मार्कण्डेय महा पुराण
21
पितोवाच गालवेन समं गत्वा नृपपुत्रेण तेन यत् । कृंतं तत् कथ्यतां पुत्रौ विचित्रा युवयोः कथा ॥ १ ॥
अश्वतर नागराज बोले-- हे पुत्रो ! गालवके साथ जाकर राजकुमारने जो विचित्र कार्य किये उनको श्राप - कहिये ॥ १ पुत्रावूचतुः स गालवाश्रमे रम्ये तिष्ठन् भूपालनन्दनः 1
रमनं चकार ब्रह्मवादिनाम् ॥ २ ॥ पुत्र बोले- वह राजकुमार गालव ऋषिके रमणीक आश्रम में ठहर गया और वहाँ उसने ब्रह्मर्षियों के सब विघ्नों को शान्त किया ॥२ ॥
वीरं कुवलयाश्वं तं वसन्तं गालवाश्रमे । मदावलेपों पहतो नाजानादानवाधमः ३
उस नीच दैत्य ने अपने मद के नशे में यह न जाना कि राजकुमार कुवलयाश्व गालव ऋषि के श्राश्रम में रहता है ॥ ३ ॥
ततस्तं गालवं विप्रं सन्ध्योपासन तत्परम् । शौकरं रूपमास्थाय प्रधर्षयितुमागतम् ॥ ४
इसके बाद वह रतं गालव ऋषि को दुःख देने को था पहुँचा|| ४|| मुनि शिष्यैरथोत्कुष्टे शीघ्रमारुह्य तं हयम् । अन्वधावद्वराहं तं नृपपुत्रः शरासनी || ५।।
राक्षस शकर का रूप धारण कर सन्ध्योपासन में सुनि-शिष्यों के बताने पर वह राजकुमार शीघ्रही घोड़े पर चढ़कर धनुप वाण लेकर उस शुकर की तरफ़ दौड़े ॥ ५ ॥ श्राजघान च वाणेन चन्द्रार्द्धाकारवर्चसा । आकृष्य बलवच्चापं चारुचित्रोपशोभितम् ॥ ६ ॥
और अर्द्ध चन्द्रमा के श्राकारका जो तीक्ष्ण वाण था वह सुन्दर धनुष पर चढ़ाकर उस शूकर के मारा ॥ ६ ॥ नाराचाभिहतः शीघ्रमात्मत्राणपरो मृगः । गिरिपादपसम्बाधां सोऽन्वक्रामन्महादवीम् ॥ ७ ॥
वह शूकर बाण से छिदा हुआ अपनी प्राण रक्षाके निमित्त गिरि और वृक्षों से क्त महावन की ओर भागा ॥ ७ ॥ तमन्वधावद्वेगेन तुरगोऽसौ मनोजवः । चोदितो राजपुत्रेण पितुरादेशकारिणा ॥ ८ ॥
वह राजपुत्र भी पिता के श्रादेशानुसार उस घोड़े पर जो मनके समान वेग वाला था. उस शूकर के पीछे शीघ्रता से भागा ॥ ८ ॥ अतिक्रम्याथ वेगेन योजनानि सहस्रशः । धरण्यां विवृते गर्ते निपपात लघुक्रमः ॥ ६ ॥
वह शूकर वेग से भांगकर सहल योजन गहरे एक गर्त में पृथ्वी के अन्दर घुस गया ॥ ॥ तस्यानन्तरमेवाशु सोऽप्यश्वी नृपतेः सुतः । निपपात महागर्चे तिमिरौघसमावृते ॥१०॥
उसी समय वह अश्वारोही राजकुमार भी अन्धकार से युक्त उस गर्त में उसके पीछे गया ॥ ततो नादृश्यत मृगः स तस्मिन् राजसूनुना । प्रकाशश्च स पातालमपश्यत् तत् नापि तम् || ११
राजकुमार ने पाताल में पहुँचकर प्रकाश तो देखा परन्तु उस शुकर रूपी शिकार को न देखा ॥ ११ ॥ ततोऽपश्यत् स सौवर्ण- प्रासादशतसंकुलम् | पुरन्दरपुरप्रख्यं पुरं प्राकारशोभितम् ||१२||
उन्होंने वहाँ सुवर्ण का एक सुन्दर महल जो इन्द्रपुरी के सदृश था देखा || १२|| तत् प्रविश्य स नापश्यत् तत्र कञ्चिन्नरं पुरे । भ्रमता च ततो दृष्टा तत्र योपित त्वरान्विता ॥ १३॥
वहाँ पहुँचकर उस नगर में उन्होंने किसी मनुष्य को नहीं देखा वरन् घूमती हुई एक स्त्री पर उनकी दृष्टि पड़ी ॥ १३॥ सा पृष्टा तेन तन्वङ्गी प्रस्थिता केन कस्य वा । नोवाच किञ्चित् प्रासादमारुरोह च भाविनी १४
जव उस स्त्री से उसने पूछा कि तू कौन है, कहाँ से श्राई है? तोउसने कुछ जवाब नहीं दिया वरन् महल के ऊपर वह सुन्दरी चढ़ाई ||१४|| सोऽप्यश्वमेकतो बद्ध्वा तामेवानुससार वै । विस्मयोत्फुल्लनयनो निःशङ्को नृपतेः सुतः ||१५||
वह राजकुमार भी घोड़े को एक तरफ़ बाँधकर श्राचर्य से चकित हो निःशङ्क उसके पीछे हो लिया ||१५|| ततोऽपश्यत् सुविस्तीर्णे पर्यङ्के सर्व्वकाञ्चने । निषणां कन्यकामेकां कामयुक्तां रतीमिव । १६ ||
वहाँ उसने सोने के एक विशाल पलङ्ग पर बैठी हुई रती के समान कामयुक्त एक कन्या को देखा ॥ १६ ॥ विस्पष्टेन्दुमुखीं सुनूं पीनश्रोणिपयोधराम् । विम्बाधरौष्ठीं तन्वङ्गीं नीलोत्पलविलोचनाम् ||१७||
वह के समान मुख वाली, सुन्दर भौंहों से युक्त उत्तम स्तन वाली थी। उसके होठ लाल, शरीरसुन्दर और आँख नील कमल के समान थीं ॥१७॥ रक्ततुङ्गनखीं श्यामां मृद्वी ताम्रकराडिकाम् । करभोरु सुदशनां नीलसूक्ष्म स्थिरालकाम् || १८ ||
उस स्त्रीके नख और अंगुलियाँ लाल कमलके समान, समान तथा हाथ ताम्रवर्ण और रङ्ग गोरा था । उसकी हाथी की सी जाँघें, सुन्दर दन्तपंक्ति तथा काले बालों की सुन्दर चोटी थी ॥ १८ ॥ तां दृष्ट्वा चारुसर्व्वाङ्गीमनङ्गाङ्गलतामिव । सोऽमन्यत् पार्थिवसुतस्तां रसातलदेवताम् ||१६||
उस सर्वा सुन्दरी को कंदर्पलता की तरह देखकर उस राज, कुमार ने उसको रसातल की देवी समझा ॥ १६ ॥ सा च दृष्ट्व तं बाला नीलकुञ्चितमूर्द्धजम् । पीनोरुस्कन्धबाहुं तममंस्तमदनं शुभा ||२०||
वह वाला भी उसे राजकुमार के घूंघर वाले वाल; सुन्दर जाँघें, कन्धे, बाहु और कामदेव के समान रूप को देखकर ||२०|| उत्तस्थौ च महाभागा चित्तक्षोभमवाप्य सा । लज्जाविस्मयदैन्यानां सद्यस्तन्वी वशं गता ॥२१॥
पलन से उठी और चित्त में क्षोभ को प्राप्त कर लज्जा, विस्मय आदि से शिर नीचा कर उसके वशीभूत होगई ॥ २१ ॥ कोऽयं देवो नु यक्षो वा गन्धव्वों वोरगोऽपि वा । विद्याधरो वा सम्प्राप्तः कृतपुण्यर तिर्नरः ||२२||
ये देवता, यक्ष, गन्धर्व, नाग, विद्याधर अथवा कोई पुण्य - वान् मनुष्यहै जो यहाँ श्राया है, ऐसा वह विचारनेलगी ||२२|| एवं विचिन्त्य बहुधा निश्वस्य च महीतले । उपविश्य ततो भेजे सा सूर्च्छा मदिरेक्षा ॥२३
ऐसा वहुत सोच विचार करके श्वास लेकर वह पृथ्वीतलपर बैठकर मूर्च्छित होगई ||२३|| सोऽपि कामशराघातमवाप्य नृपतेः सुतः । तां समाश्वासयामास न भेतव्यमिति ब्रुवन् ||२४||
वह राजकुमार भी कामवाण से पीड़ित होकर और उसको आश्वासन देकर कहने लगा कि मत डरो ||२४|| सा च स्त्री या तदा दृष्टा पूर्व्वं तेन महात्मना । तालवृन्तमुपादाय पर्य्यवीजयदाकुला ||२५|| वह उस स्त्री को मूच्छित देखकर पंखे से उसकी हवा करने लगा ॥ २५ ॥
बहुत तरह से समाश्वास्य तदा पृष्टा तेन सम्मोहकारणम् । किंचिल्लज्जान्विता बाला सर्व्वं सख्यै न्यवेदयत् २६
श्राश्वासन देकर राजकुमार ने उससे मूर्च्छा का कारण पूछा परन्तु उस स्त्री की लजा न गई परन्तु अपनी सखीको उसने सब हाल बता दिया॥२६॥ा सा चास्मै कथयामास नृपपुत्राय विस्तरात् । मोहस्य कारणं सर्व्वं तद्दर्शनसमुद्भवम् । पथा तया समाख्यातं तद्वद्वृत्तान्तञ्च भाविनी ||२७||
फिर: सखीने राजकुमार को विस्तार पूर्वक उस मूर्च्छाका कारण बताया जो कि उसके दर्शन से हुई थी ||२७|| स्त्र्युवाच वेश्वावसुरिति ख्यातो दिवि गन्धर्व्वराट् प्रभो । स्येयमात्मजा सुर्नाम्ना ख्याता मदालसा ||२८||
सखी बोली-- स्वर्ग में विश्वावसु नामके गन्धवका राजा थां जिसकी कि यह मदालसा नाम की पुत्री है ॥२८॥ वज्रकेतोः सुतोग्रो दानवोऽरिविदारणः । तालकेतुर्विख्यातः पातालान्तरसंश्रयः ||२६|| शत्रुओं के नाश करने वाले दानव वज्रके उग्र पुत्र का नाम पातालकेतु है जो कि सदैव पाताल के अन्दर रहता है ||२६|| नियमुद्यानगता कृत्वा मायां तमोमयीम् । अपहृत्य मया हीना बाला नीता दुरात्मना ||३०||
वह पातालकेतु उद्यान में से अपनी माया द्वारा अंधेरा करके इस वाला को ले श्राया है ॥३०॥ प्रागामिन्यां त्रयोदश्यामुद्रक्ष्यति किलासुरः । तु नार्हति चार्व्वङ्गीं शूद्रो वेदश्रुतीमिव ॥ ३१ ॥
उस असुर ने त्रयोदशी को इससे विवाह करना निश्चय किया है, यह सर्वाङ्गसुन्दरी उस राक्षसके इस प्रकार योग्य नहीं है जिस तरह शब्द को वेद और श्रुति ||३१|| अतीते च दिने बालामात्मव्यापादनोद्यताम् । रभिः प्राह नायं त्वां प्राप्स्यते दानवाधमः ||३२||
कुछ दिन व्यतीत होने पर यह कन्या आत्मघात करने को तैयार हुई परन्तु सुरभि ने कहा कि ये नोच राक्षस तुमको नहीं पावेगा ॥ ३२ ॥ शर्त्यलोकमनुप्राप्तं य एनं छेत्स्यते शरैः । ते भर्त्ता महाभागे अचिरेण भविष्यति ||३३||
इसको मर्त्यलोकमें कोई व्यक्ति बाणों से वेधित करेगा और वही शीघ्र हे महा- भागे ! तेरा स्वामी होगा ||३३|| तहिंचास्याः सखी नाम्नां कुण्डलेति मनस्विनी । निता विन्ध्यवतः पत्नी वीरपुष्करमालिनः ॥३४॥
मैं इसकी सखी हूँ और कुडल मेरा नाम है । मैं विध्य की बेटी और बीर पुष्करमाली की वधू हूँ ॥ ३४ ॥ ते भर्त्तरि शुम्भे तीर्थात् तीर्थमनुव्रता । दिव्यया गत्या परलोकार्थमुद्यता ||३५||
अपने स्वामी शुम्भ द्वारा मारे जाने पर मैं परलोक बनाने के लिये तीर्थों में भ्रमण करती हूँ ॥ ३५ ॥ पातालकेतुर्दुष्टात्मा वाराहं वपुरास्थितः । केनापि विद्धो वाणेन मुनीनां त्रारणकारणात् ॥ ३६
दुष्टः पाताल केतु को जिसने शूकर का रूप धारण किया था. किसी ने मनुष्यों की रक्षा करते हुए वाण से बेधा है॥ तंचाहं तत्त्वतोऽन्विष्य त्वरिता समुपागता । सत्यमेव स केनापि ताड़ितो दानवाधमः ||३७|
वह यहाँ भी आया था और यह सत्य कि किसी ने उसे वारा से छेदा है ||३७|| इयंच मूर्द्धामगमत् कारण यत् शृणुष्व तत् । त्वयि प्रीतिमती वाला दर्शनादेव मानद || ३८ ||
इसको जो मूर्च्छा हुई उसका कारण सुनो। तुम्हारे दर्शन मात्र से ही इस कन्या को प्रीति उत्पन्न हो गई है । देवपुत्रोपमे चारु-वाक्यादिगुणशालिनि । भार्य्या चान्यस्य विहिता येन विद्धः स दानवः ||३६||
आप देव पुत्र के समान सुन्दर चाणी श्रादि गुणों से युक्त हैं और यह पत्नी किसी उस अन्य पुरुष की होगी जिसने कि राक्षसको छेदा है ||३६|| एतस्मात् कारणान्मोहं महान्तमियमागता । यावज्जीवंच तन्वङ्गी दुःखमेवोषभाक्ष्यते ||४०||
इस कारण से इसको यह महान दुःख हुआ है और जब तक यह जीवित रहेगी तब तक इस दुःख से पीड़ित रहेगी ॥ ४० ॥ त्वय्यस्या हृदयं रागि भर्त्ता चान्यो भविष्यति । यावज्जीवमतो दुःखं सुरभ्या नान्यथा वचः । ४१||
तुम्हारे प्रति इसके हृदय में प्रेम है और इसका पति दूसरा होगा, जबतक यह जीवित रहेगी तब तक यह दुःख रहेगा, कारण सुरभि का यह वचन अन्यथा नहीं हो सकता ॥ ४१ ॥ यहं त्वस्याः प्रभो प्रीत्या दुःखितात्र समागता । यतो विशेषो नैवास्ति स्वसखी - निजदेहयोः ॥४२॥
हे प्रभो ! मैं इसकी प्रीति में दुःखित हुई यहाँ पर पड़ी हैं । अपनी और इसकी देहमें कोई अन्तर नहीं समझती हूँ ॥ ४२ ॥ यद्येपाभिमतं वीरं पतिमामोति शोभना । ततस्तपस्त्वहं कुर्य्यं निर्व्यलीकेन चेतसा ॥४३॥
जब इस सुन्दरी को यथेष्ट वर मिल जाय तव मैं निश्चिन्त मन से तप करूँ ॥ त्वन्तु को वा किमर्थं वा सम्प्राप्तोऽत्र महामते । देवो दैत्यो नु गन्धर्व्वः पन्नगः किन्नरोऽपिवा ॥ ४४ ॥
महामते ! आप कौन हैं, और किस लिये यहाँ आये हैं? आप देव, दैत्य, गन्धर्व, नाग, किन्नर आदि में से कौन हैं ? ॥ ४४ ॥ नात्र मानुपगतिर्न चेहङमानुषं वपुः । तत्त्वमाख्याहि कथितं यथैवावितथं मया ॥४५॥
यहाँ पर मनुष्य की गति नहीं है और न आपकी मनुष्यों की सी देह ही है । जिस तरह मैंने सच-सच हाल कहा उसी तरह थाप भी कहिये ॥ ४ ॥ कुवलयाश्व उवाच यन्मां पृच्छसि धर्म्मज्ञे कस्त्वं किं वा समागतः । तच्छृणुष्वामलप्रज्ञे कथयाम्यादितस्तव ॥ ४६।।
कुचलयाश्व बोले हे धर्म ! शुद्ध मति वाली ! यदि तुम मुझसे पूछती हो कि मैं कौन हूँ और यहाँ क्यों श्राया तो सुनो, मैं आदि से ही कहता हूँ ॥४६॥ राज्ञः शत्रुजितः पुत्रः पित्राः सम्प्रेषितः शुभे । मुनिरक्षणमुद्दिश्य गालवाश्रममागतः ॥४७॥
मैं राजा शत्रुजित का पुत्र हूँ और पिता का भेजा हुआ, मुनियोंकी रक्षा करता हुआ गालव ऋषिके श्राश्रम से श्राया हूँ ॥ ४७ ॥ कुर्व्वतो मम रक्षाञ्च मुनीनां धर्म्मचारिणाम् । विघ्नार्थमागतः कोऽपि शौकरं रूपमास्थितः ॥ ४८।।
धर्मप्राण मुनियों की रक्षा करते हुए मुझे शकर रूप से कोई व्यक्ति विघ्न करने के लिये उपस्थित होता हुआ मिला ॥ ४८ ॥ मया स विद्धो वाणेन चन्द्रार्द्धाका रवर्चसा । अपक्रान्तोऽतिवेगेन तमस्मचनुगतो ही ॥ ४६।।
मैंने अर्द्धचन्द्राकार वारा से उसको छेदित किया और वह शीघ्रता से भागा और मैं उसके पीछे घोड़े पर चढ़कर दौड़ा ॥ ४६॥ पपात सहसा गर्ने स क्रोड़ोऽश्वव मामकः । सोऽहमवं समारुदस्तमस्येकः परिभ्रमन् ||५०।।
वह सहसा एक कुण्ड में गिरा और मैं भी घोड़े पर चढ़ा हुआ उसके पीछे-पीछे उसी गर्तमें गिर पड़ा और अंधेरे में घूमने लगा || ५० || प्रकाशमासादितवान् दृष्टा च भवती मया । पृष्टपा च न मे किंचिद्रवत्या दत्तमुत्तरम् ॥ ५१॥|| थोड़ी देर बाद जब प्रकाश मिला तो मैंने तुमको देखा और तुमसे प्रश्न किया परन्तु आपने कछ उत्तर न दिया ||११|| स्वाञ्चैवानुप्रविष्टोऽहमिमं प्रासादमुत्तमम् । इत्येतत् कथितं सत्यं न देवो हं न दानवः ||१२||
फिर तुम्हारे पीछे पीछे मैं इस उत्तम भवन में आयाहूँ । जो कुछ - सत्य था वह मैंने कह दिया । न मैं देव हूँ और न दानव ॥१२॥ न पन्नगो न गन्धर्व्वः किन्नरो वा शुचिस्मिते । समस्ताः पूज्यपक्षा वै देवाद्या मम कुण्डले । मनुष्योऽस्मि विशङ्का ते न कर्त्तव्यात्र कर्हिचित् ॥ ५३॥
हे प्रसन्न मुख बाली ! मैं नाग हूँ, न गन्धर्व और न किन्नर हूँ । हे कुण्डले ! समस्त देवों को पूजने वाला मैं मनुष्य हूं, इसमें तुमको कोई संदेह नहीं करना चाहिये ॥ ५३ ॥ पुत्रावूचतुः ततः प्रहृष्टा सा कन्या सखीवदनमुत्तमम् । लज्जाजड़ वीक्षमाणा किंचिन्नोवाच भाविनी ॥ ५४।।
पुत्र बोले- वह कन्या राजकुमार का यह वचन सुनकर प्रसन्न हुई और अपनी सखीका सुन्दर मुख देखने लगी परन्तु लज्जावश कुछ न बोली ॥ ५४ ॥ सा सखी पुनरप्येनां प्रहृष्टा प्रत्युवाच ह । यथावत् कथितं तेन सुरभ्या वचनानुगे ||२५||
वह सखी. फिर प्रसन्न होकर उससे सुरभि के कथना- नुसार कहने लगी ॥ ५५ ॥ कुण्डलोचाच वीर सत्यमसन्दिग्धं भवताभिहितं वचः । नान्यत्र हृदयन्त्वस्यादृष्ट्वा स्थैय्यं प्रयास्यति ॥ ५६
कुण्डला बोली- हे वीर ! श्रापका कहा हुया वचन निस्संदेह सत्य है । इसका हृदय अब किसी अन्य पुरुष को देखकर स्थिरता को प्राप्त न होगा ॥ ५६ ॥ चन्द्रमेवाधिका कान्तिः समुपैति रविं प्रभा । भूतिर्धन्य धृतिधरं क्षान्तिरभ्येति चोत्तमम् ||१७||
इसकी कान्ति चन्द्रमा से अधिक और सूर्य के समान है और इसका ऐश्वर्य धन्य है । इसके धैर्य और शान्ति उत्तम हैं ॥७॥ त्वयैव विद्धोsसन्दिग्धं स पापो दानवाधमः । सुरभिः सागवां माता कथं मिथ्या वदिष्यतिः ॥ ५८॥
वह पापी नीच दैत्य तुम्हारे द्वारा ही निश्चय छेदित किया गया है। वह गायों की माता सुरभि किस प्रकार मिथ्या कहेगी ॥५८॥ तद्धन्येयं स भाग्या च त्वत्सम्वन्धं समेत्य वै । कुरुष्व वीर यत् कार्य्यं विधिनैव समाहितम् ॥ ५६ ॥
आपके सम्बन्ध से यह भाग्य- शालिनी धन्य है । हे वीर ! अव वह कार्य करो जिससे विधिवत् विवाह हो जावे ॥ ५६ ॥ पुत्रावूचतुः परवानहमित्याह राजपुत्रः स तां पितः । तामुद्वहे कथं बालां तन्नियोगादृते त्विमाम् || ६०॥
पुत्र चोले- हे पिता ! राजकुमार ने कहा कि मैं भी यही चाहता हूँ कि किस प्रकार विवाहहो ? नियोग द्वारा अथवा अन्य प्रकार से ? ॥६०॥ मा मा वदेहक सेत्याह देवकन्येयमुद्वह । तथेत्युक्तेन तेनैव सङ्गम्योद्वाहिकं तदा ॥ ६१।
नहीं, ऐसा न कहो.. इस देवकन्या का विवाह विधि पूर्वक करो, ऐसा कुण्डला ने कहा ॥ ६१॥ सा च तं चिन्तयामास तुम्बुरुं तत्कुले गुरुम् । स चापि तत्क्षणात् प्राप्तः प्रगृहीतसमित्कुशः ॥ ६२ ॥
उसने तुम्बुरु नामक उसके गुरु को स्मरण किया जो कि समिधा और कुश लिये हुए एक क्षण में ही आकर उपस्थित होगया. मदालसायाः सम्प्रीत्या कुण्डलागौरवेण च । प्रज्वालय पावकं हुत्वा मन्त्रिवित् कृतमङ्गन्लाम् ६३।
मदालसा की प्रीति से और कुण्डला के गौरव से उसने प्रज्वलित कर और मन्त्रों से हवन कर ) मङ्गल कार्य किया ॥ ६३ ॥ वैवाहिक विधिं कन्यां प्रतिपाद्य यथागतम् । जगाम तपसे धीमान् स्वमाश्रमपदं तदा || ६४ ||
उसने वेद की विधि के अनुसार कन्या का विवाह कर दिया और फिर तप करने के लिये अपने श्राश्रमको चला गया ॥ ६४ ॥ सा चाह तां सखीं बालां कृतार्थास्मि वरानने । संयुक्ताममुना दृष्ट्वा त्वामहं रूपशालिनीम् ॥ ६५॥
वह सखी मदालसा से बोली, "हे सुन्दर मुख वाली ! तुम रूपवती का इनसे संबन्ध हुआ देख कर अब मैं कृतार्थ हुई" ॥६५॥ तपस्तप्स्ये ऽहमतुलं निर्व्यलीकेन चेतसा । च भवित्री नेहशी यथा ॥ ६६ ॥ अव मैं निर्विघ्न मन से अतुल तपस्या करूँगी और तीर्थस्थानों के जल. से अपने पापों को धो डालूंगी ॥ ६६ ॥ तञ्चाह राजपुत्रं सा मश्रयावनता तदा । गन्तुकामा निजसखी स्नेहविक्रयभाषिणी ॥६७॥
श्रर चलने की इच्छा से तथा मदालसा के स्नेह में विहल होकर राजकुमारके प्रति विनयपूर्वक कहने लगी | कुण्डलोवाच पुंभिरप्यमितप्रज्ञ नोपदेशो भवद्विधे । दातव्यः किमुत स्त्रीभिरतो नोपदिशामि ते ॥ ६८ ॥
कुण्डला बोली-- आप पुरुषों में ज्ञानवान् हैं, आपको कोई उप- देश नहीं दे सकता । मैं तो स्त्री हूँ, फिर किस प्रकार थापको उपदेश दे सकती हूँ ॥ ६८ ॥ किन्त्वस्यास्तनुमध्याया: स्नेहाकृष्टेन चेतसा । त्वया विश्रम्भिता चास्मि स्मारयाम्यरिसूदन ॥ ६६
किन्तु हे शत्रुओं के नाश करने वाले ! इस सुन्दर कन्या के स्नेह से मेरा हृदय लिप्त हो रहा है, इसलिये श्रापको कहकर स्मरण कराती हूँ ॥ ६६ ॥ भर्त्तव्या रक्षितन्या च भार्या हि पतिना सदा । धर्मार्थकामसंसिद्ध भार्य्या भर्तृ सहायिनी ॥ ७०।।
पति को चाहिये कि सदा स्त्री का भरण-पोषण और रक्षा करे । धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि में स्त्री पति की सहायक होती है ॥ ७० ॥ यदा भार्य्या च भर्त्ता च परस्परवशानुगौ । तदा धर्म्मार्थकामानां त्रयाणामपि सङ्गतम् ॥ ७१।।
जब स्त्री और पुरुष एक दूसरे के वशीभूत होते हैं तो धर्म, अर्थ और भार्या को छोड़कर पुरुष किसी प्रकार धर्म, अर्थ काम इन तीनों को प्राप्त करते हैं ॥ ७१ ॥ कथं भार्य्यामृते धर्म्यमर्थं वा पुरुषः प्रभो । प्राप्नोति काममथवा तस्यां त्रितयमाहितम् ॥७२॥
हे प्रभो । श्रथवा काम की सिद्धि नहीं कर सकता, कारण-यें तीनों स्त्री और पुरुष के सहयोग से होते हैं ॥७२॥ तथैव भर्त्तारमृते भार्या धर्मादिसाधने । न समर्था त्रिवर्गोऽयं दाम्पत्यं समुपाश्रितः ॥ ७३।।
इसी प्रकार भार्या भी पति के बिना धर्मार्थ साधन में असमर्थ है, कारण - धर्म, अर्थ और काम दाम्पत्य जीवन में ही संघ सकते हैं ॥ ७३ ॥ देवता- पितृ-भृत्यानामतिथीनाञ्च पूजनम् । न पुंभिः शक्यते कर्त्तुमृते भाय्यीं नृपात्मज ॥ ७४
हे राजकुमार ! देवता, पितर, भ्रातृवर्ग तथा श्रतिथियों का सत्कार पुरुष स्त्री के विना नहीं करसकता है ॥७ माप्तोऽपि चार्थो मनुजैरानीतोऽपि निजं गृहम् । क्षयमेति विना भाग्यी कुभार्थ्यासंश्रयेऽपि वा ॥ ७५।
यदि मनुष्य धनोपार्जन कर घर में ले भी आवे तो विना स्त्री के वह क्षय को प्राप्त होता है, इसी प्रकार यदि स्त्री दुष्टा हो तो भी धन नाश को प्राप्त होता है ||७५ || कामस्तु तस्य नैवास्ति प्रत्यक्षेणोपलक्ष्यते । दश्त्योः सहधर्मेण त्रयीधर्म्ममवाप्नुयात् ॥ ७६।।
यदि उनकी इच्छा न भी हो तो दाम्पत्य धर्म का अवलम्वन करने से धर्म आदिक तीनों पदार्थ प्रत्यन्त प्राप्त हुए दिखाई देते हैं ॥ ७६ ॥ पितृन् पुत्रैस्तथैवान्न साधनैरतिथीन् नरः । पूजाभिरमरांस्तद्वत् साध्वी भाग्य नरोऽवति ॥७७॥
जिस प्रकार पुत्रों से पिता, अन्न से अतिथि लोग और पूजा से देवता प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार साध्वी स्त्री से पुरुष प्रसन्न होता है ॥ ७७ ॥ स्त्रियाचापि विना धर्मकामार्थसन्ततिः । नैव तस्मात् त्रिवर्गोऽयं दाम्पत्यमधिगच्छति ॥७८॥
स्त्रियां भी पति के बिना धर्म, अर्थ, काम और सन्तान को प्राप्त नहीं कर सकतीं, ये सुख दाम्पत्य जीवन में ही प्राप्त होते हैं ॥ ७८॥ एतन्मयोक्तं युवयोर्गच्छामि च यथेप्सितम् । वर्द्ध त्वमनया सार्द्धं धन- पुत्र सुखायुपा ॥७६॥
ये बातें मैंने श्राप दोनोंके लिये कही हैं, मैं अपनी इच्छा से जाती हूँ । तुम इसके साथ धनवान्, पुत्रवान होकर सुखी रहो ॥ पुत्रावृचतुः इत्युक्त्वा सा परिष्वज्य स्वसखीं तं नमस्य च । जगाम दिव्यया गत्यां यथाभिप्रेतमात्मनः ||८०||
पुत्र बोले- इतना कहकर वह कुण्डला अपनी सखी से श्रालिङ्गन करके तथा राजकुमार को नमस्कार करके दिव्य गति से अपनी इच्छानुसार चली गई ॥ ८० ॥ सोऽपि शत्रुजितः पुत्रस्तामारोप्य तुरङ्गमम् । निगन्तुकामः पातालाद्विज्ञातो दनुसम्भवैः ॥ ८१ ॥|| वह राजा शत्रुजित का पुत्र भी मदालसा को अश्व पर चढ़ाकर पाताल से जाने की इच्छा करने लगा और इस बातको दानवोंने जान लिया || ततस्तैः सहसोत्क्रुष्टं हियते ह्रियतेऽति वै । कन्यारत्नं यदानीतं दिवः पातालकेतुना ॥८२॥
फिर उन लोगों ने सहसा कोलाहल मचाया कि से लाया था लिये जाता है ॥ ८२ ॥ ततः परिघनिस्त्रिंश-गदा- शूल-शरायुधम् । दानवानां बलं प्राप्तं सह पातालकेतुना ॥ ८३।।
फिर परिघ, यह उस कन्यारत्न को जिसको पातालकेतु स्वर्ग खड्ग, गदा, शूल, वाण और श्रायुधों को लेकर दानवों की एक फ़ौज पातालकेतुके साथ श्राई ॥३॥ तिष्ठ तिष्ठेति जल्पन्तस्ते तदा दानवोत्तमाः । शरवर्षैस्तथा शूलैर्ववर्पुनृ पनन्दनम् ॥८४॥
वे प्रबल दैत्य " ठहर, ठहर " ऐसा कहने लगे और उन्होंने राजकुमार पर वाणों और शलों की वर्षा की ॥ ८४ ॥ स च शत्रुजितः पुत्रस्तदस्त्राण्यतिवीर्य्यवान् । चिच्छेद शरजालेन प्रहसन्निव लीलया || ८५||
फिर वलवान् शत्रुजित के पुत्र ने वाणों के उस जाल को कौतूहल मात्र से हँसते हुए काट दिया ॥ ८५ ॥ क्षरणेन पातालतलमसिशक्त्यृष्टिशायकैः छिन्नैः सञ्छन्नमभवदृतध्वजशरोत्करैः ॥८६॥
और क्षण भर में पाताल लोक तलवारों, शक्तियों, यष्टियों और तीरों से छिन्न होकर ऋतध्वज के वाणों से आच्छादित हो गया ||८|| ततोऽत्रं त्वाष्ट्रमादाय चिक्षेप प्रति दानवान् । तेन ते दानवाः सर्व्वे सह पातालकेतुना ||८७||
फिर उस राजकुमार ने दानवों में नि वाण को छोड़ा जिससे वे सब दैत्य पातालकेतु के साथ ||८|| अवालामालातितीव्र रेण स्फुटदस्थिचयाः कृताः । निर्द्दग्धा: कापिलं तेजः समासाद्य व सागराः ॥८८॥
तीव्र ज्वाला से हड्डियों के सहित दग्ध होगये और कुछ उस अनि के डर से समुद्रों में घुस गये ॥ ८८ ॥ ततः स राजपुत्रोऽश्वी निहत्यासुरसत्तमान् । स्त्रीरत्नेन समं तेन समागच्छत् पितुः पुरम् ||८६||
फिर वह घोड़े पर सवार राज- कुमार सव राक्षसोंको मारकर उस स्त्रीरत्न सहित अपने पिता के नगर में आया ॥ ८६ ॥ मणिपत्य च तत् सर्व्वं स तु पित्रे न्यवेदयत् । पातालगमनश्चैव कुण्डलायाश्व दर्शनम् ||६०|||
वहाँ उसने पिता को प्रणाम कर सब वृत्तान्त पाताल में जाने' और कुण्डला आदि को देखने का उनको सुना दिया ॥६०॥ तद्वन्मदालसाप्राप्तिं दानवैश्चापि सङ्गरम् । वधञ्च तेषामस्त्रेण पुनरागमनं तथा ॥ ६१ ॥
तथा मदालसा की प्राप्ति, दानवों के साथ युद्ध, उनका अस्त्र द्वारा वध तथा पुनः वापिस श्राना आदि सव वृत्तान्त सुनाया ॥ ६१ ॥ इति श्रुत्वा पिता तस्य चरितं चारुचेतसः । प्रीतिमानभवच्चेदं परिष्वज्याह चात्मजम् ||१२||
पिता ने भी उसके इस तेजखी चरित्र को सुनकर प्रसन्न हो पुत्र को छाती से लगाया ॥ ६२ ॥ सत्पात्रेण त्वया पुत्र वारितोऽहं महात्मना । भयेभ्यो मुनयस्त्राता येन सद्धर्म्मचारिणः ||३||
तुझ सुपात्र और महान् श्रात्मा वाले पुत्रसे मैं तर गया तुमने सद्धर्म में प्रवृत्त, भय से डरे हुए मुनियों की रक्षा की है ||१३|| मत्पूर्वैः ख्यातमानीतं मया विस्तारितं पुनः । पराक्रमवता वीर त्वया तद्बहुलीकृतम् ॥ ६४ ॥
जो ख्याति मेरे पूर्वजों ने प्राप्त की उसको मैंने बढ़ाया । परन्तु हे वीर ! तुमने उसको भी अपने पराक्रम से अधिक कर दिया है ॥ ६४ ॥ यदुपात्तं यशः पित्रा धनं वीर्य्यमथापि वा । तन्न हापयते यस्तु स नरो मध्यमः स्मृतः ॥६५॥
जिस व्यक्ति ने अपने पिता के संचित किये हुए धन, वल तथा यश को उसी प्रकार रक्खा वह मनुष्य मध्यम कहलाता है ॥ ६५ ॥ तद्वीर्य्यादधिकं यस्तु पुनरन्यत् स्वशक्तितः । निष्पादयति तं प्राज्ञाः प्रवदन्ति नरोत्तमम् || ६।।
उसके यश को जिसने अपनी शक्तिसे बढ़ाया उसको विद्वान लोग नरोत्तम कहते हैं ॥ ६६ ॥ यः पित्रा समुपात्तानि धनवीर्य्ययशांसि वै । न्यूनतां नयति प्राज्ञास्तमाहुः पुरुषाधमम् ||७||
जो पुत्र अपने पिता के अर्जित धन, वल और यश को कम करता है उस को ज्ञानी लोग अधम कहते हैं ॥ ६७ ॥ तन्मया ब्राह्मणत्राणं कृतमासीद्वयथा त्वया ।
पातालगमनं यच्च यच्चासुरविनाशनम् । एतदप्यधिकं वत्स तेन त्वं पुरुषोत्तमः ||८|| जिस तरहमैंने ब्राह्मणों की रक्षा की उसी तरह तुमने भी की, परन्तु पाताल में जाकर असुरों का नाश करना तुमने अधिक किया, इसलिये हे वत्स ! तुम श्रेष्ठपुरुष हो ॥ ६८ ॥
तद्धन्योऽस्यथ बाल त्वमहमेव गुणाधिकम् । त्वां पुत्रमीदृशं प्राप्य श्लाध्यः पुण्यवतामपि ॥ ६६ ॥
इसलिये हे पुत्र ! तुम धन्य हो, तुम्हारे इस गुण से मेरे यश की वृद्धि हुई, और तुम्हारे जैसे पुत्र को पाकर में श्लाघ्य तथा पुण्य- शील होगया ॥ ६६ ॥ न स पुत्रकृतां प्रीति मन्ये प्राप्नोति मानवः । पुत्रेण नातिशयितो यः प्रज्ञादानविक्रमैः ॥ १००॥
वह मनुष्य पुत्र के होने ही से प्रसन्नता को नहीं पा सकता कि जिसके बुद्धि ज्ञान और विक्रम को पुत्र ने न बढ़ाया हो ॥१००॥ धिग्जन्म तस्य यः पित्रा लोके विज्ञायते नरः । यः पुत्रात् ख्यातिमभ्येति तस्य जन्म सुजन्मनः १०१ उसके जन्म को धिक्कार है कि जिसने पिता की ख्याति को न बढ़ाया । जो पिता अपने पुत्र से ख्याति को प्राप्त करता है उसका जन्म सफल है ॥
मातृपक्षेण मात्रा च ख्यातिमेति नराधमः ॥ १०२ ॥
आत्मना ज्ञायते धन्यो मध्यः पितृपितामहः ।
जो मनुष्य अपने किये हुए कर्मों से ख्याति को प्राप्त करता है वह श्रेष्ठ है, मध्यम वह है जो पिता और दादा की नेकनामी से प्रसिद्ध है तथा निकृष्ट पाता है ॥ १०२ ॥
तत् पुत्र धनवीय्यैस्त्वं विवद्ध स्व सुखेन च । . गन्धर्व्वतनया चेयं मा त्वया वै वियुज्यताम् ॥ १०३ ॥ वह है जो नाना मामा की कृति के कारण ख्याति इसलिये हे पुत्र ! धन और बल को बढ़ाता हुआ तू सुख से रह श्रौर इस गन्धर्व पुत्री से तेरा कभी वियोग न हो ॥ १०३ ॥ इति पित्रा बहुविधं प्रियमुक्तः पुनः पुनः । परिष्वज्य स्वमावासं सभार्य्यः स विसज्जितः १०४
इस प्रकार पिता ने पुनः पुनः मधुर वाणी से पुत्रं का सत्कार किया और उसको श्रालिङ्गन कर भार्या सहित अपने रहने के स्थान में भेज दिया ॥ १०४ ॥ स तया भार्य्यया सार्द्ध रेमे तत्र पितुः पुरे । अन्येषु च तथोद्यान चन-पर्व्वतसानुषु ॥ १०५।।
फिर वह अपनी स्त्री के साथ अपने पिता के नगरमें रमण करता रहा तथा श्रनेक चारा, वन श्रौर पहाड़ों पर भी विहार करता रहा ॥ १०५ ॥ श्वश्रूश्वशुरयोः पादौ प्रणिपत्य च सा शुभा । प्रातः प्रातस्ततस्तेन सह रेमे सुमध्यमा । १०६ ॥ और वह सुन्दरी मदालसा भी सास श्वसुर को नित्य ! प्रातःकाल प्रणाम करके अपने पति के साथ इधर उधर विचरती रही ॥ १०६ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में कुवलयाश्व से मदालसा परिणयन नाम इक्कीसवाँ अ० समाप्त ।
Summary of chapter 21 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
Prince Kuvalayāshva rescues the divine princess Madālasā, daughter of the Gandharva king Vishvāvasu, from the captivity of the demon Pātālaketu in Pātāla. Captivated by her nobility and spiritual devotion, Kuvalayāshva marries Madālasā according to sacred rites with the blessings of the hermits and returns victoriously to his father's royal palace in Ayodhyā.