मार्कण्डेय महा पुराण
29
अलर्क उवाच
यत् कार्य्यं पुरुषाणाञ्च गार्हस्थ्यमनुवर्त्तताम् । वन्धश्च स्यादकरणे क्रियया यस्य चोच्छ्रितः ॥ १
अलर्क बोले—
गृहस्थ धर्म के पालन करने वाले लोगों का जो कार्य है और जिसके न करनेसे बन्धन और करने उन्नति होती है ॥ १ ॥
उपकाराय यन्नृणां यच्च वज्र्ज्यं गृहे सता । यथा च क्रियते तन्मे यथावत् पृच्छतो वद ||
घरमें रहने वाले मनुष्यों को जो छोड़ने योग्य वस्तु हैं उसे मनुष्यों को उपकार के लिये पूछनेवाले मुझसे यथावत् कहिये जिससे कि उसी प्रकार किया जाय ||२|| मदालसोवाच वत्स गार्हस्थ्यमादाय नरः सर्व्वमिदं जगत् । पुष्णाति तेन लोकांश्च स जयत्यभिवाञ्छितान् ॥३॥
मदालसा बोली- हे वत्स ! गृहस्थ चनकर मनुष्य सम्पूर्ण जगत् लोकों को प्राप्त करता है ॥ ३ ॥ पितरो युनयो देवा भूतानि मनुजास्तथा ।
कृमिकीट- पतङ्गाश्च वयसि पशवोऽसुराः ॥ ४
पित्रीश्वर, मुनि, का पोषण करता है, इसलिये वह श्रभिलपित देवता, भूत, मनुष्य, कृमि, कीट, पतङ्ग, पक्षी, पशु, और असुर लोग ॥ ४ ॥
गृहस्थमुपजीवन्ति ततस्तृप्तिं प्रयान्ति च । मुखञ्चास्य निरीक्षन्ते अपि नो दास्यतीति वै ॥ ५ ॥
ये सब जीव गृहस्थ ही जीवित रहते हैं तथा तृप्ति को प्राप्त होते हैं, ये सब गृहस्थ के सुख की घोर ताकते हैं कि वह हमें कब देगा ॥ ५ ॥
सर्व्वस्याधारभूतेयं वत्स धेनुखयीमयी । यस्यां प्रतिष्ठितं विश्वं विश्वहेतुश्च या मता ॥ ६
हे वत्स ! तीनों वेदों के अनुसार गृहस्थ सवका श्राधारभूत और कामधेनु के समान है जिसपर कि सम्पूर्ण संसार प्रतिष्ठित है तथा जो विश्व का कारण है || ६||
ऋपृष्ठासी जुर्मध्या सामंत्र क्त्त्रशिरोधरा । इष्टापूर्त्तविपाणां च साधुसूक्ततनूरुहा ॥ ७।।
इस गृहस्थरूपी कामधेनु की पीठ ऋग्वेद है तथा इसी प्रकार मध्य शरीर यजुर्वेद, मुख सामवेद, शिर पृथ्वी, यह सींग और साधुसुक्क रोम हैं ॥७॥
शान्तिपुष्टिशकृन्मूत्रा वर्णपादप्रतिष्ठिता । श्राजीव्यमाना जंगतां साक्ष्या नोपचीयते ॥ ८।
शान्ति इसकी गोवर और पुष्टि इसका मूत्र है तथा वर्ण इसका चरम है, यह अक्षय और जगत को जीवित करने वाली है ॥ ८॥
स्वाहाकारस्वधाकारौ पट्कारश्च पुत्रक । हन्तंकारस्तथा चान्यस्तस्यास्तनचतुष्टयम् || ६ ||
हे छालेर्क ! स्वाहाकार, स्वधाकार, वर्षट्कार तथा हन्तकार इस गाय के चार स्तन हैं ॥ ६ ॥
स्वाहाकारं स्तनं देवाः पितरश्च स्वधामयम् । मुनयश्च वषट्कारं देवभृतसुरेतराः ||१०|||
स्वाहा- कार स्तन को देवता, स्वधाकार को नया वपट्कार को मुनि लोग पीते हैं । देवता, भृतं और सुरों से दूसरे लोग ॥ १० ॥ हन्तारं मनुष्याश्च पिवन्ति सततं स्तनम् । । एवमाप्याययत्येषा वत्स धेनुत्रयीमयी ॥११॥
जो मनुष्य ऋदि हैं वे हन्तकार को पीते हैं । हे पुत्र ! इस प्रकार से तीनों वेद स्वरूपी धेनु सब को एस करती है ॥११॥
तेषामुच्छेदकर्त्ता च यो नरोऽत्यन्तपापकृत् । स तमस्यन्धतामिस्र तामिस्र े च निमज्जति ||१२||
जो मनुष्य ऐसी कामधेनु की उपेक्षा करता है वह पापी अन्धकार पूर्ण नरकों में गिरता है ॥ १२ ॥
यश्चेमां मानवो धेनुं स्वैत्रत्तैरमरादिभिः । पाययत्युचिते काले स स्वर्गायोपपद्यते ॥१३॥
देवताओं से पूजित इस गाय को जो मनुष्य पालता है वह उचित काल में स्वर्ग को जाता है ।
तस्मात् पुत्र मनुष्येण देवर्षि - पितृ-मानवाः । भूतानि चानुदिवसं पोष्याणि स्वतनुर्यथा ॥ १४ ॥
इसलिये हे पुत्र ! मनुष्य को चाहिये कि वह प्रति दिन अपने शरीर की भांति देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य और भूतों का पोषण करे ॥ १४ ॥
तस्मात् स्नातः शुचिर्भूत्वा देवर्षिपितृतर्पणम् । प्रजापतेस्तथैचाद्भिः काले कुर्य्यात् समाहितः ॥१५॥
श्रतएव. स्नान कर पवित्र होकर सावधानी से समय पर जल से देवता, ऋषि, पितर और प्रजापति का तर्पण करे ॥ १५ ॥
सुमनोगन्धधूपैश्व देवानभ्यर्च्य मानवाः । ततोऽस्तर्पणं कुर्य्यायाथ वलयस्तथा ॥ १६।।
मनुष्य पुष्प, गन्ध और धूप से देवताओं को पूजकर अग्नि में होम करे और बलि- दान देवे ॥ १६ ॥
ब्रह्मणे गृहमध्ये तु विश्वेदेवेभ्य एव च । - धन्वन्तरिं समुद्दिश्य प्रागुदीच्यां बलिं क्षिपेत् ॥१७॥
घर के बीच में ब्रह्मा के लिये और विश्वेदेवों को बलि देवे तथा पूर्वोत्तर दिशा में धन्वंतरि के उद्देश्य से बलि देवे ॥ १७ ॥
प्राच्यां शक्राय यान्यार्या यमाय बलिमाहरेत् । प्रतीच्यां वरुणायाच सोमायोत्तरतो बलिम् ||१८||
पूर्व दिशा में इन्द्र के लिये, दक्षिण में यमराज के लिये बलि देवे |पश्चिममें वरूप को और उत्तरमें सोम को बलि देवे ॥६॥
दद्याद्धात्रे विधात्रे च बलिं द्वारे गृहस्य तु । अर्य्यम्णेऽथ वहिर्दद्याद्गृहेभ्यश्च समन्ततः ||१६||
घर के दरवाज़े पर धाताऔर विधातां को वलिदान देवे तथा ऋर्य्यमां को घर के बाहर चारों ओर बलिदान देना चाहिये ॥१॥
नक्तञ्चरेभ्यो भूतेभ्यो वलिमाकाशतो हरेत् । पितॄणां निर्वपेच्चैव दक्षिणाभिमुखस्थितः ||२०|| गृहस्थस्तत्परो भूत्वा सुसमाहितमानसः । ततस्तोयमुपादाय तेष्वेवाचमनाय वै ॥२१॥
स्थानेषु निक्षिपेत् प्राज्ञस्तास्ता उद्दिश्य देवताः । एवं गृहवलिं कृत्वा गृहे गृहपतिः शुचिः ||२२||
राक्षस और भूतों को त्राकाश में वति देवे तथा गृहस्थी तत्पर और सावधान चित्त होकर दक्षिण की ओर मुख करके पितरों को बलि देवे । इसके अनन्तर जल लेकर उन उन देवताओं का उद्देश्यकरके श्राचमन के लिये पूर्वोक स्थानोंमें जल छोड़ेइस प्रकार गृहपति पवित्र होकर घर में गृह बलि सम्मानपूर्वक उत्सर्ग करे तथा कुत्तों, श्वपचों और करे || २०, २१, २२ ॥
आप्यायनाय भूतानां कुर्य्यादुत्सर्गमादरात् । श्वस्य श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्वावपेद्भुवि ||२३||
फिर भूतों की तृप्ति के लिये पक्षियों के लिये पृथ्वी में बलि दे ॥ २३ ॥
वैश्वदयं हि नामैतत् सायं प्रातरुदाहृतम् । श्राचम्य च ततः कुर्य्यात् प्राज्ञो द्वारावलोकनम्॥ २४॥
इसको वैश्वदेव कर्म कहते हैं यह सख्या और प्रातःकाल के समय किया जाता है । विद्वान् को चाहिये कि इसके बाद आचमन करके द्वार की ओर देखेा
मुहूर्त्तस्याष्टमं भागमुदीक्ष्योऽप्यतिथिर्भवेद । अतिथिं तत्र सम्प्राप्तमन्नाद्य नोदकेन च ||२५||
| मुहूर्त के आठवें भाग में भोजनकरे और उस समय यदि कोई अतिथि आजाय तो उसको भी अन्न और जल दान करे || २५ ||
सम्पूजयेद्ययाशक्ति गन्यपुष्पादिभिस्तथा । मित्रमतिथिं कुर्व्यान्नैकग्रामनिवासिनम् ॥२६॥
अपनी शक्ति के अनु सार गन्ध, पुष्पादि से उसकी पूजा करे तथा यदि हो तो भी उसका सत्कार करना चाहिये ॥ २६॥
श्रज्ञातकुलनामानं तत्कालसमुपस्थितम् ।
बुभुक्षुमागतं श्रान्तं याचमानम किञ्चनम् ।
ब्राह्मणं माहुरतिथिं स पूज्यः शक्तितो बुधैः ॥२७
अतिधि अपने ग्राम का रहने वाला या मित्र न भी उस समय उपस्थित होने वाला, जिसका नाम कुल इत्यादि ज्ञात न हो ऐसा भूखा, थका हुआ, भिक्षा माँगता हुआ, निर्धन इस प्रकार के 'ब्राह्मण को अतिथि कहा है वह बुद्धिमानों से शक्ति के अनुसार पूज्य है ॥ २७ ॥
न पृच्छेद्गोत्रचरणं स्वाध्यायश्चापि पण्डितः । शोभनाशोभनाकारं त्वं मन्येत प्रजापतिम् ॥२८॥
पण्डित को चाहिये कि अतिथि से गोत्र, चरण और स्वाध्याय को भी न पूछे और वह सुन्दर हो या कुरूप उसको ब्रह्माजी के समान समझे ॥ २८ ॥
अनित्यं हि स्थितो यस्मात् तस्मादतिथिरुच्यते । तस्मिंस्तृप्से नृयज्ञोत्थाहणान्मुच्येद् गृहाश्रमी ॥२६।।
जिसकी स्थिति नित्य न हो उसको अतिथि कहते हैं, उसके तृप्त होने से गृहस्थी ऋण से मुक्त हो जाता है ॥ २६ ॥
तस्मै दत्त्वा यो भुङ्क्ते स्वयं किल्विषभुङ्नरः । स पापं केवलं भुङ्क्ते पुरीषञ्चन्यजन्मनि ||३०||
उसको भोजन न कराकर जो मनुष्य स्वयं भोजन कर लेता है वह पापी है और वह अगले जन्म में विष्ठा खाता है ||३०||
प्रतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्त्तते । स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति ॥ ३१।।
जिसके घर से अतिथि निराश हो कर लौटता है वह अपना पाप उस गृहस्थ को दे कर उसका पुराय ले जाता है ॥ ३१॥ प्यं शाकदानेन यद्वाप्यश्नाति स स्वयम् । पूजयेत् तु नरः शक्त्या तेनैवातिथिमादरात् ||३२||
इसलिये जल शाक श्रादि जो कुछ स्वयं खाय उसी से मनुष्यको चाहिये कि अपनी शक्ति के अनुसार अतिथि की पूजा करे ॥ ३२ ॥
कुर्य्याचाहरहः श्राद्धमन्नाद्य नोदकेन च ।
पितृनुद्दिश्य विमांश्च भोजयेद्विप्रमेव वा ॥ ३३ ॥
और श्राद्ध के दिन पितरों का उद्देश्य करके अन्न और जल दानकरे और ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥ ३३ ॥
अन्नस्याग्रं तदुद्धृत्य ब्राह्मणायोपपादयेत् । भिक्षाश्च याचतां दद्यात् परिव्राड्ब्रह्मचारिणाम् ३४
जो कुछ अन्न बचे उसे ब्राह्मण को देदे तथा परिव्राजक या ब्रह्मचारी जो भिक्षा माँगता हुआ श्रावे उसको दे ॥ ३४ ॥
ग्रासप्रमाणा भिक्षा स्यादग्रं ग्रासचतुष्टयम् । अग्रं चतुर्गुणं माहुर्हन्तकारं द्विजोत्तमाः ॥ ३५ ॥
एक ग्रास को भिक्षा और चार ग्रास को अग्र कहते हैं तथा चार को श्रेष्ठ ब्राह्मण हन्तकार कहते हैं॥ ३५ ॥ भोजनं हन्तकारं वा श्रग्रं भिक्षामथापि वा । अदत्त्वा तु न भोक्तव्यं यथाविभवमात्मनः ॥ ३६ ॥
अपनी शक्ति के अनुसार हन्तकार, अन अथवा भिक्षा प्रमाण अतिथि को भोजन दिये विना स्वयं न खावे ॥ ३६ ॥
पूजयित्वातिथीनिष्टान् ज्ञातीन् बन्धूंस्तथार्थिनः । विकलान् वालवृद्धांच भोजयेच्चातुरांस्तथा ||३७||
अतिथियों, प्रियजनों, सजा तियों, बन्धुओं तथा याचकों को सम्मानित करके व्याकुलों, बालकों, वृद्धों और धातुरों को भोजन करावे ॥ ३७ ॥
वाञ्छते क्षुत्परीतात्मा यच्चान्योऽन्नमकिञ्चनः । कुटुम्बिना भोजनीयः समर्थो विभवे सति ॥ ३८ ॥
तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार भूखे प्यासे, निर्धन और कुटुम्बियों को भोजन करावे || ३८ ||
श्रीमन्तं ज्ञातिमासाद्य यो ज्ञातिरवसीदति । सीदता यत् कृतं तेन तत् पापं स समश्नुते ||३६|||
जो सजातीय अपने धनवान् जाति वाले के पास आकर भी कष्ट पाता है तो फि जिस पाप को वह दुःखी पुरुष करता है. वह पा धनवान् को लग जाता है ||३६||
सायश्चैव विधिः कार्य्यः सूय्र्योढं तत्र चातिथिम् । पूजयेत यथाशक्ति शयनासन- भोजनैः ॥४०॥
सायंकाल की जे विधि हो उसको करना चाहिये, तथा उस समयजो तिथि श्रावे उसको सूर्यवत् समझे और उस के सोने, बैठने और भोजनों का यथाशक्ति प्रवन्ध करे ||४०||
एवमुद्वहतस्तात गार्हस्थ्यं भारमाहितम् । बन्धु विधाता देवाच पितरश्च महर्षयः || ४१।
हे अलर्क ! यह भार गृहस्थों के ऊपरक्खा गया है। जो इसको धारण करते हैं उनसे ब्रह्माजी, देवता, पितृगण, महपिं॥४१॥
श्रेयोऽभिवर्षिणः सर्व्वे तथैवातिथिबान्धवाः । पशुपक्षिगणास्तृप्ता ये चान्ये सूक्ष्मकीटकाः ॥ ४२ ॥
तथा अतिथि भाई, बन्धु, पशु, पक्षी और कीट सव प्रसन्न ह हैं तथा उनके कल्याण की कामना करते हैं ॥ ४२
गाथाश्वात्र महाभाग स्वयमन्त्रिरगायतः । ताः शृणुष्व महाभाग गृहस्थाश्रमसंस्थिताः ||४३||
हे महाभागी पुत्र ! यहाँ श्रत्रि मुनि ने स्व | गृहस्थियों के लिये एक गाथा कही है उसको तुम सुनो ॥ ४३ ॥
देवान् पितृ श्रातिथींश्च तद्वत् सम्पूज्य वान्धवान् ज्ञातींस्तथा गुरूंश्चैव गृहस्थो विभवे सति || ४४
श्रपनी शक्ति के अनुसार गृहस्थी देवताओं, पितरों और उसी प्रकार वान्धवों,.. सजातियों तथा गुरु की पूजा करके ॥ ४४ ॥
'श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयो भ्यश्चावपेद्भुवि । वैश्वदेवं हि नामैतत् कुर्य्यात् सायं तथा दिने ॥ ४५
कुत्तों,, डोम और पक्षियों आदि को भोजन करावे, इसी को वैश्वदेवकर्म कहते हैं इसको दिनमें तथा सायं- काल के समय करना चाहिये ॥ ४५ ॥
मांसमन्नं तथा शाकं गृहे यच्चोपसाधितम् । न च तत् स्वयमश्नीयाद्विधिवद्यन्न निर्व्वपेत् ॥ ४६
मांस, अन्न,शाक या अन्य जो कुछ वस्तु घर पर हो उसको उपरोक्त लोगों को अर्पित किये बिना स्वयं न खावे ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में मदालसोपदेश नाम रहवाँ अध्याय समाप्त ।
Summary of chapter 29 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
Madālasā instructs Prince Alarka in the sacred duties of the householder ashrama, which forms the pillar of all societal order. She details daily rituals, hospitality to guests, reverence toward parents, performance of the five mahāyajnas, and regular ancestral shrāddha. She emphasizes that a householder who earns wealth through righteous means and offers its fruits to Bhagavān attains heavenly realms equal to great ascetics.