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मार्कण्डेयउवाच

वीर्य्यचन्द्रसुतासुभ्रूवरानामशुभवता।। स्वयंवरेसाजगृहेमहाराजंकरन्धमम्॥१॥

मार्कण्डेयजी बोले--

राजा वीर्य्यचन्द्रकी शुभवतवाली और सुन्दरी पुत्री वीरा ने स्वयम्वर में महाराज करन्धम कोवरण किया ॥ १ ॥

तस्यांपुत्रंसराजेन्द्रोजनयामासवीर्य्यवान्। श्रवीक्षितमितिख्यातिमुपेतंजगतीतले || २

महाराज करन्धम ने उस पत्नी  से एक पराक्रमी पुत्र उत्पन्न किया जिसका नाम इस पृथ्वी पर वीक्षित प्रसिद्ध हुआ ॥ २ ॥

जातेतस्मिन्सुतेराजासदैवज्ञानपृच्छत कच्चित्प्रशस्तनक्षत्रेशस्तलग्नेसुतोमम॥३

उस पुत्र के उत्पन्न होने पर राजा ने ज्योतिपियोंसे पूछा कि मेरा पुत्र प्रशस्त नक्षत्र और लग्न में पैदा हुआया नहीं ॥ ३ ॥

कच्चिच्चालोकितंजन्मममपुत्रस्यशोभनैः। ग्रहःकञ्चिन्नदुष्टानांग्रहाणांदृक्पथंगतम्॥४॥

तथा मेरे पुत्र का जन्मस्थान शुभ ग्रहों द्वारा दृष्ट है अथवा दुष्ट ग्रहों द्वारा यह श्रापलोग बताइये || ४ ||

इत्युक्तास्तेनदैवज्ञास्तमूचुर्नृपतिंततः। रास्तेमुहूर्तेनक्षत्रेलगेचैवसुतस्तव॥५ समुत्पन्नोमहावीर्योमहाभागोमहाबलः। भविष्यतिमहाराजमहाराजस्तवात्मजः || ६

राजा के इस प्रकार कहने पर ज्योतिषियों ने उनसे कहा, " हे महाराज ! श्रापका यह पुत्र प्रशस्त मुहूर्त्त, नक्षत्र और लग्न में उत्पन्न हुआ है। यह अत्यन्त वलवान्, भाग्यवान्, पराक्रमी और राजानों में महाराजा होगा ॥५-६॥

अवेक्षतेमंदेवानांगुरुःशुक्रश्चसप्तमः। सोमश्चतुर्थस्तनयंतवैनंसमवेक्षते॥७

वृहस्पति और शुक्र इसके सप्तम स्थान में तथा चन्द्रमा चतुर्थ स्थान में इसको देखते हैं और इसकी रक्षाकरते हैं ॥ ७ ॥

उपान्तसंस्थितश्चैवसोमपुत्रोऽप्यवेक्षते। नावक्षतेमंसवितानभौमोनशनैश्वरः॥८

दशम स्थान में स्थित होकर बुध इसकी रक्षा करते हैं । सूर्य, मङ्गल और शनैश्वर आदि पापग्रह इसके जन्मस्थान को नहीं देखतेहैं ॥ ८ ॥

तवपुत्रंमहाराजधन्योऽयंतनयस्तव। सर्व्वकल्याणसम्पत्तिसमवेतोभविष्यति॥६॥

हेमहाराज ! आपकायहपुत्रधन्यहै। यहकल्याणऔरसम्पत्तिसेयुक्तहोगा॥६॥  मार्कण्डेयउवाच

इतिदैवज्ञवचनंनिशम्यवसुधाधिपः। हर्षपूर्णमनाःप्राहनिजस्थानगतस्तदा॥१०॥

मार्कण्डेयजी बोले-

ज्योतिषियों के यह वचन सुनकर महाराज करन्धम प्रसन्न चित्त होकर बोले ॥ १० ॥

श्रवैक्षतेमंदेवानांगुरुःसोमसुतोबुधः। नावैक्षतनमादित्योनार्कसूनुर्नभूमिजः॥११॥

चूंकि वृहस्पति, शुक्र और वुध इसको देखते हैं और सूर्य, शनिश्चर और मङ्गल नहीं ॥११॥

अवेक्षतेतियदप्रोक्तंभवद्भिर्वहुशोवचः। प्रवीक्षितेतितेनास्यख्यातंनामभविष्यति॥१२॥ |

देखते ऐसाआप लोग कहते हैं  इसलिये इसका नाम श्रवीक्षितप्रसिद्धहोगा॥१२॥ मार्कण्डेयउवाच

वीक्षितःसुतस्तस्यवेदवेदाङ्गपारगः । श्रखग्राममशेषंसकण्वपुत्रान्याग्रहीत्॥१३॥

मार्कण्डेयजी बोले-

करन्थस के पुत्र प्रवक्षित वेद और वेदान में पारङ्गत हुए तथा उन्होंने अस्त्र शस्त्र की सम्पूर्ण

विद्या राय सुनि के पुत्र से सीखी ॥ १३ ॥

परूपेणातिभिषजौदेवानांपार्थिवात्मजः। बुद्ध्यावाचस्पतिंकान्त्याशशाङ्कतेजसारविस्॥१४॥

बह अवक्षित रूपमें अश्विनी कुमारों, बुद्धिमें बृहस्पति कान्ति में चन्द्रमा और तेज में सूर्य के समान था॥ १४ ॥

वैय्र्येणान्धिंतयोव्र्वञ्चसहिष्णुत्वेनवीर्य्यवान्।। शौर्येणनसमस्तस्यकश्चिदासीन्महात्मनः॥१५॥

वह धैर्य में समुद्र के समान सहिष्णुता में पृथ्वी के समान था और वीरता में उसके समान

पृथ्वी पर कोई न था ॥ १५ ॥

स्वयंवरेतंजगृहेहेRवर्म्मात्मजावरा। सुदेवतनयागौरीसुभद्रावलिनःसुवा॥१६॥

स्वयम्बर में हेमधर्म की कन्या वरा, सुदेव की कन्या गौरी और वलि की कन्या सुभद्रा ने उसको वरण किया ॥ १६ ॥

जीलावतीवीरसुतावीरभद्रसुतानिभा | नीमात्मजामान्यवतीदम्भपुत्रीकुमुद्वती॥१७॥

वीर की कन्या लीलावती, वीरभद्र की पुत्री निमा, भीम की कन्या मान्यवती. दम्भ की पुत्री कुमुद्वती॥ ७॥

पाश्चैवंनाभिनन्दन्तिस्वयंवरकृतक्षणाः। तथापिसवलाद्वीरोजग्राहनृपतेःसुतः॥१८॥

स्वयम्बरों में वीक्षित को अपना पति चुना और वीजित ने उनको बलपूर्वक ग्रहणकिया ॥१८॥

नेराकृत्यनृपान्सर्व्वस्तासांपिवकुलानिच

वकंहिवीर्यमाश्रित्यबलवान्सबलोद्धृतः॥१६॥

सूब पत्नियोंको उसने लब राजाओं तथा पत्नियों के पितायों के कुल वालों को अपने पराक्रम से परास्त करके ग्रहण किया ॥१६॥

एकदातुविशालस्यवैदिशाधिपतेःसुताम्। शालिनींसमुदतींस्वयंवरकृतक्षणाम् ||२०||

एक वार श्रवीजित ने वैदिश के राजा विशाल की पुत्री वैशालिनी को स्वयम्वर में देखा ||२०||

रिभूयाखिलान्भूपान्स्वेच्छयानवृतस्तया। लाज्जग्राहविमर्षेयथान्यावगर्धितः॥२१॥

 हे कौटुकि और जब वह वीक्षित को भी न बरके दूसरे की जी ! उस कन्या ने सब राजाओं की उपेक्षा की ओर झुकी तय वीक्षित ने उसको वल पूर्वकपकड़ लिया ||२१||

तस्तेभूभृतःसर्व्वेबहुशस्त्रेनसर्व्वे बहुशस्तेन मानिना । नेराकृताःसुनिव्विण्णाप्रोचुरन्योन्यमाकुलाः॥२२|

 इस प्रकार अपमानित होकर वे राजा बहुत दुःखी हुए और व्याकुल होकर श्रापस क्षत्रियों के होते हुए यदि इस प्रकार इस तलना में एक दूसरे से कहने लगे ॥ २२ ॥

मतांललनामेतामेकस्माद्वलशालिनाम्। हूनामेकवर्णानांजन्मथिवोमहीभृताम् ||२३||

हम वलत्रान् का हरण होजाय और हम हरण करनेवाले को क्षमा करदें तो हमारे जीवन को धिक्कार है॥ २३ ॥

रत्रियोयःक्षतत्राणंवध्यमानस्यदुर्म्यदैः। करोतितस्यतन्नामवृथैवान्येहिविभ्रति ||२४||

क्षत्रिय वही है कि जो अन्यावियों से पीड़ित है उसका क्षत्रिय नाम वृथा है ॥२४॥

प्रात्मनोऽपिक्षतत्राणंदुष्टादस्मादकुर्व्वताम्। नवतांक्षत्रियकुलेजातानांकीदृशीमतिः॥२५॥

जो मनुष्यों का त्राण करता है । जो ऐसा नहीं करता हम लोगों ने इस दुष्ट से अपनी रक्षा न की तो क्षत्रिय कुल में उत्पन्न हम लोगों की मति भ्रष्ट हो गई है ऐसा जानना चाहिये ||२५||

अचार्यतेस्तुतिर्याचसूतमागधवन्दिभिः। सत्यामावृथावीराभवत्वरिविनाशनात्॥२६॥

जो कि हमारी स्तुति सूत, मागध और वन्दीजन करते हैं वह सत्य होते हुए भी इस बैरी को न मारने से वृथा होजायगी ॥ २६ ॥

वरतांमाथांभूपशब्दोंदिगन्तरेः। रुपाश्रयिणःसर्व्वेविशिष्टकुलसम्भवात्॥२७॥

हम लोग वीर हैं और सब सभ्य कुल में उत्पन्न हुए हैं, दिन्दिगान्तरों में हमारा राज्य फैला हुआ

ये सब बातें वृथा हुआ चाहती हैं ||२७||

वेभेतिकोनमरणात्कोयुद्धेनविनाऽमरः। वचिन्त्येतन्नहातव्यंपौरुषंशस्त्रवृत्तिभिः ||२८||

संसार में कौन नहीं मरता है तथा युद्ध न करने पर भी कौन अमर रहेगा यह विचार कर क्षत्रियों को पुरुषार्थ न छोड़ना चाहिये ॥२८॥

तन्निशम्यतेभूषाविस्पष्टामर्षपूरिताः।

ऊचुः परस्पर सर्व्वे समुत्तस्थु सायुधाः ||२६||

यहसुनकरवेंसबराजाक्रोधसेयुक्तहोगये औरसबनिले लेकर खड़े हो गये ॥ २६ ॥

केचिद्रथानारुरुहुःकेचिन्नागांस्तथाहयान्। अन्येऽमर्षपराधीनास्तमुपेताःपदातयः॥३०॥

कुछहाथियोंतथाघोड़ोंपरबैठकरऔरकुछ रथों पर दुक क्रोधसेउन्मत्तहोपैदलहीश्रवीक्षितकेपहुंचे॥३०॥ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंअवीक्षितचरित्र (१) नाम१२२वाँअध्यायस०।