मार्कण्डेय महा पुराण
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मार्कण्डेयउवाच
मन्वन्तरेतृतीयेऽस्मिन्नौत्तमस्यप्रजापतेः। देवानिन्द्रमृपीनभूपान्निबोधगदतोमम॥१॥
मार्कण्डेयजी बोले--
प्रजापति औत्तम के इस तीसरे मन्वन्तर में जो देवता, इन्द्र, ऋषि, राजा श्रादि हुए उनकोमुझसे सुनो ॥१॥
स्त्रधामानस्तथादेवायथानामानुकारिणः। सत्याख्यश्चद्वितीयोऽन्यस्त्रिदशानांतथागणः॥२
प्रथम तो उसमें स्वधामान नाम देवता हुए जिनके गुण कि उनके नाम के अनुसार थे। दूसरे देवता तथा गण सत्य नाम से कहलाये॥ २ ॥
तृतीयेतुगणेदेवा: शिवाख्यामुनिसत्तम। शिवाःस्वरूपतस्तेतुश्रुताःपापप्रणाशनाः॥३
हे मुनिवर ! तीसरे देवता लोग शिव नाम से प्रसिद्ध हुए। वे शिव के समान कल्याणमयऔर पापों के नाश करने वाले थे ||३||
प्रतर्द्दनाख्यश्चगणोदेवानांमुनिसत्तमः। चतुर्थस्तत्रकथितश्रोत्तमस्यान्तरेमनोः॥४
हे कौटुकि ! उस श्रम मन्वन्तर में देवताओं का चौथा गण प्रतर्द्दनं नाम कहलाया ॥ ४ ॥
वशवर्त्तिनःपंचमेऽपिदेवांस्तत्रगणेद्विज। यथाख्यातस्वरूपास्तुसर्व्वएवमहामुने॥५
हे द्विज़ ! वशवर्तीनाम पाँचव गण में जो देवता हुए उनके स्वरूप भी उनके नामों के अनुसार थे ॥ ५ ॥
एतेदेवगणाःपंचस्मृतायज्ञभुजस्तथा। मन्वन्तरेमनुश्रेष्ठसर्व्वद्वादशकागणाः || ६ ||
ये ही पांच देव-गण यज्ञ में भोग करने वाले थे। उस श्रेष्ठ मनु केमन्वन्तर में सब बारह गए थें ॥ ६ ॥
तेषामिन्द्रोमहाभागस्त्रैलोक्येसगुरुर्भवेत्। शतंक्रतूनामाहृत्यसुशान्तिर्नामनामतः॥७
उनके तीनोंलोक में गुरु महाभागं, सुशान्ति नाम इन्द्र हुए जो कि सौ यज्ञ करके इन्द्रत्व को प्राप्त हुए थे ||७||
यस्योपसर्गनाशायनामाक्षरविभूषिता। अद्यापिमानवैर्गाथागीयतेतुमहीतले॥८॥
इनके नाम के अक्षरों को पृथ्वीतल पर श्रमङ्गल के नाश करने के लिये अब तक मनुष्य लोग गाते हैं॥',८
सुशान्तिर्देवराट्कान्तःसुशान्तिसप्रयच्छति। सहित: शिवसत्याद्यस्तथैववशवर्त्तिनः॥६
वे कहते हैं कि देवराट् सुशांन्ति शिव, सत्य और वशवर्ती देवताओं के सहित हमको सुख औरशांन्ति दे ॥९ ॥
अजःपरशुचिर्दिव्योमहाबलपराक्रमाः।
पुत्रास्तस्यमनोरासन्विख्यातास्त्रिदशोपमाः॥१०॥
उस मनु के देवताओंके सदृश तीन महावली और पराक्रमी पुत्र अज, परशुचि औरदिव्य नाम वाले हुएं ॥ १० ॥
तत्सूतिसम्भवभूमिःपालिताभून्नरेश्वरः। यावन्मन्वन्तरंतस्यमनोरुत्तमतेजसः॥११॥
उत्तम मनु का. जबतक मन्वन्तर रहा तब तक उसी के वंश के राजा लोग पृथ्वी पर शासन करते रहे ॥ ११ ॥
चतुर्युगाणांसंख्यातासाधिकाह्येकसप्ततिः। कुतत्रेतादिसंज्ञानांयान्युक्तानियुगेमया॥१२॥
जैसा किमैं पहिले कह चुकाहूँ सतयुग, त्रता, द्वापर, कलि- युग इन चारों युगांके इकत्तर चतुर्युग एक मन्वंतरमें होते हैं ||१२||
स्वतेजसाहितपसोवरिष्ठस्यमहात्मनः। तनयाश्चान्तरेतस्मिन्सप्तसप्तर्षयोऽभवन्॥१३॥
महात्मा वशिष्ठ के तेजस्वी सात पुत्र उस मम्वन्तर में सप्तर्षि कहलाये ॥ १३ ॥
तृतीयमेतत्कथितंतवमन्वन्तरंमया। तामसस्यचतुर्थन्तुमनोरन्तरमुच्यते॥१४॥
इस प्रकार मैंने तीसरे मन्वन्तर का हाल कह दिया । श्रव तामस नाम चौथे मन्वन्तरको कहता हूँ ||१४||
वियोनिजन्मनोयस्ययशसाद्योतितंजगत्। जन्मतस्यमनोब्रह्मन्श्रूयतांगदतोमम॥१५॥
हे क्रौष्टुकि मुनि ! जिस मनु का जन्म मनुष्येतर योनि में हुआ था और जिसके यश से जगतं
प्रकाशित होगया था उसका वर्णन मुझसे सुनो ॥१५
श्रतीन्द्रियमशेषाणाममूनांचरितंतथा।
तथा जन्मापि विज्ञेयं प्रभावश्च महात्मनाम् ||१६||
सबमहात्माऔरजितेन्द्रियमनुत्रोंमेंतामसमनु काजन्म, प्रभावऔरचरित्रअत्यन्तउत्तमहै॥१६॥ इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंऔत्तममन्वन्तरनाम७३वाँअध्यायसमाप्त |
Summary of chapter 72 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
The text describes major historical events and righteous conflicts resolved during the Third Manvantara through the divine intervention of Bhagavān Vishṇu, demonstrating that divine grace continually shelters those devoted to truth.