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मार्कण्डेयउवाच

एवंस्तुतस्ततस्तेनभगवान्हव्यवाहनः। ज्वालामालावृतस्तत्रतस्यासीदग्रतोमुने॥१

मार्कण्डेयजी बोले-

इस प्रकार शान्ति मुनि द्वारा स्तुति किये जाने पर भगवान् श्रग्निदेव बहुतसी ज्वालाओं से

युक्त होकर शान्ति मुनिके सन्मुख श्राये ॥ १॥

देवोविभावसुःप्रीतस्तोत्रेणानेनवैद्विज। तंशान्तिमाहप्रणतंमेघगम्भीरवागथ॥२

स्तोत्र से प्रसन्न होकर अग्निदेव शान्ति मुनि से मेघ के सदृश गम्भीर वाणी से बोले ॥२॥ अग्निरुवाच

परितुष्टोऽस्मितेविप्रभक्त्यायातेस्तुतिःकृता। वरंददामिभवतेप्रार्थ्यतांयत्तवेप्सितम्॥३

अनि बोले-

हे विप्र ! भक्ति पूर्वक जो स्तुति तुमने की है उससे मैं संतुष्ट हुआ हूँ। मैं तुमको घर देना चाहता हूँ, जो तुम्हारी इच्छा हो वह माँगो ॥३ ॥ शान्तिरुवाच

भगवन्कृतकृत्योऽस्मियत्त्वांपश्यामिरूपिणम् तथापिभक्तिनम्रस्यभवताश्रूयतांमम॥४

शान्ति बोले-

हे भगवन् ! आपको प्रगट हुआ देखकर मैंकृतकृत्य हूँ । अव भक्तिसे नम्र मैं जो कुछ कहता हूँवह सुनिये ॥ ४ ॥

भ्रातृयज्ञंगतोदेवममाचाय्र्योनिजाश्रमात्। श्रागतथाश्रमंधिष्टयंत्वत्सनाथंसपश्यतु॥५॥

 हे देव ! मेरे गुरु अपने श्राश्रम से भाई के यज्ञ में गये हैं, आप ऐसा यत्न कीजिये कि जिससे वे श्राश्रमको लौटने पर आपको प्रज्यलित पावें ||५||

ममापराधात्सन्त्यक्तंधिष्ट्यंयततेविभावसो तत्त्वयाधिष्ठितंसोऽद्यपूर्व्ववत्पश्यतांद्विजः॥६

 हे विभावसु ! मेरे अपराध से जो गुरु लौटने पर अग्नि शान्त हो गई थी उसको मेरे

पूर्ववत् प्रज्वलित देखें ॥ ६ ॥

तथान्यदपिमेदेवप्रसादंकुरुषेयदि। पुत्रोविशिष्टोभवत्तदपुत्रस्यमेगुरोः॥७

एक और कृपा मुझपर करें तो मेरे निपुत्री गुरु को एक उत्तम पुत्र उत्पन्न होजाय ॥७ ॥

'यथाचमैत्रींतनयेसकरिष्यतिमेगुरुः। तथासमस्तसत्त्वेषुभवत्वस्यमनोमृदु॥८

और मेरे गुरु जैली प्रीति उस पुत्र से रक्खें वैसी ही समस्त जीवों से कोमल भावयुक्त होकर रक्खें ॥ ८ ॥

पश्यतांस्तोष्यतेयेनप्रीतिंयातोऽसिमेऽव्यय स्तोत्रेणतस्यवरदोभवेथामत्प्रसादितः॥६

 हे अव्यय ! यदि मेरे इस स्तोत्र से आपको प्रीति उत्पन्न हुई है तो यही स्तोत्र मेरे गुरु की कामनापूर्ण करे ॥ ॥ ६  मार्कण्डेयउवाच

एतच्छ्रुत्वावचस्तस्यतमाहद्विजसत्तमम्।

स्तोत्रेणाराधितो भूयो गुरुभक्त्या च पावकः ॥ १०॥

मार्कण्डेयजीबोले- इसप्रकारउसब्राह्मणश्रेष्ठकेवचनसुनकर औरउनकेस्तोत्रसेआराधितअग्निदेवशान्तिमुनि की गुरुभक्ति देखकर कहने लगे ||१०||  अग्निरुवाच

रोरर्थेयतोब्रह्मन्याचितंतेचरद्वयम्। नात्मार्थंतेनमेप्रीतिस्त्वय्यंतीवमहामुने॥११॥

अग्नि बोले-

हे ब्रह्मन् ! आपने गुरुके लिये दो वरमांगे परंतु अपने लिये कुछ भी न माँगा, इससे हे महामुनि ! तुममें मेरी प्रीति और भी अधिक होगई है ॥ ११ ॥

भविष्यत्येतदखिलंगुरोर्यत्प्रार्थितंत्वया। मैत्रीसमस्तभूतेषुपुत्रश्चास्यभविष्यति॥१२

तुमने जो कुछ गुरु के लिये माँगा है वह सब पूर्ण होगा | मुनि की सब जीवों से प्रीति होजायगी,तथा उनको एक पुत्र भी होगा || १२ ||

मन्वन्तराधिपःपुत्रोभौत्योनामभविष्यति। महावलोमहावीर्योमहाप्राज्ञोगुरुस्तव॥१३॥

तुम्हारे गुरु के भौत्य नाम एक पुत्र होगा जो कि महाबली, पराक्रमी, विद्वान् और मन्वन्तराधिप होगा || १३||

अनेनयथस्तोत्रेणस्वोष्यतेमांसमाहितः। तस्याभिलषितंसर्व्वंपुण्यश्चास्यभविष्यति ||१४||

 जो कोई एकाग्र चित्त होकर इस स्तोत्र से मेरी स्तुति करेगा उसकी सब मनोकामना पूर्ण होंगी ॥१४

यज्ञेषुपर्व्वकालेषुतीर्थेज्याहोमकर्म्मसु। धर्म्मायपठतामेतन्ममपुष्टिकरंपरम् ||१५||

यज्ञों, पत्रा, तीर्थों, होमकम आदि में धर्म के लिये इस स्तोत्र को पढ़ने से मेरी परम पुष्टि होगी||१५||

अहोरात्रकृतंपापंश्रुतमेतत्सकृद्विज। नाशयिष्यत्यसन्दिग्धंममतुष्टिकरंपरम्॥१६॥

हे द्विज ! जो मेरे इस तुष्टिकारक स्तोत्र को एक चार सुनेगा उसका एक दिन रात्रि का किया हुआपाप निस्संदेह नष्ट होजायगा ||१६||

होमकालदोषादीननयोग्यैरपितत्कृतैः। दोषास्तानिदंसद्यःशमयिष्यतिसंश्रुतम् ||१७||

इस स्तोत्र को भली प्रकार सुनने से होम, काल और अयोग्य कर्म सम्बन्धी सब दोष नष्ट होजायेंगे ॥ १७ ॥

पौर्णमास्याममावास्यांपर्व्वस्वन्येषुप्रस्तवः | ममैषसंश्रुतोमत्यैर्भवितापापनाशनः॥१८॥

पूर्णमासी, श्रमावसअथवा अन्यपंवोंमेंजोपुरुष मेरेइसस्तोत्रकोसुनेंगेउनकेसम्पूर्णपापनाशकोप्राप्तहोंगे ||१८|| मार्कण्डेय उवाच

इत्युक्त्वाभगवानग्निःपश्यतस्तस्यवैमुने। बभूवादर्शनःसद्योदीपस्योनितोतथा॥१६॥

मार्कण्डेयजी बोले-

हे कौटुकि मुनि ! भगवान् श्रग्नि यह कह कर उसके देखते-देखते इस प्रकार अदृश्य होगये जिस

प्रकार दीपक बुझ जाता है ॥ १६ ॥

सचशान्तिर्गतेवहौपरितुष्टेनचेतसा। हर्षरोमाञ्चिततनुःप्रविवेशाश्रमंगुरोः ||२०||

अग्निदेव केअदृश्य होने पर शान्ति सुनि ने भी प्रसन्न चित्त तथा रोमांचित शरीर होकर गुरु के आश्रम मेंप्रवेश किया ||२०||

जाज्वल्यमानंतत्रासौगुरुविष्टयेहुताशनम्। ददर्शपूर्व्ववदप्रापततःसपरमांमुदम् ||२१||

 वहाँ पर गुरु की अग्नि को पूर्ववत् प्रज्वलित देखकर उनको बड़ी प्रसन्नता हुई ||इसी अवसर पर उनके महात्मा गुरुभी अपने भाईके यज्ञ से लौटकर श्राश्रम पर पहुँचे ॥ २२ ॥

एतस्मिन्नन्तरेसोऽपिगुरुस्तस्यमहात्मनः। भ्रातुर्यवीयसोयज्ञादाजगामस्वमाश्रमम् ||२२|| तस्याग्रतश्चशिष्योऽसौचक्रेपादाभिवन्दनम्। गृहीतासनपूजथतमाहसतदागुरुः॥२३॥

उनके शिष्य शान्ति मुनि ने गुरु के आगे जाकर उनके चरणों में प्रणाम किया तथा उनकी पूजा की। आसन ग्रहण कर गुरुजी बोले ॥ २३ ॥

वत्सातिहार्दत्वयिमेतथान्येषुचजन्तुषु। नवेद्मिकिमिदंत्वचेद्वत्यैतद्कथयाशुमे ||२४||

  है बत्स ! मुझे तुमसे तथा अन्य जीवों से श्रव पहिले की अपेक्षा अधिक प्रीति होगई है । मैं नहीं जानता यह क्योंकर हुई, यदि तुम्हें कुछ मालुम हो तोशीघ्र कहो ||२४||

ततःसशान्तिस्तत्सर्व्वमाचार्य्यायमहामुने। अग्निनाशादिकंविप्रःसमाचष्टेयथातथम् ||२५||

तव विप्र शान्ति ने अपने यांचार्य महामुनि के प्रति श्रग्नि बुझ जाने आदि का सबवृत्तान्त पूर्णतया सुनादिया ||२५||

नच्छ्रुत्वा स परिष्वज्य स्नेहार्द्रनयनोगुरुः । शिष्यायप्रददौवेदान्नसाङ्गोपाङ्गान्महामुने॥२६॥

यह सुनकर गुरुस्नेह से नयनों में जल भरताये और उन्होंने तिकोछातीसेल गालिया औरउसको सम्पूर्णवे वेदाङ्गोंकाज्ञानकरादिया || २६||

भौत्योनाममनुस्तस्यपुत्रोभूतेरजायत। तस्यमन्वन्तरेदेवानृषीन्भूपश्चमेशृणु॥२७॥

फिर भूति के भौत्य मनु नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ । श्रब के मन्वन्तर के देवता, ऋषि तथा राजाओं कोसे सुनो ॥ २७ ॥

भविष्यस्यभविष्यांस्तुगदतोममविस्तरात्। देवेन्द्रोयथभवितातस्यविख्यातकर्म्मणः॥२८॥

 उस मन्वन्तर के जो देवता है तथा उनके जो विख्यातकर्मी इन्द्रहोंगे उनको॥ २८॥

चाक्षुपाश्चकनिष्ठाश्चपवित्राभ्राजिरास्तथा। धारानुकाश्चइत्येतेपञ्चदेवगणाःस्मृताः ||२६||

चाक्षुष, कनिष्ट, पवित्र भ्राजिर तथा वर वृक ये पाँच देवगण होंगे ॥ २६ ॥

शुचिरिन्द्रस्तदातेषांत्रिदशानांभविष्यति। महावलोमहावीर्यःसब्वैरिन्द्रगुणैर्युतः॥३०॥

उन देवताओं महावली, पराक्रमी तथा इन्द्र होने के सब युक्त शुचि नामक इन्द्र होंगे ||३०||

अनीमिवाश्चशुचिर्मुक्तोऽथमाधवः। शक्रोऽजितश्चसप्तैतेतदासप्तर्षयःस्मृताः॥३१

अग्नीधन बाहु, शुचि, मुक्त, माधव, शुक्र और अजित सातों उस मन्वन्तर में सप्तर्षि होंगे ॥ ३१ ॥

गुरुर्गभीरोब्रनश्चभरतोऽनुग्रहस्तथा। स्त्रीमाणीचप्रतीरश्चविष्णुःसंक्रन्दनस्तथा॥ ||३२||

गुरु गभीर, ब्रघ्न, भरत, अनुग्रह, स्त्रीमाणी, प्रतीर, विष्णु और संक्रन्दन ॥ ३२ ॥

तेजस्त्रीसुबलश्चैवभौत्यस्यैतेमनोःसुताः। चतुर्द्दशमयैतत्तेमन्वन्तरमुदाहृतम् ||३३||

 तथा तेजस्वी और सुवल यह भौत्य मनु के पुत्र होंगे ।  हे कौटुकि ।इस प्रकार मैंने श्रापसे चौदहों मन्वन्तरों कात्तान्त वर्णन किया ॥ ३३ ॥

श्रुत्वामन्वन्तराणीत्थंक्रमेणमुनिसत्तम। पुण्यमाप्नोतिमनुजस्तथाऽक्षीणाञ्चसन्ततिम्३४॥

 हे मुनिसत्तम ! इन ! मन्वन्तरों को जो मनुष्य सुनेंगे वे अक्षय पुण्य : तथा सन्तति प्राप्त करेंगे ॥ ३४ ॥

श्रुत्वामन्वन्तरंपूर्वंधर्म्ममाप्नोतिमानवः। स्वारोचिपस्यश्रवणात्सर्व्वकामानवाप्नुते ||३५||

पहिले मन्वन्तर को सुनने से मनुष्य को धर्म प्राप्त होता है तथा स्त्रारोचिप मन्वन्तर की कथा सुनने से सब कामनायें पूरी होती हैं ॥ ३५ ॥

श्रौत्तमेधनमाप्नोतिज्ञानञ्चानोतितामसे। रैवतेचश्रुतेयुद्धिंसुरूपांविन्दतेस्त्रियम् ||३६||

 श्रौत्तम मन्वन्तर को सुनने से धन, तामस के सुनने से ज्ञान तथा रैवत को सुनने से बुद्धि और सुन्दर स्त्री मिलती है ॥३६॥

आरोग्यंचाक्षुषेपुंसांश्रुतेवैवस्वतेवलम्। गुणवत्पुत्रपौत्रन्तुसूर्य्यसावर्णिकेश्रुते॥३७॥

चानुष मन्वन्तर को सुनने से मनुष्यों को आरोग्य वल वैवस्वत के सुनने से तथा सूर्य सावर्णिक

मन्वन्तर के सुनने से गुणवान् पुत्र और पौत्र प्राप्तहोते हैं ॥ ३७ ॥

माहात्म्यंब्रह्मावर्णेधर्म्मसावर्णिकेशुभम्। मतिमामोतिमनुजोरुद्रसावर्णिकेजयम्॥३८॥

ब्रह्म सावर्णिक मन्वन्तर को सुननें से माहात्म्य, धर्मसावर्णिक के सुनने से शुभगति तथा रुद्रसावर्णिक को सुनने से मनुष्यों को विजयप्राप्त होती है ॥ ३८ ॥

ज्ञातिश्रेष्ठगुणैर्युक्तोदक्षसावर्णिकेश्रुते। निशातयत्यरिवलंरौच्यंश्रुत्वानरोत्तम॥३६

 दक्ष सावर्णिक मन्वन्तर को सुनने से मनुष्य अपनी जाति में श्रेष्ठ तथा गुणों से युक्त हो जाता है । रौच्य मन्वन्तर को सुनने से मनुष्यों के शत्रुओं का बल घट जाता है ॥ ३६ ॥

देवप्रसादमाप्नोतिभौत्येमन्वन्तरेश्रुते। तथाग्निहोत्रंपुत्रांगुणयुक्तानवामुते ||४०||

भौत्य मन्वन्तर को सुनने से मनुष्य देवताथों की प्रसन्नता, अग्निहोत्र का फल तथा गुणी पुत्रों कोप्राप्त करता है ||४०||

सर्व्वाण्यनुक्रमादेयश्चशृणोतिमुनिसत्तम। मन्वन्तराणितस्यापिश्रूयतांफलमुत्तमम् ||४१

 हे कौटुकि मुनि ! जो क्रम से सव मन्वन्तरों को सुनते हैं उनको जो उत्तम फल मिलता है वह सुनो ॥ ४१ ॥

तत्रदेवानृषीनिन्द्रान्मनूंस्तत्तनयान्नृपान्। वंशांश्चश्रुत्वासर्वेभ्यःपापेभ्योविममुच्यते॥४२

 हे विप्र ! उन मन्वन्तरों के देवताओं, ऋषियों, इन्द्रों तथा मनुओं और उनके पुत्र राजाओं तथा उनके वंशों का हाल सुनकर सब पापों से मुक्ति होजाती है ॥ ४२ ॥

देवन्द्रनृपाश्चान्येयेतन्मन्वन्तराधिपाः। तेप्रीयन्तेतथाप्रीताःप्रयच्छन्तिशुभांमतिम्॥४३॥

देवता, ऋषि, राजा तथा मन्त्रन्तरों के स्वामी प्रसन्न होकर सुनने वालों को शुभ मति प्रदानकरते हैं ||४३||

ततःशुभांमतिंप्राप्यकृत्वाकर्मतथाशुभम् शुभांगतिमवाप्नोतियावदिन्द्राश्चतुर्द्दश॥४४॥

फिर शुभ मति पाकर उसके मनुष्य शुभ कर्म करता है जिससे कि चौदहों इन्द्रों की अवधि तक उसको शुभ गति प्राप्त होतीहै ॥ ४४ ॥

सर्व्वेस्युर्ऋतवःक्षेम्याःसर्व्वेसौम्यास्तथाग्रहाः। रभवन्त्यसंशयंश्रुत्वाक्रमान्मन्वन्तरस्थितिम् ||४५

क्रम से सव मन्वन्तरों की कथा सुनने से सब ॠतुऐं कल्याणकारी तथा सव ग्रह शुभहोजाते हैं इसमें संदेह नहीं ||४५||

इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंचतुर्दशमन्वन्तरकथननाम१००वाँअध्यायस०।