मार्कण्डेय महा पुराण
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जड़ उवाच तन्मातुर्वचनं श्रुत्वा सोऽलकों मातरं पुनः । पमच्छ वर्णधर्म्माच धर्म्मा ये चाश्रमेषु च ॥ १।।
वह अलर्क माता के उस कथन को सुनकर फिर वर्णधर्म और आश्रम धर्मों को माता से पूछने लगा ॥ १ ॥ लर्क उवाच कथितोऽयं महाभागे राज्यतन्त्राश्रितस्त्वया । धर्मं तमहमिच्छामि श्रोतुं वर्णाश्रमात्मकम् ॥ २।।
अलर्क बोला- हे महाभागे ! राज्यतन्त्र सम्बन्धी धर्म श्रापने कहा, अब मैं वर्णाश्रम धर्मको सुनना चाहता हूँ || मदालसोवाच
दानमध्ययनं यज्ञो ब्राह्मणस्य त्रिधा मतः । नान्यश्चतुर्थो धर्मोऽस्ति धर्म्मस्तस्यापदं विना ॥ ३ ॥
मदालसा चोली- दान, अध्ययन और यक्ष ब्राह्मण के यह तीनही धर्म हैं चौथा नहीं । श्रापत्ति के विना यह धर्महै ॥ ३॥ याजनाध्यापने शुद्धे तथा पूतप्रतिग्रहः । एषा सम्यक समाख्याता त्रिविधा चास्य जीविकाः ४
शुद्ध यज्ञ कराना, पढ़ाना और पवित्र दान लेना यह तीन प्रकार की जीविका ब्राह्मण की यतलाई जाती हैं ॥ ४ ॥ दानमध्ययनं यज्ञः क्षत्रियस्याप्ययं त्रिधा । धर्म्मः मोक्तः क्षिते रक्षा शस्त्राजीवञ्च जीविका ॥ ५ ॥
दान देना, पढ़ना और यज्ञ करना क्षत्रिय का भी यह तीन प्रकार का धर्म कहा है । पृथ्वी की रक्षा और शस्त्र से जीवन-निर्वाह यह उसकी जीविका है ॥ ५ ॥ दानमध्ययनं यज्ञो वैश्यस्यापि त्रिधैव सः । वाणिज्यं पाशुपाल्यञ्च कृपिश्चैवास्य जीविका॥
दान, अध्ययन और यह वैश्य का भी यह तीन प्रकार का धर्म है तथा वाणिज्य, पशुपालन और कृषि उसकी जीविका है ॥६॥
दानं यज्ञोऽय शुश्रूपा द्विजातीनां त्रिधा मया । व्याख्यातः शूद्रधम्र्मोऽपि जीविका कारुकर्म्म च॥७॥
तद्वद्विद्वजातिशुश्रूपा पोपणं क्रय-विक्रयौ । वर्णधम्र्मास्त्विमे प्रोक्ताः श्रूयन्तां चाश्रमाश्रयाः॥८॥
दान, यज्ञ एवं द्विजातियों की शुश्रूषा ये शूद्रों का तीन प्रकार का धर्म है और शिल्प कर्म, द्विजों की सेवा और पोपण, खरीदना और वेचना. यह शुद्ध की आजीविका है। ये वर्णधर्म मैंने कहे, श्रव श्राश्रम-धम को ॥ ७८ ॥
स्ववर्गधर्मात् संसिद्धिं नरः प्राप्नोति न च्युतः । प्रयाति नरकं प्रेत्य प्रतिषिद्धनिषेवणात् ॥ & ॥
वर्णधर्म से भ्रष्ट न होकर ही सिद्धि प्राप्त करता है, निषिद्ध श्राचरण करने से मरने पर नरक में जाता है ॥ ६ ॥
यावत्तु नोपनयनं क्रियते वै द्विजन्मनः । कामचेष्टोक्तिभक्ष्यश्व तावद्भवति पुत्रक ॥१०॥
हे पुत्र ! जब तक द्विजातियों का उपनयन न हो तब तक वह इच्छानुसार चेष्टा, भापण और भक्षण कर सकते हैं ॥१०॥
कृतोपनयनः सम्यग्ब्रह्मचारी गुरोगृ है । वसेत् तत्र च धर्मोऽस्य कथ्यते तं विवोध मे ॥ ११॥
परन्तु उपनयन के वाद श्रच्छी तरह ब्रह्मचारी रहकर गुरु के घर में रहना चाहिये वहाँ पर जो उसका धर्म है वह मैं कहती हूँ, सुनो ॥११॥
स्वाध्यायोऽथाग्निशुश्रूषा स्नानं भिक्षाटनं तथा । गुरोर्निवेद्य तच्चान्नमनुज्ञातेन सर्व्वदा ||१२|||
स्वाध्याय, अग्निहवन, स्नान, भिक्षा के लिये भ्रमण एवं भिक्षा में प्राप्त हुए अन्न को गुरु के लिये निवेदन कर उनकी थाक्षा से काम में लाना ॥ १२ ॥
गुरोः कर्म्मणि सोयोगः सम्यक् प्रीत्युपपादनम् । तेनाहूतः पठेच्चैव तत्परो नान्यमानसः || १३
गुरु के कार्य में संलग्न रहना, उनको प्रसन्न करना तथा उनके बुलाने पर एकाग्र चित्तं होकर तत्परता से पढ़ना ॥ १३ ॥
एक द्वौ सकलान् वापि वेदान् प्राप्य गुरोर्मुखात् । अनुज्ञातोऽथ वन्दित्वा दक्षिणां गुरवे ततः ॥ १४॥
एक दो अथवा सम्पूर्ण वेदों को गुरुमुख से पाकर उनकी आज्ञा से उनको प्रणाम कर गुरु को दक्षिणा देकर ॥ १४ ॥
गार्हस्थ्याश्रमकामस्तु गृहस्थाश्रममावसेत् । वानप्रस्थाश्रमं वापि चतुर्थश्चच्छयात्मनः ॥ १५ ॥
गृहस्थ्य होने का अभिलापी गृहस्थाश्रम में जावे अथवा अपनी इच्छानुसार चतुर्थ वानप्रस्थ श्राश्रम में प्रविष्ट हो ॥ १५ ॥
तत्रैव वा गुरोर्गेहे द्विजो निष्ठामदामुयात् । गुरोरभावे तत्पुत्रे तच्छिष्ये तत्सुतं विना ॥ १६ ॥ शुश्रूषुर्निरभिमानो ब्रह्मचर्याश्रमं वसेत् । उपावृत्तस्ततस्तस्माद्गृहस्थाश्रमकाम्यया।॥१७॥
अथवा वहीं गुरु के घर पर निवास करे, गुरु के न रहने पर उनके पुत्रमें और पुत्र के भी न होने पर उनके शिष्य में निरभिमान होकर भक्ति और सेवा करता हुआ महाचर्षाश्रम में रहे। इसके अनन्तर अध्ययन समाप्त कर वहाँ से गृहस्थाश्रम की इच्छा से || १६-१७ ॥
ततोऽसमानर्षिकुलां तुल्यां भार्थ्यामरोगिणीम् उद्वहेन्न्यायतोऽव्यङ्गां गृहस्थाश्रमकारणात् || १८ | स्वकर्मणा धनं लब्ध्वा पितृदेवातिथींस्तथा । सम्यक् सम्प्रीणयन् भक्त्या पोषयेचाश्रितांस्तथा १६।।
भिन्न- गोत्र में पैदा हुई, रोग रहित, स्त्रियोचित चिह्नों से अपने सदृश स्त्री को गृहस्थाश्रम के लिये व्याहे ॥अपने कार्य से धन कमाकर पितर देवता श्रीर अतिथियों को भक्तिपूर्वक प्रसन्न करता हुआ आश्रितों का पोषण करे ॥ १६ ॥
भृत्यात्मजान् जामयोऽथ दीनान्धपतितानपि । यथाशक्त्यान्नदानेन वयांसि पशवस्तथा ||२०||
शक्ति के अनुसार न दान के द्वारा नौकरों को पुत्र, जाति वान्धव, दीन, अन्ध, पतितों एवं पक्षियोंका पोषण करे ॥२०॥ एष धर्मो गृहस्थस्य ऋतावभिगमस्तथा । पंचयज्ञविधानन्तु यथाशक्त्या न हापयेत् ॥ २१ ॥
बह और ऋतुकाल में श्री प्रसङ्ग करना गृहस्थका धर्म है, उसे चाहिये कि यथा सम्भव पञ्चयज्ञों को न छोड़े ॥२१॥ पितृ-देवातिथि- ज्ञाति-भुक्तशेषं स्वयं नरः । भुञ्जीत च समं भृत्यैर्यथाविभवमादृतः ||२२||
अपने वैभव के अनुसार पुरुष स्वयं पितर, देवता, अतिथि और जाति बान्धवों के भोजन से अवशिष्ट न को श्रानन्दित होकर अपने सेवकों के साथ भोजन करे ॥ २२ ॥
एप तद्देशतः प्रोक्तो गृहस्थस्याश्रमो मया । वानप्रस्थस्य धर्म्म ते कथयाम्यवधार्य्यताम् || २३
गृहस्थ श्राश्रम का यह धर्म मैंने संक्षेपसे कहा, श्रय वान- प्रस्थ के धर्म को कहती हूँ, सुनो ॥ २३ ॥
अपत्यसन्ततिं दृष्ट्वा प्राज्ञो देहस्य चानतिम् । : वानप्रस्थाश्रमं गच्छेदात्मनः शुद्धिकारणात् ||२४||
बुद्धिमान पुरुष अपनी सन्तान एवं देह की वृद्धता को देख कर अपनी शुद्धि के लिये वानप्रस्थ आश्रम में जावे ||२४||
तत्रारण्योपभोगश्च तपोभिश्रानुकर्षणम् । भूमौ शय्या ब्रह्मचर्य्यं पितृदेवातिथिक्रिया ||२५|||
वहाँ वन की सामग्रियों का उपभोग तथा तपस्या के द्वारा अपना शोषण, पृथ्वी में शयन, ब्रह्मचर्य और पितर देवता और अतिथियों की क्रियायें ॥२५॥ होमस्त्रिवणस्नानं जटावल्कलधारणम् । योगाभ्यासः सदा चैव वन्यस्नेहनिषेवणम् ||२६||
होम, तीनों बार स्नान, जटा और. स्कूल धारण, योगाभ्यास एवं सदा जङ्गली जीवों से स्नेह ॥ २६ ॥
इत्येष पापशुद्धयर्थमात्मनोपकारकः । वानप्रस्थाश्रमस्तस्माद्विक्षोस्तु चरमोऽपरः ||२७||
यह सब पाप की शुद्धि के लिये अपना उपकार करने वाला वानप्रस्थं श्राश्रम श्रतएव भिक्षुक के लिये यह अन्तिम है ॥ २७ ॥
चतुर्थस्य स्वरूपन्तु श्रूयतामाश्रमस्य मे । यः स्वधर्मोऽस्य धर्मज्ञः प्रोक्तस्तात महात्मभिः२८
चतुर्थ श्राश्रम का स्वरूप मुझसे सुनो, जैसा कि इसका स्वरूप धर्मात्मा महात्माओं ने बतलाया है ॥
सर्व्वसङ्गपरित्यागो ब्रह्मचर्य्यमकोपिता । यतेन्द्रियत्वमावासे नैकस्मिन् वसतिश्चिरम् ||२६"
समस्त विषयों का परित्याग, ब्रह्मचर्य, क्रोध का अभाव, जितेन्द्रियता, एक स्थान पर बहुत दिन तक न रहना ॥ २६ ॥
अनारम्भस्तथाहारो भैक्ष्यान्नेनैककालिना । . आत्मज्ञानावबोधेच्छा तथा चात्मावलोकनम् ॥ ३०।।
भिक्षा में मिले हुए अन्न से एक वार भोजन करना, भोजनको सिद्ध न करना, अवलोकन ॥ ३० ॥
चतुर्थे त्वाश्रमे धम्र्मो मयायं ते निवेदितः । सामान्यमन्यवर्णानामाश्रमाणाञ्च मे शृणु ॥ ३१।।
चौथे श्राश्रम में यह धर्म है जो आत्मज्ञान को प्राप्त करने की इच्छा, श्रात्मा का कि मैंने तुझसे कहा, अवं अन्य वर्ग और आश्रमों के सामान्य धर्मों को मुझसे सुनो ॥ ३१ ॥
सत्यं शोचमहिंसा च अनसूया तथा क्षमा ।
श्रानृशंस्यमकार्पण्यं सन्तोषश्चाष्टमो गुणः ॥३२॥ |
सत्य, पवित्रता, श्रहिंसा, डाहं न करना, शान्ति, क्रूरता, कृपणता का अभाव, आठवां सन्तोष है ॥३२॥
एते संक्षेपतः प्रोक्ता धर्मा वर्णाश्रमेषु ते । एतेषु च स्वधर्मेषु स्वेषु तिष्ठेत् समन्ततः ॥३३॥
ये संक्षेप से वर्ण और श्राश्रमों के धर्म तुमसे कहे इन अपने-अपने धर्मों में सब लोग रहते हैं ॥ ३३ ॥ यश्चाल्लङ्घ्य स्वकं धर्मं स्ववर्णाश्रमसंज्ञितम् । नरोऽन्यथा प्रवर्त्तेत स दएड्यो भूभृतो भवेत् ॥३४॥
पुरुष अपने वर्ण और आश्रम के धर्म को छोड़ अन्यथा श्राचरण करे उसे राजाद्वारा दण्ड मिलना चाहिये || ३४ ॥
ये च स्वधर्म्मसन्त्यागात् पापं कुर्व्वन्ति मानवाः । उपेक्षतस्तान् नृपतेरिष्टापूर्त्त मणश्यति ||३५||
जो मनुष्य अपने धर्मको त्यागकर पाप किया करते हैं उनकी उपेक्षा करने वाले राजा के समस्त यश और पुण्य नष्ट हो जाते हैं ॥ ३५ ॥ .
तस्माद्राज्ञा प्रयत्नेन सर्व्वे वर्णाः स्वधर्म्मतः । प्रवर्त्तन्तोऽन्यथा दण्ड्याः स्थाप्याश्चैव स्वकर्म्मसु ३६
इसलिये राजा को प्रयत्न पूर्वक अपने-अपने धर्मसे अन्यथा श्राचरण करने वाले सारे वर्णों को दण्ड देना चाहिये और उन्हें अपने-अपने कर्मों में लगाना चाहिये ॥ ३६ ॥
इति श्रीमार्कण्डेय० में पिता-पुत्र संवादके पुत्रानुशासनमें मदालसा वाक्य नाम २८वाँ [अ० समाप्त |
Summary of chapter 28 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
When her fourth son Prince Alarka is born, King Kuvalayāshva requests Madālasā to raise him as a future ruler rather than an ascetic renunciate. Madālasā lovingly instructs Alarka in the profound duties of Rājadharma, teaching him how a king must control his six inner enemies, protect his subjects like a compassionate father, execute justice impartially, and view royal power as a sacred sacrifice to Bhagavān.