मार्कण्डेय महा पुराण
119
मार्कण्डेयउवाच
क्षुपःखनित्रपुत्रस्तुप्राप्यराज्यंयथापिता। तथैवपालयामासप्रजाधर्मेणरञ्जयन्॥१
मार्कण्डेयजी बोले-
खनित्र पुत्र राजा छुप ने राज्य पाकर पिता की भाँति प्रजा का धर्म पूर्वक पालन किया ॥ १ ॥
सदानशीलोयष्टाचयज्ञानामवनीपतिः। समःशत्रौचमित्रेचव्यवहारादिवर्त्मनि॥२
महाराज सुप बड़े दानी तथा यज्ञों के करने वाले हुए । व्यवहार में वे शत्रु और मित्र को समान
दृष्टि से देखते थे ||२||
एकदासमहीपालोनिजस्थानगतोसुने। सुतैरुक्तोयथापूर्व्वंक्षुपोराजातथाऽभवत्॥३
हे सुनि ! एक बार जब कि महाराज छुप अपने स्थानपर बैठे हुए थे तब पौरा- शिक ब्राह्मणों ने उनसे कहा कि पूर्वकाल में भी एक महाराज जुप हुए थे ||३||
ब्रह्मणस्तनयःपूर्वंक्षुपोऽभूत्पृथिवीपतिः। यादृक्चरितमस्यासीत्तादृक्तस्यैवचेष्टितम् ||४||
जिस प्रकारे ब्रह्माजी के पुत्र उन महाराज क्षुप का चरित्र था उसीप्रकार आपका भी होना चाहिये ||४|| राजोवाच
श्रोतुमिच्छामिचरितंक्षुपस्यसुमहात्मनः। यदितादृङ्मयाशक्यंचेष्टितुंतत्करोम्यहम् ||५||
राजा वोले:-
मैं महात्मा चुप का चरित्र सुनने की इच्छा करता हूँ, यदि मेरी शक्ति भी उनके अनुसार होगी
तो मैं भी वैसी ही चेष्टा करूँगा ||५| सूताऊचुः
सचकाराकरानभूपराजागोब्राह्मणान्पुरा। षष्ठांशेनकृताचोर्व्यामिष्टिस्तेनमहात्मना || ६
पौराणिकों ने कहा:--
हे राजन् ! उन महाराज क्षप ने गो ब्राह्मणोंको इतना दान दिया कि वे अयाचित होगये । उन
महात्मा ने प्रजा से छटा भाग लेकर अनेकों यज्ञभी किये ॥ ६ ॥ राजोवाच
तेषांमहात्मनांराज्ञांकोऽनुयास्यतिमद्विधः। "तस्याप्युत्कृष्टचेष्टानांचेष्टासूमवान्भवेत्॥७
राजा वोले:-
मुझ सरीखा राजा उन महात्मा राजाथों का कहाँ तक अनुकरण कर सकेगा तथापि मैं उन श्रेष्ठ
राजाओं के कार्यानुसरण की चेष्टा करूँगा ॥ ७ ॥
तच्छ्रयतांप्रतिज्ञायासाम्प्रतंक्रियतेमया। क्षुपस्यानुकरिष्यामिमहाराजस्यचेष्टितम् || ८
अतः महाराज क्षुप के चरित्र का अनुकरण क रने के निमित्त जो प्रतिक्षा मैं करता हूँ वह सुनो॥ ८ ॥
त्रींस्त्रीन्यज्ञान्करिष्यामिशस्यापातेगतागते। पृथिव्यांचतुरर्गायांप्रतिज्ञेयंकृतामया॥६
जव जव पृथ्वी पर अकाल पड़ेगा तब तब मैं तीन तीन यज्ञ करूँगा ॥ ६ ॥
यञ्चगोब्राह्मणाःपूर्वसददन्भूभृतेकरम्। तमेवप्रतिदास्यामिब्राह्मणानांतथागवाम्॥१०॥
पूर्वकालमेंगोब्राह्मणने जोकरराजाकोदियाहैवहींमैंगो'ब्राह्मणोंको दानकेरूपमेंदूँगा॥१०॥ मार्कण्डेयउवाच
तिप्रतिज्ञायवचःक्षुपस्तत्कृतवांस्तथा। यापातेसयज्ञखीनयजयजतांवरः॥११॥
मार्कण्डेयजी बोले-
राजा तुप ने अपनी इस प्रतिज्ञा के अनुसार अकाल पड़ने पर तीन तीन श्रेष्ठ यज्ञ किये ॥ ११ ॥
ब्राह्मणःपुराराज्ञामददद्वयश्चवैकरम्। वत्सङ्खयमदाद्वित्तमन्यद्गोब्राह्मणायसः ||१२||
गो ब्राह्मणों ने जो कर पहिले राजा को दिया था वही महाराज ने गो ब्राह्मणों को दान में दे दिया ||१२|
स्यपुत्रोऽभवद्वीरःप्रमथायामनिन्दितः। वस्यप्रताप-शौय्र्याभ्यांकृतावश्यामहीभृतः॥१३॥
उनके प्रमथा नाम पत्नी से एक पुत्र वीर नामक हुए जिनका चरित्र निन्दा रहित था तथा
जिनकी शुरता और प्रताप से सब राजा उनके वश होगये थे ॥ १३ ॥
स्यापिनन्दिनीनामवैदर्भीदयिताभवत्। विविंशंतनयंतस्यांजनयामाससप्रभुः || १४ ||
विदर्भराज की कन्या नन्दिनी महाराज वीर की पत्नी हुई जिससे कि उन्होंनेविविंश नाम का एक पुत्र उत्पन्न किया ||१४||
विविंशेशासतिमहींमहीपालेमहौजसि। महीतलमभूद्वयाप्तंनिरन्तरतयानरैः॥१५॥
जब राजा विविंश पृथ्वी का शासन करने लगे तब उन तेजस्वी राजा के शासन में समस्त पृथ्वी पर प्रजा ने सुख शांति का अनुभव किया ॥ १५ ॥
ववर्षकालेपर्जन्योमहीशस्यवतीतथा। सुफलानिचशस्यानिरसवन्तिफलानिच॥१६॥
उनके शासन में समय पर वर्षा होती, सुन्दर श्रौषधियाँ पृथ्वी से उत्पन्न होतीं, खूब फसलें होतीं और फल रसदार उत्पन्न होते ॥ १६॥
रसाःपुष्टिकरायासनपुष्टिर्नोन्मादकारिणी। नवित्तनिचयानृणांप्रभूतामदहेतवः॥१७
वे रस पुष्ट करने वाले होते थे परन्तु वह पुष्टि उन्माद पैदा न करती थी । लोगों का धनैश्वर्य उनके मद का कारण न होता॥ १७॥
तत्प्रतापेनरिपवोभयमापुर्महामुने। स्वास्थ्यञ्चनःसुहृद्वर्गोमुदमिष्टाभिरिकाम् ||१८||
उनके प्रताप से शत्रुओं को भय लगा था रहता तथा उनके इष्ट मित्र सदैव प्रसन्न और
करके तथा भली भाँति पृथ्वी का पालन करकेस्वस्थ रहते ॥ १८ ॥
इष्ट्वासयज्ञान्सुबहून्सम्यक्सम्पाल्यमेदिनीम्। संग्रामेनिधनंप्राप्यशक्रलोकमितोगतः॥१६॥
राजाविविंशबहुतसेयज्ञ संग्राममेंमृत्युपाकरस्वर्गलोककोगये॥१६॥ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंविविंशचरित्रनाम११६वाँअध्यायसमाप्त।
Summary of chapter 119 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
Prince Vivimsha, son of Khanitra, ascents the throne and rules with immense valor and devotion. Under his rule, agricultural yields multiply, crime disappears, and the kingdom prospers through regular performance of Yajnās.