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मार्कण्डेय उवाच

एवन्तुस्तुवतस्तस्यतेजसेाराशिरुच्छ्रितः। प्रादुर्व्वभूवसहसागगनव्याप्तिकारकः॥१

मार्कण्डेयजी बोले-

रुचि के इस प्रकार स्तुति करने पर एक तेज- समूह सहसा प्रगट हुआ और आकाश में व्याप्तहोगया ॥ १ ॥

तद्दृष्ट्वासुमहत्तेजःसमासाद्यस्थितंजगत्। जानुभ्यामवनिंगत्वारुचिःस्तोत्रमिदंजगौ॥२

उस महान तेज को जगत् में फैला हुआ देखकर रुचि ने पृथ्वी पर घुटने टेककर यहस्तोत्र गाया ॥ २ ॥ रुचिरुवाच

अर्चितानाममूर्त्तानांपितॄणांदीप्ततेजसाम्। नमस्यामिसदातेपांध्यानिनांदिव्यचक्षुपाम् || ३

ऋषि बोले-

मैं चित, सूर्त, दीस-तेज वाले ध्यानी और दिव्यचक्षु वाले पितरों को नमस्कार करता हूँ|| ३||

इन्द्रादीनाञ्चनेतारोदक्ष-मारीचयोस्तथा। सप्तर्षीणांतथान्येषांतान्नमस्यामिकामदान्॥४

मैं उन श्रभिलाषा पूर्ण करने वाले पितरों को । नमस्कार करता हूँ जो इन्द्र, दक्ष, मारीच, सप्तर्षि

तथा अन्य देवताओं तक लेजाते हैं ||४||

मन्वादीनांमुनीन्द्राणांसूर्य्याचन्द्रमसोस्तथा। तान्नमस्याम्यहंसर्व्वान्पितृनप्सूदधावपि॥५॥

मनुयादि, मुनीन्द्रों और सूर्य चन्द्रमा तक लेजाने वाले तथा जल और समुद्र में रहनेवाले पितरों को मैं प्रणामकरता हूँ ॥ ५ ॥

नक्षत्राणांग्रहाणाश्चवाय्वग्न्योर्नभसस्तथा। द्यावापृथिव्योश्चतथानमस्यामिकृताञ्जलिः || ६ ||

  मैं हाथ जोड़कर उन पितरों कोप्रणाम करता हूं जो नक्षत्र, गृह, वायु, अग्नि, श्राकाश, स्वर्ग और पृथ्वी आदि प्राप्त कराते हैं ॥६

देवर्षीणांजनितुचसर्व्वलोकनमस्कृतान्। अक्षय्यस्यसदादातृन्नमस्येऽहंकृताञ्जलिः॥७॥

मैं हाथ जोड़ कर उन पितरों को प्रणाम करता हूं जो देवता और ऋपियों के पिता हैं तथा जिनको

सय जगत् नमस्कार करता है और जो अक्षयफलके देनेवाले हैं ॥ ७ ॥

प्रजापतेःकश्यपायसोमायवरुणायच। योगेश्वरेभ्यश्चसदानमस्यामिकृताञ्जलिः॥८

 मैं हाथ जोड़ कर प्रजापति, कश्यप, सोम, वरुण और योगेश्वर पितरों कोप्रणाम करता हूँ ||८||

नमोगणेभ्यःसप्तभ्यस्तथालोकेषुसप्तपु।

स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ॥ ६ ॥

 मैं सातों लोक के सातों गों तथा स्वायम्भुव और योगचनु ब्रह्माजी को प्रणाम करता हूँ ॥ ६ ॥

सोमाधारान्पितृगणान्योगमूर्त्तिधरांस्तथा। नमस्यामितथासोमंपितरंजगतामहम्॥१०

मैं सोम और योगमूर्ति को धारणकरने वाले पितरों  तथा समस्त संसार के पितरचन्द्रमा को प्रणाम करता हूं ॥ १० ॥

: अग्निरूपांस्तथैवान्यान्नमस्यामिपितुनहम्। अनीषोममयंविश्वंयतएतदशेषतः॥११॥

मैं अग्नि रूप उन दूसरे पितरों को नमस्कार करता हूं जिनसे कि यह सम्पूर्ण जगत् अग्नीपोममय होरहा है ॥११॥

येतुतेजसियेचैतेसोमसूर्याग्निमूर्त्तयः। जगत्स्वरूपिणचैवतथाब्रह्मस्वरूपिणः॥१२॥

वे पिनर जो कि तेजमें चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के समान हैं तथा जगत्स्वरूपी और ब्रह्मस्वरुपी हैं ।१२॥ तेभ्योऽखिलेभ्योयोगिभ्यःपितृभ्योयतमानसः। नमोनमोनमस्तेमेप्रसीदन्तुस्वधाभुजः || १३||

 उन सब योगी, नियतात्मा और स्वधाभोजीपितरों को मैं वार-बार नमस्कार करता हूँ, वे मुझ परप्रसन्न हों ॥ १३ ॥

मार्कण्डेयउवाच

एवंस्तुतास्ततस्तेनतेजसामुनिसत्तम। निचक्रमुस्तेपितरोभासयन्तोदिशोदश || १४.

मार्कण्डेयजी बोले--

हे कौटुकि मुनि ! रुचि के इस प्रकार स्तुति करने पर पितरगा उस तेज से दशों दिशाओं को

प्रकाशित करते हुए निकले ॥ १४ ॥

निवेदितञ्चयत्तेनपुष्पगन्धानुलेपनम्। तद्भूषितांनयसतान्ददृशेपुरतःस्थितान् ||१५||

रुचि ने जो कुछ पुष्प, गन्ध, चन्दन यदि निवेदन किया था रुचि ने उस सब से उनको भूषित हुआ अपने सामने खड़े हुए देखा || १५||

प्रणिपत्यपुनर्भक्त्यापुनरेवकृताञ्जलिः। नमस्तुभ्यंनमस्तुभ्यमित्याहपृथगादृतः ||१६||

 फिर भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर और प्रणाम करके रुचि उनकी चादर पूर्वक पृथक्-पृथक् पूजा करने लगे और आपको प्रणाम है ऐसा बार-बार कहने लगे ॥१६॥

ततःप्रसन्नाःपितरस्तमूचुर्मुनिसत्तमम्। वरंवृणीष्वेतिसतानुवाचानतकन्धरः ||१७||

 तव प्रसन्न होकर पितरों ने मुनिश्रेष्ठ रुचि से कहा कि वर मांगो। इसपर वह प्रणामकर उनसे बोले ॥ १७ ॥ रुचिरुवाच

साम्प्रतंसर्गकर्तृत्वमादिष्टंब्रह्मणामम। सोऽहंपत्नीमभीप्सामिधन्यांदिव्यांप्रजावतीम्॥१८॥

रुचि वोले-

इस समय ब्रह्माजी ने मुझे सृष्टि रचनेके लियेआदेश किया है  अतः मैं प्रजावती, सुन्दरी पतिव्रता स्त्री की अभिलाषा करता हूँ ॥ १८ ॥

पितरऊचुः

नैवसद्यःपत्नीतेभवत्वतिमनोरमा। तस्याश्चपुत्रोभविताभवतोमनुरुत्तमः॥१६॥

पितर बोले-

यहाँ ही शीघ्र तुमको एक सुन्दरी स्त्री मिलेगी उससे तुम्हारा एक पुत्र होगा जो कि उत्तम मनुहोगा ||१६||

मन्वन्तराधिपोधीमांस्त्वन्नाम्नैवेापलक्षितः। रुचेरौच्यइतिख्यातियोयास्यतिजगत्त्रये॥२०॥

वह मन्वन्तरका स्वामी और बुद्धिमान् तथा तुम्हारे नाम परही रौच्य नामसे तीनों लोकों

में विख्यात होगा ॥ २० ॥

तस्यापिवहवःपुत्रामहाबलपराक्रमाः। भविष्यन्तिमहात्मानःपृथिवीपरिपालकाः ||२१||

उसके भी महाबलवान, पराक्रमी और पृथ्वी-पालक बहुत से महात्मा पुत्रहोंगे ॥ २१ ॥

त्वंचप्रजापतिर्भूत्वाप्रजाःसृष्ट्वाचतुर्विधाः। क्षीणाधिकारोधर्म्मज्ञततःसिद्धिमवाप्स्यसि ||२२||

  तुम भी प्रजापति होकर चार प्रकार की सृष्टि उत्पन्न करोगे ।  हे धर्मज्ञ ! उस अधिकारके क्षीस होने पर तुम सिद्ध हो जाओगे ||२२||

स्तोत्रेणानेनचनरोयोऽस्मानस्तोष्यतिभक्तितः। तस्यतुष्टावयंभोगानात्मज्ञानंतथेोत्तमम् ||२३||

इस स्तोत्र से जो मनुष्य भक्ति पूर्वक हमारी स्तुति करेगा उसले सन्तुष्ट होकर हम उसे भोग औरउत्तम श्रात्मज्ञान ||२३||

शरीरारोग्यमर्थश्चपुत्रपौत्रादिकंतथा। वह्निःसंततंस्वव्याःस्तोत्रेणानेनवैयतः॥२४॥

शरीर की श्रारोग्यता, धन,पुत्र,पौत्रादिक देंगे।  जिन लोगोंको कुछ श्राकांक्षाहो उन्हें निरन्तर इल स्तोत्रसे हमारी स्तुति करनी चाहिये ||२४||

श्राद्धेचयइमंभक्त्याअस्मत्प्रीतिकरंस्तवम्। पठिष्यतिद्विजाग्रयाणांभुजतांपुरतःस्थितः ||२५||

हमको प्रसन्न करने वाले इस स्तोत्र को यदि मनुष्य श्राद्ध में भोजन करते हुए ब्राह्मणों

के श्रागे खड़ा होकर भक्तिपूर्वक पढ़े तो ||२५||

स्तोत्रश्रवणसम्प्रीत्यासन्निधानेपरेकृते। अस्माकमक्षयंश्राद्धंतद्भविष्यत्यसंशयम्॥२६

इस स्तोत्र के सुनने को हम प्रसन्न होकर वहाँ रहेंगे और हमारा वह श्राद्ध अक्षय होगा, इसमें सन्देहनहीं ॥ २६ ॥

यद्यप्यश्रोत्रियंश्राद्धंयद्यप्युपहतंभवेत्। अन्यायापात्तवित्तेनयदिवाकृतमन्यथा॥२७॥

चाहे श्राद्ध में पण्डित न हो, अथवा कोई विघ्न होजाय, अथवा अन्याय से संचित धनसे श्राद्ध किया जाय ॥ २७ ॥

श्रश्राद्धाहैरुपहतैरुपहारैस्तथाकृतम् 1 अकालेऽप्यथवाऽदेशेविधिहीनमथापिवा॥२८||

तथा चाहे श्राद्ध केअयोग्य और जंठे पदार्थों से उसको सम्पन्न किया जाय और उसे कुसमय. कुदेश और विना विधिके ही किया जया || २८||

अश्रद्धावापुरुपैर्दम्भमाश्रित्यवाकृतम्। अस्माकंतृप्तयेश्राद्धंतथाप्येतदुदीरणात् ||२६||

अथवा चाहे उसे श्रद्धाके विना, दम्भ का श्राश्रय लेकर ही किसी मनुष्य ने किया हो परन्तु ऐसे श्राद्धश्राद्ध से भी यदि उसमें यह स्तोत्र पढ़ा जायगा तो हमारी तृप्ति होजायगी२६ ॥

यत्रैतत्पठ्यतेश्राद्धस्तोत्रमस्मत्सुखावहम्। अस्माकंजायतेतृप्तिस्तत्रद्वादशवार्षिकी ||३०||

हमको सुख देने वाला यह स्तोत्र जिस श्राद्ध में पढ़ा जाता है उससे हमारी बारह वर्षतक तृप्ति रहती है ॥ ३० ॥

हेमन्तेद्वादशाब्दानितृप्तिमेतत्प्रयच्छति। शिशिरेद्विगुणाब्दांचतृप्तिस्तोत्रमिदंशुभम्३१

हेमन्त ऋतु में श्राद्ध करके इस स्तोत्र को पढ़ने से हमारी चारह वर्ष तक तृप्ति रहती है तथा शिशिर ऋतु में ऐसा करने से यह स्तोत्र चौवीस वर्ष तक हमको तृप्तरखता है ॥ ३१ ॥

वसन्तेपोशसमास्तृप्तयेश्राद्धकर्म्मणि। ग्रीष्मेचपोड़शैवैतत्पठितंतृप्तिकारणम् ||३२||

वसन्त ऋतु में श्राद्ध करके इसस्तोत्र को पढ़ने से सोलह वर्ष तक और उसी प्रकार ग्रीष्म ऋतु में भी ऐसा करने से यह स्तोत्रंहमको सोलह वर्ष तक तृप्त रखता है ॥ ३२ ॥

विकलेऽपिकृतेश्राद्धस्तोत्रेणानेनसाधिते। वर्षासुतृप्तिरस्माकमक्षयाजायतेरुचे ||३३|

  हे रुचि ! यदि श्राद्ध में कर्ता को विकलता होजाय  तो भी इस स्तोत्र की साधना से और वर्षा ऋतु में श्राद्ध करके इसको पढ़ने से हमारी अक्षय तृप्तिहोती है ॥ ३३ ॥

शरत्कालेऽपिपठितंश्राद्धकालेप्रयच्छति। अस्माकमेतत्पुरुषैस्तृप्तिपंचदशाव्दिकीम्॥३४॥

शरद ऋतु में श्राद्ध-समय पढ़ाइधर यह स्तोत्र हम लोगों को पन्द्रह वर्ष तक तति-कारक है ॥ ३४ ॥

यस्मिन्गृहेचलिखितमेतत्तिष्ठतिनित्यदा। सन्निधानंकृतेश्राद्धतत्रास्माकंभविष्यति ||३५||

जिस घर में कि इस स्तोत्रको लिख कर रक्खा जायगा वहाँ हम श्राद्ध में हर समय समीप रहेंगे ॥ ३५ ॥

तस्मादेतत्त्वयाश्राद्धेविप्राणांभुजतांपुरः। श्रावणीयंमहाभागअस्माकंपुष्टिहेतुकम् ||३६||

इसलिये हे महाभाग !तुमको श्राद्ध में भोजन करते हुए ब्राह्मणों के आगे खड़े होकर इस स्तोत्रको हमारी पुष्टिके लियेसुनाना चाहिये ॥ ३६ ॥ इतिश्री मार्कण्डेयपुराणकेरौच्यमन्वन्तरमेंपितृवर-प्रदाननाम६७वाँश्र०समाप्त।