मार्कण्डेय महा पुराण
107
मार्कण्डेयउवाच
लिख्यमानेततोभानौविश्वकर्माप्रजापतिः। उद्भूतपुलकःस्तोत्रमिदंचक्रेविवस्वतः॥१॥
मार्कण्डेयजीबोले--- फिरप्रजापतिविश्वकर्मानेपुलकायमानहोकरसूर्यकीमूर्तिकीइसप्रकारस्तुतिकी॥१॥
विवस्वतेप्रणतहितानुकम्पितेमहात्मनेसम |
अवसप्तसप्तये।सुतेजसेकमलकुलाववोधिते नमस्तमःपटलपटावपाटिने॥२॥
हे प्रणतपाल ! सब लोगों के हितकारी, महात्मन् । सप्तकिरण, तेजवान्, कमल-वनप्रकाशक, अँधकार नाशकविवस्वान् ! मैंआपकोप्रणामकरताहूँ ||२॥
पावनातिशयपुण्यकपणेनैककामविषयप्रदायिने।
भास्वरानलमयूखशायिनेसर्व्वलोक- श्रग्नि-किरणधारी,हितकारिणेनमः॥३॥
श्रतिशय-पावन, पुण्यकर्मी, अनेक श्रभिवांछित विषयों के प्रदान करने वाले, सर्वलोकहितकारी सूर्यदेव को नमस्कार है ॥ ३ ॥
अजायलोकत्रयकारणायभूतात्मनेगोपतये पाय | नमोमहाकारुणिकोत्तमायसूर्याय वक्षुःप्रभवालयायः॥४॥
जन्मरहित, तीनों लोक के कारण, भूतात्मा, गोपति वृष, महा कृपालु, सव के चक्षुत्रों में निवास करने वाले सूर्य को प्रणाम है ॥ ४ ॥
विवस्वतेज्ञानभृतान्तरात्मनेजगत्मतिष्ठाय नगद्धितैषिणे।स्वयम्भुवेलोकसमस्तचक्षुषे पुरोत्तमायामिततेजसेनमः॥५॥
ज्ञानात्मा, जगत कीलोक के चक्षु, सुरोत्तम, अमित तेजस्वी, सूर्य प्रतिष्ठा, जगत् के हितकारी, स्वयम्भू, समस्तके प्रति नमस्कार है ॥ ५ ॥
"क्षणमुदयाचलमौलिमालःसुरगणसहितोहितो वगतः।त्वमुरुमयूखसहस्रवपुर्जगतिविभासिमांसिनुदन्॥६॥
हे देव ! आप उदयाचल पर्वत से निकल कर देवताओं सहित समस्त संसार का कल्याण करने के लिये अन्धकार का नाश करके हजारों किरणों से प्रकाशमान होते हैं'६ ॥
भवतिमिरासवपानमदात्भवतिविलोहित - वेग्रहात्।मिहिरविभासियतःसुतरांत्रिभुवनपावनभानिकरैः॥७॥
संसार के अन्धकार रूपी आसव को पान करने के कारण आपका शरीर रक्तवर्ण होगया है,
श्राप अपनी किरणों से त्रिभुवन को प्रकाशित करते हुए इच्छा पूर्वक भ्रमण करते हैं ॥ ७ ॥
रथमधिरुह्यसमावयवंचारुविकम्पितमुरु- चिरम्।सततमखिलहयैर्भगवन्चरसिजगद्धितायवेततम्॥८॥
हैं भगवन् ! आप अपने घोड़ों से युक्त रथ पर सवार होकर शरीर को कम्पित करते हुए जगत् की भलाई. के लिये सब दिन भ्रमण करते हैं ||८||
..अमृतसुधांशुरसेनसमंवियुधपितृनपितपयसे। प्ररिगणसूदनतेनतचप्रणिपत्यलिखामिनगद्धिताय॥६॥
हे शत्रुओं के नाश करनेवाले ! श्राप मृतयुक्त रसदेकर देवताओं तथा पितरों को तृप्त करते हैं । श्रापको प्रणाम करके जगत के हित के लिये ही आपकी प्रतिमाबनाई गई है ||६ ||
शुकसमवर्णहयप्रथितंतवपदपांशुपवित्रतलम्। तजनवत्सलमांप्रणतंत्रिभुवनपावनपाहिरवे॥१०॥
हे त्रिभुवन पावन ! आपके घोड़े का रङ्ग तोते के रङ्ग के समान है आप के चरणों
की रज से हम पवित्र होते हैं । हम आपको प्रणाम करते हैं, हमारी रक्षा कीजिये ॥१०॥
इतिसकलजगत्प्रसूतिभूतंत्रिभुवनपावनधासनूतम्।
रविमखिलजगत्प्रदीपभूतंदेवंप्रणतोऽस्मिवैश्वकर्माणम्॥११॥
समस्तजगत्केउत्पत्तिकारक, त्रिभुवनकेपवित्रधाम, सकल जगत्केदीपक, समस्तसंसारकीरचनाकरने वालेसूर्यकोमैंप्रणामकरताहूँ॥११॥ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंसूर्य-स्तवननामका१०७वांअध्यायसमाप्त।
Summary of chapter 107 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
While paring down Sūryadeva's intense radiance, Vishvakarmā offered a devout hymn of praise to the Sun-god. From the trimmed celestial energy, Vishvakarmā crafted divine weapons for the devas, including Śiva's trident, Vishṇu's discus, and Kārtikeya's spear.