मार्कण्डेय महा पुराण
37
जड़ उवाच
सोऽप्यलक यथान्यायं पुत्रवन्मुदिताः प्रजाः । पालयामास धर्मात्मा स्वे स्वे कर्म्मण्यवस्थिताः १
जड़ ( सुमति ) बोले- वह महात्मा अलर्क न्यायपूर्वक प्रजा को पुत्र- वत् पालन करता था तथा सब प्रजा श्रपने-२ कर्म में स्थित होकर प्रसन्न थी ॥ १ ॥
दुष्टेषु दण्डं शिष्टेषु सम्यक च परिपालनम् । कुर्च्चन् परां मुदं लेभे इयाज च महामखैः ॥ २ ॥
वह दुष्टों को दंड देता तथा सज्जनों का भली प्रकार पालन करता हुआ परम आनन्द को प्राप्त करता था तथा बड़े २ यज्ञ किया करताथा ||२||
अजायन्त सुताश्चास्य महाबलपराक्रमाः । धर्मात्मानो महात्मानो विमार्गपरिपन्थिनः ३ ॥
उसके महावली, पराक्रमी, धर्मात्मा, महात्मा तथा कुमार्गियों को दंड देनेवाले पुत्र हुए ॥ ३ ॥
चकार सोऽर्थं धर्मेण धर्ममर्थेन चात्मवान् । तयोश्चैवाविरोधेन बुभुजे विषयानपि ॥
एवं बहूनि वर्षाणि तस्य पालयतो. महीम् ।
धर्म्मार्थ कामसक्तस्य जग्मुरेकमहर्यथा ॥ ५
अलर्क ने धर्म से धन प्राप्त किया निर्विरोध सांसारिक विषयों का सुख भोगने लगे ॥ तथा धन से धर्म किया । वे धन और धर्म से इसी तरह धर्म, अर्थ और काम में ग्रासक्त हो पृथ्वी को पालते हुए उन्हें बहुत वर्ष एक दिन के समानं व्यतीत होगये ॥ ५ ॥
वैराग्यं नास्य सञ्जज्ञे भुञ्जतो विषयान् प्रियान् । न चाप्यलमभूत् तस्य धर्म्मार्थोपार्ज्जुनं प्रति ॥ ६
उनको सांसारिक सुख भोगते-भोगते वैराग्य न हुआ तथा धर्म और धन से भी तृप्ति न हुई ॥ ६ ॥
तं तथा भोगसंसर्ग-प्रमत्तमजितेन्द्रियम् । सुबाहुर्नाम शुश्राव भ्राता तस्य वनेचरः ॥
उसके भाई सुबाहु ने जो वनवासी थे सुना कि लर्क सांसारिक भोगों, में प्रमत्त और श्रजितेन्द्रिय हो रहा है ॥७ ॥
तं बुबोधयिषुः सोऽथ चिरं ध्यात्वा महीपतिः । तद्वैरिसंश्रयं तस्य श्रेयोऽमन्यत भूपतेः ॥ ८।।
श्रलर्क को किस तरह ज्ञान उत्पन्न हो यह सुबाहु ने बहुत काल तक सोचा और निश्चित किया कि यदि कोई वैरी इनसे अटके तो इनको ज्ञान हो ॥८॥
ततः स काशिभूपालमुदीर्ण बलवाहनम् । स्वराज्यं प्राप्तमागच्छद्धबहुशः शरणं कृती ॥ ६ ॥
तब वह अपने को राज्य - प्राप्ति की इच्छा से काशीनरेश के पास जो बहुतों को शरण दिया करते थे तथा जिनके पास बहुतसी धन सेना और सवारियां भी थीं, गये ॥ ६ ॥
सोऽपि चक्रे बलोद्योगमलर्क प्रति पार्थिवः । दूतश्च प्रेषयामास राज्यमस्मै प्रदीयताम् ॥१०॥
उस राजा ने अलर्क के विरुद्ध एक सेना तैयार करके एक दूत को अलर्क के पास भेज कर कहलवाया कि यह राज्य सुबाहुको देदो ॥१०॥
सोऽपि नेच्छत् तदा दातुमाज्ञापूर्व्वं स्वधर्म्मवित् । प्रत्युवाच च तं दूतमलर्कः काशिभूभृतः ॥ ११॥
धर्मात्मा अलर्क ने आज्ञा पूर्वक माँगने पर राज्य देने की इच्छा न की और काशिराज के उस दूत से वोले ॥ ११ ॥
मामेवाभ्येत्य हार्डीयन याचतां राज्यमंग्रजः । नाक्रान्त्या सम्प्रदास्यामि भयेनाल्पामपि क्षितिम् १२)
यदि मेरा भाई मुझसे श्राकर राज्य माँगे तो उचित है । किसी के भय से दवकर मैं थोड़ीसी पृथ्वी भी न दूँगा ||१२||
सुबाहुरपि नो याश्चां चकार मतिमांस्तदा । न धर्मः क्षत्रियस्येति याज्चा वीर्य्यधनो हि सः १३
बुद्धिमान् सुवाहु ने भी याचना करना उचित न समझा, कारण-: क्षत्रिय को जिसका कि धन बल है याचना करना धर्मसङ्गत नहीं ||१३||
ततः समस्तसैन्येन काशीशः परिवारितः । आक्रान्तुमभ्यगाद्राष्ट्रमलर्कस्य महीपतेः ॥ १४॥
तब समस्त सेना को लेकर काशिराज महाराज अलर्क के राज्य को घेरने के लिये चले ॥ १४ ॥
अनन्तरैश्च संश्लेषमभ्येत्य तदनन्तरम् तेषामन्यतमै भृत्यैः समाक्रम्यानयद्वशम् ||१५।
इसके अनन्तर दोनों सेनाओं में घोर युद्ध हुआ और काशिराज ने मन्त्री सेवक: श्रादिकों को अपने वश में करलिया ॥ १५ ॥
अपीडयच्च सामन्तांस्तस्य राष्ट्रोपरोधनैः ।
न्या दुर्गानुपालांश्च चक्रे चाटविकान् वशे ॥ १६ ॥
राजा अलर्क के सामन्तों को पीड़ित किया तथा उनके राज्य, धन, दुर्गपाल और महलों के रक्षकों को अपने वश में कर लिया ॥ १६ ॥
कांश्चिचोपप्रदानेन कांश्चिद्भेदेन पार्थिवान् । साम्नैवान्यान् वशं निन्ये निभृतास्तस्य येऽभवन् १७।।
जो राजा लोग.. अलर्क के सहायक थे उनमें से कुछ को धन से, कुछ को भेद नीतिसे काशिराज ने मिलाकर अपने वशमें कर लिया ॥ १७ ॥
ततः सोऽल्पबलो राजा परचक्रावपीड़ितः । कोपक्षयमवाणेचैः पुरञ्चारुध्यतारिणा || १८।।
राजा श्रलर्क की छोटी सेना काशिराज की सेना से पीड़ित हुई और उस का खजाना खाली होगया और नगर वैरी के क़ब्ज़े मैं चला गया || १८ ||
इत्थं सम्पीड्यमानस्तु क्षीणकोपो दिने दिने । विपादभागात् परमं व्याकुलत्वंच चेतसः ॥ १६ ॥
इस प्रकार पीड़ित किये जाने और कोष के धीरे-धीरे क्षीण होने से राजा, अलर्क का चित्त बहुत व्याकुल हुआ ॥ १६ ॥
आर्तिं स परमां प्राप्य तत् सस्मारांगुरीयकम् । यदुद्दिश्य पुरा माह माता तस्य मदालसा ॥२०॥
और. उस परम दुःख को पाते हुए उन्हें उस अँगूठी की याद आई जो उनकी माता मदालसा ने उन्हें थी ||२०||
ततः स्नातः शुचिर्भूत्वा वाचयित्वा द्विजोत्तमान् । निष्कृष्य शासनं तस्माद्ददृशे प्रस्फुटाक्षरम् ॥२१॥
फिर स्नान करके और पवित्र कर उस अँगूठी से उस पट्ट को निकलवा कर साफ साफ- अक्षरों में ब्राह्मणों से पढ़वाया ॥ २१ ॥
तत्रैव लिखितं मात्रा वाचयामास पार्थिवः । प्रकाशपुलकाङ्गोऽसौ प्रहर्षोत्फुल्ललोचनः ॥२२॥
फिर उन राजा ने उसमें लिखे हुए को पढ़ा और वह बहुत प्रसन्न होकर पुलकित होगये ॥ २२ ॥ सङ्गः सर्व्वात्मना त्याज्यः स चेत् त्युक्तुं न शक्यते । स सद्भिः सह कर्त्तव्यः सतां सङ्गो हि भेषजम् ॥२३॥
संसार में सबसे सङ्ग छोड़ देना चाहिये और यदि छोड़ने को समर्थ न हो तो सज्जनों की सगति करना चाहिये कारण साधुत्रों की सङ्गति ही श्रौषधि ||२३||
कामः सर्व्वात्मना हेयो ज्ञातुञ्चेच्छक्यते न सः । मुमुक्षां प्रति तत् कार्य्यं सैव तस्यापि भेषजम् ॥२४
काम को सर्वथा त्याग देना चाहिये और यदि उसको न त्याग सके तो मुक्तिका यत्न करना चाहिये क्योंकि मुक्ति ही काम की औषधि है ||२४||
वाचयित्वा तु बहुशो नृणां श्रेयः कथन्त्विति । मुमुक्षयेति निश्चित्य सा च तत्सङ्गतो यतः ||२५||
उसको वँचवा कर तथा अपना कल्याण सोंचकर अलर्कने मुक्तिकी इच्छाकी और उसका निश्चय करके सत्सङ्गका विचार किया ||२५||
ततः स साधुसम्पर्क चिन्तयन् पृथिवीपतिः । दत्तात्रेयं महाभागमगच्छत् परमार्त्तिमान् ||२६||
इसके अनन्तर वह राजा अलर्क साधु-सत्सङ्गकी इच्छा करते हुए महर्षि दत्तात्रेय के पास गये ॥ २६ ॥
तं समेत्य महात्मानमकल्मषमसङ्गिनम् । मणिपत्याभिसम्पूज्य यथान्यायमभाषत ||२७||
उन निष्पाप प्रसङ्ग महात्मा दत्तात्रेय के पास पहुँचकर और उनको प्रणाम करके वे न्यायपूर्वक बोले ||२७||
ब्रह्मन् कुरु प्रसादं मे शरणं शरणार्थिनाम् । दुःखापहारं कुरु मे दुःखार्त्तस्यातिकामिनः ||२८||
हे भगवन् ! मेरे ऊपर कृपा कीजिये, मैं शरणार्थी हूँ । मैं प्रति कामी और दुःखी हूँ, मेरा दुःख हरण कीजिये||२८|| दत्तात्रेय उवाच
दुःखापहारमद्यैव करोमि तव पार्थिव । सत्यं ब्रूहि किमर्थं ते दुःखं तत् पृथिवीपते ||२६||
दत्तात्रेय बोले- हे राजन् ! मैं तुम्हारा दुःख दूर करने का यत्न करूँगा | सच बताओ तुमको यह दुःख कैसेहुआ। जड़ उवाच
इत्युक्तश्चिन्तयामास स राजा तेन धीमता । त्रिविधस्यापि दुःखस्य स्थानमात्मानमेव च ॥३०॥
जड़ बोला- दत्तात्रेयजी के इस प्रकार पूछने पर उस राजा ने तीनों प्रकार के दुःख के स्थान श्रात्मा में सोचा ||३०||
सं विमृष्य चिरं राजा पुनः पुनरुदारधीः । श्रात्मानमात्मना धीरः महस्येदमथाब्रवीत् ||३१||
बहुत देरतक वह उदारचित्त वेर-२ सोचता रहा और अपनी आत्मा का विचार कह हँसकर यह वचन बोला ॥ ३१ ॥
नाहमुवी न सलिलं न ज्योतिरनिलो न च । नाकाशं किन्तु शारीरं समेत्य सुखमिष्यते ॥ ३२ ॥
मैं पृथ्वी, जल, ज्योति, वाय, श्राकाश कुछ भी नहीं हूँ परन्तु शरीर को ही सुख की इच्छा रहती है ॥ ३२ ॥
न्यूनातिरिक्ततां याति पंचकेऽस्मिन् सुखासुखम् ।
यदि स्यान्मम किं न स्यादन्यस्थेऽपि हितं मयि ३३ ||
इस पंचतत्र के शरीर को सुख दुःख, न्यूनता और वृद्धि होती है । यदि सुख दुःख मुझे हो तो मैं जो दूसरे में भी मौजूद हूँ उसे क्यों नहीं होता ? ॥ ३३ ॥
नित्यमभूतसद्भावे न्यूनाधिक्यान्नतोन्नते । तथा च े समतात्यक्तो विशेषेणोपलभ्यते ॥३४॥
जीव तो नित्य और निर्विकार है और वह उन्नति या श्रव- छोड़ने से विशेष लाभ होता है ॥ ३४ ॥
तन्मात्रावस्थिते सूक्ष्मे तृतीयांशे च पश्यतः । तथैव भूतसद्भावं शारीरं किं सुखासुखम् ||३५||
तन्मात्रा के नति में अधिक न्यून नहीं होता । इसलिये ममता बीच में जो आत्मा सूक्ष्म रूप से स्थित है उस जीव जिसको ज्ञान है उसको शरीरके दुःख या सुखक्या ? ॥ ३५ ॥
मनस्यवस्थितं दुःखं सुखं वा मानसंच यत् । यतस्ततो न मे दुःखं सुखं वा न ह्यहं मनः ||३६||
दुःख और सुख की स्थिति मन में इसलिये दुःख सुख मनोगत है । चूंकि मैं मन नहीं हूँ इसलिये मुझको दुःख सुख नहीं है ॥ ३६ ॥
नाहङ्कारो न च मनो वुद्धिर्नाहं यतस्ततः । अन्तःकरणजं दुःखं पारक्यं मम तत् कथम् ||३७||
न मैं अहङ्कार हूँ, न मन और न बुद्धिहूँ, मेरे अंतः- करण में जो दुःख है वह दूसरे को है मुझको वह किस प्रकार हो सकता है ? ॥ ३७ ॥
नाहं शरीरं न मनो यतोऽहं पृथक शरीरान्मन-संस्तथाहम् । तत् सन्तु चेतस्यथवापि देहे सुखानि | दुःखानि च किं ममात्र ॥३८॥
न मैंः शरीर हूँ और न मन, मैं शरीर और मन से अलग हूँ । इस लिये सुख या दुःख मन में हो अथवा शरीर में, मुझे इससे क्या ? ||३८||
राज्यस्य वाञ्छां कुरुतेऽग्रजोऽस्य देहस्य चेत् | पंचमयः स राशिः । गुणप्रवृत्त्या मम किं नु तत्र | पञ्चतत्त्वमय है | तत्स्थः स चाहंच शरीरतोऽन्यः ॥ ३६ ॥
जिस राज्यकी अभिलाषा मेरे भाई सुबाहु को है वह शरीर का है और शरीरशरीरके गुणोंमें मेरी प्रवृत्ति नहीं है क्योंकि शरीर में स्थित होकर भी उससे अलग हूं ||३६||
न यस्य हस्तादिकमप्यशेषं मांसं न चास्थीनि शिराविभागः । कस्तस्य नागाश्वरथादिकोषैः | स्वल्पोऽपि सम्बन्ध इहास्ति पुंसः ॥ ४० ॥
जिस शरीर के हाथ मांस, अस्थि, शिर यादि ही अपने नहीं हैं तो उसके हाथी, घोड़े, रथ खजाने आदि से क्या ? इस संसार में मनुष्य का सम्बन्ध क्षणिक है ||४०||
तस्मान्न मेऽरिन च मेऽस्ति दुःखं न मे सुखं नापि पुरं न कोषः । न चाश्व-नागादि बलं न तस्य नान्यस्य वा कस्यचिद्वा ममास्ति ॥ ४१
इसलिये न तो कोई मेरा शत्रु है और न मुझको दुःख व सुख हैं और नगर कोप, अश्व, हाथी, सेना आदि न मेरी हैं, न उस की और न किसी और की है ॥ ४१ ॥
यथा घटी-कुम्भ कमण्डलुस्थमाकाशमेकं | बहुधा हि दृष्टम् । मन्ये च देहेषु शरीरभेदैः ॥४२॥
जिस प्रकार आकाश घटी, घड़े और कमण्डलमें एक ही तत्व है,, परन्तु स्थानभेद के कारण अलग-अलग दिखाई. भेद हैं ॥ ४२ ॥
इति श्रीमार्कण्डेय ० में पिता-पुत्र संवादमें आत्म-विवेक नाम ३७वाँ अ० समाप्तः।
Summary of chapter 37 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
The dialogue between Jaḍa and his father explores the profound discrimination between the eternal Ātman and the transient physical body. The son explains that the self is neither the physical senses, nor the intellect, nor the subtle prāṇas, but the changeless witness of all states of waking, dreaming, and deep sleep.