मार्कण्डेय महा पुराण
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मार्कण्डेयउवाच
तस्यपुत्रःखनीनेत्रोमहाबलपराक्रमः। यस्ययज्ञेष्वगायन्तगन्धर्व्वाविस्मयान्विताः॥१॥
मार्कण्डेयजी वोले-
राजा विवंश के पुत्र खनीनेत्र बड़े बली और पराक्रमी हुए । उनके यज्ञों में गन्धवों ने विस्मित
होकर यह गाया ॥ १ ॥
खनीनेत्रसमोनान्योभुवियज्वाभविष्यति। तेनयज्ञायुतेपूर्णेदत्तापृथ्वीससागरा॥२
खनीनेत्र के समान पृथ्वी पर दूसरा यज्ञ करने वाला राजा न होगा जिसने दस हज़ार यज्ञ समाप्त करके समुद्र सहित सम्पूर्ण. पृथ्वी दान कर दी ॥ २ ॥
दत्त्वाचसकलांपृथ्वींब्राह्मणानांमहात्मनाम् तपसाद्रव्यमासाद्यमोचयेत्साधितेनयः॥३
उन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी को महात्मा ब्राह्मणों को दान में देकर तपस्या द्वारा पुनः हव्य प्राप्त कर पृथ्वी को फिर लेलिया ॥ ३ ॥
पतश्चप्राप्यवित्तर्द्धिमतुलांदातुसत्तमात्। जगृहुर्ब्राह्मणाविषनान्यराज्ञःप्रतिग्रहम्॥४
उस धनैश्वर्य को जो कि राजा ने दान में दिया था प्राप्त कर ब्राह्मण लोगों ने भिक्षावृत्ति छोड़दी ॥ ४ ॥
सपष्टिसहस्राणिसप्तषष्टिशतानिसप्तषष्टिशतानिच। सप्तषष्टिश्चयोयज्ञानयजद्भूरिदक्षिणान्॥५॥
महाराज खनीनेत्र ने सड़सठ हज़ार, सड़सठ सौऔर सड़सठ कुल इतने यज्ञ किये औरप्रचुर दक्षिणा दी ॥ ५ ॥
पुत्रःसमहीपालोमृगयामुपचक्रमे। पुत्रार्थंपितृयज्ञायमांसकामोमहामुने॥६
हे महामुनि ! वह पुत्र थे, अतः उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिये करने का विचार किया और यज्ञ के लिये लाने के निमित्त श्राखेट करनेका विचार किया ||६||
अश्वारूढ़ोबिनासैन्यमेकएवमहावने। बद्धगोधाङ्गुलित्राणोवाणखड्गधनुर्द्धरः॥७
घोड़े पर सवार होकर विना ही सेना के कवचं धारण कर और धनुषवाण खड्ग हाथ में लेकर
वे महावन में प्रविष्ट हुए ॥ ७ ॥
तंवाहयन्तंतुरगमन्यतोगहनाद्वनात्। विनिष्कृम्पमृगःप्राहमांहत्वाभिमतंकुरु || ८
जेव कि वे घोड़े दौड़ाते हुए चले जारहे थे उस समय एक दूसरे गहन वन से एक हरिण निकला और उनसे बोला, "मुझे मार कर आप अपना कार्य साधिये । ॥ ८ ॥ राजोवाच
अन्येमृगाःपलायन्तेमहाभीत्याविलोक्यमाम्। कथमात्मप्रदानंत्वंमृत्यवेकर्त्तुमिच्छसि॥६
राजा बोले:-
दूसरे हरिण तो मुझे देखकर डर से भाग जाते हैं । तुम किस कारण मृगया के हेतु श्रात्म
समर्पण कर रहे हो ? ॥६॥ मृगउवाच
अपुत्रोऽहंमहाराजवृथाजन्मप्रयोजनम्। विचारयन्नपश्यामिप्रारणानामिहधारणम्॥१०॥
मृग वोला:-
हे महाराज ! मैं निपुत्री हूँ, इस कारण मेरा जीवन वृथा है, इस संसार में अपने प्राणोंके रखने
की मुझे कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती ॥ १०॥ मार्कण्डेयउवाच
श्रथाभ्येत्यमृगःप्राहतमन्योवसुधाधिपम्। मृगस्यतस्यप्रत्यक्षमलमेतेनपार्थिव॥११॥
मार्कण्डेयजी बोले-
इतने में ही एक दूसरा मृग राजा के पास आकर बोला. “महाराज ! इसको न मारिये " ॥११॥
घातयस्त्रेतिमांमांसैर्ममकर्मसमाचर। यथाकृतार्थतातेस्यान्ममचाप्युपकारितत्॥१२ ॥
मुझे मार कर मेरे माँस से अपना कार्य कीजिये जिससे कि आपके कार्य में सिद्धि हो और मेराभी उपकार हो ॥ १२ ॥
पुत्रार्थंत्वंमहाराजस्वपितॄन्यष्टुमिच्छसि। पुत्रस्यास्यमांसेनलप्स्यसेवाञ्छितंकथम्॥१३
हे महाराज ! आप पुत्रप्राप्ति के लिये अपने पितरों का यज्ञ करना चाहते हैं, ऐसी दशा में इस निपुत्री मृग के मांस से आपका कार्य किस प्रकार सिद्ध होगा ॥ १३ ॥
यादृक्कर्म्मविनिष्पाद्यंतादृग्द्दव्यमुपाहरेत्।
दुर्गन्धैर्नसुगन्धानांगन्धज्ञानविनिर्णयः || १४
जैसा कर्म हो उसके लिये वैसा ही हव्य उपस्थित करना चाहिये । दुर्गन्ध से कभी सुगन्धि की प्राप्ति नहींहो सकती ॥१४॥ राजोवाच
वैराग्यकारणंप्रोक्तमनेनापुत्रतामम। कथ्यतांप्राणसन्त्यागेयत्तेवैराग्यकारणम्॥१५॥
राजा बोले:-
इस मृग ने वैराग्य का कारण मुझे अपुत्रता बताई, अव तुम्हारा प्राण त्यागने में क्या वैराग्य
का हेतु है वह कहो ॥१५॥
मृग उवाच
बहवोमेसुताभूपवढ्योदुहितरस्तथा। यच्चिन्तादुःखदावाग्निज्वालामध्येवसाम्यहम् || १६ | | |
मृग बोला:-
हे राजन् ! मेरे बहुत से पुत्र और पुत्रियाँ हैं,उन्हीं की चिन्ता रूपी अग्नि में मैं जला करता हूँ||१६||
सर्व्वसाध्यानरेन्द्रेयंमृगजातिःसुकातरा। तेष्वपत्येषुमेचातिममत्वंतेनदुःखितः॥१७॥
हे नरेन्द्र ! मृग जाति को सब लोग अपना साधन बना लेते हैं तथा यह अति निर्वल है इस
कारण मुझे अपनी सन्तान का बहुत ख्याल रहता है और इसी से मैं दुःखित हूं ||१७||
मनुष्य-सिंह-शार्दूल-चूकादिभ्योविभेम्यहम्। हीनाद्वयत्सर्व्वसत्त्वेभ्यःश्व-शृगालादपिप्रभो॥।१८
हे प्रभो ! चूंकि हरिण सब जीवों से यहाँ तक कि कुसे और सियार से भी कमज़ोर है मैं मनुष्य, सिंह, चीता, भेड़िया आदि सबसे डरता रहता हूँ ॥ १८ ॥
पोऽहंनिमित्तंबन्धूनामिमांशून्यांवसुन्धराम्। तृ-सिंहादिभयात्सर्व्वामिच्छामिसुभृशंसकृत्॥१६
इसलिये मैं अपने वालवच्चों और भाई बन्धुत्रों के निमित्त यह चाहता हूँ कि ये मनुष्य और सिंह आदि के भय से रहित हों ॥ १६ ॥
गुणान्यन्येऽपिखादन्तिगोऽजावितुरगादिकाः। वांस्तेषांपोषरणायाहमिच्छामिनिधनंगतान्॥२०
जैसे मृग घास खाते हैं उसी तरह, गाय, बकरी, भेड़ और घोड़े भी घास - खाते हैं इसलिये मेरी इच्छा यह रहती है कि मनुष्य इन दूसरों पशुओं को ही मारा करें, मृगोंको नहीं ||२०||
निष्क्रान्तेषुततस्तेषुममापत्येषुवैपृथक्। भवन्तिचिन्ताःशतशोममत्वावृतचेतसः ||२१||
जव मेरे पुत्र, पौत्रादि अलग होकर चरने के लिये निकल जाते हैं उस समय उनकी
रक्षा के विचार से मेरा चित्त बड़ा चिन्तित रहताहै ॥ २१ ॥
किंकूटपाशंकिंवज्रवागुरांकिंसुतोमम। प्राप्तचरन्वनेकिंवानृ-सिंहादिवशंगतः॥२२॥
कहीं मेरे पुत्र किसी व्याध के पाश में न फँस जाँव किसी ऐसे वन में चरते हुए न
चले जाँय जहाँ कि वे मनुष्य या सिंह के वश में हो जाँय यही चिन्ता रहती है ||२२||
प्राप्तोऽयमेकःसम्प्राप्तास्तेऽवस्थांकीदृशींमम। साम्प्रतंविचरन्तोवैयेगताःसुमहावनम्॥२३॥
जिस बन में कि मैं एक हूं वहाँ तो मेरी यह दशा है परन्तु जिस विशाल वन में वे सब होंगे वहाँ क्या दशा होगी ||२३॥
दृष्ट्वाप्राप्तानममाभ्यासमहंतानात्मजान्नृप। ईषदुच्छवसितःक्षेममिच्छामिरजनींपुनः॥२४॥
हे राजन् ! जय मेरे पुत्र सायंकाल को वापिस श्जाते हैं तो मैं कुछ देर सोकर फिर रात्रि में भी
उनकी मङ्गल कामना किया करता हूँ ||२४||
प्रभातेदिवसंक्षेममस्तगेऽर्केनिशामपि। वाञ्छाम्यहंकदाक्षेमंसर्व्वकालंभविष्यति ||२५||
प्रातः,सन्ध्या, दिन, रात्रि प्रत्येक समय मैं यही सोचता रहता हूँ कि उनकी कुशल किस प्रकार रहे || २५ ॥
एतत्तेकथितंभूपममोद्वेगस्यकारणम्। तःप्रसादंकुरुसेवाणोऽयंपात्यतांमयि ||२६||
हे राजन् ! यह मैंने आपसे अपने उद्वेग का कारण कहा, अब आप ऐसी कृपा करें जिससे कि आपका यह वारा मेरे ऊपर गिरे ॥ २६ ॥
इतिदुःखशताविष्टःप्राणानपित्यजामियत्। तत्कारणंनिबोधत्वंब्रुवतोममपार्थिव ||२७||
हे राजन् ! जिस लिये कि मैं दुःखित होकर इन प्राणों को त्यागना चाहता हूँ उसका कारण मुझसे सुनो ॥ २७ ॥
असूर्यानामतेलोकायान्गच्छन्त्यात्मघातकाः। यज्ञोपयुक्ताःपशवःसम्प्रयान्त्युच्छ्रितःप्रभो ||२८|
हे प्रभो ! जो लोग श्रात्मघात करते हैं वे सूर्यानाम लोकों को प्राप्त होते हैं और यज्ञ के उपयोग में आये हुए पशु उत्तम गति को प्राप्त होते हैं ||२८||
अग्निःपशुरभूत्पूर्व्वंपशुरासीज्जलाधिपः। भास्वानथोच्छ्रितीःप्राप्तोयज्ञेनिष्ठामुपागतः॥२६॥
पहिलेश्रग्नि, वरुण और सूर्य पशु थे परन्तु यज्ञ में वधको प्राप्त होकर वे उच्च गति को पहुंचे ||२१||
तन्ममैतांकृपांकृत्वानयमामुच्छितिंनृप। आत्मनचेप्सितंकामंपुत्रलाभादवाप्स्यसि ||३०||
हे राजन् ! इसलिये मेरे ऊपर कृपा करके मुझको वध कीजिये जिससे में उत्तम गति को पहुँचूं और आप पुत्रप्राप्त करें ॥ ३० ॥ पूर्व्वमृगउवाच
राजेन्द्रनैपहन्तव्योधन्योऽयंसुकृतीमृगः। बहवस्तनयायस्यहन्तव्योऽहमसन्ततिः ||३१||
पहिला मृग वोला:---
हे राजेन्द्र ! इस पुण्यवान् मृग को न मारिये, यह धन्य है कि इसके इतने पुत्र हैं। आप तो मुझ
बिना पुत्र के मृग का वध करें ॥३१ ॥
उत्तरमृगउवाच
एकदेहभवंयस्यदुःखंधन्यःसवैभवान्। बहूनि यस्य देहानि तस्य दुःखान्यनेकथा ||३२||
दूसरामृगवोला:- जिसकोएकशरीरकाहीदुःखहैवहधन्यहै | जिसके अनेकों देह हों उसके दुःख भी अनेकोंहैं॥ ३२॥
एकोयदाहमासन्तुप्राक्तदादेहजंमम। दुःखमासीन्ममत्वेतुभार्य्यायास्तदभूद्दद्विधा॥३३॥
शाजब मैं एक था तो मुझे अपने शरीर का ही दुःख था लेकिन जब मेरी स्त्री आई तव वही मेरा
दुःख दुगना होगया ||३३||
यदायातान्यपत्यानितदायावन्तितानिवै। तावच्छरीरभूमीणममदुःखान्यथाभवन् ||३४||
परन्तु जब स्त्रीसे मेरे पुत्र, पुत्रियाँ उत्पन्न हुए तब उसी प्रकार मेरा दुःखबढ़ता गया ॥ ३४ ॥
सकृतार्थोभवान्यस्यनातिदुःखायसम्भवः। इहदुःखायमत्सूतिःपरत्रचविरोधिनी ||३५||
तुम धन्य हो कि तुमको इस संसार में अधिक दुःख नहीं है । मेरा जन्म लेना तो इस लोक और परलोक दोनों में दुखदायी है ॥३५
यतोरंक्षणपोषार्थमपत्यानांकरोमितत्। चिन्तयामिचसम्भूतिस्तेनमेनरकेध्रुवा ||३६||
चूंकि मैं अपनी संतान की रक्षा और पालन आदि की चिन्ता में लगा रहता हूँ इसलिये हरिस्मरण
करने के कारण अवश्य नरकमें जाऊँगा ॥ ३६ ॥ राजोवाच
नवेद्मिकिंसन्ततिमान्धन्योऽपुत्रोऽत्रकिंमृग। पुत्रार्थञ्चायमारम्भोममदोलायतेमनः ||३७||
राजा वोले--
हे मृगो ! मैं नहीं जानता कि तुम दोनों में धन्य कौन है सन्तति वाला या निपुत्री । परन्तु पुत्र प्राप्ति के लिये मृगका वध करने को मेरा चित्तस्थिर नहीं || ३७ ॥
दुःखायसन्ततिःसत्यमैहिकामुष्मिकायतत्। तथाप्यतनयान्यान्तिऋणानीतिश्रुतंमया ||३८||
यह सत्य है कि सन्तति इस लोक और परलोक में दुःख का कारण है । तथापि मैंने सुना है कि निपुत्री लोग ऋणी रहते हैं॥ ३८ ॥
सोऽहंयतिष्येपुत्रार्थमृतेप्राणिवधंमृग। तपसैवमचएडेनयथापूर्व्वमहीपतिः ||३६||
इसलिये मैं ऐसा यज्ञ करूँगा कि पुत्र प्राप्तिके लिये मृग का वध न करके प्रचण्ड तप ही करूँ जैसा कि पूर्वकाल में राजाओं ने किया था ॥ ३६ ॥
इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंखनीनेत्रचरित्रनाम१२०वाँअध्यायसमाप्त।
Summary of chapter 120 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
King Khanīnetra, son of Vivimsha, faces the trial of being childless for a long period. Performing severe penances and the grand Ashvamedha Yajna with unwavering faith, he pleases the devas and receives a heroic son named Karandhama.