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मार्कण्डेयउवाच

क्षुपःखनित्रपुत्रस्तुप्राप्यराज्यंयथापिता। तथैवपालयामासप्रजाधर्मेणरञ्जयन्॥१

मार्कण्डेयजी बोले-

खनित्र पुत्र राजा छुप ने राज्य पाकर पिता की भाँति प्रजा का धर्म पूर्वक पालन किया ॥ १ ॥

सदानशीलोयष्टाचयज्ञानामवनीपतिः। समःशत्रौचमित्रेचव्यवहारादिवर्त्मनि॥२

महाराज सुप बड़े दानी तथा यज्ञों के करने वाले हुए । व्यवहार में वे शत्रु और मित्र को समान

दृष्टि से देखते थे ||२||

एकदासमहीपालोनिजस्थानगतोसुने। सुतैरुक्तोयथापूर्व्वंक्षुपोराजातथाऽभवत्॥३

 हे सुनि ! एक बार जब कि महाराज छुप अपने स्थानपर बैठे हुए थे तब पौरा- शिक ब्राह्मणों ने उनसे कहा कि पूर्वकाल में भी एक महाराज जुप हुए थे ||३||

ब्रह्मणस्तनयःपूर्वंक्षुपोऽभूत्पृथिवीपतिः। यादृक्चरितमस्यासीत्तादृक्तस्यैवचेष्टितम् ||४||

जिस प्रकारे ब्रह्माजी के पुत्र उन महाराज क्षुप का चरित्र था उसीप्रकार आपका भी होना चाहिये ||४|| राजोवाच

श्रोतुमिच्छामिचरितंक्षुपस्यसुमहात्मनः। यदितादृङ्मयाशक्यंचेष्टितुंतत्करोम्यहम् ||५||

राजा वोले:-

मैं महात्मा चुप का चरित्र सुनने की इच्छा करता हूँ, यदि मेरी शक्ति भी उनके अनुसार होगी

तो मैं भी वैसी ही चेष्टा करूँगा ||५| सूताऊचुः

सचकाराकरानभूपराजागोब्राह्मणान्पुरा। षष्ठांशेनकृताचोर्व्यामिष्टिस्तेनमहात्मना || ६

पौराणिकों ने कहा:--

हे राजन् ! उन महाराज क्षप ने गो ब्राह्मणोंको इतना दान दिया कि वे अयाचित होगये । उन

महात्मा ने प्रजा से छटा भाग लेकर अनेकों यज्ञभी किये ॥ ६ ॥ राजोवाच

तेषांमहात्मनांराज्ञांकोऽनुयास्यतिमद्विधः। "तस्याप्युत्कृष्टचेष्टानांचेष्टासूमवान्भवेत्॥७

राजा वोले:-

मुझ सरीखा राजा उन महात्मा राजाथों का कहाँ तक अनुकरण कर सकेगा तथापि मैं उन श्रेष्ठ

राजाओं के कार्यानुसरण की चेष्टा करूँगा ॥ ७ ॥

तच्छ्रयतांप्रतिज्ञायासाम्प्रतंक्रियतेमया। क्षुपस्यानुकरिष्यामिमहाराजस्यचेष्टितम् || ८

अतः महाराज क्षुप के चरित्र का अनुकरण क रने के निमित्त जो प्रतिक्षा मैं करता हूँ वह सुनो॥ ८ ॥

त्रींस्त्रीन्यज्ञान्करिष्यामिशस्यापातेगतागते। पृथिव्यांचतुरर्गायांप्रतिज्ञेयंकृतामया॥६

जव जव पृथ्वी पर अकाल पड़ेगा तब तब मैं तीन तीन यज्ञ करूँगा ॥ ६ ॥

यञ्चगोब्राह्मणाःपूर्वसददन्भूभृतेकरम्। तमेवप्रतिदास्यामिब्राह्मणानांतथागवाम्॥१०॥

पूर्वकालमेंगोब्राह्मणने जोकरराजाकोदियाहैवहींमैंगो'ब्राह्मणोंको दानकेरूपमेंदूँगा॥१०॥ मार्कण्डेयउवाच

 तिप्रतिज्ञायवचःक्षुपस्तत्कृतवांस्तथा। यापातेसयज्ञखीनयजयजतांवरः॥११॥

मार्कण्डेयजी बोले-

 राजा तुप ने अपनी इस प्रतिज्ञा के अनुसार अकाल पड़ने पर तीन तीन श्रेष्ठ यज्ञ किये ॥ ११ ॥

ब्राह्मणःपुराराज्ञामददद्वयश्चवैकरम्। वत्सङ्खयमदाद्वित्तमन्यद्गोब्राह्मणायसः ||१२||

गो ब्राह्मणों ने जो कर पहिले राजा को दिया था वही महाराज ने गो ब्राह्मणों को दान में दे दिया ||१२|

स्यपुत्रोऽभवद्वीरःप्रमथायामनिन्दितः। वस्यप्रताप-शौय्र्याभ्यांकृतावश्यामहीभृतः॥१३॥

उनके प्रमथा नाम पत्नी से एक पुत्र वीर नामक हुए जिनका चरित्र निन्दा रहित था तथा

जिनकी शुरता और प्रताप से सब राजा उनके वश होगये थे ॥ १३ ॥

स्यापिनन्दिनीनामवैदर्भीदयिताभवत्। विविंशंतनयंतस्यांजनयामाससप्रभुः || १४ ||

विदर्भराज की कन्या नन्दिनी महाराज वीर की पत्नी हुई जिससे कि उन्होंनेविविंश नाम का एक पुत्र उत्पन्न किया ||१४||

विविंशेशासतिमहींमहीपालेमहौजसि। महीतलमभूद्वयाप्तंनिरन्तरतयानरैः॥१५॥

जब राजा विविंश पृथ्वी का शासन करने लगे तब उन तेजस्वी राजा के शासन में समस्त पृथ्वी पर प्रजा ने सुख शांति का अनुभव किया ॥ १५ ॥

ववर्षकालेपर्जन्योमहीशस्यवतीतथा। सुफलानिचशस्यानिरसवन्तिफलानिच॥१६॥

उनके शासन में समय पर वर्षा होती, सुन्दर श्रौषधियाँ पृथ्वी से उत्पन्न होतीं, खूब फसलें होतीं और फल रसदार उत्पन्न होते ॥ १६॥

रसाःपुष्टिकरायासनपुष्टिर्नोन्मादकारिणी। नवित्तनिचयानृणांप्रभूतामदहेतवः॥१७

वे रस पुष्ट करने वाले होते थे परन्तु वह पुष्टि उन्माद पैदा न करती थी । लोगों का धनैश्वर्य उनके मद का कारण न होता॥ १७॥

तत्प्रतापेनरिपवोभयमापुर्महामुने। स्वास्थ्यञ्चनःसुहृद्वर्गोमुदमिष्टाभिरिकाम् ||१८||

उनके प्रताप से शत्रुओं को भय लगा था  रहता तथा उनके इष्ट मित्र सदैव प्रसन्न और

करके तथा भली भाँति पृथ्वी का पालन करकेस्वस्थ रहते ॥ १८ ॥

इष्ट्वासयज्ञान्सुबहून्सम्यक्सम्पाल्यमेदिनीम्। संग्रामेनिधनंप्राप्यशक्रलोकमितोगतः॥१६॥

राजाविविंशबहुतसेयज्ञ संग्राममेंमृत्युपाकरस्वर्गलोककोगये॥१६॥ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंविविंशचरित्रनाम११६वाँअध्यायसमाप्त।