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मार्कण्डेय उवाच

अथसाऽवीक्षितोमातावीरावीरप्रजावती। पुण्येऽहनिसमाहूयप्राहपुत्रमवीक्षितम्॥१

मार्कण्डेयजी बोले.

इसके बाद वीर जननी वीरा ने एक शुभ दिनअपने पुत्र वीक्षित को बुलाकर कहा || १ ||

पुत्राहमभ्यनुज्ञातातवपित्रामहात्मना। उपवासंकरिष्यामिदुष्करोऽयंकिमिच्छकः॥२

हे पुत्र ! तुम्हारे महात्मा पिता की आज्ञा से मैं एक दुष्कर उपवास करूँगी जिसका नाम किमिच्छुक है ||२||

सचायत्तस्तवपितुस्त्वयासाध्योमयापिच। प्रतिज्ञातेत्वयापुत्रततस्तत्रयताम्यहम्॥३

यह व्रत तुम्हारे पिता का बताया हुआ है, इसलिये यह मुझे और तुम्हें दोनों को साधना चाहिये ।

परन्तु तुमने पिता के श्रागे प्रतिज्ञा की है, इसलिये मैं यत्न करती हूँ ॥ ३ ॥

द्रव्यस्याद्धमहाकोषात्तवदास्याम्यहंपितुः। धनंतेपितुरायत्तमनुज्ञाताऽस्मितेनच॥४ क्लेशसाध्योमदायत्तःसहिश्रेयोभविष्यति।

मैंतुम्हारेपिताकेखजाने काआधाधनतुमकोदूँगीऔरऐसाकरनेके लियेतुम्हारेपितानेमुझेश्राज्ञादेदीहै॥॥४॥

साध्योभवेद्वायदितेकश्चिद्वलपराक्रमे || ५ ||

यह व्रत कष्ट साध्य होगा परन्तु यह अत्यन्त श्रेष्ठ मंत है । यदि तुम अपना वल, पराक्रम प्रदर्शित करोगेतो यह व्रत सफल हो जावेगा ॥ ५ ॥

सतेऽसाध्योह्यन्यथावादुःखसाध्योभविष्यति। तत्त्वंप्रतिज्ञांकुरुषेयदिपुत्रात्रचैवते।। तदेतदहमावाप्स्येकथ्यतांयन्मतंतव || ६ ||

यह व्रत साध्य हो अथवा असाध्य ? हे पुत्र ! यदि तुम. प्रतिज्ञा करो तो मैं व्रत श्रारम्भ करूँ अथवा जो तुम्हारा मत हो वह कहो ॥ ६ ॥ . श्रवीक्षितउवाच

वित्तंमेपितुरायत्तंमत्स्वामित्वंनतत्र यन्मच्छरीरनिष्पाद्य ं तत् करिष्ये त्वयोदितम् ॥ ७ ॥

वीक्षितनेकहा :-- धनतोमेरेपिताकाहै, उसपरमेरास्वामित्वं नहींहै, जोमेरेशरीरकेयोग्यहोउसेकहियेमैंकरूँगा ||७|

किमिच्छकंव्रतंमातर्निचिन्ताभवनिर्व्यथा।

राज्ञा पित्राऽभ्यनुज्ञातं यदि वित्तेश्वरेण मे ॥ ८ ॥

हेमाता ! आपनिश्चिन्तहोकरपिता जीद्वाराश्राज्ञाकियेगयेकिमिच्छुकव्रतकोकरिये॥८॥ मार्कण्डेयउवाच

ततःसाराजमहिषीवदव्रतंसमुपोषिता। यथोक्तांसाकरोत्पूजांराजराजस्यसंयता॥६॥

मार्कण्डेयजी बोले-

फिर उस रानी ने राजा की आज्ञानुसार व्रत करना प्रारम्भ किया और उसने राजा का ॥ ६ ॥

निधीनामप्यशेषाणांनिधिपालगणस्यच। लक्ष्म्याश्चपरयाभक्त्यायतवाक्कायमानसा॥१०॥

सम्पूर्ण निधियोंका तथा निधियोंके पालक गणपति का और लक्ष्मीजी का मन, वचन और कर्मसे भक्ति पूर्वक पूजन किया ॥ १० ॥

विविक्तेतुगृहस्थोऽयमथराजाकरन्धमः। · श्रासीनउक्तःसचिवैनींतिशास्त्रविशारदैः॥११॥

जब महाराज करन्धम घर में बैठे हुए थे उस समय नीति और शास्त्र के जानने वाले मन्त्रियों ने कहा ॥ ११ ॥ सचित्राऊचुः

राजन्वयःपरिणतंतवैतच्छासतोमहीम्। एकस्तेतनयोऽवीक्षित्त्यक्तदारपरिग्रहः ||१२||

मन्त्री बोले:-

हे राजन् ! इस पृथ्वी पर शासन करते हुए आपकी अवस्था बीत चुकी है। श्रवीक्षित ही

आपके एक पुत्र हैं और उन्होंने स्त्री ग्रहण करनाछोड़ दिया है ||१२|

अपुत्रःसचतेनिष्ठांयदाभूपगमिष्यति। तदारिपक्षंपृथिवीनिश्रितंतवयास्यति॥१३॥

निस्संतान होते हुए जब वे राज्य सिंहासन पर बैठेंगे  तो निश्चय ही शत्रु लोग श्रापके राज्य को उनसे छीन लेंगे ॥१३॥

वंशक्षयस्तेभवितापितृपिण्डोदकक्षयः। एतन्महत्तेऽरिभयंक्रियाहान्याभविष्यति॥१४

पितरों को पिण्ड और जल देने वाला न रहने से आप का वंश क्षीण होजायगा । इससे चापको शत्रु-भय तथा क्रियाओं की हानि भी ॥ १४ ॥

तस्मात्कुरुतथाभूपयथातेतनयःपुनः। करोतिसततंबुद्धिंपितृणामुपकारिणीम्॥१५॥

हे राजन् ! इसलिये ऐसा यत्न कीजिये जिससे आपके पुत्र की ऐसी बुद्धि हो जिससे पितरों का हित हो ॥ १५ ॥ मार्कण्डेयउवाच

एतस्मिन्नन्तरेशब्दशुश्रावजगतीपतिः पुरोहितस्यवीरायागदतोहार्थिनंप्रति ||१६||

मार्कण्डेयजी बोले-

इसी अवसर पर महाराज ने अपनी स्त्री वीरा पुरोहित की आवाज़ सुनी जो कि याचकों सेयह कह रहे थे ॥ १६ ॥

कःकिमिच्छतिदुःसाध्यंकस्यकिंसाध्यतामिति। करन्धमस्यमहिषीकिमिच्छकमुपोषिता॥१७॥

बोलो, कौन क्या चाहता है? दुःसाध्य हो अथवा साध्य सब मिलेगा महाराज करन्धम की रानी वीरा किमिच्छुक व्रतकररही हैं ||१७|

राजपुत्रोऽप्यवीक्षिततुश्रुत्वापौरोहितंवचः। प्रत्युवाचार्थिनःसर्व्वान्राजद्वारमुपागतान् ||१८||

पुरोहित के वचन सुनकर राजकुमार अवीक्षितने भी राजद्वार पर श्राये हुए सब याचकों

से कहा ॥१८॥

मयासाध्यंशरीरेणयस्यकिञ्चिदब्रवीतुसः। मातामहाभागाकिमिच्छकमुपोषिता॥१६॥

मेरी सौभाग्यवती माता किमिच्छुक व्रत कर रही हैं, जो मेरे शरीर से संम्भव हो वह माँगो मैं दूंगा ॥१६॥ मार्कण्डेयपुराण

शृण्वन्तुमेऽर्थिनःसर्व्वेप्रतिज्ञातंमयातदा। किमिच्छयददाम्येषक्रियमाणेकिमिच्छके ||२०||

हे याचको ! सुनो ! मैंने यह प्रतिज्ञा की है कि किमिच्छुक व्रत के अवसर पर जो कोई जो कुछ

इच्छा करेगा वह मैं पूरी करूँगा ॥ २० ॥ मार्कण्डेयउवाच

ततोराजानिशम्यैतद्वाक्यंपुत्रमुखाच्च्युतम्। समुत्पत्यानवीत्पुत्रमहमर्थीप्रयच्छमे॥२१

मार्कण्डेयजी बोले-

इस समय पुत्र के मुख से यह वचन सुनकर राजा करन्धम पुत्र के पास गये और बोले, "हे

पुत्र | मैं याचक हूँ, मुझे दो ॥ २१ ॥ अवीचिदुवाच

दातव्यंयन्मयातातभवतेतद्ब्रवीहिमाम्। कर्त्तव्यंदुष्करंवाऽतिसाध्यंदुःसाध्यमेववा॥२२॥

श्रवीक्षित वोले:-

हे तात ! मुझे आपको जो कुछ देना चाहिये वह आप मुझे बतावै, वह चाहे साध्य हो अथवा

दुःसाध्य और कितना ही कठिन क्यों न हो ॥ २२ ॥ राजोवाच

यदिसत्यप्रतिज्ञस्त्वंददासिचकिमिच्छकम्।

पौत्रस्यदर्शयमुखंममोत्सङ्गगतस्यतत् ||२३||

राजा बोले:-

यदि तुम सत्य-प्रतिश हो और जो कोई जो कुछ याचना करता है उसे बही देते हो तो मुझे

मेरी गोद में पौत्र का मुख दिखलाओ ॥ २३ ॥ वीचिदुवाच

अहंतवैकस्तनयोब्रह्मचर्य्यश्चमेनृप। नमेपुत्रोऽस्तिपौत्रस्यदर्शयामिकथंमुखम्॥२४॥

श्रवीक्षित वोले:-

हे राजन् ! मैं आपका एक ही पुत्र हूँ और मेरा ब्रह्मचर्य जीवन है । मेरे कोई पुत्र नहीं है अंतः

मैं आपको नाती का मुख किस प्रकार दिखलाऊँ ॥२४ राजोवाच

पापायब्रह्मचर्यंतेयदिदंधार्यतेत्वया। तस्मात्त्वंमोचयात्मानंममपौत्रश्चदर्शय ||२५||

राजा बोले--

तुमको ब्रह्मचर्य धारण से पाप होगा अतः तुमश्रात्मा का उद्धार करके मुझे नाती का मुख दिखलाओ ||२५|| श्रवीचिदुवाच

विपमंस्यान्महाराजयदन्यत्तत्समादिश। वैराग्येणमयात्यक्तःस्त्रीसंम्भोगस्तथास्तुसः॥२६

प्रवीक्षित वोले:-

हे महाराज ! यह कठिन है, और जो कुछ श्राशा हो वह मैं करूँ । मैंने वैराग्य से स्त्री संभोगछोड़ दिया है ॥ २६ ॥ राजोवाच

चहुभिर्युध्यमानानांदृष्टोवैवैरिणांजयः। तत्रापियदिवैराग्यमुपैपितदपण्डितः॥२७॥

राजा बोले:-

मैं बहुत से राजाओं ने मिलकर तुमको युद्ध जीता है इसलिये तुमको वैराग्य न होना चाहिये ।

यदि इससे तुम्हें वैराग्य होता है तो यह तुम्हारीमूर्खता है || २७ ॥

किंवानोबहुनोक्तेनब्रह्मचर्यंपरित्यज। मातुस्त्वमिच्छयावक्त्रंपौत्रस्यममदर्शय ||२८||

बहुत कहने से क्या है ? तुम ब्रह्मचर्य को छोड़ कर अपनी माताकी इच्छानुसार मुझे नाती का मुख दिखलाओ ॥ २८ ॥

मार्कण्डेयउवाच

यदासवहुभिस्तेनप्रोक्तःपुत्रेणपार्थिवः। नान्यत्प्रार्थयतेकिश्चित्तदापुत्रोऽब्रवीत्पुनः२६॥

मार्कण्डेयजी बोले-

यद्यपि श्रवीक्षित ने राजा को बहुत समझाया परन्तु उन्होंने नाती को छोड़कर और किसी वस्तु

की इच्छा न की, इस पर अवीक्षित बोले ||२६||

दत्त्वाकिमिच्छकंतुभ्यंप्राप्तोऽहंतात्सङ्कटम्। तंत्करिष्यामिनिर्लज्जोभूयोदारपरिग्रहम्॥३०॥

हेतात।आपसेप्रतिज्ञाकरकेमैंसङ्कटमेंपड़गया हूं | अतःग्रंवलज्जाछोड़करस्त्री. ग्रहणकरूँगा ||३०॥

स्त्रियः समक्षं विजितः पातितो धरणीतले । स्त्रीपतिर्भविता · भूयस्तातैतदतिदुष्करम् ||३१||

हे तात ! जिस स्त्री के सन्मुख मैं परास्त होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा व उस स्त्री का पति होनामुझेबड़ादुष्करमालुमहोताहै॥३१॥

तथापिकिंकरोम्येषसत्यपाशवशंगतः। करिष्यामियथात्थत्वंभुज्यतांनिजशासनम् ||३२||

परन्तुक्याकरूँ ? सत्यकेपाशमेंबँधाहूँ, जोश्रापने आज्ञादीहैवहीकरूँगा।आपअपनाराज्यकीजिये॥३२॥ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंवीक्षितचरित्र (४) नाम१२५वाँश्र०स०।