मार्कण्डेय महा पुराण
65
· मार्कण्डेयउवाच
ततःसताभिःसहितःपत्नीभिरमरद्यतिः। ररामतस्मिन्शैलेन्द्रेरम्यकानननिर्झरे॥१॥
मार्कण्डेयजी बोले-
इसके बाद वह देवताओं की सी कांन्तिवाला स्वरोचि उन स्त्रियों के साथ उस पर्वत पर तथा
बन और झरनों में विहार करने लगा ॥१॥
सर्वोपभोगरत्नानिमधूनिमधुराणिच। निधयःसमुपाजहुःपद्मिन्यावशवर्त्तिनः॥२॥
उपभोगके सव रत्न, मधु और मधुर रस उनके लिये पद्मिनी विद्या के प्रभावसे सव निधियां वशवर्तिनी होकर उपस्थित करतीं ॥२॥,
स्रजोवस्त्राण्यलङ्कारान्गन्धाढ्यमनुलेपनम्। आसनान्यतिशुभ्राणिकाश्चनानियथेच्छया || ३ ||
अलङ्कार, गन्ध, चन्दन आदि लेप तथा सोने के वने हुए सुन्दर श्रासन तथा अन्य वस्तुयें जिनकी वे इच्छा करते थे || ३||
सौवर्णानिमहाभागकरकान्भाजनानिच। तथाशय्याश्चविविधादिव्यैरास्तरणैर्यताः॥४
सोने के बर्तन तथा नानाप्रकार की शय्यायें और उपरोक्त सब वस्तुयें उनको निधियां देती थीं ॥ ४ ॥
एवंसताभिःसहितोदिव्यगन्धादिवासिते। ररामस्वरुचिर्भाभिर्भासितेवरपर्व्वते॥५
दिव्य गन्धों सहितउस सुन्दर पर्वत पर स्वरोचि उन स्त्रियों के साथरमण करने लगे ॥ ५ ॥
ताश्चापिसहतेनेतिलेभिरेमुदमुत्तमाम्। रममाणायथास्वर्गेतथातत्रशिलोच्चये॥
वे स्त्रियां भी स्वरोचि के साथ प्रेम पूर्वक रहती थीं और उस पर्वत पर इस प्रकार रमण करतीं थीं जिस प्रकार कि वे स्वर्ग मेंथीं॥ ६ ॥
कलहंसीजगादैकांचक्रवाकींजलेसतीम्। नस्यतासांश्चललितेसम्बन्धेचस्पृहावती॥७
स्वरोचि और उसकी स्त्रियों का ललित. सम्बन्ध देखकर स्पृहा करके एक हंसनी जल
दूसरी चक्रवाकी से बोली || ७॥
धन्योऽयमतिपुण्योऽयंयोऽयंयौवनगोचरः। दयिताभिःसहैताभिर्भुङ्क्तेभोगानभीप्सितान् ||८||
अत्यन्तं पुण्यवान्यह स्वरोचि धन्य है जो यौवनावस्था में अपनीस्त्रियों सहित इच्छित भोगों को भोगता है ॥८- ॥
पन्तियौवनिनःश्लाघ्यास्तत्पत्न्योनातिशोभनाः। नगत्यामल्पकाःपत्न्यःपतयश्चातिशोभनाः॥६
इस संसार में बहुधा यदि पति सुन्दर और युवा तो उसकी स्त्री कुरूपा है और यदि पत्नी अच्छी पति अच्छा नहीं है ॥ ६ ॥
प्रभीष्टाःकस्यचित्कान्ताकान्तःकस्याश्विदीप्सितः परस्परानुरागाढ्यंदाम्पत्यमतिदुर्लभम् ||१०|||
कहीं स्त्री की क़द्र है तो कहीं पुरुष की । परस्परं दाम्पत्य प्रेम अंति दुर्लभ है ॥१० ॥
रन्योऽयंदयिताभीष्टोहोताश्वास्यातिवल्लभाः। रस्परानुरागोहिधन्यानामेवजायते॥११॥
यह स्वरोचि धन्य है कि इसकी पत्नियां इसको चाहती हैं और यह भी उनकोवहुत प्यार करता है। जिन स्त्री-पुरुषों में परस्परप्रीति है वे धन्य हैं ॥११॥
एतन्निशम्यवचनंकलहंसीसमीरितम्।। वाचचक्रवाकीतांनातिविस्मतमानसा ||१२||
हंसिनी के इन वचनोंको सुनकर चक्रवाकी ने आश्चर्य रहित होकर कहा ॥१२
धन्योयतोलज्जानान्यस्त्रीसन्निकर्षतः। पन्यांत्रियमयंभुङ्क्तेनसर्व्वास्त्रस्यमानसम्१३
यह स्वरोचि धन्य नहीं है कारण– इसको अन्य स्त्री के सामीप्य से लज्जा नहीं है । जब यह एकके अतिरिक्त दूसरी स्त्री से भी भोग करता है तो इस की प्रीति सब में बराबर नहीं हो सकती ॥ १३ ॥
चेत्तानुरागएकस्मिन्नधिष्ठानेयतःसखि। तोहिप्रीतिमानेपभार्यासुभविताकथम् ||१४||
जब इसके चित्त का अनुराग एक स्त्री में स्थित नहीं है तो इसकी प्रीति सब स्त्रियोंमेंबराबर किंसप्रकार हो सकती है ? ॥ १४ ॥
तानदयिताःपत्युर्नैतासांदयितःपतिः। नोमात्रमेवैतायथापरिजनोऽपरः॥१५॥
इसलिये न तो यहपति की स्त्रियां हैं और न स्त्रियों का यह पति है । ये तो केवल विनोद मात्र है अथवा जिस तरह अन्य लोग हैं उसी तरह ये भी हैं ॥ १५ ॥
एतासाञ्चयदीष्टोऽयंतत्किंप्रारणान्नमुञ्चति। आलिङ्गत्यपरांकान्तांध्यायतोवैकान्तयान्यया१६
यदिइन लोगों का यही इट है तो जब ये एक स्त्री से आलिंगन करके दूसरीसे भोग करता है तो तीसरीस्त्री प्राण क्यों नहीं छोड़ देती ॥ १६ ॥ विद्यामदानमूल्येनविक्रीतोशेप 1भृत्यवत्
प्रवर्त्ततेनहिप्रेमसमंवद्दीषु।तिष्ठति॥१७॥
इन स्त्रियों ने विद्या दानरूपी मूल्य देकर स्वरोचि को बतौर सेवक के खरीद लिया है। एक पुरुष का प्रेम कई स्त्रियों में वराबर नहीं रह सकता है ॥ १७ ॥
कलहंसपतिर्धन्योममधन्याहमेवच। यस्यैकस्याश्चिरंचित्तंयस्याश्चैकत्रसंस्थितम्॥१८
हे हंसनी ! मेरा पति और मैं धन्यहूँ, कारण- मैं एकहूँ और मेरा पति भी एक है और एक का एक मेंप्रेम स्थित है ॥ १८ ॥
मार्कण्डेयउवाच
सर्व्वसत्त्वरुतज्ञोऽसौस्वरोचिरपराजितः। निशम्यलज्जितोदध्यौसत्यमेवहिनानृतम्॥१६
मार्कण्डेयजी बोले--
स्वरोचि जो सब जीवों की बोली समझते थे इस वार्तालाप को सुनकर बड़े लजित हुए श्रौर
उन्होंने मनमें निश्चय किया कि यह सत्य है, इसमेंझूठ नहीं ॥ १६ ॥
ततोवर्षशतेयातेरममाणोमहागिरौ। रममाणःसमंताभिर्ददर्शपुरतोमृगम् ||२०||
इसके बाद वह उस पर्वत परसौ वर्ष तक विहार करते रहे । विहार करते हुएउन्होंने एक मृग को देखा ॥ २० ॥
सुस्निग्धपीनावयवंमृगीयूथविहारिणम्। वासिताभिःस्वरूपाभिर्मृगीभिःपरिवारितम् || २१
जो सुन्दर और हृष्ट पुष्ट था तथा मृगियों के झुंड में विहार कररहा था । वह सुन्दर हरिणियों से घिरा हुना उनके द्वारा संधा जारहा था ॥२१॥
याकृष्टघ्राणपुटकाजिघ्रन्तीस्तास्ततोमृगीः। उवाचसमृगोरामालज्जात्यागेनगम्यताम् ||२२||
वे हरिणियां आकर्षित होकर उसको सूंघती और उससे लिपटती थीं। वह मृग उनसे बोला कि तुम मुझे लजा मतछोड़ने दो और यहाँ से जाओ || २२||
हंस्वरोचिस्तच्छीलोनचैवाहंसुलोचनाः। निर्लज्जाबहवःसन्तितादृशास्तत्रगच्छतः ||२३||
मैं स्वरोचिनहीं हूँ और न उसका सा मेरा शील है । उसकेसमान बहुत से निर्लज्ज मृग हैं, तुम उनके पासजाओ ॥ २३ ॥
एकात्वनेकानुगतातथाहासास्पदंजने। काभिस्तथैवैकोभोगदृष्ट्यानिरीक्षितः ||२४|| |
जिस प्रकार एक स्त्री की बहुत सेपुरुषों के साथ रहने से संसार में हँसी होती है उसी प्रकार एक पुरुष का अनेक स्त्रियोंकोभोगनानिन्दित है ||२४||
तस्यधर्म्मक्रियाहानिरहन्यहनिजायते। सक्तोऽन्यभार्य्यया/चान्य-कामासक्तःसदैवसः२५||
जो पुरुष अन्य स्त्री में कामासक्त रहता है उसकी धार्मिक क्रियाओं की दिनपर दिन हानि होती जाती है ॥ २५ ॥
यस्तादृशोऽन्यस्तच्छीलःपरलोकपराङ्मुखः। तंकामयतभद्रंवोनाहंतुल्यःस्वरोचिपा ||२६|||
जो ऐसे चरित्रं चाला हैऔर परलोक से विमुख मृग हो उसको तुम ढूंढ़ लो, मैंस्वरोचिकेतुल्यनहींहूँ ||२६||
इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंस्वरोचिपमन्वन्तर ( ४ ) नाम६५वांअध्यायसमाप्त |
Summary of chapter 64 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
The narrative details the heroic deeds of Svarochis as he subdues demonic forces and establishes peace across his kingdom. His righteous governance and performance of grand Vedic sacrifices ensure prosperity and spiritual harmony throughout the realm.