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मार्कण्डेय उवाच

सृष्ट्वाजगदिदंब्रह्माप्रविभागमथाकरोत्। वर्णाश्रम-समुद्राद्रि-द्वीपानांपूर्ववद्यथा॥१

मार्कण्डेयजी बोले-

ब्रह्माजी ने इस जगत् की रचना करके वर्ण और आश्रम के अनुसार विभाग किये तथा पहिले

की तरह समुद्र, द्वीप आदि की रचना की ॥ १ ॥

देवदैत्योरगादीनांरूपस्थानानिपूर्व्ववत्। देवेभ्यएवभगवानकरोत्कमलोद्भवः॥२

पद्मयोनि ब्रह्माजीने देवता, दैत्य और सर्प यादिकों के स्वरूप और स्थान पूर्ववत् निर्माण कर दिये ||२||

ब्रह्मणस्तनयोयोऽभून्मरीचिरितिविश्रुतः। कश्यपस्तस्यपुत्रोऽभूत्काश्यपोनामनामतः३

ब्रह्मा के पुत्र मरीचि या कश्यप नाम से विख्यात हुए तथा मरीचि के पुत्र काश्यपं हुए ॥ ३ ॥

दक्षस्यतनयाब्रह्मन्तस्यभाय्यास्त्रयोदश। बहवस्तत्सुताश्चासन्देव-दैत्योरगादयः॥४॥

हे ब्रह्मन् ! दक्ष की तेरह कन्यायें काश्यप की स्त्रियां हुई जिनसे कि देव, दैत्य और नाग आदि बहुतपुत्र उत्पन्न हुए ॥ ४ ॥

श्रदितिर्जनयामासदेवांस्त्रिभुवनेश्वरान्।। दैत्यान्दितिर्दनुश्रोग्रात्दानवानुरुविक्रमान्॥५

श्रदिति से त्रिभुवनपति देव - ताथोकी, दितिसे उग्र दैत्योंकी और दनुसे पराक्रमीदानवों की उत्पत्ति हुई ॥५ ॥

गरुडारुणौचविनतायक्ष-रक्षांसिवैखसा। कद्रुःसुपावनागांश्चगन्धर्व्वान्सुषुवेमुनिः || ६

विनतासे गरुड़ और अरुण, खसा से यक्ष और राक्षस, कडु से नाग और मुनि से गन्धर्व उत्पन्न हुए ॥ ६ ॥

क्रोधायाजज्ञिरेकुल्यारिष्टायाश्चाप्सरोगणाः। ऐरावतादीन्मातङ्गानिराचसुपुवेद्विज॥७॥

क्रोधा से समस्त कुल्या, रिष्टा से सब अप्सरायें तथा इरांसे ऐरावत आदि हाथी उत्पन्न हुएं ॥ ७ ॥

ताम्राचसुषुवेश्येनी - प्रमुखाःकन्यकाद्विज। यासांमसुताःखगमाःश्येन -भास - शुकादयः || ८

  हे द्विज !'ताम्रा ने श्येनी श्रादि कन्याओं को जना जिनसे कि बाज़, कबूतर, तोते आदि पक्षीगण उत्पन्न हुए ||८||

इलायाःपादपाजाताःमधायाःपततांगणाः। श्रदित्यांयासमुत्पन्नाकश्यपस्येतिसन्ततिः॥६

इला से सब वृक्षों का जन्म हुआ और प्रधासे  सब तालावों का कश्यपकी श्रदितिसे जो संतान ॥६॥

तस्याश्चपुत्रदौहित्रःपौत्र- दौहित्रिकादिभिः। व्याप्तमेतज्जगत्सुत्यातेषांतासांञ्चवैमुने॥१०॥

उनके पुत्र, धेवते, नाती और प्रपौत्रों से तथा अन्य स्त्रियों की सन्ततिसे यह संसार व्याप्तहोगया ॥ १० ॥

तेषांकश्यपपुत्राणांप्रधानादेवतागणाः। सात्त्विकाराजसास्त्वंतेतामसाश्चमुनेगणाः॥११॥

कश्यप के पुत्रों में प्रधान देवताहुए जो सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण से युक्त धे ॥११

देवान्यज्ञभुजश्चक्रेतथात्रिभुवनेश्वरान्। ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठः परमेष्ठी प्रजापतिः ||१२||

प्रजापति परमेष्ठी ब्रह्माजी ने देवताओं को त्रिभुवन पति तथा यज्ञभोजी बनाया ॥ १२ ॥

तानंबाधन्तसहिताःसपत्नादैत्य - दानवाः राक्षसाश्चतथायुद्धंतेषामासीत्सुदारुणम्॥१३

उनके सौतेले भाई दैत्य, दानवों और राक्षसों ने देवताओं से वैर किया और उनका आपस में भीषण युद्ध हुआ ॥ १३ ॥

दिव्यंवर्षसहस्रन्तुपराजीयन्तदेवताः जयिनाभवन्विमवलिनोदैत्यदानवाः॥१४॥

   हे विप्र ! एक हजार दिव्य वर्षों तक युद्ध होने के बाद देवता परास्त हुए तथा बलवान् दैत्यऔर दानव विजयी हुए ॥ १४ ॥

ततोनिराकृतान्पुत्रान्दैतेयैर्दानवैस्तथा। हृतत्रिभुवनान्दृष्ट्वाअदितिर्मुनिसत्तम॥१५॥

 फिर दितिके पुत्र दैत्यों से अपने पुत्रों को पराजित और त्रिभुवनसेरहित किये गये देखकर अदिति को ॥ १५ ॥

याच्छिन्नयज्ञभागांश्चशुचासम्पीड़िताभृशम्। श्राराधनायसवितुःचक्रमे॥१६॥

घड़ा दुःख हुआ और उसने देवताओंका यक्षभाग छिना हुआ देखकर भगवान सूर्य की आराधना करने कायत्न किया ॥ १६ ॥

एकाग्रानियताहारापरंनियमास्थिता। तुष्टावतेजसांराशिगगनस्थंदिवाकरम् ||१७||

उसने नियम से नियताहारी और एकाग्र चित्त होकर आकाशस्थ तेजराशि भगवान् सूर्य की स्तुति की ॥ १७ ॥ श्रदितिरुवाच

नमस्तुभ्यंपरांसूक्ष्मांसौवरणविभ्रतेतनुम्। धामधामवतामीशधाम्नामाधारशाश्वत || १८ ||

श्रदिति बोली-हे ईश ! मैं आप के सौवर्णी और परम सूक्ष्म शरीर धारण करने वाले धामों के धाम, शाश्वतरूप को नमस्कार करती हूँ ॥१८॥

जगतामुपकारायतथापस्तवगोपते। आददानस्ययद्रूपंतीव्रंतस्मैनमाम्यहम्॥१६॥

 हे गोपते ! जगत के उपकार के लिये किरणों द्वारा जल खींचनेवाले आपके स्वरूप को नमस्कार है ॥ १६ ॥

ग्रहीतुमष्टमासेनकालेनेन्दुमयंरसम्। विभ्रतस्तवयद्रूपमतितीव्रंनतास्मितत्॥२०॥

 आठ महीने तक अति तीव्र रूप से जल खींचने वाले श्रापकेरूप को नमस्कार करती हूँ ||२०||

तमेवमुञ्चतःसर्व्वंरसंवैवर्षणाययत्। रूपसाप्यायकंभास्वंस्तस्मैमेघायतेनमः॥२१

 हे भास्वन् ! उस जल को आप मेघों द्वारा वर्षा करके छोड़ते हैं ऐसेश्राप्यायक मेघरूप आपको नमस्कार है ||२१||

वार्य्युत्सर्गविनिष्पन्नमशेपञ्चौषधीगणम्। पाकाय तव यद्रूपं भास्करं तं नमाम्यहम् ||२२||

फिरवर्षेहुएजलकोभास्कररूपसेपचाकरआपश्रौषधियोंकोउत्पन्नकरतेहैं।मैंआपकेइसभास्कर रूप कोनमस्कारकरतीहूँ ||२२||

यच्चरूपंतवातीवहिमोत्सर्गादिशीतलम्। तत्कालशस्यपोषायतरणेतस्यतेनमः॥२३॥

हे तरणि!शस्य की वृद्धि के लिये आप जो हिमवत् शीतलरूप धारण करते हैं  उस शीतल रूप को नमस्कार  है २३

नातितीव्रश्चयद्धपंनातिशीतंचयत्तव वसन्तर्त्तीरखेसौम्यंतस्मैदेवनमोनमः ||२४||

 हे रवि ! वसन्त ऋतु में जो आपका न अति तीव्र और न अति शीतल सौम्य रूप होताहै उसको नमस्कार है ||२४||

आप्यायनमशेषाणांदेवानांचतथापरम्। पितृणांचनमस्तस्मैशस्यानांपाकहेतवे॥२५॥

देवताओं तथा पितरों को तृप्त करने के लिये अनाजों को पकाने वाले !आपके रूप के निमित्तं नमस्कार है ||२५||

यद्रूपंजीवनांयैकंवीरूधाममृतात्मकम्। पीयतेदेवपितृभिस्तस्मैसोमात्मनेनमः॥२६॥

देवताओं पितरों और प्राणियों के पीने के लिये जो प्रापश्रमृतमय सोमरूप धारण करते हैं उस श्राप केसोमात्मा रूप को प्रणाम है ॥ २६ ॥

आभ्यांयदर्करूपाभ्यांरूपंविश्वमयंतव। समेतमभीपोमाभ्यांनमस्तस्मैगणात्मने॥२७

श्रग्नि और चन्द्रमा के सहित जो विश्वमय आपका स्वरूपउस गणात्मक रूप को मैं नमस्कर करती हूँ ॥२७॥

यद्रूपमृग्यजुःसाम्नामैक्येनतपतेतव। विश्वमेतत्त्रयीसंज्ञंनमस्तस्मैविभावसो॥२८॥

हे विभावसु ! ऋक्, यजुः और सामके सम्मिश्रणसे जो त्रयसंज्ञक तेज उत्पन्न होकर संसारको तृप्तकरता है उस आपके स्वरूप को प्रणाम है ॥ २८ ॥

यत्तुतस्मात्परंरूपमोमित्युक्त्वाभिशब्दितम्। अस्थूलानन्तममलंनमस्तस्मैसदात्मने॥२६॥

और उससे परे आपके सदात्मा रूप को जो प्रणवसे युक्त तथा सूक्ष्म, अनन्त और अमल है मैं नमस्कार करती हूँ ॥ २६ ॥ मार्कण्डेयउवाच

एवंसानियतादेवीचक्रेस्तोत्रमहर्निशम्। निराहाराविवस्वन्तमारिराधयिषुर्मुने॥३०॥

मार्कण्डेयजी बोले-

हे कौटुकि ! इस प्रकार श्रदिति निराहारीऔर नियमित रूप से सूर्य की दिन रात्रि स्तुतिकरने लगी ॥ ३० ॥

ततःकालेनमहताभगवांस्तपनोऽभ्वरे। प्रत्यक्षतामग्रादस्यादाक्षायण्याद्विजोत्तम॥३१॥

बहुत समय व्यतीत होने पर भगवान् सूर्य ने श्राकाश में प्रकट होकर दक्षसुतास्थित उस तेजपुञ्ज रूप सूर्य को पृथ्वीतक ज्योतिअदिति को दर्शन दिया ॥ ३१ ॥

ददर्शमहाकूटंतेजसोस्वरसंश्रितम्।

भूमौ च संस्थितं भास्वज्ज्वालामाला तिदुदुद्द शम् ॥३२॥

उसनेआकाशमेंफैलातेहुएदेखा। उनकास्वरूपअत्यन्तजाज्वमानहोनेकेकारणदेखानजाताथा॥३२॥

तंदृष्ट्वासातदादेवीसाध्वसंपरमंगता। जगादमेप्रसीदेतिनत्वांपश्यामिगोपते॥३३

वह देवी उस रूपको देखकर अत्यन्त दुःखित हुई और कहा, "हे गोपते ! आप प्रसन्न हों, मैं आपको नहींदेख सकती ||३३ ॥

यथादृष्टवतीपूर्व्वमम्वरस्थंसुदुददृशम्। निराहाराविवस्वन्तंतपन्तंतदनन्तरम् ||३४||

हे सूर्य ! दुदृश आपको जिस प्रकार मैं पहिले देख सकती थी उस प्रकार अव निराहार होने के कारण नहीं देख सकती हूँ ||३४||

संघातंतेजसांतद्वदिहपश्यामिभूतले। प्रसादंकुरुपश्येयंयद्रूपंतेदिवाकर। भक्तानुकम्पकविभोभक्तार्हपाहिमेसुतान ||३५||

हे भक्तों पर दया करने वाले विभो ! जैसा तेज का समूह आपका आकाश में है वैसाही रूप मैं पृथ्वी पर देखती हूँ । हे दिवांकर ! मुझपर कृपा करके इस रूप को मेरे पुत्रों को दिखाइये और उनकीरक्षा कीजिये ॥ ३५ ॥

त्वंधाताविसृजसिविश्वमेतत् त्वंपासिस्थितिकररणायसम्मवृत्तः त्वय्यन्तेलयमखिलंप्रयातितत्त्वं

त्वत्तोऽन्या न हि गतिरस्ति सर्व्वलोके ॥ ३६ ॥

 तुमब्रह्माहोकरइसजगत् कोउत्पन्नकरतेहो, पालनकरनेकेलियेप्रवृत्त  होकर रक्षा करतेहोतथा अन्तमेंयह जगत्तुम मेंहीलीनहोगा, सर्वलोकमेंतुम्हारेविनाकोईगतिनहींहै॥३६॥

त्वंब्रह्माहरिरजसंज्ञितस्त्वमिन्द्रो वित्तेशःपितृपतिरम्बुपतिःसमीर: सोमोऽग्निर्गगनमहीधरोऽब्धिः किंस्तव्यंतवसकलात्मरूपधाम्नः||३७||

 तुम ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, कुवेर, यम, वरुण, वायु, चन्द्रमा, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, पर्व, समुद्र सब हो । आापकी क्या स्तुति करू' श्राप सकलात्मा रूप हैं ॥ ३७ ॥

यज्ञेशत्वामनुदिनमात्मकर्म्मसक्ताः स्तुवन्तोविधिपदैर्द्विजायजन्ति। ध्यायन्तोविनियतचेतसोभवन्तं योगस्थाःपरमपदंप्रयान्तियोगमूर्त्या ||३८||

हे यज्ञेश !  प्रतिदिन अपने कर्मों में प्रवृत्त ब्राह्मण लोग अनेक चित्त होकर आपकी योगमूर्ति का ध्यान करते हुए परमपद को प्राप्त करते हैं ||३८||

तपसिपचसिविश्वंपासिभस्मीकरोपि प्रकटयसिमयूखैर्ह्रादयस्यम्युगः। सृजसिकमलजन्मापालयस्यच्युताख्यः

क्षपयसि च युगान्ते रुद्ररूपो त्वमेवः ||३६||

पदोंसेआपकायजनकरतेहैंतथायोगीएकात्र संसारकोश्रापहीतप्तकरते, पचातेऔरभस्मकरतेहैंतथा आपहीउसकीरक्षाकरतेहैं।श्रामयूखकिरणोंसे प्रगटकरनेतथाश्रम्बुगर्भकिरणोंसेहर्षितकरते हैं।आपब्रह्माहोकरउत्पत्ति, विष्णुहोकरपालनऔररुद्रहोकरकल्पान्तमेंप्रलयकरतेहैं॥३६॥ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंदिवाकरस्तुतिनाम१०४वाँ०समाप्त |