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मदालसोवाच प्रतिपद्धनलाभाय द्वितीया द्विपदमदा रार्थिनी तृतीया तु चतुर्थी शत्रुनाशिनी

मदालसा बोली- प्रतिपदा को श्राद्ध करने से धन और द्वितीया को श्राद्ध करने से द्विपद की प्राप्ति होती है, तृतीय मनोभिलाषा को पूर्ण करने वाली और चौथ शत्रुओं का नाश करने वाली है

श्रेयं प्राप्नोति पंचम्यां षष्ट्यां पूज्यो भवेन्नरः

णाधिपत्यं सप्तम्यामष्टम्यां दृद्धिमुत्तमाम्

पञ्चमी को श्राद्ध करने से मनुष्य लक्ष्मी को पाता है तथा षष्ठी को करने से पूज्य होता है सप्तमी में करने से गणाधिपत्य और अष्टमी को करने से उत्तम वृद्धि..को प्राप्त करता है

यो नवम्यां प्राप्नोति दशम्यां पूर्णकामताम् दांस्तथानुयात् सर्व्वानेकादश्यां क्रियापरः

नवमी को श्राद्ध करने से स्त्री को तथा दशमी को करने से मनोकामना की पूर्णता को पाता है, एकादशी को श्राद्ध करने से समस्त वेदोंका ज्ञान प्राप्त करता है ३॥

दश्यां जयलाभंच प्राप्नोति पितृपूजकः जां मेधां पशुं वृद्धि स्वातन्त्र्यं पुष्टिमुत्तमाम्

द्वादशी के दिन पितरों का पूजने वाला विजयी होता है तथा प्रजा, बुद्धि, पशु, वृद्धि, स्वतन्त्रता और उत्तम पुष्टिको पाता है ||४||

र्घमायुरथैश्वर्य्यं कुर्व्वाणस्तु त्रयोदशीम् मोति न सन्देहः श्राद्धं श्रद्धापरो नरः

त्रयोदशीको श्राद्ध करने वाला श्रद्धावान् मनुष्य दीर्घ आयु तथा ऐश्वर्य को प्राप्त करता है इसमें संदेह नहीं

या सम्भावितान्नेन श्राद्धसम्पत्समन्वितः

युवानः पितरो यस्य मृताः शस्त्रेण वा हताः

जो शक्ति से संम्भव होसके उसी अन्न से श्राद्ध करना चाहिये, जिसके पितर युवावस्था में अथवा शस्त्र के लगने  से मरगये हों उसको

तेन कार्य्यं चतुर्द्दश्यां तेषां प्रीतिमभीप्सता श्राद्धं कुर्व्वन्नमावस्यां यत्नेन पुरुषः शुचिः

उनकी तृप्ति के लियेचतुर्दशी के दिन श्राद्ध करना चाहिये, जो मनुष्य पवित्र होकर यत्न से श्रमावस को श्राद्ध करता ||७|| सर्व्वान कामानवाप्नोति स्वर्गश्चानन्तमश्नुते कृत्तिकासु पितृनर्च्य स्वर्गमाप्नोति मानवः

वह मनुष्य सब कामनाओं को तथा उत्तम स्वर्ग को प्राप्त करता है और मनुष्य कृत्तिका नक्षत्र मैं भी पितरों को पूजकर स्वर्ग को जाता है

अपत्यकामा रोहिण्यां सौम्ये चौजस्वितां लभेत् शौर्य्यमार्द्रासु चामोति क्षेत्रादि च पुनर्व्वसौ

सन्तान की कामना करनेवाले को रोहिणी नक्षत्रमें श्राद्ध करना चाहिये मृगशिरा नक्षत्र में श्राद्धकरने वाला श्रजखिता, आर्द्रा में करनेवाला वीरता श्रीर  पुनर्वसु नक्षत्र में करनेवाला खेत आदि प्राप्त करता  है ॥६॥

पुष्टिं पुष्ये सदाभ्यर्श्व अश्लेषासु वरान् सुतान् मघासु स्वजनश्रैष्ठ्यं सौभाग्यं फल्गुनीषु च ॥१०॥

पुण्य नक्षत्र में श्राद्ध करने से पुष्टि, म्लेषा में उत्तम पुत्र, मघा में श्रेष्ठ स्वजन और फाल्गुनी में सौभाग्य मिलता है ॥१०॥

प्रदानशीलो भवति सापत्यश्चोत्तरासु च प्रयाति श्रेष्ठतां सत्यं हस्ते श्राद्धमदो नरः ११

उत्तरा फाल्गुनीमें श्राद्ध- प्रद मनुष्य दानशील और पुत्रवान् होता है तथा हस्तनक्षत्र में सत्य और श्रेष्ठताको प्राप्त करता है

रूपयुक्तश्च चित्रासु तथापत्यान्यवाप्नुयात् बाणिज्यलाभदा स्वातिर्विशाखा पुत्रकामदा ||१२||

चित्रामें श्राद्ध करने से पुरुष रूपवान् होता है तथा सन्तान प्राप्त करता है, स्वाति में व्यापार में लाभ तथा विशाखा में पुत्रलाभ होता है ||१२||

कुर्व्वन्तथानुराधासु लभन्ते चक्रवर्त्तिताम् श्राधिपत्यंच ज्येष्ठासु मूले चारोग्यमुत्तमम् १३

अनुराधा में श्राद्ध करने से चक्रवर्ती राजा होता है ज्येष्ठा में आधिपत्य और मूल में आरोग्य मिलता है || १३|

आपादासु यश:माप्तिरुत्तरासु विशोकता श्रवणे च शुभान् लोकान् धनिष्ठासु धनं महत् १४

पूर्वाषाढ़ में यशप्राप्ति, उत्तराषाढ़ में शोकहीनता, श्रावण में सुन्दर लोक और धनिष्ठामें श्राद्ध करने से धन और महत्व मिलता है १४

वेदवित्त्वमभिजिति भिषक्सिद्धिन्तु वारुणे अजाविक प्रौष्ठपदे विन्देद्धावांस्तथोत्तरे ॥१५॥

श्रभिजित मुहूर्त्त में श्राद्ध करनेसे मनुष्य वेदोंका ज्ञाता होता है तथा शतभिप में करने से वैद्य पूर्वाभाद्र में श्राद्ध करनेसे भेड़ बकरीरूपी धन तथा उत्तराभाद्र मनुष्य गौ धन प्राप्त करता है ||१५||

रेवतीषु तथा कुप्यमश्विनीषु तुरङ्गमान् श्राद्धं कुर्व्वस्तथा मोति भरणीष्वायुरुत्तमम् तस्मात् काम्यानि कुर्वीत ऋक्षेष्येतेषु तत्त्ववित् १६

 रेवती नक्षत्र श्राद्ध करने से सोना, चाँदी, अश्विनी में करने से घोड़े और भरणी में करने से उत्तम श्रायु मिलती है इसलिये तत्त्वके जानने वाले लोग इन्हीं में नक्षत्रों और मुद्दतों में श्राद्ध करते हैं ॥१६॥

इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में काम्यश्राद्ध फल कथन नाम का ३३वाँ अध्याय समाप्त