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मदालसोवाच

अतः परं शृणुष्वेमं पुत्र भक्त्या यदाहृतम् पितॄणां प्रीतये यद्वा वर्ज्यं वाऽमीतिकारकम् ।।।।

मदालसा बोली- हे पुत्र ! व पितरों के लिये श्रानन्ददायक अथवा उनके लिये वर्जित जो विषय है उसको मैं कहती हूं सुनो ॥१॥

मासं पितृणां तृप्तिश्च हविष्यान्नेन जायते मासद्वयं मत्स्यमांसैस्तृप्तिं यान्ति पितामहाः २।।

हविष्यान्न को देने से पितर लोग एक महीने तक तृप्त रहते हैं तथा मछली का मांस देने से दो महीने तक तृप्त रहते हैं

त्रीन् मासानू हारिणं मांसं विज्ञेयं पितृतृप्तये चतुर्मासांस्तु पुष्णाति शशस्य पिशितं पितॄन्

पितरों की तीन महीने की तृप्ति के लिये हिरन का मांस बतलाया गया है तथा खरगोश का मांस उनको चार महीने तक तृप्त रखता है शाकुनं पंच वै मासान् षण्माषान् शूकरामिषम् छागलं सप्त वै मासानैखेयश्चाष्टमासिकीम् ४।

पक्षियों के मांस से पांच महीने तक और सूअर के मांस से छः महीने तक तथा बकरके मांससे सात महीने तक और बारहसिंगे के माँस से आठ महीने तक पितृ लोग तृप्त रहते हैं

करोति तृप्तिं नव वै रुरोमांस न संशयः गवयस्यामिषं तृप्तिं करोति दशमासिकीम् || ५ |

चित्राङ्ग हिरन का मांस नौ महीने तक और गवय हिरन का मांस दस महीने तक पितरों को तृप्त करता है इसमें संशय नहीं

तथैकादशमासांस्तु उरभ्रं पितृतृप्तिदम् संवत्सरं तथा गव्यं पयः पायसमेव वा

उरभ्र पशु के मांस से ग्यारह महीने तक और गऊ के दूध अथवा खीर से एक वर्ष तक पितृ लोग तृप्त रहते हैं ॥६॥

वाघीणसामिषं लौह कालशाकं तथा मधु

दौहित्रामिषमन्यच्च यच्चान्यत् स्वकुलोद्भवैः॥

वाधीण और लोह पक्षी का मांस, कालशाक, मधु तथा धेवतेऔर अन्य कुटुम्बियों द्वारा लाया हुया मांस पितरों को तृप्तदायक है

अनन्तां वै प्रयच्छन्ति तृप्ति गौरीसुतस्तथा पितृणां नात्र सन्देहो गयाश्राद्धञ्च पुत्रक || ८

हे पुत्र ! गौरी पुत्र तथा गया का श्राद्ध पितरों को बड़ा आनन्द देने वाला है इसमें सन्देह नहीं श्यामाक- राजश्यामाकौ तद्वच्चैव मसातिकाः नीवारा: पौष्कलाश्चैव धान्यानां पितृतृप्तये

धान्यों में श्या- माक, राजश्यामाक, प्रसातिका, नीवार और पौष्कल पितरों की तृप्ति के लिये हैं ॥॥

यव-ब्रीहि- सगोधूम - तिला मुगाः ससर्षपाः प्रियङ्गवः कोविदारा निष्पावाश्चातिशोभनाः ||१०||

जौ, गेहूँ, तिल, मूँग, सरसों, गूलर, बेर और निष्पाव यह सब उत्तम हैं ॥१०॥ वज्र्ज्या मर्कटकाः श्राद्ध राजमाषास्तथाणवः विभूषिका मसुराश्च श्राद्धकर्म्मणि गर्हिताः ११

श्राद्धों में मक्का, राजमाष, उड़द विभूषि और मसूर ये वर्जित हैं ११ लशुनं गृञ्जनञ्चैव पलाण्डुं पिण्डमूलकम् करम्भं यानि चान्यानि हीनानि रसवर्णतः ||१२||

लहसन, प्याज़, मूली, करम्भ और अन्य कुत्सित रसादिक ॥१२॥

गान्धारिका मलावूनि लवणान्यूपराणि च आरक्ता ये च निर्यासाः प्रत्यक्षलवणानि च १३

तथा गान्धारिका, अलाबू, लवण, ऊसरपृथ्वी, रङ्गीन कपड़े और प्रत्यक्ष लवण १३ वज्र्ज्यान्येतानि वै श्राद्ध यच्च वाचा न शस्यते यच्चोत्कोचादिना प्राप्तं पतिताद्वयदुपार्जितम् १४ ||

ये सव तथा जो वाणी में अच्छा न लगता हो वह श्राद्धमें वर्जित हैं, इसी प्रकार जो वस्तु पतित से मँगाईमें निषिद्ध हैं १४

अन्याय - कन्याशुल्कोत्थं द्रव्यञ्चात्र विगर्हितम् दुर्गन्धि फेनिलञ्चाम्बु तथैवाल्पसरोदकम् ||१५||

श्रन्याय से संचित अथवा गई हो अथवा पतित द्वारा उपार्जित धन. ये श्राद्ध कन्या बेचकर प्राप्त किया हुआ धन श्राद्ध में वर्जितहै | दुर्गंधित, फेनयुक्त अथवा जिस जगह थोड़ाजल हो उस जगह से प्राप्त किये हुए जलको श्राद्ध पासके उस स्थान का जल, रात्रि का जल तथा  में प्रयोग न करे ||१५||

न लभेद्यत्र, गौस्तृप्ति नक्तं यच्चाप्युपाहृतम्

यच्च सर्व्वजनोत्सृष्ट' यच्चाभोज्यं निपाननम् १६॥ जिस स्थान पर गौ तृप्ति न जिस जलाशय का यज्ञं न हुआ हो उसका जल, अभोज्य और अपेय जल ॥१६॥

तद्वज्ज्यं सलिलं तात सदैव पितृकर्म्मणि मार्गमाविकमौष्ट्रञ्च सर्व्वमैकशफंच यत् ॥१७॥

पितरों के कार्य में ये सब जलं वर्जित हैं। मृगी, वकरी, ऊँटनी तथा जिस पशु का खुर चिरा न हो जैसे घोड़ी १७

माहिषं चामरंचैव धेन्वा गोश्राप्यनिर्द्दशम् | पित्रार्थं मे प्रयच्छस्वेत्युक्त्वा यच्चाप्युपाहृतम् वर्ज्जनीयं सदा सद्भिस्तत् पयः श्राद्धकर्म्मणि १८

भैंस, चमरी, तुरन्तकी व्याहीहुई गाय और पितरों के लिये माँग कर लाया हुआ दूध, ये सव दूध श्राद्ध कर्म में प्रयोग न करने चाहिये १८

वर्ज्या जन्तुमती रूक्षा क्षितिः प्लुष्टा तथाग्निना अनिष्टदुष्टशब्दो- दुर्गन्धा चात्र कर्म्मणि १६

जान- वरों से पूर्ण, रूखी और अग्नि से जली हुई पृथ्वी पर श्राद्ध न करना चाहिये श्रनिष्ट वस्तु, दुष्ट शब्द और दुर्गन्ध जहाँ हो तथा १६

कुलापमानकाः श्राद्धे व्याधमौष्टिकलङ्गकाः

नग्नाः पातकिनश्चैव हन्युदृष्ट्या पितृक्रियाम् ||२०||

कुल का अपमान करने वाले और कुल घाती, नंगे और पापी मनुष्यों के रहने से श्राद्ध कर्म नष्ट हो जाता है

अपुमानपविद्धव कुक्कुटो ग्रामशकरः श्वा चैव हन्ति श्राद्धानि यातुधानाथ दर्शनात्॥ २१

नपुंसक, स्त्री, लुला-लङ्गड़ा, मुर्ग और ग्राम सूर तथा कुत्ते और राक्षस ये सब दर्शन मात्रसे. श्राद्धों को नष्ट कर देते हैं २१

तस्मात् सुसंवृतो दद्यात् तिलैश्वावकिरन महीम् एवं रक्षा भवेच्छाद्धे कृता तातोभयोरपि ||२२||

इसलिये श्राद्ध- स्थान पर चारों तरफ तिल छिटका देने चाहिये हे तात ! इस प्रकार दोनों पक्षों में श्राद्ध करने से रक्षा होती है ||२२||

शावस्सुतकसंस्पृष्ट ं दीर्घरोगिभिरेव च पतितैर्मलिनैश्चैव न पुष्णाति पितामहान् ||२३||

जो सुतकं में हो अथवा चिर- काल से रोगी हो, पतित हो अथवा मलिन हो और पिता, वावा श्रादि का पालन न करता हो वज्र्ज्जनीयं तथा श्राद्धे तथोदक्याचं दर्शनम् मुण्डशौण्डसमाभ्यासो यजमानेन चादरात् ||२४||

सब और रजस्वला स्त्रीका दर्शन श्राद्ध में निषिद्ध है तथा सन्यासी और दासी आदि का श्रानाजाना भी श्राद्ध मे वर्जनीय है।

केशकीटावपन्नंच तथा श्वभिरवेक्षितम् पूति पर्युषितंचैव वार्त्ताक्यभिषवांस्तथा वर्जनीयानि वै श्राद्ध यच्च वस्त्रांनिलाहतम् ||२५||

वह वस्तु जिसमें बाल अथवा कीड़ा पड़ गया हो, जिस पर कुत्ते की दृष्टि पड़ गई हो, बासी, दुर्गन्धयुक्त, बेगुन, शराब तथा वह वस्तु जो कपड़े की हवा से सुखाई गई हो श्राद्ध में निषिद्ध है २५

श्रद्धया परया दत्तं पितृणां नामगोत्रतः यदाहारास्तु ते जातास्तदाहारत्वमेति तत् ||२६||

परम श्रद्धा पूर्वक पितरों का नाम और गोत्र उच्चारण कर पिण्डदान करे उस आहार को उस समय वे लेतेहैं २६

तस्माच्छ्राद्धवता पात्रे यच्छस्तं पितृकर्मरिण यथावचैव दातव्यं पितॄणां तृप्तिमिच्छता ||२७||

इसलिये पितरों की तृप्ति की कामना करके श्राद्ध  कर्म में जो वस्तु प्रशस्त हो वह श्रद्धापूर्वक सत् पात्र को देनी चाहिये ||२७||

योगिनंथ सदा श्राद्ध भोजनीया विपश्चिता योगाधारा हि पितरस्तस्मात् तान् पूजयेत् सदा २८

विपश्चित योगी लोग को सदैव श्राद्ध में भोजन कराना चाहिये पितृ गण योगाधार होते हैं इसलिये वे सदैव पूजनीय है ॥ २८

ब्राह्मणानां सहस्रभ्यो योगी त्वग्राशनो यदि यजमानंच भोक्तुं च नौरिवाम्भसि तारयेत् ||२६||

एक हजार ब्राह्मणों से एक योगी श्रेष्ठ है जो यजमान को और भोजन करनेवालों को नौक के समान संसार सागर से तार देता है ॥२६

पितृगाथास्तथैवात्र गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः या गीताः पितृभिः पूर्व्वमैलस्यासीन्महीपतेः ॥३०॥

प्राचीन काल में राजा ऐल के पितरों ने जो गी गाये थे उसी पितृगाथा का ब्रह्मवादियों ने गा किया है ३०

"कदा नः सन्ततावग्रचः कस्यचिद्भवितां सुतः यो योगिभुक्तशेषानो भुवि पिण्डं प्रदास्यति ३१

हमारी सन्तति में कब श्रीर की ऐसा पुत्र होगा जो पृथ्वी पर योगी को भोज कराकर पिण्डदान करेगा ३१

गयायामथवा पिएडं खड्गमांसं महाहविः कालशाकं तिलाढ्यं वा कृसरं मासतृप्तये ॥३२

गयाजी में दान करने से, खड्ग के मास से, महाहवि (खीर | से, कालशाक, तिल और खिचड़ी से एक महीने तक हम पितर लोग तृप्त होते हैं ३२

वैश्वदेवंच सौम्यंच खड्गमांसं परं हविः विपाणवर्ज्जचखड्गाप्त्या आस्म्रुय्र्य्यचानुवामहे ३३ ||

विश्वदेव- कर्म हमको प्रिय है तथा उत्तम वस्तु, खड्गमांस, हविष्यान्न, बिना सींग वाले पशु का मांस और जिस वस्तु पर सूर्य का प्रकाश न पड़ा हो ऐसी वस्तुयें हम खाते हैं ३३

दद्याच्छाद्ध त्रयोदश्यां मघासु च यथाविधि मधुसर्पिःसमायुक्त पायसं दक्षिणायणे ||३४||

त्रयोदशी और मघा नक्षत्र में विधिपूर्वक श्राद्ध करना चाहिये तथा शहद और घी मिली खीर पितरों को उस समय देनी चाहिये जब सूर्य दक्षिणायणहों ||३४||

तस्मात् सम्पूजयेद्भक्त्या स्वपितृन् पुत्र मानवः कामानभीप्सन् सकलान् पापाच्चात्मविमोचनम् ३५||

हे पुत्र ! इसलिये मनुष्य को चाहिये कि अपने पितरों को भक्तिपूर्वक पूजे क्योंकि ऐसा करने से सब- सर्व मनो-- कामना पूर्ण होती हैं तथा पापों का नाश होता है३५

वसून् रुद्रांस्तथादित्यान् नक्षत्रग्रहतारकाः प्रीणयन्ति मनुष्याणां पितरः श्राद्धतर्पिताः || ३६ ||

श्राद्ध से तृप्त होकर पितृ लोग मनुष्यों पर वसुओं, रुद्रों, सूर्य, नक्षत्र, ग्रह, तारागणों आदि को प्रसन्न कराते हैं ||३६||

आयुः प्रज्ञां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्षं सुखानि च . प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पिताः ||३७||

श्राद्ध से तृप्त होकर पितृगण श्रायु, बुद्धि, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष और अनेकों सुख तथा राज्य दिलाते हैं ३७॥

एतत् ते पुत्र कथितं श्राद्धकर्म्म यथोदितम्

काम्यानां श्रूयतां वत्स श्राद्धानां तिथिकीर्त्तनम् ३८ |||

 हे पुत्र ! यह तुमसे श्राद्धकर्म कहा हे वत्स ! अब काम्य श्राद्ध का तिथि- कीर्तन सुनो ॥३८॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणमें श्राद्धकल्प नाम ३२वाँ श्र० समाप्त !