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मार्कण्डेय उवाच

पूषभ्राख्योमनोःपुत्रोमृगव्यामगमद्वनम्। तत्रचंक्रममाणोऽसौविपिनेनिर्जनेवने॥१

मार्कण्डेयजी बोले-

सावर्णि मनु के पुत्र राजा पूषन एक बार नृगया के लिये वन में गये और वे वहाँ पर घूमते

घूमते बहुत दूर एक निर्जन वन में पहुँच गये ॥१॥

नाससादमृगंकञ्चिद्वानुदीवितितापितः। क्षुत्तृट्तापतरीताङ्गइतश्चेतश्थचंक्रमन्॥२

परन्तु उनको कोई मृग न मिला और वे सूर्य की गर्मी से संतप्त होकर इधर-उधर घूमने लगे ॥२॥

सददर्शतदातत्रहोमधेनुंमनोहराम्। नतावतानसम्बद्धांब्राह्मणस्यान्निहोत्रिणः॥३॥

उनको दूर से एक होमधेनु दीख पड़ी जो कि वस्तुतः एक अग्निहोत्री ब्राह्मण की थी ॥ ३ ॥

समन्यमानोगवयमिषुरणातामताडयत्। पपातसापितद्वाणविभिन्नहृदयाभुवि॥४

राजा पूयन ने उसको नीलगाय समभकर उसके एक चारा मारा जिसके लगते ही उसकी छाती

फट गई और वह पृथ्वी पर गिर पड़ी ॥ ४ ॥

ततोऽग्निहोत्ररणःपुत्रोब्रह्मचारीतपोरतिः। शप्तवान्सपितुर्दृष्ट्राहोमधेनुंनिपातिताम्॥५

तव उस अग्निहोत्री के ब्रह्मचारी और तपस्त्री पुत्र ने पिता की होमधेनु को देखकर राजा को शाप दिया॥ ५ ॥

गोपालःप्रेषितःपुत्रोचाम्रन्योनामनामतः। कोपामर्षपराधीनचित्तवृत्तिस्ततोमुने। चुकोपविगलत्त्रंद-जललोलाविलेक्षणः॥६

  हे सुनि ! बाभ्रव्य नाम उस पुत्र को गाय चराने के लिये मेजा गया था उनकी चित्त वृत्ति

क्रोधयुक्त होगई और गुस्से से उसे पसीना आ  गया तथा उसके नेत्र चंचल होगये ॥ ६॥

तंक्रुद्धंप्रेक्ष्यसनृपःपृपनोमुनिदारकम्। प्रसीदेतिजगौकस्माच्छूद्रवत्कुरुषेरुषम्॥७

राजा धूपन उस मुनि कुमार को क्रोधित हुत्रा देखकर उससे कहने लगे, “प्रसन्न हूजिये, आप शुद्र कीतरह क्रोध क्यों करते हैं ? ॥ ७ ॥

नक्षत्रियंनवावैश्यमेवंक्रोयउपैतिवै। यथात्वंशूद्रवज्जातोविशिष्टेब्रह्मणःकुले॥८

विशिष्ट ब्राह्मण - कुल में उत्पन्न होकर भी आप शूद्रवत् होगये, ऐसा क्रोध तो क्षत्रिय और वैश्य भी नहीं करते ||८॥ मार्कण्डेयउवाच

इतिनिर्भत्सितस्तेनसराज्ञामौलिनःसुतः। शशापतंदुरात्मानंशूद्रएवभविष्यति॥६

मार्कण्डेयजी बोले-

जब राजा ने मौलि पुत्र बाभ्रव्य की इस तरह भर्त्सनाकी तो उन्होंने राजासे कहा, "हे दुरात्मन् !तू शब्द ही होगा" ॥ ६ ॥

प्रयास्यतिक्षयंब्रह्मयत्तेऽधीतंगुरोर्मुखात्। हामधेनुर्ममगुरोर्यदियंहिंसितात्वया॥१०॥

चूंकितुमनेमेरेगुरुकी होमधेनुकोमाराहैइसलियेजोकुछवेदवाक्य तुमनेअपनेगुरुले पड़ेहैंवेतुमसबभूलजाओगे१०॥

एवंशप्तोनृपःक्रुद्धस्तच्छापपरिपीडितः। प्रतिशापपरोविप्रतोयंजग्राहपाणिना॥११॥

इस प्रकार शाप दिये जाने पर राजा को दुःखौर देने के लिये हाथ में जल ले लिया ॥ ११ ॥

सोऽपिराज्ञोविनाशायकोपंचक्रेद्विजोत्तमः। तमभ्येत्यत्वरायुक्तोवारयामासवैपिता॥१२

उस क्रोध उत्पन्न हुआ और उन्होंने मुनिपुत्र को शाप श्रेष्ठ ब्राह्मण ने भी राजा के नष्ट करने के लिये कोप किया । दैवात् उसी समय मुनिकुमार के पिता ने शीघ्र वहां पहुँच कर उनको रोका ॥१२॥

वत्सालमलमत्यर्थंकोपेनायतिवैरिणा। ऐहिकामुष्मिकहितःशमएवद्विजन्मनाम्॥१३॥

उसने कहा कि हे पुत्र ! व्यर्थ इतना 'कोध मत करो, क्रोध ब्राह्मण का शत्रु है। इस लोक और परलोक, में ब्राह्मण का हित इसी में है कि वह शान्त रहे ॥१३॥

कोपस्तपोनाशयतिक्रुद्धोभ्रश्यत्यथायुषः। क्रुद्धस्यगलतेज्ञानंक्रुद्धार्थाच्चहीयते॥१४

कोप तप को नष्ट करता है । क्रोधी का ज्ञान तथा धन नाश को प्राप्त हो जाता है ॥१४॥

नधर्म्मःक्रोधशीलस्यनार्थञ्चानोतिरोषणः। नालंसुखायकामाप्तिःकोपेनाविष्टचेतसाम् ||१५||

क्रोधी का धर्म नहीं रहता और न उसको धन ही मिलता है । अभिलाषा पूर्ण होने पर भी क्रोधियों को सुख नहींमिलता है ॥ १५ ॥

यदिराज्ञाहताधेनुरियंविज्ञानिनासता। युक्तमत्रदयांकर्त्तुमात्मनोहितवोधिना॥१६॥

यदि राजा ने अनजान में इस गाय को मार दिया है तो हमको अपने हित का विचार करके इन पर दया करना चाहिये ॥ १६॥

अथवाऽजानताधेनुरियंव्यापादितामम। तत्कथंशापयेोग्योऽयंदुष्टंनास्यमनोयतः॥१७॥

अर्थात् जब इन्होंने विना जाने भूल से मेरीको गाय मार दिया है तो यह शाप के योग्य किस प्रकार है । कारण इनका मन शुद्ध है ॥ १७ ॥ श्रात्मनोहितमन्विच्छन्बाधतेयोऽपरंनरः। कर्त्तव्यामूढविज्ञानेदयातत्रदयालुभिः || १८ ||

  वे मनुष्य दूसरे हैं जो अपनी भलाई के लिये दूसरे को दुःख देते हैं, जो लोग कर्तव्य का ज्ञान न होने पर अर्थात भूल से अपराध करते हैं वे केवल दया के पात्र हैं ॥ १८ ॥

अज्ञानतःकृतेदण्डंपातयन्तिबुधायदि। बुधेभ्यस्तमहंमन्येवरमज्ञानिनोनराः॥१६॥

यदि ज्ञानी लोग अज्ञान से किये हुए कार्य को दण्डित करें तो उन ज्ञानियों से मैं श्रज्ञांनी

लोगों को अधिक अच्छा समझता हूँ ॥ १६ ॥

नाद्यशापस्त्वयादेयःपार्थिवस्यास्यपुत्रक। स्वकर्म्मणैवपतितागौरेषादुःखमृत्युना ||२०||

पुत्र ! तुम्हें राजाको शाप नहीं देना चाहिये कारण इस गौने अपनी आयु समाप्त करके मृत्यु पाईं हैं॥२०॥ मार्कण्डेयउवाच

पूषधोऽपिमुनेःपुत्रंप्रणम्यानम्रकन्धरः। प्रसीदेतिजगादोच्चैरज्ञानाद्वघातितेतिच॥२१

मार्कण्डेयजी बोले-

इसके बाद पूपध ने प्रणाम कर मुनिकुमार से कहा, "श्राप प्रसन्न हों, मैंने अज्ञान में इस गायको मारा है” ||२१||

मयागवयबुद्ध्यागौरवच्याघातितामुने। श्रज्ञानाद्धोमधेनुस्तेप्रसीदत्वश्चनोमुने ||२२||

 हे मुनि ! मैंने बिना जाने व ध्या गायको नीलगाय समझकर मारा है । हैमुनिं । आप मुझपर कृपा करें ॥ २२ ॥ ऋषिपुत्रउवाच

'आजन्मनोमहीपालनमयाव्याहृतंमृषा। क्रोधाद्यमहाभागनान्यथामेकदाचन॥२३॥

ऋषिपुत्र बोले-

हे राजन् ! मैंने श्राजन्म कभी मिथ्या नहीं बोला श्रतः हे महाभाग ! मेरा क्रोध मूंठा न होगा || २३ ||

तन्नाहमेनंशक्नोमिशापंकर्त्तुंनृपान्यथा। यस्तेसमुद्यतःशापोद्वितीयःसनिवर्त्तितः॥२४॥

श्रतः श्रव मैं इस शाप को श्रन्यथा नहीं कर सकती परन्तु दूसरा शाप जो कि मैं देने को उद्यत था अव न दूँगा ॥ २४ ॥

इत्युक्तवन्तंतंबालमादायसपिताततः। जगाम स्वाश्रमं सोऽपि पूषधः शूद्रतामगात् ||२५||

इसप्रकारकहतेहुएउसमुनि  कुमारकोउसकेपिताश्राश्रममेंलेगयेऔरराजा पूंषधभीशापवशशूद्रहोगये || २५ || इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंपूषनउपाख्यानकथननाम११२वाँअध्यायस०