103

मार्कण्डेयउवाच

 तस्यसन्ताप्यमानेतुतेजसोदधमधस्तथा। सिसृक्षुचिन्तयामासपद्मयोनिःपितामहः॥१

मार्कण्डेयजी बोले-

सूर्य के उस तेज से समस्त श्राकांश तथा पृथ्वीतल को संतप्त होता देखकर पद्मयोनि पिता-

मह ब्रह्माजी सृष्टि रचने की चिन्ता से व्याकुलहुए ॥ १ ॥

सृष्टिःकृतापिमेनाशंप्रयास्यत्यभितेजसः। स्वतःसृष्टि-संहार-स्थितिहेतोर्महात्मनः॥२

उत्पत्ति, पालन और प्रलय के कारण रूप भगवान सूर्य के इस तेजसे मेरी रची हुई सृष्टिनाश को प्राप्त होजायगी ॥ २ ॥

अमाणाःप्राणिनःसर्व्वेश्रापःशुष्यन्तितेजसः। नचाम्भसाविनासृष्टिर्विश्वस्यास्यभविष्यति॥३

इस तेज से सबप्राणियों के प्राण निकल जायेंगे और जल सूख जायगे और इस संसार की सृष्टि जलके बिना नहींचलेगी ॥ ३ ॥

इतिसंचिन्त्यभगवान्स्तोत्रंभगवतोरवेः। चकारतन्मयोभूत्वाब्रह्मालोकपितामहः॥४

यह सोचकर लोकपितामह भगवान् ने एकाग्र चित्त होकर सूर्य भगवान् की स्तुति की ॥ ४ ॥ ब्रह्मोवाच

नमस्येयन्मयंसर्व्वमेतत्सर्व्वमयश्चयः।

विश्वमूर्त्तिः परं ज्योतिर्यत्तद्ध्यायन्ति योगिनः || ५ ||

ब्रह्माजी बोले-

मैं ब्रह्मा उन विश्वमूर्ति, परमज्योति सूर्यको नमस्कार करता हूँ जिनमें यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है औरजोसर्वमयहैंतथाजिनकायोगीध्यानकरतेहैं॥५

यऋङमयोयोयुषांनिधानंसाम्नाश्चया योनिरचिन्त्यशक्तिः।त्रयीमयीस्थलतयार्द्धमात्रा परस्वरूपगुणपारयोग्यः॥६॥

और जो ऋग्, यजुर, साममय और अचित्यशक्ति हैं तथा जो तीनों वेदमय स्थूलरूप और अर्द्धमात्रा संयुक्त परम स्वरूप और अपार गुण वाले हैं ॥ ६ ॥

तंसर्व्वहेतुंपरमेड्यवेद्यमादौपरज्योतिरवह्नि- रूपम्।स्थूलश्चदेवात्मतयानमस्येभास्वन्त- माद्यंपरमंपरेभ्यः॥७॥

मैं उन सूर्य भगवान् को प्रणाम करता हूँ जो सब जगत् के कारण और परम स्तुति के योग्य हैं, जो और अग्नि से पृथकं आदि में परम जहैं तथा जो स्थूलरूप, देवताओं के श्रादि और परे से भी परे हैं ॥७ ॥

सृष्टिंकरोमियदहंतवशक्तिराद्यातत्प्रेरित जल -मही- पवनाग्निरूपाम्।तद्देवतादिविषयांप्रण- वाद्यशेषांनात्मेच्छयास्थितिलयावपितद्वदेव॥८

मैं आपकी आद्या शक्तिसे प्रेरित होकर जल, पृथ्वी, वायु, अग्निरूप, देवताओं तथा

प्रणव आदि से संयुक्त, सृष्टि को रचता हूँ, इसी प्रकार स्थिति और प्रलय भी मेरी इच्छा से नहींहोता  वरन आपकी शक्तिसे ही होता है ॥८॥

वह्निस्त्वमेवजलशेषतःपृथिव्याः सृष्टिंकरोमिजगतांचतथाद्यपाकम्। व्यापीत्वमेवभगवन्गगनस्वरूपं त्वंपंचधाजगदिदंपरिपासिविश्वम् || ६

पृथ्वी के जल को शोषण करने के लिये जल आप ही हैं, आपके पृथ्वी को संतप्त करने पर मैं सृष्टि रचताहूँ हे भगवन् ! श्राकाश रूप होकर आपही व्याप्त हैं । आप पाँच रूप से इस विश्व का पालन करते हैं ।६

 यज्ञैर्यजन्तिपरमात्मविदोभवन्तं विष्णुस्वरूपमखिलेष्टिभयंविवस्वन्। ध्यायन्तिचापियतयोनियतात्मचित्ताः सर्वेश्वरंपरममात्मविमुक्तिकामाः॥१०॥

हे विवखन् ! परम आत्मज्ञानी यज्ञ करके आपको पूजते हैं और यती लोग अपनी मुक्ति की इच्छा से एकाग्र चित्त होकर विष्णु स्वरूप सर्व जगत्- सर्वेश्वर परम रूप आपका ध्यान करते हैं ॥ १० ॥

नमस्तेदेवरूपाययज्ञरूपायतेनमः। परब्रह्मस्वरूपायचिन्त्यमानाययोगिभिः || ११|

देवरूप, यज्ञरूप, परब्रह्म स्वरूप और योगियों से चित्यमान् ! आपको नमस्कार है ॥ ११ ॥

उपसंहरतेजोयत्तेजसःसंहतिस्तव। सृष्टर्विधातायविभोसृष्टौचाहंसमुद्यतः ||१२||

हे विभो ! मैं सृष्टि रचने में तत्पर हूँ, परन्तु श्रापका यह तेज समूह सृष्टि का नाश कर रहा है, अतः आप इस को हरण कर लीजिये ॥ १२ ॥ मार्कण्डेयउवाच

इत्येवंसंस्तुतोभास्त्रान्ब्रह्मणासर्गकर्त्तृणा। उपसंहृतवांस्तेजःपरंस्वल्पमधारयत्॥१३

मार्कण्डेयजी बोले-

सृष्टि रचते हुए ब्रह्माजी से इस प्रकार स्तुति किये जाने पर भगवान् सूर्य ने अपने तेजको शमन

करके थोड़ा सा तेज शेष रहने दिया ॥ १३ ॥

चकारचततःसृष्टिंजगतःपद्मसम्भवः। तथातेषुमहाभागःपूर्व्वकल्पान्तरेषुवै॥१४॥

फिर पद्मयोनि ब्रह्माजी ने उसी प्रकार सृष्टि की रचनाकी जिस प्रकार कि उन्होंने पहिले कल्पों में की थी॥ १४ ॥

देवासुरादीन्मत्यश्चपश्वादीनवृक्षवीरुधः। ससर्जपूर्व्ववदब्रह्मानरकांश्चमहामुने ||१५||

हेंमहामुनिकौटुकिजी।ब्रह्माजीनेपहिले.कीतरहदेवता, असुरों, पशु, वृक्षलताऔर नरकइत्यादिकानिर्माणकिया ||१५|| इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंआदित्यस्तवनामका१०३वांअध्यायसमाप्त |