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दत्तात्रेय उवाच

अरिष्टानि महाराज शृणु वक्ष्यामि तानि ते येषामालोकान्मृत्युं निजं जानाति योगवित्

दत्तात्रेय बोले- हे राजन् ! अब मैं उन अरिष्टों को कहता जिनको कि देखकर योगी अपनी मृत्यु जान लेता है

देवमार्गं ध्रुवं शुक्रं सोमच्छायामरुन्धतीम् यो न पश्येन जीवेत् स नरः संवत्सरात् परम्

देवमार्ग, ध्रुव, शुक्र और अरुन्धती ये तीन तारे और चन्द्रमा की छाया जो मनुष्य नहीं देख सकता है वह एक वर्ष के भीतर मृत्यु को प्राप्त होता है ||२||

रश्मि विम्बं सूर्य्यस्य वह्निं चैवांशुमालिनम् दृष्ट्वादशमासात् तु नरो नोर्ध्वन्तु जीवति || ३

जो मनुष्य प्रातःकाल के सूर्यकी लाली और अग्नि की उष्णता को न मालूम करे बह ग्यारह महीने से उपरान्त जीवित नहीं रह सकता

वान्ते मूत्रपुरीषे च यः स्वर्ण रजतं तथा प्रत्यक्षं कुरुते स्वप्ने जीवेत् स दशमासिकम्

जो मनुष्य स्वप्नावस्था में चमन, मूत्र और विष्ठा में सोना चाँदी देखे वह दस महीनेतक जीवित रहता है

दृष्ट्वा प्रेत-पिशाचादीन् गन्धर्व्वनगराणि च सुवर्णवर्णान् वृक्षांश्च नव मासान् स जीवति

जो मनुष्य स्वप्न में प्रेत, पिशाच श्रादिक और गन्धर्वो के नंगर तथा सौने के पेड़ आदि देखे वह नौ महीने तक जीता हैं ॥३५॥

स्थूलः कृशः कृशः स्थूलो योऽकस्मादेव जायते प्रकृतेश्च निवर्त्तेत तस्यायुश्वाष्टमासिकम्

जो अकस्मात् स्थूल से कृश अथवा कृश से स्थूल हो जावे और उसकी प्रकृति विगड़ जावे तो उस की श्रायु आठ महीने की ही समझनी चाहिये ॥६॥

खण्डं यस्य पदं पार्ष्णयां पादस्याग्रे च या भवेत् पांशुकर्द्दमयोर्मध्ये सप्त मासान् स जीवति

जिस मनुष्य के पाँव की एड़ी या तलुए का चिह्न धूलि में अङ्कित न हो वह पुरुष सात महीने से  अधिक जीवित नहीं रह सकता ॥७॥

गृध्रः कपोतः काकोलो वायसो वापि मूर्द्धनि क्रव्यादो वा खगो नीलः षण्मासायुः प्रदर्शकः

गिद्ध, कबूतर, कौत्रा, उल्लू, बाज़ अथवा काली चिड़िया इनमें से किसी का शिर पर बैठना छः महीने की अवस्था बतलाता है ॥८॥

हन्यते काकपङ्क्तीभिः पांशुवर्षेण वा नरः स्वां छायामन्यथा दृष्ट्वा चतुःपञ्च स जीवति

जिस मनुष्य को कौनों की पंक्ति मारजाय अथवा जिसके ऊपर धूलिकी वर्षा श्रना- यास होजाय अथवा जो अपनी ही छाया न देख सके ऐसा मनुष्य केवल चार या पाँच महीने तक और जीता है

: अनभ्रे विद्युतं दृष्ट्वा दक्षिणां दिशमाश्रिताम् रात्राविन्द्रधनुश्चापि जीवितं द्वित्रिमासिकम् १०

जो बिना मेघ के दक्षिण- दिशा में बिजली चमकती हुई देखे श्रथवा रात्रि में इन्द्रधनुष देखे वह दो या तीन महीने तक जीता है ॥१०॥ घृते तैले तथादर्शे 'तोये वा नात्मनस्तनुम् यः पश्येदशिरस्कां वा मासादूर्ध्वं न जीवति ११

जो मनुष्य घी, तेल अथवा जल में अपना शरीर बिना शिर के देखे वह एक महीने बाद मरः जाता है ११

यस्य वस्तसमो गन्धो गात्रे शवसमोऽपि वा

तस्याद्ध मासिकं ज्ञेयं योगिनो नृप जीवितम् ||१२||

 हे राजन् ! जिस योगी के शरीर, में मृत देह की सी दुर्गन्ध प्रातीहो उसका जीवन -

केवल पन्द्रह दिन ही समझो ॥१२॥

यस्य वै स्नातमात्रस्य हृत्पादमवशुष्यते पिवतथ जलं शोपो दशाहं सोऽपि जीवति १३

स्नान करने भी जिसके पाँव और हृदय सूखे रहें और पी लेनेपर भी गंला जिसका सूखा रहे वह तक जीवित रहता है ॥१३॥

सम्भिन्नो मारुतो यस्य मर्मस्थानानि कृन्तति हृष्यते नाम्युसंस्पर्शात् तस्य मृत्युरुपस्थितः १४

वायु से जिसके स्थानों को कष्ट पहुँचता हो तथा जल से श्रवयव कटते से मालूमहों उसकी मृत्यु . हुई समझनी चाहिये १४

ऋक्ष-वानरयानस्थो गायन यो दक्षिणां दिशम् स्वझे प्रयाति तस्यापि न मृत्युः कालमृच्छति ||१५||

जो मनुष्य स्वप्नm अपने को रीछ या बन्दरपर सवार होकर दक्षिण दिशा की ओर जाते हुए देखे उसकी .. तत्क्षण समझनी चाहिये १५

रक्तकृष्णाम्बरधरा गायन्ती हसती च यम् दक्षिणाशां नयेन्नारी स्वप्ने सोऽपि न जीवति ॥१६॥

जो मनुष्य में यह देखे कि लाल और काले कपड़े पहिने हु स्त्रियां हँसती हुई उसको दक्षिण दिशामें ले.  हैं तो उसकी मृत्यु निकट है १६

ननं क्षपणकं स्वप्ने हसमानं महाबलम् | एकं संवीक्ष्य वल्गन्तं विद्यान्मृत्युमुपस्थितम् ||१७||

यदि स्वप्न कोई महा बलवान् पुरुष नङ्गा, हजामत:  हुधा, हँसता हुआ और बकताहुआ दिखाई दे - समझना चाहिये कि मृत्यु आगई ||१७||

श्रामस्तकतलादयस्तु निमनं पङ्कसागरे स्वप्ने पश्यत्यथात्मानं स सद्यो म्रियते नरः १८

जो पुरु स्वप्न में अपने को शिर से पाँव के तलुए  कीचड़ में सना हुआ देखे तो वह शीघ्र मरजाता ॥ १८

केशाङ्गारांस्तथा भस्म भुजङ्गान् निर्ज्जलां नदीम् दुष्टा स्वप्ने दशाहात् तु मृत्युरेकादशे दिने || १६ ||

जो मनुष्य स्वप्न में वाल, अङ्गारा, राख, साँ श्रथवा सूखी नदी देखे तो उसकी ग्यारहवें दि मृत्यु हो जावेगी १६

करालैर्विकटैः कृष्णैः पुरुपैरुद्यतायुधैः पापाणैस्ताड़ितः स्वप्ने सद्यो मृत्युं लभेन्नरः ||२०||

जो मनुष्य स्वप्न में अप को कराल, विकट, काले, हाथ में हथियार लि‍ हुए पुरुषों द्वारा पत्थरों से मारा हुआ देखे तो उरु की मृत्यु शीघ्र होती है २०

सूर्योदये यस्य शिवा क्रोशन्ती याति सम्मुखम् विपरीतं परीतं वा स सद्यो मृत्युमृच्छति ॥२१॥

सूर्योदय के समय जिसके सन्मुख अथवा वाँये या दाँये गीदड़ी रोर्त जिसको भोजन कर लेने पर भी क्षुधा पीड़ित करें हुई चली जाय तो उसकी मृत्यु जल्दी होती है

यस्य वै भुक्तमात्रस्य हृदयं वाघते क्षुधा जायते दन्तघर्पश्च स गतायुर्न संशयः ॥२२॥

और जिसके अनायास दाँत से दाँत घिस उसकी श्राय समाप्त हो चुकी इसमें कोई संशय नहीं २२

दीपगन्धं न यो वेत्ति त्रस्यत्यहि तथा निशि नात्मानं परनेत्रस्थं वीक्षते न स जीवति ||२३||

जिसको दीपक की गन्ध न नातीहो और जो रात और दिन डरता रहे और जो अपनी छाया कोदूसरों के नेत्रों में न देखे वह जीवित नहीं रह  सकता ||२३||

शक्रायुधश्चार्द्धरात्रे दिवा ग्रहगणं तथा दृष्ट्वा मन्येत संक्षीणमात्मजीवितमात्मवित् ॥२४॥

जो आधी रात के समय इन्द्रधनुष श्रौर दिनमें तारागण देखे तो ज्ञानी को समझना चाहिये कि उसका जीवन क्षीण हो चुका है ||२४||

नासिका वक्रतामेति कर्णयेोर्नमनोन्नती नेत्रश्च वामं स्स्रवति यस्य तस्यायुरुद्वतम् ||२५||

यदि नाक टेढ़ी होजाय, कान ऊँचा नीचा होजाय अथवा वाँये नेत्र से आँसू निकलते रहें तो जानना चाहिये कि श्रायु समाप्त हो चुकी है २५

श्ररक्ततामेति मुखं जिह्वा वा श्यामतां यदा तदा माज्ञो विजानीयान्मृत्युमासन्नमात्मनः ||२६||

यदि मुख लाल और जिहा काली होजाय तो बुद्धिमान् को समझना चाहिये कि उसकी मृत्यु निकट ही श्रा पहुँची २६

उष्ट्र-रासर्भयानेन यः स्वप्ने दक्षिणां दिशम् प्रयाति तंच जानीयात् सद्योमृत्युं न संशयः २७॥

जो मनुष्य स्वप्न में अपने को ॐ या गदहे पर दक्षिण दिशा को जाता हुआ देखे तो जान ले कि उसकी मृत्यु निस्संदेह शीघ्र  होगी ||२७||

पिधाय कर्णौ निर्घोषं न शृणोत्यात्मसम्भवम् निश्यते चक्षुषोज्योंतियस्य सोऽपि न जीवति ||२८||

जो मनुष्य अपने दोनों कान बन्द कर के अपनी ही आवाज़ न सुने तथा जिसकी आँखों- की रोशनी जाती रहे वह भी जीवित नहीं रहता ||२८||

पततो यस्य वै गर्ने स्वप्ने द्वारं पिधीयते न चोत्तिष्ठति यः श्वभ्रात् तदन्तं तस्य जीवितम् २६

जो स्वप्न में अपने को गर्त में गिरा हुआ देखे और उससे निकलने का मार्ग भी बन्द देखे तथा उस गड्ढे में से न उठे तो समझले कि उसके जीवन का अन्त आ गया ||२६||

ऊर्ध्वा च दृष्टिर्न च सम्प्रतिष्ठा रक्ता पुनः संपरिवर्त्तमाना सुखस्य चष्मा शुषिरंच नाभे: शंसन्ति पुंसामपरं शरीरम् ||३०|| -

जिसकी दृष्टि उलट, जाय और नेत्र लाल-लाल होकर स्थिर न रहें,मुख से गर्म श्वास निकले तथा नाभि सूख जाय तो समझना चाहिये कि वह मनुष्य शरीर को छोड़ेगा ||३०||

स्वप्नेऽग्नि प्रविशेद्यस्तु न च निष्क्रमते पुनः जलप्रवेशादपि वा तदन्तं तस्य जीवितम् ||३१||

जो मनुष्य स्वप्न में अग्नि में गिरपड़े और उसमें से न निकले अथवा जल में डूब जाय तो उसके जीवन का भी अन्त समझना चाहिये

यथाभिहन्यते दुष्टैर्भूतैरात्रावथो दिवा स मृत्युं सप्तरात्रन्तु नरः प्राप्नोत्यसंशयम् ॥३२

जिसको दुष्ट भूत रात्रि अथवा दिन में मारें वह पुरुष सातवीं रात्रि के अन्त में निस्सन्देह मर जायगा ३२

स्ववस्त्रममलं शुक्लं रक्तं पश्यत्यथासितम् यः पुमान् मृत्युमासन्नं तस्यापि हि विनिर्दिशेत् ||३३|||

जो मनुष्य अपने निर्मल सफ़ेद कपड़ों को लाल या काले देखे वह मृत्यु के समीप ही है ऐसा जानना चाहिये ||३३||

स्वभाववैपरीत्यन्तु प्रकृतेश्व विपर्य्ययः कथयन्ति मनुष्याणां सदासन्नौ यमान्तकौ ३४

जिसका स्वभाव विपरीत और प्रकृति उलटी हो जाय तो समझना चाहिये उसके पास यमदूत श्रापहुँचे ३४

येषां विनीतः सततं येऽस्य पूज्यतमा मता तानेव चावजानाति तानेव च विनिन्दति ||३५|||

जिन मनुष्यों का चिनीत हो और जो उसके पूज्यतम हों उन्हीं की निन्दा और अपमान जो व्यक्ति करे||३५||

देवान् नार्चयते वृद्धान् गुरून् विमांच निन्दति मातापित्रोर्न सत्कारं जामातॄणां करोति च ॥३६॥

जो देवताओं का पूजन न करे और वृद्धों, गुरुश्र और ब्राह्मणों की निन्दा करे तथा माता, पिता और जमाई का सत्कार न करे ३६

योगिनां ज्ञानविदुषामन्येषाञ्च महात्मनाम् प्राप्ते तु काले पुरुषस्तद्विज्ञेयं विचक्षणैः ||३७||

तथा योगियों, ज्ञानियों, पण्डितों और महात्माओं का भी सत्कार न करे तो ऐसे पुरुष का समय भी ज्ञानी लोग निकट आया समझते हैं ||३७||

योगिनां सततं यत्नादरिष्टान्यवनीपते संवत्सरान्ते तज्ञेयं फलदानि दिवानिशम् ||३८||

हे राजन् ! योगियों को इन अरिष्टों को यक्ष पूर्वक देखते रहना चाहिये क्योंकि यह दिन रात्रि अथवा वर्ष के श्रन्तमें फल - देते रहते हैं ||३८||

विलोक्या विशदा चैषां फलपंक्ति: सुभीषणा विज्ञाय काय्र्यो मनसि स च काला नरेश्वर ||३६||

हे राजन् ! इन रिष्ठों का फल बड़ा भीषण है, इसलिये इनके कार्य और काल को मनमें जान ले ३६

ज्ञात्वा कालंच तं सम्यगभयस्थानमाश्रितः युञ्जीत योगी कालोऽसौ यथा नास्याफलो भवेत् ४०

उस काल को भली प्रकार जानकर योगी को चाहिये कि अभय स्थान में जा कर योग करे जिससे उस काल का कुफल उसको और न हो ||४०||

दृष्ट्वारिष्ट तथा योगी त्यक्त्वा मरणजं भयम् तत्स्वभावं तदालोक्य काले यावत्युपागतम् ४१

रिट को जानकर और मरने का भय छोड़कर उस अरिष्ट के स्वभाव को समझे जब तक वह समय आवे ४१

तस्य भागे तथैवाहो योगं युञ्जीत योगवित् पूर्वाह्न चापरा च मध्याह्न चापि तद्दिने || १२ ||

उसके निमित्त उसी दिन पूर्वाह्न, अपराह्न और मध्याह्न में योग करे ४२

यत्र वा रजनीभागे तदरिष्टं निरीक्षितम् तत्रैव तावद्युञ्जीत यावत् प्राप्तं हि तद्दिनम् ||४३||

और यदि वह अरिष्ट रात्रिमें होता दिखाई दे तो जब तक वह दिन श्रावे उसके पहिले ही. योग करे ॥४३॥

ततस्त्यक्त्वा भयं सर्व्वं जित्वा तं कालमात्मवान्

तत्रैवावसथे स्थित्वा यत्र वा स्थैर्यमात्मनः ॥४४॥

इसके अनन्तर सव भय को त्याग कर उस काल को जोते और उसी स्थान में अथवा दूसरे स्थान में अपने मन को स्थिर करके रक्खे

युञ्जीत योगं निज्जित्य त्रीन् गुणान् परमात्मनि तन्मयश्रात्मना भूत्वा चिद्रष्टत्तिमपि सन्त्यजेत् ४५

 तीनों गुणों को जीत कर योग करे और परमात्मा में मन लगाकर चैतन्य वृत्ति को भी छोड़ दे ||३५||

परमनिर्वाणमतीन्द्रियमगोचरम् यद्वबुद्ध यन्न चाख्यातुं शक्यते तत् समश्नुते ||४६ ||

इसपर वह योगी इन्द्रियों से अगोचर और बुद्धि से परे जो परम निर्वाणपद है उसको पाता है ॥४६॥

एतत् सर्व्वं समाख्यातं तवालर्क यथार्थवत् प्राप्स्यसे येन तद्ब्रह्म संक्षेपात् तन्निबोध मे ।।४७

हे अलर्क ! हमने ये सब तुमसे यथार्थ रूपसे कहा अब जिस तरह योगी को ब्रह्म प्राप्त होता है वह सुनो || ४७||

शशाङ्करश्मि संयोगाच्चन्द्रकान्तमणिः पयः समुत्सृजति नायुक्तः सोपमा योगिनः स्मृता ४८

चन्द्रमा की किरणों के संयोग से चंद्र- कान्त मणि जल छोड़ती है और यदि किरणें न लगें तो नहीं, इसी प्रकार योगियों की उपमा है

यच्चार्करश्मि संयोगादर्ककान्तो हुताशनम् आविष्करोति नैकः सन्नुपमा सापि योगिनः ४६

सूर्यकान्त मणि सूर्य के लगने से उत्पन्न करती है और न लगनेसे नहीं, यही उपमा योगियों के लिये भी है ४६

पिपीलिकाखु नकुल-गृहगोधा - कपिञ्जलाः बसन्ति स्वामिवद्गेहे ध्वस्ते यान्ति ततोऽन्यतः ५०

जिस प्रकार चींटी, चूहा, नेवला, छिपकली और कपिल घर में उसके स्वामी के ही समान रहते हैं परन्तु उस घरके नट भ्रष्ट हो जाने पर दूसरे में चले जाते हैं ॥१०॥

दुःखन्तु स्वामिनो ध्वंसे तस्य तेपां न किञ्चन वेश्मनो यत्र राजेन्द्र सोsपमा योगसिद्धये ५२॥

परन्तु जिसप्रकार उस घर के स्वामीको उसके टूटनेकादुःख होता है उस प्रकार उनकोनहीं, इसी प्रकार हे राजन् ! योगसिद्धि की उपमा जाननी चाहिये ५१

मृद्देहिकाल्पदेहापि मुखाग्रेरणा प्यणीयसा करोति मृद्भारचयमुपदेशः स योगिनः ५२

छोटे शरीर वाली चींटी अपने मुख के छोटेसे अग्रभाग से मिट्टी का ढेर इकट्ठा करती हुई मानों योगी को उपदेश करती है ५२

पशु-पक्षि-मनुष्याद्यैः पत्र-पुष्प-फलान्वितम् वृक्षं विलुप्यमानन्तु दृष्ट्वा सिध्यन्ति योगिनः ५३

पशु, पक्षी और मनुष्य श्रादिक जिस तरह पत्तों, फूलों और फलोंसे युक्त वृक्षों को धीरे-धीरे काट डालते हैं इसको देखकर योगियों को योग सिद्ध करना चाहिये ||१३||

रुरुशावविषाणाग्रमालक्ष्य तिलकाकृतिम् सह तेन विषद्ध न्तं योगी सिद्धिमवाप्नुयात् ॥५४॥

जिस प्रकार हरिण के बच्चे के सींगकी नोक पहिले तिल के समान दिखाई देती है और फिर हरिणके साथ साथ बढ़ती हैं उसी प्रकार धीरे-धीरे योगी सिद्धिको प्राप्त करे ५४

द्रवपूर्णमुपादाय पात्रमारोहता भुवः तुङ्गमङ्गं विलोक्योश्चैर्विज्ञातं किं न योगिना ५५||

 जल से पूर्ण पात्र को शिर पर रखकर यदि कोई पृथ्वी पर चलता है तो उस पात्र को ऊँचा देखकर योगी योग में अपने को ऊँचा रक्खे ||५||

सर्व्वस्वे जीवनायालं निखाते पुरुषस्य या " चेष्टा तां तत्त्वतो ज्ञात्वा योगिनः कृतकृत्यता ५६

और ज़मीन से खोद कर जो तुच्छ वस्तु निकाली जाती है पुरुष का चित्त उसी में लगा रहता है, इसका तत्व पूर्वक समझनाही योगी की कृतकृत्यता है ५६॥

तद्वगृहं यत्र वसतिस्तद्रोज्यं येन जीवति येन सम्पद्यते चार्थस्तत् सुखं ममता का ||५७||

घर वह है जिसमें मनुष्य - रहे भोजन वह है जिससे वह जीवित रहे और धन वह है जिससे सुख हो फिर ममता करनेसे क्या ? ५७

अभ्यर्थितोऽपि तैः कार्य्यं करोति करणैर्यथा तथा बुद्ध्यादिभिर्योगी पारक्यैः साधयेत् परम् ५८

जिस प्रकार वुद्धिमान लोग बाधाओं के उपस्थित होने पर भी उद्यम को नहीं छोड़ते इसी प्रकार इन्द्रियों को जीतकर योगी लोग योग-साधन करते हैं ५८

जड़ उवाच

तःत प्रणम्यात्रिपुत्रमलकः स महीपतिः

प्रश्रयावनतो वाक्यमुवाचातिमुदान्वितः ५६

जड़ ( सुमति ) बोले- इसके अनन्तर राजा अलर्क दत्तात्रेयजी को प्रणाम कर हर्ष से विनय पूर्वक वचन बोले ॥५६॥ अलर्क उवाच दिष्ट्या देवैरिदं ब्रह्मन पराभिभवसम्भवम् उपपादितमत्युग्रं प्राणसन्देहदं भयम् ६०

अलर्क बोले-हे भगवन् ! मेरे भाग्य धन्य हैं कि जो मुझे अति उग्र प्राणों को भय देने वाला सन्देह उत्पन्न हुआ ६०

दिष्ट्या काशिपतेर्भूरि-वलसम्पत्पराक्रमः

यदुच्छेदादिहायातः स युष्मत्सङ्गदो मम ६१

काशिराज का प्रचुर चल सम्पत्ति और पराक्रम धन्य है कि जिससे कष्ट पाकर मैं यहाँ आया और आपसे सत्सङ्ग हुआ ६१

दिष्ट्या मन्दवलचाहं दिष्ट्या भृत्याश्च मे हताः

दिष्ट्या कोषः क्षयं यातेो दिष्ट्याहं भीतिमागतः ६२॥

 मेरा-, वल घटना, सेना और सेवकों का मारा जाना, कोप का क्षीण होना, और मुझको भय होना ये सब कल्याणकारी ही हुए ||६२||

दिष्ट्या त्वत्पादयुगलं मम स्मृतिपथं गतम्

दिष्ट्या त्वदुक्तयः सर्व्वा मम चेतसि संस्थिताः॥ ६३॥

ये कितनी कल्याणमयी घटना है कि आपके चरण युगल मेरे स्मृति : पटल पर अति होगये और श्रापने जो कुछ कहा वह मेरे चित्त में बैठ गया ६३॥

दिष्ट्या ज्ञानं ममोत्पन्नं भवतथ समागमात्

भवता चैव कारुण्यं दिष्ट्या ब्रह्मन् कृतं मम ||६४।।

आपके समागम से जो ज्ञान मुझे हुआ तथा हे ब्रह्मन् ! आपने जो मेरे  ऊपर करुणा की वह धन्य है ६४

अनर्थोऽप्यर्थतां याति पुरुषस्य शुभोदये

यथेदमुपकाराय व्यसनं सङ्गमात् तव || ६ ||

पुरुष के शुभ दिन जाने पर अनर्थ भी कल्याणकारी होजाता है जिस तरह कि आपके सङ्ग से दुःख भी मेरे उपकार का कारण हुआ ||६५॥

सुबाहुरुपकारी मे स च काशिपतिः प्रभो

ययोः कृतेऽहं सम्प्राप्तो योगीश भवतोऽन्तिकम्॥ ६६ ।।

सुवाहु और काशि- राज भी मेरे उपकारी हुए कि जिनके कारण मैं आप जैसे योगीश्वर के पास आया || ६६||

सोऽहं तव प्रसादानि - निर्दग्धाज्ञानकिल्विषः

तथा यतिष्ये येनेदृडून भूयां दुःखभाजनम् || ६७||

आपकी कृपा रूपी अग्नि से मेरा अज्ञानरूपी पाप जल गया,मैं वही यत्न करूँगा कि जिससे फिर इस तरह दुःख का भागी न बनूं ॥६७॥

परित्यजिष्ये गार्हस्थ्यमार्त्तिपादप काननम्

त्वत्तोऽनुज्ञां समासाद्य ज्ञानदातुर्महात्मनः ६८।।

श्राप जैसे ज्ञान देने वाले महात्मा से श्राज्ञा लेकर गृहस्थरूपी बन को जो दुःखरूपी वृक्षों से पूर्ण है छोडूंगा ॥६८॥

दत्तात्रेय उवाच

गच्छ राजेन्द्र भद्रं ते यथा ते कथितं मया निर्ममो निरहङ्कारस्तथा चर विमुक्तये ६६

दत्तात्रेय बोले-

हे राजन् ! जाओ, तुम्हारा कल्याण हो जिस तरह मैंने तुमको बताया है निरहङ्कार और निर्मम रहकर मुक्ति के लिए प्रयत्न करो ६६ जड़ उवाच

एवमुक्तः प्रणम्यैनमाजगाम त्वरान्वितः यत्र काशिपतिर्भ्राता सुबाहुश्चास्य सोऽग्रजः ७०

जड़ ( सुमति) वोले- यह कहे जाने पर उनको प्रणाम करके राजा अलर्क जहाँ काशिराज़ और बड़े भाई सुबाहु थे, वहाँ शीघ्र पहुंचे ७० समुपेत्य महाबाहुं सोऽलर्कः काशिभूपतिम् सुवाहोरग्रतो वीरमुवाच महसन्निव ७११

और काशी नरेश के पास पहुँचकर अलर्क सुबाहु के सामने हँसते हुए उनसे बोले ७१

राज्यकामुक काशीश भुज्यतां राज्यमूजितम् यथा वा रोचते तद्वत् सुवाहे |ः सम्प्रयच्छ वा ॥७२॥

हे राज्य के इच्छुक काशीनरेश ! जीते हुए इस राज्य को अब तुम भोगो अथवा यदि तुम्हारी इच्छा हो तो सुबाहु को देदेो ७२

काशिराज उवाच

किमलर्क परित्यक्तं राज्यं ते संयुगं विना क्षत्रियस्य न धर्मोऽयं भवांश्च क्षत्रधर्म्मवित् ॥७३॥

काशिराज बोले- यह राज्य तुमने विना युद्ध किये क्यों छोड़ा, आप तो क्षत्रियधर्म के जानने वाले हैं ॥७३॥

निज्जितामात्यवर्गस्तु त्यक्त्वा मरणजं भयम् सन्दधीत शरं राजा लक्ष्यमुद्दिश्य वैरिणम् ||७४ ||

सेना के हारने पर यह क्षत्रिय धर्म नहीं है भय छोड़कर राजा स्वयं धनुष वाण लेकर वैरी के सन्मुख आते हैं ७४

तं जित्वा नृपतिर्भोगान् यथाभिलषितान् वरान्

भुञ्जीत परमं सिद्ध्यै यजेत च महामखैः ॥७५॥

उस बैरी को जीतकर यथेष्ट भोगों को भागते हैं और परम सिद्धिके लिए यश आदि भी करते हैं ॥७॥ लर्क उवाच

एवमीदृशकं वीर ममाप्यासीन्मनः पुरा आम्मतं विपरीतार्थं शृणु चाप्यन्न कारणम् ॥७६।।

अलर्क बोले- हे वीर ! जैसा तुम कहते हो मेरा पहिले वैसा ही मन था परन्तु अब विपरीत होगया है, इसका कारण सुने ॥७६॥

यथायं भौतिकः सङ्घस्तथान्तःकरणं नृणाम् गुणास्तु सकलास्तद्वदशेषेष्वेव जन्तुषु ॥७७॥

जैसा यह भौतिक सङ्घ है वैसा ही मनुष्यों का अन्तःकरण है और सब जीव अन्तुओं में गुण भी हैं ७७ चिच्छक्तिरेक एवायं यदा नान्योऽस्ति कश्चन तदा का नृपते ज्ञानान्मित्रारि-प्रभु-भृत्यता ||७८

परन्तु उनमें पुरुष एक ही है और जब वह एक ही है तो हे काशि- राज ! फिर मित्र, शत्रु, स्वामी और सेवक क्या ? ७८

तन्मया दुःखमासाद्य त्वद्भयोद्भवमुत्तमम् दत्तात्रेयप्रसादेन ज्ञानं प्राप्तं नरेश्वर ॥७६॥

हे नरेश ! तुम्हारे भय से मैं दुःख पाकर दत्तात्रेयजी के पास गया और उनकी कृपासे यह ज्ञान मुझे प्राप्त हुआ ७६

निज्जितेन्द्रियवर्गस्तु त्यक्त्वा सङ्गमशेपतः मनो ब्रह्मणि सन्धाय तज्जये परमो जयः ॥८०॥

मैंने सब सङ्गको छोड़ कर और इन्द्रियों को जीतकर अपने मनको ब्रह्म में लगाया है और यही उत्तम विजय है ८०

संसाध्यमन्यत् तत्सिद्ध्यै यतः किञ्चिन्न विद्यते इन्द्रियाणि च संयम्य ततः सिद्धिं नियच्छति ८१

उसी सिद्धि के लिए जिसके अतिरिक्त और कुछ नहीं सिद्धि प्राप्त होती है ८१

न सोऽहं न तेऽरिर्न ममासि शत्रुः सुबाहुरेपो पमापकारी दृष्ट मया सव्र्व्वमिदं यथाव- दन्विष्यतां भूप रिपुस्त्वयान्यः ||८२||

श्रतः मैं तुम्हारा और है यह साधना है इन्द्रियों का संयम करनेसे वह तुम मेरे शत्रु नहीं हो और ये सुबाहु भी मेरा अप- कारी नहीं है। मैं इस सबको यथार्थ रूपसे देखता हूँ इसलिये हे राजन् ! आप अपने लिए दूसराशत्रु. लीजिए ८२

इत्थं स तेनाभिहितो नरेन्द्रो हृष्टः समुत्थाय ततः सुबाहुः दिष्ट्येति तं भ्रातरमाभिनन्य काशीश्वरं वाक्यमिदं बभाषे ८३

अलर्क के इस प्रकार कहने पर सुवाह प्रसन्न होकर उठा और 'धन्य है' इस तरह भाई का अभिनन्दन करके काशी नरेश के प्रति कहने लगा ८३

इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में अरिष्टकथन नाम ४३ वाँ अ० समाप्त