मार्कण्डेय महा पुराण
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मार्कण्डेय उवाच एवन्तुभारतंवर्षंयथावत्कथितंमुने। कृतंत्रेताद्वापरञ्चतथातिष्यंचतुर्युगम्॥१
मार्कण्डेयजी बोले-
हे मुनिवर ! मैंने श्रापसे भारतवर्ष का यथा- वत वर्णन किया तथा त्रेता, द्वापर आदि चारोंयुगों को भी बताया ||१||
अत्रैवैतद्युगानान्तुचातुर्व्वणयोऽत्रवैद्विज। चत्वारित्रीणिद्वेचैवतथैकंचशरच्छतम्॥२
हे द्विज ! इन चारों युग में चारों वर्णों के मनुष्यों की श्रायु क्रमशः चारसो, तीनसौ, दोसी और सौ वर्ष है ॥ २ ॥
जीवन्त्यत्रंनराब्रह्मन्कृतत्रेतादिकेक्रमात्। देवकूटस्यपूर्व्वस्यशैलेन्द्रस्यमहात्मनः॥३
हे ब्रह्मन् ! सतयुग, त्रेता यदि युगों में इस क्रम से लोग जीवित रहते हैं । शैलराज देवकूट के पूर्व में ॥ ३॥
पूर्वेणयत्स्थितंवर्षंभद्राश्वतन्निबोधमे। श्वेतपर्णश्चनीलचशैवालश्चाचलोत्तमः॥४
जो भद्राश्व वर्ष है उसको मुझसे सुनो। उसमें श्वेतपर्स, नील, पर्वतों में श्रेष्ठ शैवाल ॥ ४ ॥
कौरञ्जःपर्णशालाग्रःपंचैतेतुकुलाचलाः।
तेषांप्रसूतिरन्येयेबहवःक्षुद्रपर्व्वताः॥५॥
कौरञ्जऔर पर्णशालाय यह पाँच कुलपर्वत हैं उनमें सेबहुत से छोटे-छोटे पर्वत निकलते हैं ॥ ५ ॥
तैर्विशिष्टाजनपदानानारूपाःसहस्रशः। ततःकुमुदसङ्काशाःशुद्धसानुसुमङ्गलाः॥६
इनपर्वतों के अतिरिक्त हज़ारों नाना प्रकार के देश उस भद्राश्व वर्ष में हैं तथा कुमुद के समान, शुद्ध और मङ्गल वहाँ के किनारे हैं ॥ ६ ॥
इत्येवमादयोऽन्येऽपिशतशोऽथसहस्रशः। शीताशंखावतीभद्राचक्रावर्त्तादिकास्तथा॥७
ऐसे तथाअन्य सैकड़ों हज़ारों पर्वत वहाँ पर है । शीता, शंखावती, भद्रा और चक्रावर्ता श्रादि ॥ ७ ॥
नद्योऽथवढ्योविस्तीर्णाःशीततोयौधवाहिकाः। अत्रवर्षेनराःशंखशुद्धहेमसमप्रभाः || ८ ||
बड़े विस्तार वाली तथा अगाध शीतल जल वाली नदियाँ हैं । इस वर्ष में मनुष्य शंख और सुन्दर सुवर्ण की तरह कान्तिमान् हैं ॥ ८ ॥
दिव्यसङ्गमिनःपुण्यादशवर्षशतायुषः।। मन्दोत्तमौनतेषुस्तःसर्व्वेतेसमदर्शनाः॥६
उन लोगोंकीदिव्य गति है तथा वे पुण्यात्मा हैं उनकी श्रायु एकसौदस वर्ष की है। उन लोगों में उत्तम और मध्यम कोई नहीं है तथा वे सब समदर्शी हैं ॥ ६ ॥
तितिक्षादिभिरष्टाभिःप्रकृत्यातेगुणैर्युताः। तत्राप्यश्वशिरादेवश्चतुर्बाहुर्जनार्दनः॥१०॥
वे लोग स्वभाव से ही तितिक्षा यदि श्राठों गुणों से युक्त हैं और वहाँ अश्वशिरा, चतुर्भुज भगवानजनार्दन रहते हैं ॥१० ॥
शिरोहृदयमेद्राघ्रि-हस्तैश्चाक्षित्रयान्वितः। तस्याप्यथैवंविषयाविज्ञेयाजगतःप्रभोः॥११
भगवान् श्रश्वशिरा शिरहृदय, लिङ्ग, चरण, हाथ और तीन नेत्रों से युक्त हैं॥ ११ ॥
केतुमालमतोवर्षंनिबोधममपश्चिमम्। विशालःकम्बलःकृष्णोजयन्तोहरिपर्व्वताः॥१२
श्रच पश्चिम में स्थित केतुमाल वर्ष का हाल उस जगत् में उसी प्रभु का विषय जानना चाहिये
सुनो । विशाल, कम्बल, कृष्ण, जयन्त, हरि पर्वत||१२||
विशोकोवर्द्धमानश्चसप्तैतेकुलपर्व्वताः।
अन्ये सहस्रशः शैला येषु लोकगणः स्थितः ||१३||
विशोकऔरबर्द्धमानयहसातवहाँपर कुलपर्वतहैंऔरभीहज़ारोंछोटे-छोटेपर्वतहैं जिनमेंलोगरहतेहैं ||१३||
मौलयस्ते महाकायाः शाकपोतकरम्भकाः ।
अङगुलप्रमुखाश्चापि वसन्ति शतशो जनाः || १४॥
वेविशालशरीरवालेहैंतथाउनकेशिरबड़ेहैं। शाक, पोतक, रम्भक औरअंगुल यादिप्रमुख सहस्रोंमनुष्यवहाँ रहतेहैं॥१४॥
येपिवन्तिमहानद्योरंश्यामांसकम्वलाम्। अमोघांकामिनींश्यामांतथैवान्याःसहस्रशः॥१५॥
यह लोग जिन महानदियों के जल को पीते हैं उनके नाम सुनो। अनु, श्यामा, कम्वला,अमोघा, कामिनी आदि तथा और भी हज़ारोंनदियां वहाँ पर हैं ॥ १५ ॥
अत्राप्यायुःसमंपूर्वैरत्रापिभगवान्हरिः। वराहरूपीपादास्य-हृत्-पृष्ठ-पार्श्वतस्तथा॥१६॥
वहाँ भी आयु एकसौदस वर्ष की होती है तथा यहां वाराहरूपी हरि भगवान् रहते हैं जिनके चरण, हृदय. मुख, पीठऔर पार्श्व हैं ॥ १६ ॥
त्रिनक्षत्रयुतेदेशेनक्षत्राणिशुभानिच। इत्येतत्केतुमालंतेकथितंमुनिसत्तम॥१७॥
यह देश भी तीन नक्षत्रों सेयुक्त है जिनका कि शुभाशुभ फल होता है । हेमुनिवर ! मैंने आपसे इस प्रकार केतुमाल वर्ष कावर्णन किया ॥ १७ ॥
अतःपरंकुरून्वक्ष्येनिबोधेहममोत्तरान्। तत्रवृक्षामधुफलानित्यपुष्पफलोपगाः॥१८
अव उत्तर दिशा की ओर जो कुरु वर्ष है उसको कहता हूँ, सुनो। वहां के वृक्षपुष्प और मीठे फल नित्य देते हैं ॥ १८ ॥
वस्त्राणिचप्रसूयन्तेफलेष्वाभरणानिच। सर्व्वकामप्रदास्तेहिसर्व्वकामफलप्रदाः॥१६||
वहाँ वृक्षोंसे फल रूप में वस्त्र आभूपण उत्पन्न होते हैं । वेवृक्ष सव कामनाओं के देने वाले तथा पूर्ण फलकरने वाले हैं ॥ १६ ॥
भूमिर्मणिमयीवायुःसुगन्धःसर्व्वदासुखः। जायन्तेमानवास्तत्रदेवलोकपरिच्युताः॥२०॥
वहां की पृथ्वी मणिमयी हैंऔर वायु सर्वदा सुखदायक और सुगन्धिमयीवहाँ पर जन्मते हैं ॥ २० ॥
मिथुनानि प्रसूयन्ते समकालस्थितानि वै । अन्योन्यमनुरक्तानिचक्रवाकोपमाणिच ||२१||
वहां स्त्री-पुरुष जोड़े से चलती है । जो लोग देवलोक से च्युत होते हैं वे समान काल और स्थिति में जन्म धारण करते हैंतथा उनमें चकवा चकई की तरह प्रीति स्थिररहती है ||२१||
चतुर्द्दशसहस्राणितेषांसार्द्धानिवैस्थितिः। चन्द्रकान्तश्चशैलेन्द्रःसूर्य्यकान्तस्तथापरः ||२२||
वहाँ लोगों की आयु साढ़े चौदहहज़ार वर्ष की होती है । चन्द्रकान्त पर्वत तथासूर्यकान्त ॥ २२ ॥
तस्मिन्कुलाचलौवर्षेतन्मध्येचमहानदी।।
भद्रसोमामयात्युर्व्वयांपुण्यामलजलौबिनी ||२३||
उस वर्ष में यह दोनों कुल पर्वत हैं, उसके मध्य में महानदी भद्रसोमा जिसकी जल राशि पवित्र और पुण्यवती है ॥ २३ ॥
सहस्रशस्तथैवान्यानद्योवर्षेऽपिचोत्तरे। तथान्याःक्षीरवाहियोघृतवाहिन्यएवच ||२४||
तथाअन्य सहस्रों नदियां बहती हैं और वहाँ क्षीर-वाहिनी तथा घृतवाहिनी नदियां भी हैं ||२४||
दनोहृदास्तदातत्रतथान्येचानुपर्व्वताः। अमृतास्वादकल्पानिफलानिविविधानिच ||२५||
वहांपर अनेक दधि के कुण्ड हैं तथा अनेक रमणीकपर्वत हैं । वहाँ पर अनेक प्रकार के फल हैं
जिनका स्वाद अमृत के समान है || २५ |
वनेषुतेषुवर्षेषुशतशोऽथसहस्रशः। तत्रापिभगवान्विष्णुःप्राकुशिरामत्स्यरूपवान्॥२६॥
उस वर्ष सैकड़ों हज़ारों वन हैं तथा वहाँ भगवान् विष्णु मत्स्य रूप से पूर्व की ओर मुख करके स्थित हैं ।२६॥
विभक्तोनवer for नक्षत्राणांत्रयंत्रयम् | दिशस्तथापि, नवाविभक्तामुनिसत्तम ||२७||
हे कौटकिजी ! उस वर्ष में तीन नक्षत्रोंके नौ विभागहैं । हे मुनिवर ! दिशायें भी वहाँ नौ भागों में चॅटीहुई हैं ॥ २७ ॥
चन्द्रद्वीपःसमुद्रेचभद्रद्वीपस्तथापरः। तत्रापिपुण्योविख्यातःसमुद्रान्तर्महामुने॥२८॥
समुद्र में चन्द्रद्वीप है तथा दूसराभद्रद्वीप अति पवित्र है । हे महामुने ! इसके चारोंश्रोर समुद्र है ॥ २८ ॥
इत्येतत्कथितंब्रह्मन्कुरुवर्षंमयोत्तरम्।
शृणु किम्पुरुषादीनि वर्षाणि गदतो मम ||२६||
हे ब्रह्मन् ! मैंने श्रापसे उत्तर वर्ती कुरु दर्प का वर्णन किया व किम्पुरुष आदि वर्षों का वर्णन करता हूँ, सुनिये ॥ २६ ॥
इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंउत्तरकुरुकथननाम५६वाँअध्यायसमाप्त।
Summary of chapter 59 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
The narrative describes the remaining six ocean-girt continents—Plakshadvīpa, Śālmaladvīpa, Kushadvīpa, Krauñchadvīpa, Śākadvīpa, and Pushkaradvīpa—alongside their mountain ranges, sacred rivers, and righteous inhabitants who live in perpetual health and devotion.