मार्कण्डेय महा पुराण
66
मार्कण्डेय उवाच
एवंनिरस्यमानास्ताहरिणेनमृगाङ्गनाः। श्रुत्वास्वरोचिरात्मानंमेनेसपतितंयथा॥१॥
मार्कण्डेयजी बोले-
हरिण द्वारा मृगियों के प्रति कहे हुए वचनों को सुनकर स्वरोचि ने अपने को पतित समझा ॥१
त्यागेचकारचमनःसतासांमुनिसत्तम। चक्रवाकीमृगप्रोक्तोमृगचर्य्याजुगुप्सितः॥२
हेकौटुकिजी ! चक्रवाकीएवंमृगकीकहीहुई नसीहतसेउन्होंनेस्त्रियोंकेत्यागनेकीइच्छाकी ||२||
समेत्यताभिर्भयश्चवर्द्धमानमनोभवः। क्षिप्तनिवेदकथोरेमेवर्षशतानिषट्॥३
परन्तु स्त्रियों के पास श्राते ही उसकी काम- वासना और भी बढ़ी, वह सब ज्ञान-कथा भूल
गया तथा उसने छःसौ वर्पतक और उन स्त्रियों केसाथ विहार किया || ३ ||
किन्तुधर्माविरोधेनकुर्व्वन्धर्माश्रिताःक्रियाः। भुङ्क्तेस्वरोचिर्विषयान्सहताभिरुदारधीः॥४
परन्तु वह वुद्धिमान् स्वरोचि विषयों में आसक्त होता हुआ भी धर्मपूर्वक सव क्रियाओं को करता रहा ॥ ४ ॥
ततश्चजज्ञिरेतस्यत्रयःपुत्राःस्वरोचिषः। विजयोमेरुनन्दश्चप्रभावश्चमहाबलः॥५॥
इसके वांद,स्वरोचि के तीन महावली पुत्र उत्पन्न हुए जिनके नाम कि विजय, मेरुनन्द और प्रभाव हुए ॥ ५ ॥
मनोरमाचविजयंप्रासूतेन्दीवरात्मजा।
विभावरीमेरुनन्दंप्रभावञ्चकलावती || ६ ||
इन्दीवर की पुत्री मनोरमा से विजय, विभावरी से मेरुनन्द और कलावती से प्रभाव उत्पन्न हुए ॥ ६ ॥
पद्मिनीनामयाविद्यासर्व्वभोगोपपादिका। सतेषांतत्प्रभावेणपिताचक्रेपुरत्रयम्॥७
सब भोगों को उत्पन्न करने वाली जो पद्मिनी नाम विद्या थी उसके बल से स्वरोचि ने तीन नगरबसाये ||७||
: प्राच्यान्तुविजयंनामकामरूपेनगोपरि। विजयायसुतायादौसददौपुरमुत्तमम्॥८
उस पर्वत के पूर्व दिशा की ओर उसने कामरूप विजय नाम नगर बसाया जिसे पहिलेपुत्र विजय को दे दिया ||८||
उदीच्यांमेरुनन्दस्यपुरींनन्दवतीमिति। ख्यातांचकारप्रोत्तुङ्गचमप्राकारमालिनीम्॥६
उत्तर दिशा की ओरबड़े-बड़े भुवनों से युक्त नन्दवती नाम नगरी स्थापित की जिसको कि उसने मेरुनन्द को दिया ॥९॥
कलावतीसुतस्यापिप्रभावस्यनिवेशितम्। पुरंतालमितिख्यातंदक्षिणापथमाश्रितम् ||१०||
दक्षिण की ओर एक नगर जिसका नाम कि ताल था वसाकर कलावती के पुत्र प्रभाव को दिया १०॥
एवंनिवेश्यपुत्रान्सपुरेषुपुरुषर्षभः। रेमेंताभिःसमंविममनोज्ञेष्वतिभूमिपु॥११॥
हे क्रोष्टुकिजी ! अपने पुत्रों को इस प्रकार अलग अलग राज्य देकर वह पुरुष श्रेष्ठ उन स्त्रियों के
साथ पूर्ववत् रमण करता रहा ॥ ११ ॥
एकदातुगतोऽरण्येविहरन्सधनुर्द्धरः। चकर्षधनुरालोक्यवराहमतिदूरगम्॥१२
एक बारधनुष हाथ में लेकर बन में विचरते हुए उन्होंने एक शूकर का पीछा किया और जब वह बहुत दूर पर दिखाई दिया तो धनुष को खँचा ॥ १२ ॥
अथाहकाचिदभ्येत्यतंतदाहरिणाङ्गना। मय्येवपात्यतांवाणःप्रसीदेतिपुनःपुनः॥१३
उससमय एक हरिणी वहाँ आकर यह बोली कि आप प्रसन्न होकर यह वाण मुझ पर छोड़ दीजिये,वह वार वार ऐसा कहने लगी ||१३||
किमनेनहतेनाद्यममाशुविनिपातय। त्वयानिपातितोवाणोदुःखान्मांमोक्षयिष्यति१४॥
इस शूकर के मारने से क्या लाभ है, मुझको शीघ्र मारिये । आपका बाण लगनेसे मैं अपने दुखोंसे मुक्त होजाऊँगी॥१४॥
स्वरोचिरुवाच
नतेशरीरंसरुजमस्माभिरुपलक्ष्यते। किंतुतत्कारणंयेनत्वंप्राणान्हातुमिच्छसि१५ ||
स्वरोचि वोले --
हम तेरे शरीर में कोई रोग भी नहीं देखते हैं फिर तू क्यों अपना प्राण घात करना चाहती है ? ॥१५
मृग्युवाच
अन्यास्वासक्तहृदयेयस्मिंश्चेतःकृतास्पदम्। ममतेनविनामृत्युरौषधंकिमिहापरम्॥१६॥
मृगी वोली-
जिस पुरुष को मैं चाहती हूँ वह अन्य स्त्री परआसक्त है । फिर उसके बिना मेरी औषधि मृत्युही है दूसरी नहीं ॥ १६ ॥
स्वरोचिरुवाच
कस्त्वांनाभिलषेद्गीरुसानुरागासिकुत्रवा।
यदमाप्तो निजान् प्राणान् परित्यक्तुं व्यवस्यसि १७॥
स्वरोचिबोले- वहकौनपुरुषहैजिसमेंकितेराअनुरागऔर जो तुझे नहीं चाहता है तथा जिसके न मिलने के कारण तूप्राण त्यागकरनाचाहतीहै॥१७॥
मृग्युवाच
त्वामेवेच्छामिभद्रंतेत्वयामेऽवहृतंमनः। वृणोम्यहमतोमृत्त्युंमयिवाणोंनिपात्यताम्॥१८॥
मृगी बोली-
हे भद्र ! मैं तुमको ही चाहती हूँ और तुम्ही ने मेरे मनको हरण किया है । अतः अब मैं मृत्यु हीचाहती हूँ, आप बाण मारिये ॥१८॥
स्वरोचिवाच त्वंमृगीचञ्चलापाङ्गीनररूपधरावयम्। कथंत्वयासमंयोगोमद्विधस्यभविष्यति॥१६॥
स्वरोचि बोले-
तू तो चञ्चला मृगी है और मैं मनुष्य रूपधारी हूँ, मेरा तेरे साथ किस प्रकार योग होगा ? ॥ १६ ॥
मृग्युवाच
यदिसापेक्षितंचित्तंमयितेमांपरिष्वज। यदिवासाधुचित्तंतेकरिष्यामियथेप्सितम्। एतावताहंभवताभविष्याम्यतिमानिता ||२०||
मृगी बोली-
यदि तुम्हारा अनुराग मुझ में है तो मुझ से आलिङ्गन करो | यदि आप मुझसे इच्छित भोग
करेंगे तो जो कुछ श्राप चाहेंगे वह मैं होजाऊंगी।२०॥
मार्कण्डेयउवाच
श्रालिलिङ्गततस्तांसस्वरोचिर्हरिणाङ्गनाम्। तेनचालिङ्गितासद्य: साभूद्दिव्यवपुर्धरा॥२१॥
मार्कण्डेयजी बोले-
इसके अनन्तर स्वरोचि ने उस हरिणी को आलिङ्गन किया। उसके श्रालिङ्गन करते ही वह
हरिणी शीघ्रही दिव्य शरीर वाली स्त्री होगई ॥ २१ ॥
ततःसविस्मयाविष्टःकात्वमित्यभ्यभाषत। साचास्मैकथयामासप्रेमलज्जाजड़ाक्षरम् ||२२||
उस समय विस्मयान्वित होकरस्वरोचि उससे वोले तुम कौन हो ? उसने प्रेम से लज्जित होकरकहा ||२२||
अभ्यर्थितादेवैःकाननस्यास्यदेवता। उत्पादनीयोहिमनुस्त्वयामयिमहामते ||२३ :
मैं इस वनकी देवी हूँ, मुझसे देवतात्रों ने प्रार्थना की है अतः मैं आपसे कहती हूँ मुझमहामते ! मुझसे मनु को पैदा कीजिये ||२३||
प्रीतिमत्यांमयिसुतंभूर्लोकपरिपालकम्। तमुत्पादयदेवार्नात्यामहंवचनाद्वदे ||२४|| |
कि हे तात्रों के वचन से मैं आपसे कहती हूँ कि देव -प्रीतिमती में भूलोक का पालन करने वाला पुत्रउत्पन्न कीजिये ||२४|| मार्कण्डेयउवाच
ततःसतस्यांतनयंसर्व्वलक्षणलक्षितम्। तेजस्विनमिवात्मानंजनयामासतत्क्षणात् ||२५||
मार्कण्डेयजी बोले--
इसके बाद स्वरोचि ने सब लक्षणों से युक्त और पने समान तेजस्वी एक पुत्र उस हरिणी सेपैदा किया || २५ |
जातमात्रस्यतस्याथदेववाद्यानिसस्वनुः। जगुर्गन्धर्व्वपतयोननृतुश्चाप्सरोगणाः॥२६
उस पुत्र के पैदा होने के समयदेवता लोग वाजे वजानेलगे, गन्धर्व गाने लगे औरश्रप्सरायें नाचने लगीं ॥ २६ ॥
सिषिचुःशीकरैर्नागाऋपयश्चतपोधनाः। देवाथपुष्पवर्षश्चमुमुचुश्चसमन्ततः ||२७||
तथा नागलोग श्रीरतपोधन ऋषिगण उस बालक के ऊपर जलके छींटे मारने लगे और देवता लोग पुष्पों की वर्षा करनेलगे ||२७ ||
तस्यतेजःसमालोक्यनामचक्रेपितास्वयम्। ध्रुतिमानितियेनास्यतेजसाभासितादिशः ||२८||
पिता ने उसका तेज देखकर स्वयं उस का नाम द्यतिमान् रक्खा कारण कि वह अपने
तेज से सब दिशाओं को प्रकाशित कर रहा था ॥२८
सबालोद्युतिमान्नाममहाबलपराक्रमः। स्वरोचिपःसुतोयस्मात्तस्मात्स्वारोचिपोऽभवत्॥२९
वह वालक द्यतिमान् वड़ा वली और पराक्रमी और स्वरोचि का पुत्र होने के कारण स्वारोचिप कहलाया ॥ २९॥
सचापिविचरनंरम्येकदाचिगिरिनिर्झरे। स्वरोचिददृशेहंसंनिजपत्नीसमन्वितम् ||३०||
एक बार स्वरोचि ने उस रमणीक पर्वत पर विचरते हुए एक हंस औरहंसिनी को देखा ||३०||
उवाचसतदा - हंसींसाभिलाषांपुनःपुनः।
उपसंहितामात्मा चिरं ते क्रीड़ितं मया ||३१|||
हंसिनीकोकामवासनायुक्त देखकरहंसनेकहाकिअबमुझकोछोड़दो, मैं नेतुम्हारे साथबहुतकालतक क्रीड़ाकी॥३१॥
किंसर्व्वकालंभोगैस्तेश्रासनंचरमंवयः। परित्यागस्यकालोमेतवचापिजलेचरि ||३२||
सदैव भोग करने से ही क्या लाभ है ? अवस्था भी चरम सीमा को पहुँच गई है । हे जलचरि व
मेरे और तेरे वियोग का समय है || ३२ ||
हंस्युवाच
अकालःकोहिभोगानांसर्व्वभोगात्मकंजगत्। यज्ञाःक्रियन्तेभोगार्थंब्राह्मणैःसंयतात्मभिः॥३३॥ दृष्टादृष्टस्तथाभोगान्वाञ्छमानाविवेकिनः। . दानानिचप्रयच्छन्तिपूर्णधम्मचकुर्व्वते ||३४||
हंसिनी बोली-
भोग के लिये कौनसा समय नहीं है ? यह संयतात्मा होकर भोग के लिये ही यज्ञ करते हैं ।
समस्त संसार भोगात्मक हैं । ब्राह्मण लोग भी ज्ञानी लोग दृष्ट दृष्ट भोगों की इच्छा करते हुए
दान देते हैं तथा धार्मिक क्रियायें करते हैं ॥ ३४ ॥
सत्वंनेच्छसिकिंभोगान्भोगचेष्टशफलंनृणाम्। विवेकिनांतिरश्चयाश्चकिंपुनःसंयतात्मनाम् ||३५||
जब बड़े-बड़े ज्ञानी और संयतात्मा लोगों के कर्म का फल भोग ही है तो तुम तिर्यग योनि में होकर भी भोग की इच्छा क्यों नहीं करते ? ॥ ३५ ॥
हंसउवाच
भोगेष्वसक्तचित्तानांपरमात्मान्वितामतिः। भविष्यतिकदासङ्गमुपेतानाञ्चबन्धुषु॥३६
हंस बोला-
भोगों और भाई-बन्धुत्रों में आसक्त चित्तवालों की परमात्मामें बुद्धि किस तरह स्थिर होगी ||३६||
पुत्र - मित्र - कलत्रेषुसक्ताःसीदन्तिजन्तवः।
सरः पङ्कार्णवे मग्ना जीर्णा वनगजा इव ||३७||
पुत्र,मित्र और स्त्री आदि में श्रासक्त मनुष्य इस प्रकार दुःख पाते हैं जिस प्रकार वृद्ध हाथी तालाब की कीचड़ में फंस जाता है ॥ ३७ ॥ किनपश्यसिवाभद्रेजातसङ्ग'स्वरोचिषम् श्राबाल्यात्कमसंसक्तंमग्नंस्नेहाम्बुकर्द्दमे ||३८||
हे भद्रे ! तुम स्वरोचि को क्यों नहीं देखतीं जो कि बाल्यावस्था से. ही कामासक्त होकर स्नेहरूपी जल की कीचड़- में मग्न हो रहे हैं ॥ ३८ ॥
यौवनेऽतीवभार्यासुसाम्प्रतंपुत्रनप्तषु। स्वरोचिषोमनोमग्नमुद्धारंप्राप्यतेकुतः॥३६॥
स्वरोचि अपनी युवावस्थामें स्त्रियों में श्रासक्त थे और अब अपने पुत्रों में श्रसतहैं । इनका मन इस कीचड़से कैसे निकलेगा॥ ३६ ॥
नाहंस्वरोचिषस्तुल्यःस्त्रीबाध्योवाजलेचरि। विवेकवांश्चभोगार्नानिवृत्तोऽस्मिचसाम्प्रतम् ||४०||
हे हंसिनी | मैं स्वरोचिकी तरह स्त्रीके वश में नहीं हूँ । मुझे विवेक है इसलिये मैं व भोगोंसे निवृत्त होता हूँ ॥ ४० ॥
मार्कण्डेयउवाच स्वरोचिरेतदाकर्ण्यजातोद्वेगःखगेरितम्। श्रादायभार्य्यास्तपसेययावन्यत्तपोवनम्॥४१॥
मार्कण्डेयजी बोले-
हंस के मुख से यह वचन सुनकर स्वरोचिकोउद्विग्नता हुई और वे स्त्रियों सहित तप करने के
लिये दूसरे तपोवन को चले गये. ॥ ४१ ॥
तत्रतप्त्वातपोघोरंसहताभिरुदारधीः। गामलोकानमलान्निवृत्ताखिलकल्मषः || ४२|||
वहाँ वेस्त्रियों सहित घोर तप करके अपने संपूर्ण पापों श्री निवृत्त करतेहुए निर्मल लोकों में पहुँच गये॥ ४२ ॥ इतिश्री मार्कण्डेयपुराण मेंस्वारोचिषंमन्वन्तर (५) नाम६६वाँअध्यायसमाप्त।
Summary of chapter 65 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
Svarochis is blessed with a radiant son named Dyutimān, born from his queen Manoramā. Dyutimān grows in wisdom and strength, performing intense penances to Sūryadeva and earning divine boons of universal sovereignty.