मार्कण्डेय महा पुराण
121
मार्कण्डेय उवाच
ततःसनृपतिर्गत्वागोमतींपापनाशिनीम्। तत्रतुष्टावनियतोभृत्वादेवंपुरन्दरम्॥१॥
मार्कण्डेयजी बोले-
इसके अनन्तर राजा खनीनेत्र ने पापनाशिनी गोमती नदी के किनारे पर जाकर नियत चित्त
होकर इन्द्रदेव की आराधना की ॥ १ ॥
तप्यमानस्तपश्चग्रंयतवाक्कायमानसः। तुष्टावप्रयतःशक्रमपत्यार्थंमहीपतिः॥२
पुत्र प्राप्ति के लिये महाराज ने प्रारण और शरीर को निवृ करके उग्र तपस्या करते हुए इन्द्र की स्तुति की॥२॥
तस्यस्तोत्रेणतपसाभक्त्याचापिसुरेश्वरः। तुतोपभगवानिन्द्रःमाहचैनंमहामुने || ३
हे क्रौष्टुकि मुनि ! उनकी स्तुति, तपस्या, भक्ति से प्रसन्न होकर इन्द्रदेव ने महाराजकहा ॥ ३ ॥
अनेनतपसाभक्त्यास्तोत्रेणोच्चारितेनच। परितुष्टोऽस्मितेभूपवियतांभवतावरः॥४
आपके भक्ति पूर्वक तपस्या और स्तुतिं करने से मैं संतुष्ट हूं । श्राप वर माँगिये ॥ ४ ॥ राजोवाच
अपुत्रस्यसुतोमेऽस्तुसर्व्वशस्त्रभृतांवरः। सदाचाव्याहतैश्वय्र्योधर्म्मकृद्धर्म्मवित्कृती॥५
राजा वोले:-
मुझ निस्संतान को एक पुत्र हो जो कि सर्व अस्त्र शस्त्रों से युक्त होकर ऐश्वर्यवान, धर्मात्मा
ज्ञानी और पुण्यात्मा हो ॥ ५ ॥ मार्कण्डेयउवाच
तथेतिचोक्तःशक्रेणराजाप्राप्तमनोरथः। प्रजाःपालयितुंभूपआजगामनिजंपुरम्॥६॥
मार्कण्डेयजी बोले-
पुनः इन्द्र ने कहा कि ऐसा ही होगा और राजा भी अपना मनोरथ प्राप्त कर प्रजा पालन के लिये अपनेनगर में आये ॥ ६ ॥
तत्रास्यकुर्व्वतोयज्ञंसम्यक्पालयतःप्रजाः। अजायतसुतोविमतदाशक्रप्रसादतः॥७॥
हे विप्र ! वहाँ यज्ञ करते और भली भाँति प्रजा का पालन करते हुए राजा खनी- नेत्र के इन्द्र की कृपासे एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ७ ॥
तस्यनामपिताचक्रेवलाश्वइतिभूपतिः। अस्त्रग्राममशेषश्चग्राहयामासतंसुतम्॥८
राजा ने उसका नाम वलाश्व रक्खा, और उसको सम्पूर्ण अस्त्र शस्त्रों की विद्या पढ़ा दी ॥ ८ ॥
पितर्युपरतेविप्रसोऽधिराज्येस्थितोनृपः। स वलाश्वो वशंनिन्येभुविसर्व्वमहीक्षितः || ६ ||
हे विप्र ! महाराज खनीनेत्र के मरने पर बलाश्व राजा हुए जिन्होंने कि पृथ्वी के सम्पूर्ण राजाओं को अपनेवश में कर लिया ॥ ६ ॥
करञ्चदापयामाससारग्रहणपूर्वकम्। ससर्व्वभूमिपान्राजापालयामासचप्रजाः॥१०॥
महाराज बलाश्व ने सब राजाओं से कर वसूल किया तथा प्रजाका पालनकिया ॥ १० ॥
श्रथाखिलनरेन्द्रास्तेदायादास्तस्यदुर्मदाः। नचाभ्युत्थायसततंतेचास्मैप्रददुःकरान् || ११
परन्तु कुछ काल बाद उन राजाश्र ने तथा अन्य कर देने वालों ने मदोन्मत्त होकरबलाश्व को कर देना बन्द कर दिया ॥ ११ ॥
व्युत्थिताःस्वेषुराष्ट्रषुनसन्तोषपरास्ततः। भुवंतस्यनरेन्द्रस्यजगृहुस्तेनराधिपाः॥१२
उन राजाओं ने अपने अपने राज्यों पर सन्तोष न करके महाराज वलाश्व का राज्य छीन लिया ॥ १२ ॥
सगृहीत्वास्वकंराज्यंपृथिवीशोऽवलोमुने। तस्थौस्वनगरेभूपैर्विरोधोवहुभिःकृतः॥१३॥
हे मुनि ! परन्तु महाराज बलाश्व ने अपने राज्य को वापिस ले लिया और राजाओं के अत्यन्त
विरोध करने पर भी वे अपने नगर में राज्य करनेलगे ॥ १३ ॥
समेत्यसुमहावीर्याःससाधनधनास्ततः। रुरुधुस्तंमहीपालंपुरेतत्रनरेश्वराः || १४
परन्तु फिर उन पराक्रमी राजाओं ने अनेकों साधनों से युक्त होकर बहुत-सी सेना इकट्ठी की और राजा बलाश्व के नगर को घेर लिया ||१४||
पुररोधेनतेनाथकुपितःसमहीपतिः। स्वल्पकोषोऽल्पदण्डश्थवैक्लव्यंपरमंगतः ||१५||
नगर के घिर जाने से महाराज बड़े क्रुद्ध हुए तथा खजाना खाली होने और प्रभाव कम होने सेभी उन्हें बड़ी विकलता हुई ||१५||
अपश्यमानःशरणंसवलोद्विजसत्तम। करौमुखाग्रतःकृत्वानिशश्वासार्त्तमानसः || १६
हे द्विजसत्तम ! जव बलाश्व को बचाव की कोई सूरत न दीखी तव वे दुःखी मनसे अपने मुख पर दोनों हाथ रख कर लम्बी लम्बी श्वाँस लेने लगे ॥ १६ ॥
ततोऽस्यहस्तविवरान्मुखानिलसमाहताः। निर्ज्जग्मुःशतशोयोधारथ- नाग-तुरङ्गमाः॥१७॥
महाराज वलाश्व के मुख की वायु से उनकी अँगु लियों के बीच की जगह से सैकड़ों योद्धा, रथ
हाथी और घोड़े निकल पड़े ॥ १७ ॥
ततःक्षणेनतत्सर्व्वंनगरंतस्यभूपतेः। व्याप्तमासीहलौघेनसारेणातिवलान्मुने॥१८॥
हे मुनि ! फिर तो उन महाराज वलाश्व का नगर एक बड़ी सेना से व्याप्त होगया || १८||
अथसोऽतिवलौघेनमहतातेनसंवृतः। निर्गम्यनगरात्तस्मात्तान्विजिग्येनराधिप:॥१६॥
फिर तव वे उस विशाल सेना को लेकर नगर से बाहर निकले और उन शत्रुओं को परास्त किया ॥ १६ ॥
जित्वाचवशमानीयचकारकरदान्पुनः। यथापूर्वमहाभागमहाभाग्योनरेश्वरः || २०
फिर बड़भागी महाराज वलाश्व ने उन राजाओं को जीत कर उनसे पहिले की भाँति कर वसूल किया ॥ २० ॥
धुतयोःकरयोर्जज्ञेयतस्तस्यारिदाहदम्। घलंकरन्धमस्तस्मात्सवलाश्वोऽभिधीयते२१ ||
काँपते हुए उनके हाथों से जो शत्रुओं को दग्ध करने वाली सेना उत्पन्न हुई थी इसलिये बलाश्व को करन्धमभी कहा जाता है ॥ २१ ॥
सधर्मात्मामहात्माचसमैत्रःसर्व्वजन्तुषु। करन्धमोऽभवद्भूपस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ||२२||
महाराजकरन्धमबड़ेधर्मात्मा, महात्मातथासवजीवोंकेमित्रहोकर तीनों लोकों में विख्यात हुए ॥ २२ ॥
सम्प्राप्तस्यपरामार्त्तिददावरिविनाशनम्।
बलं धर्मेण चाक्षिप्तमभ्युपेत्य स्वयं नृपः ॥ २३ ॥
वह सेना जोमहाराजकेधर्मसेउत्पन्नहुईथीस्वयंकष्ट उठाकरऔरशत्रुओंकोनष्टकरमहाराजबलाभ्व मेंहीविलीनहोगई ||२३||
इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंकरन्धमचरित्रनाम१२९वाँअ०समाप्त |
Summary of chapter 121 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
King Karandhama demonstrates extraordinary martial strength and righteous governance. When rival monarchs surrounded his capital in a surprise siege, Karandhama clapped his hands in divine prayer, generating a vast army from his own spiritual power that dispersed the enemy without bloodshed.