्त्रगन्धानुसंयुक्तां चक्रुर्भागभुजिक्रियाम् ११

वे दोनों नागकुमार भी स्नान, वाहन, वस्त्र, सुगन्ध किया तथा भोजन श्रादि एक साथ उनके सहित करते थे || ११|| अहन्यहन्यनुप्राप्ते तौ च नागकुमारकौ ( श्राजग्मतुर्मुदा युक्तौ भीत्या सुनोर्महीपतेः ॥१२॥

दिनप्रति दिन वे नागकुमार प्रीतिपूर्वक श्रानन्द से उस राजकुमार के पास आते थे॥ १२ स च ताभ्यां नृपसुतः परं निर्धारणमाप्तवान् विनोदैर्विविधैर्हास्य-संलापादिभिरेव च १३

विनोद, हास्य और विविध वार्तालाप होते होते एक दिन राजकुमार का उन नागपुत्रों से वियोग होगया ||१३|| विना ताभ्यां न बुभुजे न सस्नौ न पपौ मधु न रराम न जग्राह शास्त्राएयात्मगुणद्धये ॥१४॥

परन्तु उसने उन दोनों के बिना न खाया, न पिया और न स्नान किया तथा न घूमे और न अपनी उन्नति के निमित्त शास्त्रों की चर्चा ही की ||१४|| रसातले च तौ रात्रिं विना तेन महात्मना निश्वासपरमौ नीत्वा जग्मतुस्तं दिने दिने ॥१५॥ पाताल में भी वे दोनों नागपुत्र उसके विना दिन रात ठरांडी श्वास लिया करते थे १५ अथ कालेन महता पिता पुत्रावपृच्छत मर्त्यलोके परा प्रीतिर्भवतोः केन पुत्रकौ ॥१६॥

कुछ समय व्यतीत होने पर पिता ने अपने दोनों पुत्रों से पूछा, " हे पुत्रो ! तुम्हारी मर्त्यलोक में ऐसी प्रीति किस प्रकार हुई १६ दृष्टौ न चापि पाताले बहूनिदिवसानि मे दिवा रजन्यामेवोभौ पश्यामि प्रियदर्शनी || १७ | |

मैं पाताल में बहुत दिन से देखता हूँ कि तुम लोग दिन रात मर्त्य लोक का ही ख्याल रखते हो ” ॥१७॥ जड़ उवाच इति पित्रा स्वयं पृष्टौ प्रणिपत्य कृताञ्जली प्रत्यूचतुर्महाभागाबुरगाधिपतेः सुतौ १८

सुमति वोले- इस प्रकार पिता के पूछने पर वे दोनों महा भाग नागराज से इस प्रकार वोले १८ पुत्रावूचतुः पुत्रः शत्रुजितंस्तांत नाम्ना ख्यात ऋतध्वजः रूपवानार्ज्जवोपेतः शूरो मानी प्रियंवदः १६

पुत्र चोला-- हे पिताजी ! शत्रुजित नाम के राजा का पुत्र ऋतध्वजं रूपवान, गुणवान् वीर, प्रतिष्ठायुक्त तथा मधुरभाषी है १६ श्रनापृष्टको वाग्मी विद्वान् मैत्रो गुणाकरः मान्यमानयिता धीमान् हीमान् विनयभूषणः ||२०||

वह बिना पूछी बात का बनाने वाला, विद्वान, मित्रतायुक्त गुणवान्, ग्रहङ्कार रहित, दूसरों का मान करने वाला, विद्यावान, लज्जावान व विनय भूषण है २० तस्योपचारसम्प्रीति सम्भोगापहृतं मनः नागलोके भुवो लोके न रतिं विन्दते पितः २१

उसके व्यव हार, प्रेम और उसके साथ विहार करने से हमारा मन उसमें अटक रहा है तथा हे पिता ! हम लोगों को विना उसके नागलोक और भूलोक अच्छा नहीं लगता है २१ तद्वियोगेन नस्तात निशा पातालशीतला परितापाय तत्सङ्गादाह्लादाय रविर्दिवा ||२२|| हे तात! उसके विना हमको पाताल शीतल नहीं लगता और उसके सह में हमको इतनी प्रसन्नता होती है जितनी दिन को सूर्य से २२ पितोवाच पुत्रः पुण्यवतो धन्यः स यस्यैवं भवद्विधैः

परोक्षस्यापि गुणिभिः क्रियते गुणकीर्त्तनम् ||२३||

पिता बोले-

वह राजपुत्र धन्य है कि जिसका गुण कीर्तन आप लोग परोक्ष में भी कर रहे हैं ॥२३॥ सन्ति शास्त्रविदोऽशीलाः सन्ति मूर्खाः सुशीलिनः

शास्त्रशीलसमं मन्ये पुत्रौ धन्यतरन्तु तम् ||२४||

हे पुत्रो !मूर्ख अच्छा है, क्योंकि शास्त्र और शीलको मैं समान जो शास्त्र को जानकर निःशील हो उससे सुशील। मानता हूँ ||२४||

यस्य मित्रगुणान् मित्राण्यमित्राश्च पराक्रमम्

कथयन्ति सदा सत्सु पुत्रवांस्तेन वै पिता ||२५|| वही पिता पुत्रवान है कि जिसका पुत्र अपने मित्र के गुणों और पराक्रम की यथार्थ प्रशंसा करता है २५

तस्योपकारिणः कच्चिद्भवद्भ्यामभिवाञ्छितम्

किश्चिन्निष्पादितं वत्सौ परितोषाय चेतसः ||२६||

यदि उसके उपकार करने की तुम्हारी इच्छा है तो वह कार्य करो जिससे तुम्हारे और उसके मन को संतोष हो ||२६||

स धन्यो जीवितं तस्य तस्य जन्म सुजन्मनः यस्यार्थिनो न विमुखा मित्रार्थो न च दुर्व्वलः २७॥

उसी  का जीवन धन्य है और उसी का जीवन सुफल है जिसके यहाँ याचक विमुख नहीं जाते और जो मित्र के लिए दुर्वल न हो ||२७|| मदगृहे यत् सुवर्णादि रत्नं वाहनमासनम् यच्चान्यत् प्रीतये तस्य तद्देयमविशङ्कया ॥२८॥

इसलिये हे पुत्रों ! !मेरे घर में जो कुछ सुवर्ण, रत्न, वाहन, आसन आदि अथवा और भी जो कुछ है वह तुम निःशङ्ग होकर प्रीति पूर्वक उसे दो २८ धिक् तस्य जीवितं पुंसो मित्राणामुपकारिणाम् प्रतिरूपमकुर्व्वन् यो .. जीवामीत्यवगच्छति ||२६|| उसके जीवन को धिक्कार है जो अपने मित्र के उपकारी को दान देने में बाधा उपस्थित करता है २६

उपकार सुहृद्वर्गे योऽपकारश्च शत्रुषु

नृमेघो वर्षति प्राज्ञस्तस्येच्छन्ति सदोन्नतिम् ३०

जो लोग मित्रों का उपकार करते हैं तथा शत्रुओं का भी अपकार न कर उपकार करते हैं वे बादलों की तरह हैं जो हर जगह बरसते हैं तथा वे सदा उन्नतिशील होते हैं ३० पुत्रावूचतुः किं तस्य कृतकृत्यस्य कर्त्तुं शक्येत केनचित् यस्य सर्व्वार्थिनो गेहे सर्व्वकामैः सदार्चिताः ३१

पुत्र बोले- हे पिता ! उन कृतार्थी का कोई क्या उपकार कर सकता है कि जिनके घर सम्पूर्ण अर्थी लोग सदैव सव कामनाओं को प्राप्त होते हैं ३१ यानि रत्नानि तद्गेहे पाताले तानि नः कुतः वाहनासनयानानि भूषणान्यम्वराणि च ॥३२॥

जो रत्न, वाहन, आसन, यान, भूषण वस्त्र उनके घर हैं, वे पाताल में कहीं नहीं हैं ३२ विज्ञानं तत्र यच्चास्ति तदन्यत्र न विद्यते प्राज्ञानामप्यसौ तात सर्व्वसन्देहहृत्तमः ३३

और विज्ञान जो उनके यहाँ है वह कहीं दूसरी जगह नहीं है । हे पिता ! वे तो पण्डितों के संदेहों को भी दूर करते हैं ||३३|| एकं तस्यास्ति कर्त्तव्यमसाध्यं तच्च नौ मतम् हिरण्यगर्भ - गोविन्द शर्व्वादीनीश्वरादृते ॥३४॥

एक कर्तव्य उनके प्रति अवश्य है परन्तु वह असाध्य है ऐसा हमारा - मत है ! भगवान् गोविन्दकी कृपाके बिना वह पूरा होना कठिन है पितोवाच तथापि श्रोतुमिच्छामि तस्य यत् कार्य्यमुत्तमम् असाध्यमथवा साध्यं किं वासाध्यं विपश्चिताम् ३५॥

पिता बोले- तो भी मैं उस उत्तम कार्यके सुनने की इच्छा करता हूँ | चाहे वह साध्य हो, या श्रसाध्य हो अथवा कष्ट साध्य हों ३५ देवत्वममरेशत्वं तत्पूज्यत्वञ्च मानवाः प्रयान्ति चाञ्छितं वान्यद्वदृढ़ ये व्यवसायिनः ३६

जो लोग इढ़-कर्म होते हैं वे मनवांछित फल पाकर देवत्व और इन्द्रत्व को प्राप्त होकर पूजित होते हैं ३६ ' नाविज्ञातं न चागम्यं नाप्राप्यं दिवि चेह वा उद्यतानां मनुष्याणां यतचित्तेन्द्रियात्मनाम् ||३७||

उद्यमी और जितेन्द्रिय लोगों को उद्योग के आगे स्वर्ग और पाताल कुछ भी नहीं है ३७ योजनानां सहस्राणि व्रजन् याति पिपीलिकः गच्छन् वैनतेयोऽपि पादमेकं न गच्छति ३८

जातीहुई चींटी भी सहस्रों योजन जा सकती है और न जाते हुए गरुड़जी एक पग भी नहीं चल सकते प्रयुक्तानां मनुष्याणां गम्यागम्यं न विद्यते भूतलं क्व च धौवं स्थानं यत् प्राप्तवान् ध्रुवः उत्तानपादनृपतेः पुत्रः सन् भूमिगोचरः ||३६||

प्रयुक्त मनुष्यों के लिये गस्य श्रगस्य कुछ नहीं है, कहाँ पृथ्वी और कहाँ वैकुण्ठ, जिसे उत्तानपाद राजा के पुत्र ध्रुव ने पाया है ३६॥ तत् कथ्यतां महाभाग कार्य्यवान् येन पुत्रकौ स भूपालसुतः साधुर्येनानृएयं भवेत वाम् ||४०|| ये हे पुत्रो ! बताओ वह कार्य कौनसा है जिससे वह राजकुमार तुम्हारा ऋणी होजाय ||४०|| पुत्रावृततुः

तेनाख्यातमिदं तात पूर्व्वदृत्तं महात्मना कौमारके यथा तस्य दृत्तं सद्वृत्तशालिनः ४१

पुत्र बोले- हे तात ! उस महात्मा सद्वृत्तशाली राज-कुमार की कुमारावस्था का एक वृत्तांत सुनिये || तन्तु शत्रुजितं तात पूर्व्वं कश्चिद्विजोत्तमः गालवोऽभ्यागमद्धीमान् गृहीत्वा तुरगोत्तमम् ॥४२॥

हे तात ! उस शत्रुजित राजा के पास कोई श्रेष्ठ ब्राह्मण जिनका नाम गालव था, एक उत्तम घोड़ा लिये हुए आये ४२॥

प्रत्युवाच च राजानं समुपेत्याश्रमं मम

कोऽपि दैत्याधमो राजन् विध्वंसयति पापकृत् ||४३||

 और उन्होंने राजा से कहा, "हे राजन् ! मेरे श्राश्रम पर एक अधम पापी दैत्य आकर उपाधि करता है. ४३

तत्तद्रूपं समास्थाय सिंहेभ वनचारिणाम्

अन्येषाञ्चाल्पकायानामहर्निशमकारणात् ॥४४॥

वह सिंह, हाथी तथा अन्य छोटे पशु व जङ्गली जानवरों का रूप  धारण कर दिन रात अकारण ही ४४

समा-समाधिध्यानयुक्तस्य मौनव्रतरतस्य च

तथा करोति विघ्नानि यथा चलित मे मनः || ४५ |

विस्थ, ध्यानयुक्त अथवा मौनव्रती लोगों के कार्यचधिस्थ, में विघ्न डालता है जिससे मेरे मनको दुःख होता||४५ ||

दग्धुं कोपाग्निना सद्यः समर्थस्त्वं वयं न तु दुःखाज्जितस्य तपसो व्ययमिच्छामि पार्थिव ४६

यद्यपि मैं शीघ्र ही अपनी क्रोधाग्निसे उस को भस्म कर सकता हूँ तथापि हे राजन् ! मुझे दुःख से अर्जित किये हुए तप को क्षीण करने की इच्छा नहीं है ||४६||

एकदा तु मया राजन्नतिनिव्र्व्विणचेतसा तत्क्लेशितेन निश्वासो निरीक्ष्यासुरमुज्झितः॥४७॥

हे राजन् ! एक बार मैं प्रति खिन्न चित्त होकर बैठा हुआ यह देखता था कि वह राक्षस किधर से आता है और क्या करता है ॥४७॥ ततोऽम्बरतलात् सद्यः पतितोऽयं तुरङ्गमः वाक् चाशरीरिणी प्राह नरनाथ शृणुष्व ताम् ॥४८॥

उस समय श्राकाश से यह अश्व उतरा और आकाश- वाणी भी हुई जिसे हे राजन! आप सुनिये ४८ अश्रान्तः सकलं भूमेर्वलयं तुरगोत्तमः समर्थ: क्रान्तुमर्केण तवायं प्रतिपादितः ॥४६॥

यह उत्तम घोड़ा विना परिश्रमके ही समस्त पृथ्वी की परिक्रमा करने को समर्थ है और इसे तुमको सूर्य ने प्रदान किया है ४६॥ पातालाम्बरतोयेषु न चास्य विहता गतिः समस्तदिक्षु व्रजतो न भङ्गः पर्व्वतेष्वपि ५०।।

इसकी गति पाताल,श्राकाश जल आदि में भी नहीं रुकती है और यह  सब दिशाओं में जाता हुआ पहाड़ों पर भी नहीं रुकता है ५०

यतो भूवलयं सर्व्वमश्रान्तोऽयं चरिष्यति श्रतः कुवलयो नाम्ना ख्यातिं लोके प्रयास्यति ५१

क्योंकि यह समस्त भूमण्डल पर श्रविश्रान्त होकर भ्रमण करेगा इस कारण यह कुवलयाश्व के नाम से जगत् में विख्यात होगा

क्लिश्यत्यहर्निशं पापो यश्च त्वां दानवाधमः तमप्येनं समारुह्य द्विजश्रेष्ठ हनिष्यति ॥५२॥

हे विप्रवर ! जो नीच दैत्य तुमको दिन रात क्लेशित करता है उसको इस घोड़े पर बैठकर वह मारेगा जो ||१२|| शत्रुजिन्नाम भूपालस्तस्य पुत्र ऋतध्वजः प्राप्यैतदश्वरत्नञ्च ख्यातिमेतेन यास्यति ॥५३॥

राजा शत्रुजित का पुत्र ऋतध्वज है, वह इस अश्वरत्नको प्राप्त कर ख्याति पावेगा सोऽहं त्वां समनुप्राप्तस्तपसो विघ्नकारिणम् तं निवारय भूपाल भागभाङ्नृपतिर्यतः ॥५४॥

इसलिये मैं तुम्हारे पास आया हूँ हे राजन् ! तुम प्रतापवान् हो, तप में विघ्न के कारण का तुम निवारण करो ५४ तदेतदश्वरत्नं ते मया भूप निवेदितम् पुत्रमाज्ञापय तथा यथा धर्मो न लुप्यते ||२५||

इसलिये इस श्रश्वरत्न को मैं तुम्हें देता हूँ अपने पुत्र को आज्ञा दो जिससे : धर्म की रक्षा हो" ||५||

स तस्य वचनाद्राजा तं वै पुत्रमृतध्वजम् तमश्वरत्नमारोप्य कृतकौतुकमङ्गलम् ५६।।

राजा ने उसके यह वचन सुनकर मङ्गल मुहूर्त में ऋतध्वज को अश्व पर सवार कराया ५६ श्रमेषयत धर्मात्मा गालवेन समं तदा स्वमाश्रमपदं सोऽपि तमादाय ययौ मुनिः ॥५७॥ ||

और उसको धर्मात्मा गालव के साथ भेज दिया। वह मुनि भी उसको लेकर अपने आश्रम को श्राये ५७ इति श्रीमार्कण्डेय ० में कुवलयाश्व नामका बीसवाँ अध्याय समाप्त |