मार्कण्डेय महा पुराण
26
जड़ उवाच.
वर्द्धमानं सुतं सा तु राजपत्नी दिने दिने । तमुल्लापादिना बोधमनयन्निर्म्ममात्मकम् ॥ १ ॥
जड़ (सुमति) बोले- जैसे -२ वह बालक बढ़ता गया मंदालसा उसको बहलाने के वहाने निर्ममात्मक उपदेश करती थी॥ १॥
यथायथं वलं लेभे यथा लेभे मतिं पितुः । तथा तथात्मवोधंच सोऽवाप मातृभाषितैः ॥ २
ज्यों-ज्यों उसने वल प्राप्त किया पिता ने उसको व्यावहारिक ज्ञान दिया परन्तु उसने माताकी बातों से श्रात्मबोध को प्राप्त किया ॥ २ ॥ इत्थं तया स तनयो जन्मप्रभृति वोधितः । चकार न सतिं प्राज्ञो गार्हस्थ्यं प्रति निर्ममः || ३ ||
इस प्रकार वह पुत्र जन्म से ही मातासे ज्ञान प्राप्त कर गृहस्थाश्रम से विमुख होकर विरक्त होगया ॥ ३ ॥ द्वितीयोऽस्याः सुतो जज्ञे तस्य नामाकरोत् पिता । सुवाहुरयमित्युक्ते सा जहास मदालसा ॥ ४ ॥
फिर मदाल- का दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम पिता ने सुबाहु रक्खा इसपर भी वह हँसी ॥ ४ ॥
तमप्येवं यथापूर्व्वं बालमुछापचादिनी । प्राह वाल्यात् स च प्राप तथा बोधं महामतिः ॥ ५
उसको भी वह पहिले की तरह बहलानेके बहानेसे उपदेश करती जिससे वह भी वाल्यावस्था से ही ज्ञान प्राप्त करता हुआ ज्ञानवान् हो निर्मम होगया ॥ ५ ॥
तृतीयं तनयं जातं स राजा शत्रुमर्दनम् । यदाह तेन सा सुभ्रूर्जहासातिचिरं पुनः ॥ ६।।
जब मदालसा के तीसरा पुत्र उत्पन्न हुआ तब राजा ने उसका नाम शत्रुमर्दन रक्खा उस समय भी उस सुन्दरी को हँसी आ गई ॥ ६ ॥
तथैव सोऽपि तन्वङ्गन्या वालत्वादववोधितः । क्रियाञ्चकार निष्कामो न किंचिदुपकारकम् ॥ ७
उसको भी सुन्दरी मदालसा ने बाल्यावस्था से बोध करायाn जिससे वहभी निष्काम होकर विरक्त होगया और किसी उपकार का न रहा ॥ ७ ॥
चतुर्थस्य सुतस्याथ चिकीर्षुर्नाम भूमिपः । ददर्श तां शुभाचारामीसद्धासां मदालसाम् । तामाह राजा हसत किञ्चित् कौतूहलान्वितः॥ ८
जब चौथे पुत्रं का. नाम राजा रखना ही चाहता था तो उसने शुभा चरण वाली मदालसा को कुछ मुस्कराते हुए देखाइसपर राजा ने कुतूहलयुक्त होकर मुस्कराती हुई उस स्त्री से कहा ॥ ८ ॥
राजोवाच
क्रियमाणे सकृन्नाम्नि कथ्यतां हास्यकारणम् । विक्रान्तथ सुबाहुश्च तथान्यः शत्रुमर्दनः ॥ ६।।
राजा बोला- इन नामों के रक्खे जाने में तुम अपनी हँसी का कारण बताओ। विक्रान्त, सुबाहुं और शत्रु- मर्दन ||६||
शोभनानीति नामानि मया मन्ये कृतानि वै । योग्यानि क्षत्रबन्धनां शौर्य्यायोपयुतानि च ॥ १०॥
ये मैंने सुन्दरनाम शुरवीरों और क्षत्रियों के योग्य समझकर रक्खे ॥ १० ॥ सन्त्येतानि चेद्रे यदि ते मनसि स्थितम् । तदस्य क्रियतां नाम चतुर्थस्य सुतस्य मे ॥ ११
हे भद्रे ! यदि ये नाम तुम्हारे मनके अनुसार नहीं हैं तो इस चौथे लड़के का नाम तुम्हीं रक्खो ॥११॥
मदालसोवाच
मयाज्ञा भवतः कार्य्या महाराज यथात्थ माम् । तथा नाम करिष्यामि चतुर्थस्य सुतस्य ते ||१२||
मदालसा बोली हे महाराज ! आपकी आज्ञा का मैं अवश्य ही पालन करूंगी और आपके इस चौथे पुत्र का नाम मैं ही रक्खूंगी ||१२||
अलर्क इति धर्मज्ञः ख्यातिं लोके प्रयास्यति । कनीयानेप ते पुत्रो मतिमांथ भविष्यति ॥ १३॥
आपके इस छोटे पुत्रका नाम विख्यात होगा और बड़ा विद्वान होगा ॥ १३ ॥ तच्छ्रुत्वा नाम पुत्रस्य कृतं मात्रा महीपतिः । अलर्क इत्यसम्बद्धं प्रहस्येदमथाब्रवीत् ||१४||
मैंने अलर्क रक्खा । ये धर्मात्मा सम्पूर्ण लोक में माता के रक्खे हुए 'अलर्क' इस सम्बद्ध नामको सुनकर राजा कुछ हँसकर बोले ॥ १४ ॥ राजोवाच भवत्या यदिदं नाम सत्पुत्रस्य कृतं शुभे । किमीदृशमसम्बद्धमर्थः कोऽस्य मदालसे ||१५||
राजा बोले- हे शुभे मदालसे ! मेरे पुत्र का तुमने यह क्या असम्भवसा नाम रक्खा इसका क्या अर्थ है ? ||१५|| मदालसोवाच
कल्पनेयं महाराज कृता सा व्यवहारिकी । त्वत्कृतानां तथा नाम्नां शृणु भूप निरर्थताम् ॥१६॥
मदालसा वोली-- हे महाराज ! इस प्रकार नाम की कल्पना कर लेना एक व्यवहार की सी बात है । हे राजन् शाप अपने रक्खे हुए नामों की निरर्थकता को भी सुनिये ॥ १६ ॥
वदन्ति पुरुषाः प्राज्ञा व्यापिनं पुरुषं यतः । क्रान्तिश्च गतिरुद्दिष्टा देशाद्देशान्तरन्तु या ॥१७॥
विद्वान् लोग पुरुषको व्यापी कहते हैं, क्रांति उस वस्तु को कहते हैं जो देश-देशान्तरं में गति रखती है ||१७|| सर्व्वगो न प्रयातीति व्यापी देहेश्वरो यतः । ततो विक्रान्तसंज्ञेयं मता मम निरर्थका ॥ १८ ॥
देहका ईश्वर पुरुष व्यापक विक्रान्त नाम बिल्कुल निरर्थक है ||१८|| सुवाहुरिति या संज्ञा कृतान्यस्य सुतस्य ते । निरर्था साप्यमूर्त्तत्वात् पुरुषस्य महीपते || १६।।
हे राजन् ! होने के कारण कहीं नहीं जाता, अतः मेरे मत से जो तुमने 'सुवाहु' दूसरे पुत्र का नाम रक्खा वह निरर्थक है, कारण पुरुष तो मूर्तिमान नहीं है।
पुत्रस्य यत् कृतं नाम तृतीयस्यारिमद्दनः । मन्ये तदप्यसम्बद्धं शृणु चाप्यत्र कारणम् ||२०||
श्रौर तीसरे पुत्र का नाम जो आपने 'शत्रुमर्दन' रक्खा वह भी निरर्थक है, इसका भी कारण सुनिये ॥ ० ॥
एक एव शरीरेषु सर्व्वेषु पुरुषो यदा ।
तदास्य राजन् कः शत्रुः को वा मित्र मिहेष्यते ॥ २१ ॥
हे राजन् ! जब एक ही पुरुष सव शरीरों में विद्यमान है तो इस संसार में उसका कौन शत्रु और कौन मित्र है ! ॥ २१ ॥
भूतैर्भूतानि मृद्यन्ते अमूर्तो मृद्यते कथम् । क्रोधादीनां पृथग्भावात् कल्पनेयं निरर्थका ||२२||
शरीरों से शरीरों का नाश होता है, जिसका शरीर ही नहीं है उसका किस प्रकार नाश होगा ? वह पुरुष क्रोध आदि से भी पृथक है, इसलिये यह कल्पना ही निरर्थक है ॥
यदि संव्यवहारार्थमसन्नाम प्रकल्पद्यते । नाम्नि कस्मादलर्काख्ये नैरर्थ्यं भवतो मतम् ॥२३॥
यदि इसपर भी आपके रक्खे हुए नाम सार्थक और व्यावहारिक हैं तो फिर अलर्क नाम में ही कौनसी निरर्थकता है ॥ २३ ॥
जड़ उवाच
एवमुक्तस्तया साधु महिष्या स महीपतिः । तथेत्याह महाबुद्धिर्दयितां तथ्यवादिनीम् ॥२४॥
जड़ ( सुमति ) बोले- वह राजा मदालसाकी यह बात सुनकर कहने लगा, “हे प्रिये ! जो कुछ तुमने कहा वह सच है ||२४|| तञ्चापि सा सुतं सुर्यथा पूर्व्वसुतांस्तथा । प्रोवाच वोधजननं तामुवाच स पार्थिवः ||२५||
फिर मदालसा उस पुत्र को भी पहिले पुत्रों की तरह आत्मज्ञान देने लगी, इस पर राजा ऋतध्वजं ने उससे कहा ॥ २५ ॥ 'राजोवाच
करोपि किमिदं मूढे ममाभावाय सन्ततेः । दुष्टावबोधदानेन यथापूर्व्वं सुतेषु मे ॥
राजा बोले- हे मूर्खे ! यह क्या करती है ? वा संतति का अभाव है और तू इस पुत्र को भी पहिले पुत्रों की तरह वैराग्य सिखलाती है ॥ २६ ॥ यदि ते मत्प्रियं कार्यं यदि ग्राह्यं वचो मम । तदेनं तनयं मार्गे प्रवृत्तेः सन्नियोजय ||२७||
यदि तू मेरे कहने को मानकर वह कार्य करना चाहती है जो मुझको प्रिय है तो इसको प्रवृति मार्गमें लगा ॥ २७॥ कर्ममार्गः समुच्छेदं नैव देवि गमिष्यति । पितृपिण्डनिवृत्तिश्च नैवं साध्वि भविष्यति ||२८||
हे देवि ! कर्म-मार्ग का नाश करने से पितरों की पिंड दानादि से निवृत्ति नहीं होगी ॥ २८ ॥
पितरो देवलोकस्थास्तथा तिर्यक्त्वमागताः । तद्वन्मनुष्यतां याता भूतवर्गे च संस्थिताः ॥ २६ ॥
जो पितर देवलोक में स्थित हैं तथा जो तिर्य्यकं योनि में प्राप्त होगये हैं अथवा जो मनुष्य योनि या भूतों में स्थित हैं ॥ २६॥
सपुण्यानसपुण्यांश्च क्षुत्क्षामान् तृट् परिप्लुतान् । पिण्डोदकप्रदानेन नरः कर्मण्यवस्थितः ।
सदाप्याययते सुभ्रु तद्वद्दवातिथीनपि ॥ ३०
तथा जो पितर पुराय, पाप, भूख श्रथवा प्यास से युक्त हैं उनको मनुष्य पिंड और जल से तृप्त करते हैं तथा हे प्रिये ! इसी प्रकार देवता और अतिथियों को भी ॥ ३० ॥
देवैर्मनुष्यैः पितृभिः प्रेतैर्भूतैः सगुह्यकैः ।
वयोभिः कृमिकीटैश्च नर एवोपजीव्यते ॥ ३१ ॥ ||
तथा देव, मनुष्य, पितर, प्रेत, भूत, गुह्यक, कृमि, कीट श्रादि मनुष्यों को आशीर्वाद देते हैं जिससे मनुष्यों कॉ जीवन बढ़ता है ॥ ३१ ॥
तस्मात् तन्वङ्गि पुत्रं मे यत् कार्य्यं क्षत्रयोनिभिः । ऐहिकामुष्मिकफलं तत् सम्यक् प्रतिपादय ||३२||
हे सुन्दरी ! इसलिये इस पुत्र को क्षत्रियोचित कर्म बताओ जिससे इस लोक और परलोक का फल प्राप्त हो ॥३२॥
तेनैवमुक्ता सा भर्त्रा वरनारी मदालसा । अलर्क नाम तनयमुवाचोल्लापवादिनी ||३३||
अपने स्वामी से इस प्रकार कहे जाने पर सुन्दरी मदाल- सा उस अलर्क नाम श्रपने पुत्र से कहने लगी ॥३३॥ पुत्र वर्द्ध स्व मद्भर्त्तर्मनो नन्दय कम्र्म्मभिः । मित्राणामुपकाराय दुहृदां नाशनाय च ॥ ३४ ॥
हे पुत्र ! चिरंजीव रहो, मित्रों का उपकार और शत्रुओं का नाश आदि कर्मों से मेरे स्वामीके हृदय को श्रानन्द पहुँचाओ ||३४||
धन्योऽसि रे यो वसुधामशत्रु रेकश्चिरं पालयितासि पुत्र । तत्पालनादस्तु सुखोपभोगो धम्र्म्मात् फलं प्राप्स्यसि चामरत्वम् ||३५||
हे पुत्र ! तू धन्य है, तू शत्रुरहित होकर पृथ्वी का पालन कर । उसके पालन से तू सुखोपभोग कर तथा धर्म से श्रमरत्व प्राप्त कर ॥ ३५ ॥
धरामरान् पर्व्वसु तर्पयेथाः समीहितं वन्धुषु पूरयेथाः । हितं परस्मै हृदि चिन्तयेथा मनः परस्त्रीषु निवर्त्तयेथाः || ३६ ॥
पर्वों पर ब्राह्मणों को तृप्त करो, भाई, बन्धुओं की इच्छा पूर्ण करो, सदैव दूसरों का हित- चिन्तन करो और परस्त्रियों में कभी मन न लगाओ ॥ ३६ ॥
यज्ञैरनेकैर्वियुधानजस्रमथैर्द्विजान् प्रीणय संश्रि- तांश्च । स्त्रियश्च कामैरतुलैश्विराय युद्धे चारों स्तोषयितासि वीर ||३७|
तथा अनेक यज्ञों से देवताओं शत्रुओं को को, धन से ब्राह्मणों को, स्त्रियों को काम से तथा युद्ध से प्रसन्न रखो || ३७||
बाल्यावस्था युद्धश्चारीं- | बालो मनो नन्दय बान्धवानां गुरोस्तथाज्ञाकरणैः कुमारः। स्त्रीणां युवा सत्कुलभूषणानां वृद्धो वने वत्स वनेचराणाम् ॥३८॥
भाई बन्धु को प्रसन्न रखो। कुमारावस्था में श्राज्ञाकारिता से गुरु को, युवावस्था में अच्छे कुल की स्त्रियों को और वृद्धावस्था में बनवासियों को सुख पहुँचाओ ||३८||
राज्यं कुर्व्वन् सुहृदो नन्दयेथाः साधून रक्षस्तात यज्ञैर्यजेथाः । दुष्टान् निघ्नन् वैरिणवाजि - मध्ये गोविमार्थे वत्स मृत्युं व्रजेथाः ॥ ३६ ॥
हे तात! तुम राज्य करते हुए मित्रों को प्रसन्न करना, साधुओं की रक्षा करते हुए यज्ञ करना, दुष्टों और शत्रुओं का नाश करके श्रश्वमेध यज्ञ करना तथा गो ब्राह्मण के लिये मृत्यु से भी भय न करना ||३६|| इति श्रीमार्कण्डेयपुराणमें पुत्रानुशासन (१) नाम छब्बीसवाँ अ० समाप्त ।
Summary of chapter 26 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
As Queen Madālasā gives birth to her first three sons—Vikrānta, Subāhu, and Shatrumardana—she rocks their cradles while singing profound spiritual lullabies. Instead of worldly affection, she teaches them that the body is merely a temporary garment of panchabhūtas and that their true identity is pure, unblemished Ātman. Imbibing these non-dual teachings from infancy, all three princes renounce the kingdom in youth and attain liberation.