मार्कण्डेय महा पुराण
118
मार्कण्डेयउवाच
ततःसमस्तलोकस्यविस्मयःसोऽभवन्महान्। यदेककालंनेशुस्तेपृथक्पुरनिवासिनः॥१
मार्कण्डेयजी बोले-
अलग अलग ग्रामों में रहने वाले पुरोहितों और मन्त्री विश्ववेदि के एक ही समय में मर
जाने पर समस्त प्रजा को बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ १ ॥
ततःश्रुश्रावनिधनंयातानभ्रातृपुरोहितान्। मन्त्रिणञ्चतथाभ्रातुर्दग्धंतंविश्ववेदिनम्॥२
भाइयों के पुरोहितों और शौरि नामक भाई के मन्त्री विश्ववेदि के एक साथ भस्म होजाने कासमाचार सुनकर ||२||
किमेतदितिसोऽतीवविस्मितोमुनिसत्तम। खनित्रोऽभून्महाराजोनाजानात्तच्चकारणम्॥३॥
हे कौटुकि मुनि ! महाराज खनित्र को बड़ा श्राचर्य हुआ और वह कहने लगे । कि यह क्या हुआ। परन्तु इसका कारण उन्हें ज्ञातन हुआ ॥ ३ ॥
ततोवशिष्ठंपप्रच्छसराजागृहमागतम्।
यत्कारणं विनेशुस्ते भ्रातृमन्त्रिपुरोहिताः ॥ ४
इसकेअनन्तरवशिष्ठमुनिकेघर'आने पर महाराज ने उनसे भाइयों के पुरोहितों और विश्ववेदि मन्त्री के एक साथ भस्म होजानेका कारण पूछा ॥ ४ ॥
तेनपृष्टस्तदाप्राहयथावृत्तंमहामुनिः। यच्छौरिमन्त्रिणाप्रोक्तंयच्चशौरिरुवाचतम् || ५
उनके पूछने पर महामुनि वशिष्ठ ने जो कुछ वृत्तान्त था वह तथा जो कुछ शौरिके मन्त्री विश्ववेदि ने शौरिसे और फिर शौरि ने विश्ववेदि से कहा था वह सब कह सुनाया ||५||
यथाचानुष्ठितंतेनभ्रातृणांभेदकारिवै।
मन्त्रिणातेनदुष्टेनयच्चक्रुश्चपुरोहिताः॥६
तथा जिस प्रकार उस दुष्ट मन्त्री ने भाइयों में भेद कराया और पुरोहितों को कुमन्त्रणा दी ॥ ६ ॥
यन्निमित्तंविनेशुस्तेअपापस्यापकारिणः। पुरोहितास्तस्यराज्ञःशत्रावपिदयापराः॥७
और चूंकि राजा खनित्र पापी न थे और शत्रुओं पर भी दया रखते थे इसलिये वे पुरोहित स्वयं नष्ट होगये ॥ ७ ॥
सतच्छ्रुत्वाततोराजाहाहतोऽस्मीतिवैवदन्। निनिन्दात्मानमत्यर्थंवशिष्ठस्याग्रतोद्विजः॥८॥
इस सव वृत्तान्त को सुनकर महा- राज खनित्र ने कहा, " हा ! मैं मारा गया !" और
उन्होंने अपनी ही द्विज वशिष्ठ के सन्मुख खूब निन्दा की ॥ ८ ॥ राजोवाच
धिङ्मामपु एयसंस्थानमल्पभाग्यमशोभनम् ।
दैवदोषकृतं पापं सर्व्वलोकविगर्हितम् ॥ ६
राजाबोले:- मुझपापीमन्दभागी, दुष्टकोधिक्कारहै, जिसकेकिदुर्भाग्यसेयहसंसारमेंनिन्दाकरनेवाला पाप हुआ ॥ ६ ॥ तन्निमित्तंविनष्टंयत्तद्ब्राह्मणचतुष्टयम्। मत्तःकोऽन्यःपापतरोभविष्यतिपुमान्भुवि॥१०॥
मेरे ही निमित्त वे चार ब्राह्मण मारे गये। इस पृथ्वी पर मेरे बराबर दूसरापापी कौन है ? ॥१०॥
नाभविष्यंयदिपुमानहमत्रमहीतले।। तस्तेनविनश्येयुर्ममभ्रातृपुरोहिताः॥११
यदि मैं पृथ्वी पर इस तरह का पापी मनुष्य न होता तो मेरे भाइयोंके पुरोहित क्यों मारे जाते १ ॥ ११ ॥
घेग्राज्यंधिक्चमेजन्मभूभुजांमहतांकुले। कारणत्वंगतोयोऽहंविनाशस्यद्विजन्मनाम् ||१२||
मेरे राज्य करने, जन्म लेने और कुल को धिक्कार है कि जिसके कारण मैं चार ब्राह्मणों के नाश का हेतु हुआ ॥ १२ ॥
कुर्व्वन्तःस्वामिनांतेऽर्थंभ्रातृणांममयाजकाः। नाशंययुर्नदुष्टास्तेदुष्टोऽहंनाशकारणे॥१३
वे तो अपने स्वामियों का जो कि मेरे भाई हैं कार्य कर रहे थे, वे मेरे लिये नाश को प्राप्त हुए । अतः वे दुष्ट नहीं वरन उनके नाश का कारण रूप दुष्ट मैं हूं॥ १३॥
केकरोमिकगच्छामिनान्योमत्तोहिपापकृत् पृथिव्यामस्तिहेतुत्वंद्विजनाशस्ययोगतः॥१४-
क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? मेरे समान इस पृथ्वी पर कोई पापी नहीं है जो कि मैं ब्राह्मणों केनाश का हेतु हुआ ||१४||
त्यमुद्विग्नहृदयःखनित्रःपृथिवीपतिः। नंयियासुःपुत्रस्यकृतवानभिषेचनम्॥१५॥
यह विचार कर महाराज खनित्र बड़े व्याकुल हुए और वे पुत्र को राज्य तिलक देकर वनको चले गये ॥ १५ ॥
प्रभिषिच्यसुतंराज्येक्षुपसंज्ञंमहीपतिः। माय्र्याभिस्तिसृभिःसार्द्धंतपसेसवनंययौ॥१६
महाराज खनित्र अपने क्षुप नाम पुत्र का राज्याभिषेक करके तीन पत्नियों सहित तप करने को वन में गये ॥ १६॥ .
तत्रगत्वातपस्तेपेवानप्रस्थविधानवित्। रातानित्रीणिवर्षाणांसार्द्धानिनृपसत्तमः॥१७॥
वहाँ जाकर उन श्रेष्ठ राजा ने वानप्रस्थ विधान से साढ़े तीन सौ वर्ष तक तपस्या की ॥ १७ ॥
उपसाक्षीणदेहस्तुराजवय्योंद्विजोत्तम। निगृह्यसर्व्वस्रोतांसितत्याजासूनवनेचरः || १८
हे दुर्बल होगये और फिर उन्होंने सब तीर्थों के जल द्विजोत्तम । वे श्रेष्ठ राजा तपके कारण अत्यन्त से स्नान करके उसी वन में प्राण त्याग दिये ॥१८॥
उतःपुण्यान्ययौलोकान्सर्व्वकामदुहोऽक्षयान्। येनराधिपैः॥१६॥
प्राणत्यागनेपरवेसबकामनाओंको पूर्ण करन वाले उन अक्षय पुण्यलोकोंकोप्राप्तहुएजोकि अश्वमेधआदियज्ञकरनेपरराजाओंको प्राप्त होतेहैं॥१६॥
भाय्याश्चतस्यतास्तिस्रःसमंतेनैवतत्यजुः। प्राणान्वपुःसमालोक्यंतेनैवसुमहात्मना॥२०
उस महात्मा राजा के समान उसकी तीनों स्त्रियों ने भी उसके साथ साथ प्राणों को त्याग अक्षय
लोकों को माप्त किया ॥ २० ॥
एतत्खनित्रचरितंश्रुतंकल्मषनाशनम्। पठताञ्चमहाभागक्षुपस्यातोनिशामय || २१ |||
हे कौटकि जी ! महाराज खनित्र का यह चरित्र सुनने और पढ़ने से पापों का नाश करता है । अव श्राप चुप कावृत्तान्त सुनिये ॥२१॥ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंखनित्रचरित्र ( २ ) नाम११८वाँश्र०स०
Summary of chapter 118 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
King Khanitra's forest penance is celebrated as he dissolves all personal desires and merges his consciousness in the Supreme Soul, setting a luminous example of royal detachment and forgiveness.