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पक्षिणऊचुः समुनिर्मार्कण्डेयोमहातपाः।

क्रौष्टुकिञ्चापि चक्रे माध्याह्निकीः क्रियाः ।१॥

पक्षीबोले- यहसबकहकरमहातपस्वीमुनिमार्कण्डेयजी नेक्रौष्टुकिकोविदाकरअपनीनैमित्तिकमध्याह्नकीक्रिया की ॥१॥

अस्माभिश्चश्रुतंतस्माद्यत्तेमोक्तंमहामुने। अनादिसिद्धमेतद्धिपुराप्रोक्तंस्वयम्भुवा॥२

 हे महामुनि जैमिनिजी ! हमने भी उन्हीं से यह कथा सुनी थी जिसको कि आपसे कह दिया यह कथा अनादि सिद्ध है और सबसेपहिले ब्रह्माजी ने ॥ २ ॥

मार्कण्डेयायमुनयेयदुक्तंकथितंतव। पुण्यंपवित्रमायुष्यंसर्वकामार्थसिद्धिदम् || ३

मुनि मार्कण्डेयजी से कही, जिस पुण्यवती, पवित्र आयु बढ़ाने वाली और सब कामनाओं को सिद्ध करने वाली कथा को हमने आपसे वर्णन कर दिया ॥ ३ ॥

पठतां  शृण्वताञ्चापिसर्व्वपापैःप्रमुच्यते।

श्रादावेवकृतायेचप्रश्नाहिचतुरस्त्वया॥४॥

इस कथाको जो कोई पढ़ता या सुनता है उसके सर्व पाप, छूट जाते हैं । आपने जो शुरू में चार प्रश्न कियेथे ॥ ४ ॥

पितापुत्रस्यसंवादस्तथासृष्टिःस्वयम्भुवः। तथामनूनामुत्पत्तीःराज्ञाञ्चचरितंमुने॥५

उनके उत्तर स्वरूप हमने पिता-पुत्र मनुष्यों की उत्पत्ति औरसम्वाद, ब्रह्मा की सृष्टि

उनका वर्णन, तथा राजानों के चरित्र श्रादि का,वर्णन ॥ ५ ॥

श्रस्माभिरेतत्तेप्रोक्तंकिमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि। एतान्सर्व्वान्नरःशृण्वन्पठन्नपिसभासुच। विधूयसर्व्वपापाणिब्रह्मण्येवलयंव्रजेत्॥६

श्रापसे कर दिया है, अव आप क्या और सुनना चाहते हैं । इन प्रश्नोत्तरोंकों सुनकर

या सभाओं में पढ़कर मनुष्य सवं पापों से छूट कर ब्रह्म में लय हो जाता है ॥ ६ ॥

अष्टादशपुराणानियानिप्राहपितामहः। तेषान्तुसप्तमंज्ञेयंमार्कण्डेयंसुविश्रुतम्॥७

पितामह ब्रह्मा ने जो अठारह पुराण कहे हैं उनमें प्रख्यात मार्कण्डेय पुराण को सातवां समझना चाहिये |७|

ब्राह्मयपाद्मवैष्णवञ्चशैवंभागवतंतथा। तथान्यन्नारदीयश्चमार्कण्डेयंचसप्तमम्॥८

  (१) ब्रह्मपुराण, ( २ ) पद्मपुराण (३) विष्णु पुराण, ( ४ ) शिवपुराण, (५) श्रीमद्भागवत'

पुराण, (६) नारदपुराण, ( ७ ) मार्कण्डेय पुराण..८ ॥

आग्नेयमष्टमंप्रोक्तंभविष्यंनवमंस्मृतम्। दशमंब्रह्मवैवर्त्तनृसिंहैकादशंतथा॥६॥

( ८ ) अग्निपुराण ( 8 ) भविष्यपुराण (१०) ब्रह्मवैवर्त्त, ( ११ ) नृसिंह

वाराहंद्वादशंप्रोक्तंस्कान्दमत्रत्रयोदशम्। चतुर्दशं.. वामनकंकौमंपंचदशंतथा॥१०॥

 . ( १२ )वाराह, ( ( १३ ) स्कन्द, (१४) वामन, ( १५ कूर्म, ॥ १० ॥

मात्स्यंचगारुड़ञ्चैवब्रह्माण्डंचततःपरम्॥ अष्टादशपुराणानांनामधेयानियःपठेत्॥११॥

( १६ ) मत्स्य, ( १७ ) गरुड़, ( १८ ब्रह्माण्ड । इन अठारह पुराणों के नामों को जो

कोई पढ़ता है और ॥ ११ ॥

त्रिसन्ध्यंजपतेनित्यंसोऽश्वमेधफलंलभेत्। चतुःप्रश्नसमोपेतंपुराणंमार्कण्डसंज्ञकम्॥१२

तीनों संख्याओं में इस का जप करता है उसको अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है । चारों प्रश्नों से युक्त मार्कण्डेय नष्ट "पुराण को ॥ १२ ॥

श्रुतेननश्यतेपापंकल्यकोटिशतैःकृतम्। ब्रह्महत्यादिपापानितथान्यान्यशुभानिच॥१३

सुनने से करोड़ों पाप है  जाते हैं । ब्रह्महत्या आदि पाप तथा अन्य अरि॥ १३ ॥

तानिसर्व्वाणिनश्यन्तितूलंवाताहतंयथा। पुष्करस्नानजंपुण्यंश्रवणादस्यजायते॥१४

इस प्रकार नए होजाते हैं, जैसे हवा वे लगने से रुई उड़ जाती है। इस पुराण के केवल

सुनने से ही पुष्कर स्नान का फल होता है || १४ |

वन्ध्यावामृतवत्सावाशृणोतियदितत्त्वतः सापिवैलभतेपुत्रंसर्व्वलक्षणसंयुतम्। धनधान्यमवाप्नोतिस्वर्गलोकंतथाक्षयम्॥१५॥

   के बच्चे मर जाते हों सुनें तो उसको सव इस कथा को तबूपूर्वक जो कोई बाँझ स्त्री

लक्षणों से युक्त पुत्र की प्राप्ति होती है, तथा खूब धनधान्य प्राप्त करती और मरने पर स्वर्गको जाती है ॥ १५ ॥

सुरापश्चग्रकर्माचश्रुत्वैतत्सकलंनरः। - सर्व्वपापविनिर्मुक्तःस्वर्गलोकेमहीयते॥१६॥

मंदिरा पान करने वाले, उग्र कर्म करने वाले मनुष्य भी इस कथा को सुनकर सब पापों से मुक्त होजाते हैं और मरने पर स्वरको जाते हैं ॥ १६ ॥

आयुरारोग्यमैश्वर्य्यंधनधान्यसुतादिकम्। शश्चैवव्यवच्छेदीप्राप्नोतिद्विजसत्तम॥१७॥

 हे द्विजोत्तम ! इस कथा सुनने वाला आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन, पुत्रऔरवंश  दिकीप्राप्तिकरताहै. ॥१७॥

म्रुत्वैतत् सकलं चिम यद् कुर्य्यात् तन्निशामय । प्रमिसमाधायततोहोमंकुर्य्याद्विचक्षणः || १८ ||

हे विप्र ! इसको सुनकर जो करना चाहिये वह हमसे सुनो। चतुर मनुष्य को चाहिये कि पहिले

तो अग्नि प्रज्वलित करके हवन करे ॥ १८ ॥

ध्यात्वापुराणंगोविन्दंहृत्पद्ममुनिसत्तम। जांवपुष्मतैवेद्यैर्गन्धमाल्याम्बरैस्तथा॥१६॥

 हे मुनि सत्तम ! फिरगोविन्दरूपपुराणकाहृदयमेंध्यान करकेपुराणकीनैवेद्य, गन्ध, मालाऔरवस्त्र श्रादिसेपूजाकरे॥१६॥

आचकन्तु सपत्नीकं पूजयेन्युनिसत्तम ।

चकाय ततो देया गौः सवत्सा पयस्विनी ||२०||

हेजैमिनिंजी ! फिर वाचककीउसकीस्त्रीकेसहितपूजाकरेऔरवाचक को बच्चे वाली, एक दुधारू गाय दे ||२०||

भूमिःशस्यवतीविप्रहिरण्यंरजतंतथा।

ग्रामऔरवाहनादि:थाशक्त्याचदातव्यंनृपैर्ग्रामादिवाहनम्॥२१

 हे विप्र ! राजाओं को कथा बाँचने वालों को उप-जाऊ भूमि, सोना, चाँदी,  यथाशक्ति देनेचाहिये॥२१॥

चकं तोषयित्वा तु स्वस्तीति समुदीरयेत् ।

पूज्य वाचकं यस्तु लोकमेकं शृणोति हि ॥ २२ ॥

याँचनेवालेकोसन्तुष्टकरके"स्वस्ति"कहनाचाहिये।वांचक कोसन्तुष्टकियेविना जोएक श्लोकभी सुनताहै॥२२॥

सौ पुण्यमवाप्नोति शास्त्रचौरः स्मृतो बुधैः ।

तस्य देवाः प्रीणन्ति पितरो नैव पुत्रकान् ||२३||

उसकोकोईपुण्यनहींहोताऔरविद्वान् उसकोशास्त्रकाचोरकहतेहैं।ऐसेमनुष्यपर .. देवताऔरपितरभीप्रसन्ननहींहोतेहैं॥२३॥

तंश्राद्धंनचेच्छन्तिस्नानतीर्थफलंनच। भतेशास्त्रचौरोऽसोनिन्दितावेदपाठकैः ||२४||

उसके दिये हुए दान और श्राद्ध को पितर ग्रहण नहीं करते, उस शास्त्र के चोर को स्नान और

तीर्थादिकाफलनहींमिलताऔरवेदपाठीउसकी निन्दा करते हैं ॥ २४ ॥

र्कण्डेयसमाप्तौतुछुत्सवंकारयेद्युधः। नुंपयस्विनींदद्यात्सर्व्वपापविमुक्तये॥२५॥

कि वे उत्सव करें और सब पापों की शान्ति के कथाकीसमाप्तिपरवुद्धिमान्मनुष्योंकोचाहिये लियेदुधारूगायकादानकरें॥२५॥

सनानि च रत्नानि सपत्नीकद्विजातये ।

एडलेकञ्चुकोष्णीषंशय्यांसोपस्करमपि॥२६॥

और स्त्रीसहितउसब्राह्मणकोवस्त्र, रत्न, कुण्डल, पगड़ी,जूता शय्या तथा श्रोढ़ने विद्याने के वस्त्र || २६ ॥

पानतकरकंस्वर्ण-मुद्रिकांसप्तधान्यकम्। पांत्यपात्रंभोजनार्थंघृतपात्रसमन्वितम् ||२७||

अँगूठीसोनेकी, सप्तधान्य, औरभोजनकेलिये एकघृत संयुक्त कांसे का पात्र दे ॥ २७ ॥

अश्वमेधसहस्रस्य राजसूयशतस्य

वं कृते द्विजश्रेष्ठ कृतकृत्यो भवेन्नरः च ||२८||

हेद्विजश्रेष्ठ !ऐसा करने पर मनुष्य कृतकृत्य होजाता है ।  हज़ारश्रश्वमेधऔरसौराजसूययज्ञोंका ||२८||

लंवैसमवाप्नोतिश्रुत्वासम्यग्विधानतः। चैवयमभीतिःस्यान्नतस्यनरकाद्वयम् ||२६||

फल उसको यह कथा अच्छी तरह सुननेसे होता- है उसको यमराज का डर तथा नरक का भय

नहींरहता॥२६॥

र्व्वपापानिनिर्मुक्तःकृतकृत्येोभवेन्नरः। विच्छिन्नःसदावंशोभविष्यतिनसंशयः॥३०

वह सब पापों से मुक्त होकरकृतकृत्य होजाता है  और इसमें सन्देह नहीं किउसकावंश सदैवचलतारहताहै॥३०॥

गच्छेदिन्द्रलोकंचब्रह्मलोकंसनातनम्।

युतस्ततः पुनर्नैव स भविष्यति मानवः ॥३१ ॥

मनुष्यइन्द्रलोकऔरसनातनब्रह्मलोकमेंपहुँचता हैतथावहाँसेवहकभीच्युतनहींहोता॥३१॥

राणश्रवणादेवपरंयोगमत्राप्नुयात्।

स्तिकाय न दातव्यं वृषले वेदनिन्दके ॥३२॥

वह पुराण के श्रवण करने से मनुष्य परम योग को प्राप्तहोताहै।वाचककोचाहियेकिनास्तिक, नपुंसकऔरवेदनिन्दककोयहकथानसुनावे॥३२॥

विद्वेषके चैव तथा भग्नत्रतेषु च ।

मातृ परित्यागे सुवर्णस्ते यिने तथा ||३३|||

गुरुकेविरोधी, व्रतभङ्गकरनेवाले, मातापिताकोछोड़देनेवालेऔरसुवर्णकी चोरीकरनेवालेको॥३३॥

मिश्रमर्थ्यादकेचैवतथैवज्ञातिदूषके  एतेषांनैवदातव्यंमाणैःकण्ठगतैरपि | ४||

तथा मर्यादा केतोड़ने वाले और जाति से च्युत होजाने वाले को इस पुराण की कथा प्राणों के कण्ठ में श्राजाने परभी न सुनावे ॥ ३४ ॥

लोभाद्वायदिवामोहादयाद्वापिविशेषतः पठेद्वापाठयेद्वापिसगच्छेन्नरकंध्रुवम्३५||

 जो मनुष्य लोभ से, मोह से अथवा भय से इस कथा को पढ़ता यां पढ़ाता है वह निश्चय ही नरक को जाता है ॥ ३५ ॥ जैमिनिरुवाच

भारतेनाभवद्वयन्मेसन्देहस्फोटनंद्विजा तद्भवद्भिःकृतंमैत्रात्कश्चिदन्यःकरिष्यति३६॥

जैमिनिजी बोले-

हे पक्षियो ! महाभारत में हुए सन्देहों को जिस प्रकार आपने निवारण किया है. उस प्रकार

दूसरा और कोई नहीं करेगा ॥ ३६ ॥

यूयंदीर्घायुषःस्थोचैनींरोगावृत्तिसंयुता सांख्ययोगेतथाचास्तुबुद्धिरव्यभिचारि॥३७॥

श्रायु वाले होकर नीरोग रहें और उच्च वृत्ति वाले हों । सांख्य योग में आपकी बुद्धि अचलरहे ॥ ३७ ॥

पितृशापकृताद्दोषाद्दौर्मनस्यंव्यपैतुं। एतावदुक्त्वावचनंसजगामस्वमाश्रमः॥३८॥

चिन्तयन् परमोदारं पक्षिणां वाक्यमीरिं ।

जैमिनिः सुमहाभागः पूजयित्वा द्विजोत्तम् ||३६||

 पिताकेशापं – जन्यदोषसेश्रापकोजो उदासीहैवहभीशान्तहोजाय ! यहकहकर मुनिजैमिनिपक्षियोंके उदारवाक्योंकास्मरण करतेहुएतथाउनकीपूजाकरकेअपनेश्राश्रमको चले गये ॥ ३८ ॥

इतिश्रीमार्कण्डेयाणमें१३७वाँअध्यायसमाप्त