मार्कण्डेय महा पुराण
89
राजोवाच
विचित्रमिदमाख्यातंभगवन्भवतामम। देव्याश्चरितमाहात्म्यंरक्तवीजवधाश्रितम्॥१॥
राजा बोले-
हे भगवन् ! आपने यह विचित्र वर्णन मुझे देवी के चरित्र, माहात्म्य और रक्तवीज के बधका सुनाया ॥ १ ॥
भूयश्वेच्छाम्यहंश्रोतुंरक्तवीजेनिपातिते। चकारशुम्भोयत्कर्मनिशुम्भश्रातिकोपनः॥२
श्रव मैं वह सुनने की इच्छाकरता हूँ जो कि रक्तबीज के मरनेपर शुम्भ और निशुम्भ ने किया ॥ २ ॥ ऋषिरुवाच
चकारकोपमतुलंरक्तवीजेनिपातिते। शुम्भासुरोनिशुम्भश्चहतेष्वन्येषुचाहवे॥३॥
ऋषि बोले-
क्रुद्ध रक्तबीज के पतन होने और अन्य असुरों के मरने पर शुम्भ और निशुम्भ ने अत्यन्त क्रोधकिया ॥ ३ ॥
हन्यमानंमहासैन्यंविलोक्यामर्षमुद्वहन्। अभ्यवावन्निशुम्भोऽथ मुख्ययाऽसुरसेनया ॥ ४ ॥
अपनीविशालसेनाकोनष्टहुआदे करक्रोधितहोनिशुम्भअपनीमुख्यसेनालड़ने को दौड़ा ||४|| तस्याग्रतस्तथापृष्ठेपार्श्वयोश्चमहासुराः। सन्दष्टौष्ठपुटाःक्रुद्धाहन्तुंदेवीमुपाययुः॥५
उसके श्रागे पीछे तथा अगल-वगल चारों तरफ महादैत्य क्रोधित होकर देवी को मारने को दौड़े ॥ ५ ॥
श्राजगाममहावीर्यःशुम्भोऽपिस्वबलैटतः। निहन्तुंचण्डिकांकोपात्कृत्वायुद्धन्तुमातृभिः॥६
महाबलवान् शुम्भ कीअपनी सेनाओं को लेकर चण्डिकाको मारने और शक्तियों से युद्ध करने के लिये श्राया ॥ ६ ॥
ततोयुद्धमतीवासीद्देव्याशुम्भ-निशुम्भयोः। शरवर्षंमतीवोग्रंमेघयोरिववर्षतोः॥७॥
फिर देवी और शुम्भ निशुम्भ का घोर युद्ध हुआ, दोनों ओर से मेघों के समान वाणों की वर्षा हो रही थी'॥७॥
चिच्छेदास्ताञ्छरांस्ताभ्यांचण्डिकाशशरोत्करैः। | ताड़यामासचाङ्गेषुशस्त्रौघैरसुरेश्वरौ॥८॥
चंडिका ने अपने बाणोंसे उन दैत्यों के तीरों को काट डाला और अपने शस्त्रों से उन दैत्यराज़ों
के शरीरों को ताड़न किया ॥ ८ ॥
निशम्भोनिशितंखड्गंचर्म्मचादायसुप्रभम्। अताडयन्मूर्द्विनसिंहदेव्यावाहनमुत्तमम् || ६
निशुम्भ ने प्रभायुक्त ढाल और तलवार लेकर देवी के उत्तम वाहन सिंह के शिर में प्रहार किया ॥ ६ ॥
ताड़ितेवाहनेदेवीक्षुरप्रेणासिमुत्तमम्। निशुम्भस्याशुचिच्छेदचचाप्यष्टचन्द्रकम्॥१०॥
सिंह केआहत होने पर देवी ने शीघ्रं निशुम्भको तलवार, ढाल और चन्द्राष्टक को काट डाला ॥ १० ॥
छिन्नेचर्म्मणिखड्गेचशक्तिंचिक्षेपसोऽसुरः। तामप्यस्यद्विधाचक्रेचक्रेणाभिमुखागताम्॥११॥
ढाल और तलवार के टूटने पर असुर ने एक शक्तिफेंकी जिसको भी देवी ने अपने चक्र से दो टुकड़े कर डाले ॥११॥
कोपाध्मातोनिशुम्भोऽथशूलंजग्राहदानवः। आयातंमुष्टिपातेनदेवीतच्चाप्यचूर्णयत्॥१२॥
क्रोधयुक्त होकर फिर निशुम्भ ने शूल चलाया जिसको कि देवी ने अपनी मुष्टि सेचूर्ण कर डाला ॥ १२ ॥
विध्याथगदांसोऽपिचिक्षेपचण्डिकांप्रति। सापिदेव्यात्रिशूलेनभिन्नाभस्मत्वमागता॥१३॥
फिर उसने चण्डिका परगदा चलाई और उस गंदा को भी देवी ने त्रिशल से काट कर भस्म कर दिया || १३ ||
ततःपरशुहस्तंतमायान्तंदैत्यपुङ्गवम्।। श्राहत्यदेवीवाणौघैरपातयतभूतले॥१४॥
फिर हाथ मेंपरशा लेकर श्राते हुए उस दैत्य को देवी ने वांणों से बेधं कर पृथ्वी पर गिरा दिया ॥ १४ ॥
तस्मिन्निपतितेभूमौनिशुम्भेभीमविक्रमे।
तर्यतीवसंक्रुद्धःप्रययौहन्तुमम्बिकाम्॥१५॥
फिर पराक्रमी निशुम्भ के भूमि पर गिरते ही उसका भाई शुम्भ अत्यन्त क्रोध करके अम्बिकाको मारनेके लिये श्राया ॥ १५ ॥
सरथस्थस्तथात्युचैगृहीतपरमायुधैः। भुजैरष्टाभिरतुलैर्व्याप्याशेषंबभौनभः॥१६॥
वह रथ पर बैठ कर अपनीआठों भुजाओं में परम अस्त्र-शस्त्रोंको धारण करता हुआ आकाश को शोभायमान करने लगा ॥ १६ ॥
तमायान्तंसमालोक्यदेवीशंखमवादयत्।
ज्याशब्दश्चापिधनुषश्चकारातीवदुःसहम् ||१७||
उसको श्राते हुए देखकर देवीने शंख बजाया और धनुष खींचकर अत्यन्त दुःसह शब्द किया ॥ १७ ॥
पूरयामासककुभोनिजघण्टास्वनेनच। समस्तदैत्यसैन्यानांतेजोवधविधायिना॥१८॥
उन्होंने अपने घण्टे के शब्द से समस्त दिशाओं को व्याप्त कर दिया और उस समय ऐसा प्रतीत होने लगा कि अब समस्त दैत्य सेना के बध का विधान हो गया है ॥ १८ ॥
ततःसिंहोमहानादैस्त्याजितेभमहामदैः। पूरयामासगगनंगांतथोपदिशोदश॥१६
फिर सिंह भी महानाद करने लगा जिससे कि समस्त श्राकाश, पातालऔर दशों दिशायें व्याप्त होगई ॥ १६ ॥
ततःकालीसमुत्पत्यगगनंक्ष्मामताडयत्।
कराभ्यांतन्निनादेनप्राक्स्वनास्तेतिरोहिता: २० ||
फिर काली ने'श्राकाश में उछल कर दोनों हाथ पृथ्वी पर मारे जिसका कि पहिली गरजसे भी अधिक शब्द हुआ॥ २० ॥
एवं शिवदूती चकार ह । तैःशब्दैरसुरास्त्रेसुःशुम्भःकोपंपरंययौ॥२१॥
फिर शिवदूती ने भयङ्कर अट्टहास किया जिसके शब्द से दैत्य भयभीत होगये और शुम्भने क्रोध किया ॥ २१ ॥
दुरात्मंस्तिष्ठतिष्ठेतिव्याजहाराम्बिकायदा। तदाजयेत्यभिहितंदेवैराकाशसंस्थितैः॥२२॥
तव अम्विका ने कहा, "हे दुरात्मन् ! तनिक ठहर ।" उस समय श्राकाश में स्थित देवताओं ने जय-जयकार किया ||२२||
शुम्भेनागत्ययाशक्तिर्मुक्ताज्वालातिभीषणा। श्रयान्तीवह्निकूटाभासानिरस्तामहोल्कया ||२३||
शुम्भ ने आकर ज्वाला के समान अनि भीषण शक्ति चलाई | देवी ने अग्नि के ढेर के समान श्राती हुई उस शक्ति को महोल्का नाम अस्त्रसे काट डाला ॥२३
सिंहनादेनशुम्भस्यव्याप्तंलोकत्रयान्तरम्। निर्घातनिस्वनोघोरोजितवानवनीपते ||२४||
शुम्भ के सिंहनादसे उस समय तीनों लोक व्याप्तहोगये । हे राजन् ! उस भीषण शब्द से सब लोगथर्रा गये ||२४||
शुम्भमुक्ताञ्चरान्देवीशुम्भस्तत्महिताञ्छरान्। चिच्छेदस्वशरैरुयैःशतशोऽथसहस्रशः॥२५॥
शुम्भ के चलाये हुए वाणों को देवी और देवी के चलाये हुए बाणोंको शुम्भ ने अपने तीक्ष्ण बाणों से सैकड़ों हजारों टुकड़े-टुकड़े करडाले || २५ ||
ततःसाचण्डिकाक्रुद्धाशूलेनाभिजघानतम्। सतदाभिहतोभूमौमूच्छितोनिपपातह ||२६||
फिर चरिडका ने क्रुद्ध होकर उसेशूल से मारा । तब वह उससे चोट खाकर मूर्छितपृथ्वी पर गिर पड़ा ॥ २६ ॥
ततोनिशम्भःसम्माप्यचेतनामात्तकार्मुकः। श्राजघानशरैर्देवींकालीकेशरिणंतथा॥२७॥
उसी समय निशंभ ने होश में आकर धनुष हाथ में लिया और बाण से देवी, काली और सिंह को मारने लगा ॥ २७ ॥
पुनवकृत्वावाहूनामयुतंदनुजेश्वरः। चक्रायुधेनदितिजश्छादयामासचण्डिकाम् ||२८||
फिर उस दानवेन्द्र ने दस हजार भुजायें धारण कर उन सब में चक्रायुध लिया और चण्डिका देवी को आच्छादित कर दिया || २८||
ततोभगवतीक्रुद्धादुर्गादुर्गार्त्तिनाशिनी। चिच्छेदतानिचक्राणिस्वशरैःशायकांश्चतान्॥२६
तब दुर्गति नाश करने वाली भगवती दुर्गा ने क्रोधित होकर उन चक्रों को और उसके धनुष को अपने बाणोंसे काट डाला ॥ २६ ॥
ततोनिशुम्भोवेगेनगदामादायचण्डिकाम्। अभ्यधावतवैहन्तुंदैत्यसेनासमावृतः॥३०॥
फिर निशुंभ वेग से गदा लाकर दैत्य सेना के साथ चण्डिका को मारने को दौड़ा ॥ ३० ॥
तस्यापततएवाशुगदांचिच्छेदचण्डिका। खड्गेनशितधारेणसचशूलंसमाददे॥३१
चण्डिका ने उसकी श्राती हुई गदा को अपने तीक्ष्ण धार वाले खड्ग से काट गिरायाफिर असुर ने शूल को लिया ॥ ३१ ॥
शूलहस्तंसमायान्तंनिशुम्भममरार्द्दनम्। हृदिविव्याधशूलेनवेगाविद्धेनचण्डिका॥३२
देवताओं के वैरी निशुम्भ को शूल हाथ में लिये आता हुश्रा देखकर चण्डिका ने उसकी छाती में अपना शूलमारा ॥ ३२ ॥ भिन्नस्यतस्यशूलेनहृदयान्निःसृतोऽपरः। 'महावलोमहावीर्य्यस्तिष्ठेतिपुरुषोवदन् ||३३||
शूल से वेधित होते ही उसकी छाती से एक दूसरा महाबली और पराक्रमी दैत्य 'ठहरो
ठहरो' यह कहता हुआ निकला ॥ ३३ ॥
वस्यनिष्क्रामतोदेवीमहस्यस्वनवत्तदा। - शिरश्चिच्छेदखड्गेनततोऽसावपतद्भुवि॥३४॥
उसकोनिकलते हुए देखकर देवी बहुत हँसी और उसने उस दैत्य का शिर काट कर उसे पृथ्वी पर गिरादिया ॥ ३४ ॥
ततःसिंहश्वखादोग्र - दंष्ट्राक्षुण्णशिरोधरान्। असुरांस्तांस्तथाकालीशिवदूतीतथापरान् ||३५||
तब सिंह अपनी उग्र दंष्ट्राओं से और काली तथा शिवदूती उनके शिर, घड़ और अन्य राक्षसों को खागई ॥ ३५ ॥
कौमारीशक्तिनिर्भिन्नाःकेचिनेशुर्महासुराः। ब्रह्माणीमन्त्रपूतेनतोयेनान्येनिराकृताः॥३६
कुछ दैत्यों को कौमारी ने अपनी शक्ति से काट डाला और ब्रह्माणी ने अपने अभिमन्त्रत जल से कितने हीसुरों को भस्म कर डाला ॥ ३६ ॥
माहेश्वरीत्रिशूलेनभिन्नाःपेतुस्तथापरे। वाराहीतुण्डघातेनकेचिचूर्णीकृताभुवि॥३७॥
कितनेहीअसुरमाहेश्वरीकेशूलसेकटकरपृथ्वीपरगिर पड़ेऔरकुछबाराहीकीतुण्डकेमहारसे . चूर्णहोगये ॥ ३७ ॥
खण्डखण्डञ्चचक्रेणवेष्णव्यादानवाःकृताः। वज्रेणचैन्द्रीहस्ताग्र-विमुक्तेनतथापरे ||३८||
कुछ दानवों को वैष्णवी ने चक्र से काट कर टुकड़े-टुकड़े कर डाला और कुछ पेन्द्री
के वज्र से हत होगये ॥ ३८ ॥
केचिद्विनेशुरसुराःकेचिन्नष्टामहाहवात्। भक्षिताचापरेकाली-शिवदूती- मृगाधिपैः॥३६॥
इसप्रकारबहुतसेदैत्यनष्टहोगयेऔरबहुतसेरणसेभागगये। जोबाक़ीबचेउनकोकाली, शिवदूतीऔरसिंहनेभक्षणकरलिया॥३६॥ इतिश्री मार्कण्डेय०मेंसावर्णिकमन्वंतरमेंदेवीमाहात्म्यमेंनिशुंभवधनाम८हवाँप्र०स०।
Summary of chapter 88 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
To assist in the supreme cosmic war, the divine Śaktis of the devas manifest from their bodies as the Mātṛkās—Brāhmī, Māheshvarī, Kaumārī, Vaishṇavī, Vārāhī, Nārasimhas, and Aindrī—alongside Śivadūtī. When the demon Raktavīja enters the field, every drop of his blood touching the ground produces thousands of demon clones equal in strength. Mother Ambikā commands Goddess Chāmuṇḍā to open Her vast mouth and drink every drop of Raktavīja's blood as it falls, enabling the Mātṛkās to pierce the original demon until he falls lifeless.