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मार्कण्डेयउवाच

 कारूषाःक्षत्रियाःशूराःकरूपस्याभन्तुताः। तेतुसप्तशतावीरास्तेभ्यश्वान्येमहस्रशः॥१॥

मार्कण्डेयजी बोले–

करूप के पुत्र सातसी कारूप क्षत्रिय हुए, उनसातसौ बीरों से हजारों क्षत्रिय उत्पन्न हुए ॥ १ ॥

दिष्टपुत्रस्तुनाभागःस्थितःप्रथमयौवने। ददर्शवैश्यतनयामतीवमुमनोहरान्॥२॥

दिए के पुत्र नाभाग ने अपने प्रथम चौवन में एक अत्यन्त सुन्दर वैश्य कन्या को देखा ॥ २ ॥

तस्यांसदृणुमात्राचांमदनाक्षिप्तमानसः। चभूवभूपतनयोनिश्वासाक्षेपतसः॥३

उसकोदेखते ही राजकुमार काम के वश में होकर ठण्डी श्वास लेने लगे ॥ ३ ॥

तस्यांसगत्वाजनकंवत्रेतांवैश्यकन्यकाम्। ततोऽनङ्गपराचीनमनोवृत्तिनृपात्मजम्॥४॥

फिर राजपुत्र उस वैश्यं कन्या के पिता के पास गये और उस कन्या को माँगा । वैश्य ने राजकुमार को कामासक देखकर॥ ४ ॥

तञ्चाहसपितातस्याराजपुत्रंकृताञ्जलिः। 'विभ्यत्तस्यपितुर्वित्रप्रश्रयावनतंवचः॥५॥

उनले हाथ जोड़ कर तथा राजा के डर से यह कहा ॥ ५ ॥

भवन्ताभूभुजोभृत्यावयंवःकरदायकाः। : कयंसम्बन्धमसमैरस्माभिरभिवाञ्छति॥६

आप राजा है तथा हम आपके सेवक और कर देने वाले हैं । हम और आप असमान हैं, हमारा आपका सम्बन्ध कैसा ॥ ६ ॥ राजपुत्रउद्याच

साम्यंमानुषदेहस्यकाममोहादिभिःकृतम्। तयापिकालेतैरेवयोज्यतेमानुषंवपुः॥७

राजपुत्र बोले-

सब मनुष्यों के देह में काम और मोह समान है । समय पाकर काम सभी के शरीर में प्रबलहोता है ॥ ७ ॥

तथैवचापकारायजायन्तेतस्यतान्यपि। अन्यानिचान्येजीवन्तिभिन्नजातिमतांसताम्॥८॥

इसी प्रकार काल पाकर काम श्रादि मनुष्यों के शरीर का उपकार करते हैं और अलग अलग जाति में एक शरीर का काम दूसरे शरीरसे प्राप्त होता है ॥८॥

तयान्यान्यप्ययोग्यानियोग्यतांयान्तिकालतः। योग्यान्ययोग्यतांयान्तिकालवश्याहियोग्यता॥६॥

इसी प्रकार काल पाकर अयोग्य मनुष्य योग्य अयोग्य होजाते हैं । वस्तुतः योग्यता काल के वश में है ॥ ६ ॥

श्राप्याय्यतेयच्छरीरमाहारादिभिरीप्सितैः कालंज्ञात्वातथाभुक्ततदेवपरिशिष्यते || १०

जो शरीर कि इच्छित आहार आदि से तृप्त किया जाता है समय पाकर वह ही किसी जीव द्वारा खालिया जाता है अतः समय ही बलवान है ॥ १० ॥

इत्यंममैषाभिमतातनयादीयतांत्वया। श्रन्ययामच्छरीरस्यविपचिपलक्ष्यते॥११॥

मेरा मत इसप्रकार है. अब तुम मुझे अपनी कन्या दो अन्यथा मेरे शरीर को भारी आपत्ति की आशङ्का है ॥११॥ वैश्यउवाच

परतन्त्रावयंत्वञ्चपरतन्त्रोमहीभुजः। पित्रा देनाभ्यनुज्ञातस्त्वं गृहाण ददाम्यहम् ||१२|

वैश्यबोला श्रापऔरहमराजाकेवशमेंहैं, यदिआप - केपिताश्राज्ञादेवतोमैंअपनीकन्याआपकोदेदूंगा॥१२॥ राजपुत्रउवाच

प्रष्टव्याःसर्व्वकार्येषुगुरवोगुरुवर्त्तिभिः। नवीष्वकार्येषुगुरूणांवाक्यगोचरः॥१३॥

राजपुत्र बोले-

"समस्तकार्योंमेंगुरुजनोंसेपूछनाचाहिये परन्तु इस तरह के कार्यों को बड़ों तक  पहुँचाना ठीकनहीं॥१३॥

मयकथालापो गुरुणां श्रवणं कचम् | विरुद्धमेतदन्यत्रमष्टव्यागुरवोनृभिः || १४ |||

कहाँ तो कामदेव की कथावार्ताऔर कहाँ गुरुजनों के वाक्यों को सुनना ? यह

दोनों परस्पर विरोधी है. अतः मनुष्यों को चाहियेकिदूसरेमामलोंमेंगुरुजनोंसेपूछें॥१४॥

 वैश्यउवाच

एवमेतत्स्मरालापस्तवायंपृच्छतोगुरुम्। अहंपृच्छामिनालापोममकामकथाश्रयः ||१५||

वैश्य बोला-

हे राजकुमार ! आपके लिये तो ये वात पिताजी से पूछना कामालाप होगा परन्तु मेरे लिये तो ऐसी कुछ बात नहीं है, मैं पूछूंगा ॥ १५ ॥

मार्कण्डेयउवाच

इत्युक्तःसोऽभवन्मौनोराजपुत्रःसचापितत्। तत्पित्रेसर्व्वमाचष्टराजपुत्रस्ययन्मतम् || १६ ||

मार्कण्डेयजी बोले-

उसके यह कहने पर राजकुमार मौन होगये और फिर वैश्य ने राजकुमार का मत पिता सेप्रकट किया ॥ १६ ॥

ततस्तस्यपिताविमानृचीकादीन्द्विजोत्तमान्। प्रवेश्यराजपुत्रञ्चयथाख्यातंन्यवेदयत् ||१७||

फिर राजा दिए ने ऋचीक श्रादि उत्तम ब्राह्मणों को बुला कर राजकुमार की उपस्थिति में सव वृत्तान्त उनसे कह सुनाया ||१७

निवेद्यचततःप्राहमुनीनेवंव्यवस्थितः। यत्कर्त्तव्यंतदादेष्टुमर्हन्तिद्विजसत्तमाः॥१८॥

इस प्रकार निवेदन कर उसने मुनियों से कहा कि इस प्रकार की व्यवस्था है, अब आप जो आदेशदें वह मैं करूँ ॥१८॥ ऋषयऊचुः

राजपुत्रानुरागस्तेयद्यस्यांवैश्यसन्ततौ। तदस्तुधर्मएवैषकिन्तुन्यायक्रमेणसः॥१६॥

ऋषि बोले--

हे राजकुमार ! यदि तुम्हारा अनुराग इस वैश्य की कन्या ही से है तो यह धर्म के अनुरूप है परन्तुयह होना चाहिये न्यायके क्रमसे ॥१६॥

मृदुर्भाभिषिक्ततनया- पाणिग्राहोभवेत्पुरा। भवत्वनन्तरञ्चेयंतवभार्य्याभविष्यति ||२०||

पहिले आपका विवाह क्षत्रिय की कन्या के साथ होना चाहिये । उसके बाद यह वैश्य कन्या श्रापकी स्त्री होसकतीहै ॥२०॥

एवंनदोषोभवतितथेमामुपभुञ्जतः। अन्यथाऽभ्येतितेजातिरुत्कृष्टावालिकांहरन्॥२१

  इस प्रकार इसमें दोष न होगा और श्राप इस वैश्य कन्या से भोग भी कर सकेंगे । न्यायके

विरुद्ध कर्म करने से दोष होगा, क्योंकि आपकी जाति उत्कृष्ट है और यह कन्या निम्न वर्ण की है॥२१॥ मार्कण्डेयउवाच

इत्युक्तस्तदपास्यैववचस्तेषांमहात्मनाम्। विनिष्क्रम्यगृहीत्वातामुद्यतासिरथाब्रवीत् | २२ ||

मार्कण्डेयजी बोले-

 इस प्रकार कहे जाने पर भी उस राजकुमारने महात्माओं की बातों पर कुछ ध्यान न दिया और

बाहर निकल कर उस कन्या को पकड़ लिया. और हाथ में तलवार लेकर बोला ||२२||

राक्षसेनविवाहेनमयावैश्यसुताहृता। यस्यसामर्थ्यमत्रास्तिसएतांमोचयत्विति ||२३||

मैंने कन्या को हरण करके राक्षस विधि से इसके सा विवाह किया है जिसकी सामर्थ्य हो वह इसेकर छुड़ावे ॥ २३ ॥

ततःसवैश्यस्तांदृष्ट्वागृहीतांतनयांद्रुतम्। त्राहीतिपितरंतस्यप्रययौशरणंद्विज || २४|

  हे कौटुकिजी ! उस कन्या के इस प्रकार हरण किये जानेपर उसका पिता त्राहि-त्राहि कहता हुआ महाराज की शरण में गया ||२४||

ततस्तस्यपिताक्रुद्धआदिदेशवलंमहत्। हन्यतांहन्यतांदुष्टोनाभागोधर्म्मदूषकः ||२५||

 तब उसके पिता दिष्ट ने क्रुद्ध होकर एक महान् सेना को श्राज्ञादी कि धर्मदोपी दुष्ट नको मारो ||२५||

ततस्तदयुयुधेसैन्यंतेनभूभृत्सुतेनव। कृतास्त्रेणतदास्त्रेणतत्प्राचुर्येणपातितम्॥२६

तब वह सेना राजकुमार के युद्ध करने लगी और राजकुमार ने अपने अस्त्र से उस सब सेना को काट डाला ॥ २६ ॥

सश्रुत्वानिहतंसैन्यंराजपुत्रेणभूपतिः। स्त्रयमेवययौयोद्धुंस्वसैन्यपरिवारितः॥२७॥

राजकुमारके हाथों सव सेना का नाश हुआ सुनकर स्वयं महाराज अपनी सेना लेकर उससे युद्ध करने कोगये ||२७||

ततोयुद्धमभूत्तस्यभूभुजःस्त्रसुतेनयत्।

राजपुत्रेण शस्त्रास्त्रैस्तत्रातिशयितः पिता ||२८||

इसकेबादराजाकापुत्रकेसाथयुद्ध हुआऔरउसयुद्धमेंराजकुमारनेअपनेशत्र अस्त्रोंसेपिताकोबहुतपीड़ित किया॥२८॥

तोऽन्तरीक्षादागत्यपरिव्राट्सहसामुनिः। त्युवाचमहीपालंविरमस्वेतिसंयुगात् ||२६||

इसके अनन्तर परिव्राट् नाम मुनि सहसा श्राकाश मार्ग से आकर महाराज दिष्ट से बोले कि आप

युद्ध न करें ॥ २६ ॥

त्वत्पुत्रस्यमहाभागविधम्मोऽयंमहात्मनः। तवापिवैश्येनसहनयुद्धंधर्म्मवन्नृप ||३०||

 हे राजन् ! आपका पुत्र धर्मसे च्युत होकर वैश्य होगया है और वैश्य के साथ

आपका युद्ध करना उचित नहीं ॥ ३०॥

ब्राह्मणोब्राह्मणीपूर्व्वंकुर्व्वन्दारपरिग्रहम्।

ब्राह्मयात्सर्व्ववर्णेषुनहानिमुपगच्छति॥३१॥

 एक ब्राह्मण ब्राह्मणी के साथ पाणिग्रहण करने के पश्चात् अन्य वर्णों की स्त्रियों के साथ विवाह कर सकता है, ऐसा करने में उसको कोई दोष नहीं लगता है ||३१

तथैवक्षत्रियसुतांक्षत्रियःपूर्व्वमुद्वहन्। इतरेचततोराजंश्चयवन्तेनस्वधर्म्मतः ||३२||

इसी प्रकार क्षत्रिय पहिले क्षत्रिय कन्या से विवाह करके फिर इतर वर्ण अर्थात् वैश्य और शूद्र की

कन्या के साथ विवाह कर सकता है ॥ ३२ ॥

पूर्वंवैश्यस्तथावैश्यांपश्चात्शूद्रकुलोद्भवाम्। नहीयतेवैश्यकुलादयंन्यायःक्रमादितः ||३३|||

 इसीप्रकार यदि वैश्य वैश्य की कन्या से विवाह करने वे. वाद शूद्र की कन्या के साथ विवाह करले तो वैश्य कुल से हीन नहीं होता है। यह मैंने क्रमसे न्यायकर्म कहा ||३३||

ब्राह्मणाःक्षत्रियावैश्याःसवर्णापाणिसंग्रहम्। अकृत्वाऽन्यतरापाणेःपतन्तिनृपसंग्रहात् ||३४||

 हे राजन् ! जो ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य क्रमशः अपने वण की कन्या से विवाह

करने के पूर्व दूसरे वर्ग की कन्याय से विवाह कर लेता है वह पतित होजाता है ॥ ३४ ॥

यस्यायस्याहिहीनायाःकुरुतेपाणिसंग्रहम्। अकृत्वावर्णसंयोगंनापितद्वस्तुभाग्भवेत्॥३५॥

श्रर्थात् जो व्यक्ति पहिले अपने वर्ण की कन्या से विवाह न करके हीन वर्ण की कन्या से विवाह कर लेता है उसकी जाति पतित होकर उसी हीन वर्ण कन्या की जाति हो जाती है ||३५||

सोऽयंवैश्यत्वमापन्नस्तवपुत्रःसमन्दधीः। नास्याधिकारोयुद्धायक्षत्रियेणत्वयासह ||३६|||

आपका यह बुद्धिहीन पुत्र वैश्यत्व को प्राप्त होगया है । आप क्षत्रिय हैं, नहीं है ||३६||

वयमेतन्नजानीमःकारणंनृपनन्दन | यथाभविष्यतीदंञ्चनिवर्त्तरणकर्म्मतः ||३७||

हेनृपनन्दन ! हमइसकाकारणनहीं आपकेसाथइसवैश्यकोयुद्धकरनेकाअधिकार जानतेहैंकियहकिसप्रकारहुआ, परन्तुआप . इसकेसाथयुद्धकर्मसेनिवृत्तहोंऐसाहमारा प्रदेशहै॥३७॥ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंनाभागचरित (१) नाम११३वाँअध्यायसमाप्त।