मार्कण्डेय महा पुराण
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मदालसोवाच एवं पुत्र गृहस्थेन देवताः पितरस्तथा । सम्पूज्या हव्य-कव्याभ्यामन्नेनातिथि- बान्धवाः। १
मदालसा बोली- हे पुत्र ! गृहस्थी को चाहिये कि देवताओं को हव्य से, पितरों को कव्य से और अतिथि बान्धवं श्रादिरूप मनुष्यों को अन्नसे पूजे ॥ १ ॥
भूतानि भृत्याः सकलाः पशु-पक्षि- पिपीलिकाः । भिक्षवो याचमानाथ ये चान्ये वसता गृहे ॥ २
भूत, प्रेत, सेवकगण, पंशु, पक्षी, चींटी, भिखारी, याचक तथा और जो घर पर रहते हों ॥ २ ॥
सदाचारवता तात साधुना गृहमेधिना । पापं भुङ्क्ते समुल्लङ्घय नित्यनैमित्तिकीः क्रियाः॥ ३ ॥
उनको सदाचारी साधु गृहस्थी अन्न से पूजे । नित्यनैमित्तिकी क्रियात्रों का उल्लंघन करके जो भोजन करता वह पापी है ॥ ३ ॥ अलर्क उवाच
कथितं मे त्वया मातर्नित्यं नैमित्तिकंच यत् । नित्यनैमित्तिकंचैव त्रिविधं कर्म्म पौरुषम् ॥ ४
अलर्क वोला- हे माता ! तुमने मुझसे नित्य, नैमित्तिक तथा नित्यं नैमित्तिक त्रिविधात्मक कर्म कहा ॥ ४ ॥
सदाचारमहं श्रोतुमिच्छामि कुलनन्दिनि । यत् कुर्व्वन् सुखमाप्नोति परत्रेह च मानवः ॥
हे कुलनन्दिनि ! मैं वापसे सदाचार को सुनना चाहता हूँ जिसके करने से मनुष्य परलोकमें तथा यहाँ सुख पाता है ॥ ५ ॥ मदालसोवाच
गृहस्थेन सदा कार्य्यमाचारपरिपालनम् । न ह्याचारविहीनस्य सुखमत्र परत्र वा ॥ ६
मदालसा बोली- गृहस्थी को सदैव श्राचार का पालन करना चाहिये, आचार- विहीन को यहाँ अथवा परलोक सुख नहीं है ॥ ६ ॥ यज्ञदानतपांसीह पुरुषस्य न भूतये । भवन्ति यः सदाचारं समुङङ्घन्य ं प्रवर्त्तते ॥ ७
जो सदाचार का उल्लंघन करता है उसको यज्ञ, दान और तप आदि करने का कुछ फल नहीं मिलता है ॥ ७ ॥ दुराचारो हि पुरुषो नेहायुर्विन्दते महत्। काय्र्यो यत्नः सदाचारे आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥८॥
इस संसार में.. दुराचारी पुरुष अधिक श्रायु नहीं पाताहै, इसलिये यत्न से सदाचारी रहे । सदाचार कुलक्षण का अन्त कर देता है ||८||
तस्य स्वरूपं वक्ष्यामि सदाचारस्यपुत्रक । तन्ममैकमनाः श्रुत्वा तथैव परिपालय ॥ ६।।
हे पुत्र ! उस सदाचार का रूप मैं तुमको बतलाती हूँ । तुम उसको एकाग्र चित्त से सुनकर उसी तरह पालन करो ॥ ६ ॥ त्रिवर्गसाधने यत्नः कर्त्तव्यो गृहमेधिना । तत्संसिद्धौ गृहस्थस्य सिद्धिरत्र परत्र च ॥ १०
गृहस्थी मनुष्यको त्रिवर्गका साधन यत्नसे करना चाहिये क्योंकि उसके सिद्ध होने से गृहस्थी की इस लोक तथा परलोक में सिद्धि होती है ॥ १० ॥ पादेनार्थस्य पारम्यं कुर्य्यात् सञ्चयमात्मवान् । श्रद्धेन चात्मभरणं नित्यनैमित्तिकान्वितम् ॥ ११॥
अपने धन के चतुर्थ भाग का सञ्चय परलोक के लिये करें तथ आधे से अपना भरण पोषण और नित्यनैमित्तिक क्रियायें करे ॥ ११ ॥ पादश्चात्मार्थमायस्य मूलभूतं विवद्धयेत् । एवमाचरतः पुत्र अर्थ: साफल्यमर्हति ॥ १२
और एक भाग को अपने लिये रखकर उसे बढ़ावे । हे पुत्र ! इस. प्रकार से प्रयोग किया हुआ धन सफल होता है ॥
तद्वत् पापनिषेधार्थं धर्म्मः काय्र्यो विपश्चिता । परत्रार्थं तथैवान्यः कामोऽत्रैव फलमदः ॥ १३
इसलिये पाप की निवृत्ति के लिये स्वर्ग की इच्छा से ज्ञानी लोगों को धर्म करना चाहिये तथा इसी प्रकार काम को वश में करके इसी संसार में फल प्राप्त करना चाहिये ||१३||
प्रत्यवायभयात् काम्यस्तथान्यश्चाविरोधवान् । द्विधा कामोऽपि गदितस्त्रिवर्गस्याविरोधः ॥ १४ ॥
कुछ कार्य भय के कारण और कुछ कार्य विरोध दूर करने के लिये होते हैं, यह दोनों कार्य त्रिवर्ग से सम्बन्धित हैं ॥ १४ ॥
परस्परानुवन्धांच सर्व्वानेतान् विचिन्तयेत् । विपरीतानुवन्धांश्च धर्मादींस्तान् शृणुष्व मे ॥ १५
इन सबको परम्परा अनुबन्ध और विपरीत अनु- वन्ध समझना चाहिये । श्रव इन धर्मादिकों को सुनो ॥ १५ ॥
धम्र्मो धम्र्मानुबन्धार्थो धम्र्मो नात्मार्थबाधकः । · उभाभ्याञ्च द्विधा कामस्तेन तौ च द्विधा पुनः १६ ॥
धर्म से धर्मानुबन्ध होता है और धर्म आत्मार्थ में वाधक नहीं है । इन दोनों करके काम दो प्रकार हैं तथा काम से धर्म भी दो तरह का है ॥ १६ ॥
ब्राह्मे मुहूर्त्ते युध्येत धर्मार्थै चापि चिन्तयेत् । कार्य्यक्केशांस्तु तन्मूलान् वेदतत्त्वार्थमेव च । समुत्थाय तथाचम्य प्राङ्मुखो नियतः शुचिः ||१७||
ब्रह्म मुहूर्त्त में उठकर धर्म और अर्थका चिन्तन करे तथा कार्य में जो कठिनाइयाँ हों उनका वेदतत्व से विवेचनकरें। फिर उठकर तथा श्राच मन करके पूर्व दिशा में पवित्र होकर बैठे ॥१७
पूर्वी सन्ध्यां सनक्षत्रां पश्चिमां सदिवाकराम् । उपासीत यथान्यायं नैनां जह्मादनापदि ॥ १८ ॥
तारे दीखते मातः सध्या और सायंकालकी संध्या किसी श्रापत्ति के इनको न छोड़े ॥ १८ ॥
श्रसत्प्रलापमनृतं वाक्पारुष्यंच वर्जयेत् । सच्छास्त्रमसद्वादमसत्सेवाञ्च पुत्रक ॥ १६ ॥
हे पुत्र ! पश्चिम में सूर्य देखते न्यायपूर्वक करे तथा बिना मिथ्या प्रलाप, भंठा वचन, कुशास्त्र का पठन-पाठन मूंठा वाद-विवाद और दुष्टोंकी सेवा ये सब वर्जित हैं ||१६||
सायं प्रातस्तथा होमं कुर्व्वीत नियतात्मवान् । नोदयास्तमने विम्बमुदीक्षेत विवस्वतः ॥ २० ॥
नियतात्मा होकर मातः तथा सायंकाल : में हवन करे तथा सूर्य के उदय और अस्त होने के समय सूर्य के प्रतिविम्बं को न देखे ॥ २० ॥
केशप्रसाधनादर्श दर्शनं दन्तधावनम् । पूर्वा एव काय्र्याणि देवतानाञ्च तर्पणम् ॥२१॥
बाल कांढ़ना, दर्पण देखना, दांत साफ़ करना और देव- ताओं को तर्पण ये कार्य पूर्वाह्न में करने चाहिये ।। ग्रामावसथतीर्थानां क्षेत्राणाञ्चैव वर्त्मनि । विण्मूत्रं नानुतिष्ठेत न कृष्टे न च गोव्रजे ॥२२॥
गाँव, वास स्थान, खेतों, रास्तों और गोशाला में को न देखे, अपने विष्ठा और मूत्रको न देखे, तथा विष्ठा और सूत्र त्यागने न वैठे ॥ २२ ॥
नग्नां परस्त्रियं नेक्षेन्न पश्येदात्मनः शकृत् ।
उदक्या दर्शनं स्पर्शो वर्ज्यं सम्भाषणं तथा ||२३||
नही परस्त्री रजस्वला स्त्री का दर्शन, स्पर्श और उससे वार्ता - लाप वर्जित हैं ॥ २३ ॥
नाप्सु सूत्रं पुरीषं वा मैथुनं वा समाचरेत् । नाधितिष्ठेच्छकृन्मूत्र- केश-भस्म - कपालिकाः ||२४||
जल में मूत्र, विष्ठा और मैथुन न करे और जहाँ केश, भस्म और हड्डियां हों वहाँ भी सूत्र और विष्ठा करने के लिये न बैठे ||२४||
तुषाङ्गारास्थिशीर्णानि रज्जुवस्त्रादिकानि च । नाधितिष्ठेत् तथा प्राज्ञः पथि चैवं तथा भुवि ||२५||
भूसा, श्रङ्गारा, हड्डी, सूखे हुए पत्ते, रस्सी और कपड़ा इन सबको बुद्धिमान मनुष्य रास्ते या पृथ्वी परसे न उठावे ॥२५॥
पितृ-देव- मनुष्याणां भूतानाच तथार्च्चनम् । कृत्वा विभवतः पश्चाद्गृहस्थो भोक्तुमर्हति ॥ २६ ॥
पितृ, देवता, मनुष्य और जीवों की पूजा करके फिर गृहस्थी को स्वयं भोजन करना चाहिये ||२६||
प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि स्वाचान्तो वाग्यतः शुचिः।
भुञ्जीतान्नञ्च तचित्तो ह्यन्तर्जानुः सदा नरः||२७||
पूर्व मुख अथवा उत्तर मुख होकर पवित्र चित्त से एकाग्र होकर अपने दोनों हाथ जंघाओं के अन्दर रखकर मनुष्य को भोजन करना चाहिये ॥ २७ ॥
उपघातादृते दोषं नान्यस्योंदीरये बुधः । प्रत्यक्षलवणं वर्ज्यमन्नमत्युष्णमेव च ॥ २८ ॥
विना उपधात किये बुद्धिमान् किसी दूसरे का दोष वर्णन न करे सदैव भोजन करना चाहिये२८ ॥ न गच्छन्न च तिष्ठन् वै विण्मूत्रोत्सर्गमात्मवान् । कुर्व्वीत नैव चाचामन् यत् किंचिदपि भक्षयेत् ॥ २६।।
चलते हुए और बैठते हुए सूत्र और विष्ठा तथा प्रत्यक्ष लवण और बहुत गर्म यंत्र वर्जित है का त्याग न करे और यदि आचमन करना हो तोस कुछ न खाय ॥ २६ ॥
उच्छिष्टो नालपेत् किंचित् स्वाध्यायंच विवर्जयेत् ।
गां ब्राह्मणं तथा चानिं स्वमूर्द्धानंच न स्पृशेत्॥ ३०
झूठे मुंह होकर बातचीत न करे तथा झूठे सुख से स्वाध्याय करना और गौ, ब्राह्मण, अग्नि और अपने शिर को छूना वर्जित है ||३०||
न च पश्येद्रवि नेन्दुं न नक्षत्राणि कामतः । भिन्नासनं तथा शय्यां भाजनंच विवर्जयेत् ॥ ३१।
झूठे मुख से सूर्य, चन्द्रमा और तारांगणों का देखना तथा दूसरे श्रासन और शय्यापर जाना आदि सब निषिद्ध है ॥ ३१ ॥
गुरूणामासनं देयमभ्युत्थानादिसत्कृतम् । अनुकूलं तथालापमभिवादनपूर्व्वकम् | तथानुगमनं कुर्य्यात् प्रतिकूलं न सज्जपेत् ३२||
गुरू का स्वागत श्रादि करके उनको आसन दे तथा प्रणाम करके : उनसे अनुकूल वार्तालाप करे, तथा गुरू का अनु- गमन करे और उनके प्रतिकूल न चले ॥ ३२ ॥
नैकवस्त्रश्च भुञ्जीत न कुर्यादेवतार्च्चनम् । न वाहयेद्विजान् नानौ मेहं कुर्व्वीत बुद्धिमान् ॥३३॥
एक वस्त्र ही धारण किये हुए भोजन और देवताओं का पूजन न करे, ब्राह्मणोंको बोझ से न लादे तथा अग्नि में मल-सूत्र का त्याग न करे ||३३||
स्नायीत न नरो नमो न शयीत कदाचन ।
न पाणिभ्यामुभाभ्यांच कण्डूयेत शिरस्तथा ॥ ३४ ॥
मनुष्य को नही होकर नहाना और सोना नहीं चाहिये तथा दोनों हाथों से शिर को न खुजलाना चाहिये ||३४||
न चाभीक्ष्णं शिरःस्नानं कार्य्यं निष्कारणं नरैः । शिरःस्नातश्च तैलेन नाङ्गं किंचिदपि स्पृशेत्॥ ३५॥
बिना कारण शिर से वार वार स्नान न करना चाहिये और शिर से स्नान करके तेल किसी श्रंद्र में न लगावे ॥ ३५ ॥ श्रनध्यायेषु सर्वेषु स्वाध्यायंच विवज्र्जयेत् । ब्राह्मणानिल गो-सूर्य्यान्न मेहेत कदाचन ||३६||
सब अनध्याय के अवसरों में स्वाध्याय वर्जित है । ब्राह्मण, अग्नि, गौ, सूर्यकी श्रोर मुंह करके विष्ठा और मूत्र न करे ||३६||
उदङ मुखो दिवा रात्रात्सर्गं दक्षिणामुखः । श्रावाधासु यथाकामं कुर्य्यामूत्र-पुरीपयोः ||३७||
दिनमें उत्तर मुख और रात्रि में दक्षिण मुख होकर मल-मूत्र का त्याग करें तथा इसमें वाधा हो तो इच्छानुसार करे ॥ ३७ ॥
दुष्कृतं न गुरोर्ब्रूयात् क्रुद्धचैनं प्रसादयेत् ।
परिवादं न शृणुयादन्येषामपि कुर्व्वताम् ||३८||
गुरू के दोष को न कहे श्रीर यदि वे क्रुद्ध होगये हों तो उनको प्रसन्न करे । तथा दूसरों से की हुई भी गुरु की निन्दा को न सुने ॥ ३८ ॥
पन्था देयो ब्राह्मणानां राज्ञो दुःखातुरस्य च । विद्याधिकस्य गुर्विण्या भारार्त्तस्य यवीयसः ॥ ३६ ॥
ब्राह्मणों को, राजा को तथा दुःख से आतुरों को, और अपने से अधिक विद्वान को, गर्भवती स्त्री को, वोझ से लदे हुए को तथा अपने से श्रेष्ठ को मार्ग छोड़ दे ||३६|| मूकान्धवधिराणांच मत्तस्योन्मत्तकस्य च । पुंश्चल्याः कृतवैरस्य बालस्य पतितस्य च ॥४०॥
सूक, अन्धे, बहिरे, मतवाले और विक्षिप्ततथा पुंश्चली स्त्री, वैरी, वालक और पतित के लिये भी रास्ता छोड़ देना चाहिये ||४०||
देवालयं चैत्यतरु तथैव च चतुष्पथम् । विद्याधिकं गुरुं देवं बुधः कुर्य्यात् प्रदक्षिणम् ॥ ४१।।
वुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि देवालय, देववृक्ष, गाय, अपने से अधिक विद्या वाले, गुरु और देवता की परिक्रमा करे ॥४१॥ उपानद्वस्त्रमाल्यादि धृतमन्यैन धारयेत् ।| उपवीतमलङ्कारं करकंचैव वर्ज्जयेत् ॥४२॥||
जो जूता, वस्त्र, माला आदि दूसरे का पहना हुआ हो उसको धारण नं करे इसी प्रकार जनेऊ, गहने और करवा भीदूसरे के वर्जित हैं ॥ ४२ ॥
चतुर्दश्यां तथाष्टम्यां पंचदश्यांच पर्व्वसु । तैलाभ्यङ्ग तथा भोगं योषितश्च विवर्जयेत् ॥ ४३।।
चौदस, मी र श्रमावस तथा अन्य पर्वों पर श्रद्धों में तेल लगाना और स्त्री के साथ मैथुन करना वर्जित है ॥ ४३ ॥
न क्षिप्तपादजङ्घश्च प्राज्ञस्तिष्ठेत् कदाचन । न चापि विक्षिपेत् पादौ पाद पादेन नाक्रमेत् ॥ ४४॥
बुद्धिमान मनुष्य कभी बैठकर पाँव और जाँघ न हिलावें तथा दोनों पाँवों को न हिलानें और पाँत्र को पाँव पर न रक्खे ॥ ४४ ॥
मम्र्माभिघातमाक्रोशं पैशुन्यंच विवर्जयेत् । दम्भाभिमान तीक्ष्णानि न कुर्वीत विचक्षणः ॥ ४५ ॥
मर्मस्थान में श्राघात करना, वृथा शाप देना और चुगली करना, यह वर्जित हैं । दम्भ, अभिमान तथा कठोरता कभी बुद्धिमान् को करना उचित नहीं ॥ ४५ ॥ मूर्खोन्मत्तव्यसनिनो विरूपान् मायिनस्तथा ।
न्यूनाङ्गांश्चाधिकाङ्गांश्च नो हासैर्विदूषयेत् ||४६ ||
मूर्ख, उन्मत्त, व्यसनी, कुरूप, मायावी, तथा न्यूनाङ्ग और अधिकाङ्ग इनको देखकर हंसना नहीं चाहिये तथा इनका दोष भी नहीं बताना चाहिये ॥ ४६ ॥
परस्य दण्डं नोद्वयच्छेच्छिक्षार्थं पुत्र- शिष्ययोः । तद्वन्नोपविशेत् प्राज्ञः पादेनाक्रम्य चासनम् ॥४७॥
अपने पुत्र और शिष्य की शिक्षा के लिये दूसरे को घसीट कर न बैठना चाहिये ॥ ४७ ॥
संयावं कृसरं मांसं नात्मार्थमुपसाधयेत् । सायं प्रातश्च भोक्तव्य कृत्वा चातिथिपूजनम् ॥ ४८ ॥
खीर, खिचड़ी दण्ड नहीं देना चाहिये तथा पाँव से श्रासन को और मांस अपने लिये ही न नावे | सायंकालऔर प्रातःकाल पहिले अतिथि का सत्कार कर फिर स्वयं भोजन करे ॥ ४८ ॥ प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि वाग्यतो दन्तधावनम् । कुन्वीत सततं वत्स वर्जयेद्वर्ण्यवीरुधः ॥४६।
पूर्व मुख अथवा उत्तर मुख होकर दाँतनकरे । तथा हे वत्स ! जिस वृक्ष की दाँतन का निषेध है उस वृक्ष की दाँतन न करे ॥ ४६ ॥
नोदकक्शिराः स्वपेज्जातु न च प्रत्यशिरा नरः ।
शिरस्यगस्त्यमास्थाय शयीताथ पुरन्दरम् ॥५०॥
उत्तर और पश्चिम दिशा में शिर करके न सोवे । सोते समय शिर दक्षिण या पूर्व दिशा में होना चाहिये ॥ ५० ॥
न तु गन्धवतीष्वप्सु स्नायीत न तथा निशि । उपरागे परं स्नानमृते दिनमुदाहृतम् ॥५१॥
दुर्गन्धित जल में के मरनेपर और चन्द्रग्रहण में रात्रि में स्नान करना तथा रात्रि में स्नान न करना चाहिये' परन्तु किसी चाहिये ॥ ५१ ॥
अपमृज्यान्न चास्नातो गात्राण्यम्बरपाणिभिः । न चापि धूनयेत् केशान् वाससी. न च धूनयेत् ॥ ५२ ॥
उपरोक्त दशामें स्नान करने पर शरीर को पोंछना नहीं चाहिये । विना स्नान किये वालों और वस्त्रों को न धोना चाहिये ॥ ५२ ॥
नानुलेपनमादद्यादस्नातः कर्हिचिद्वबुधः । न चापि रक्तवासाः स्याच्चित्रासितधरोऽपि वा ॥ ५३ ॥
विना स्नान किये बुद्धिमान् मनुष्य चन्दन न लगावे । लाल और रङ्गविरङ्गा कपड़ा न पहिने ॥ ५३ ॥
न च कुर्य्याद्विपर्य्यासं वाससोर्नापि भूषणे । वच्चर्य'श्च विदशं वस्त्रमत्यन्तोपहतंच यत् ॥ ५४
कोई श्रा- भूषण वस्त्र के ऊपर न पहिने तथा फटा पुराना और मुलीन वस्त्र पहनना वर्जित है ॥ ५४ ॥
केशकीटावपन्नंच क्षुराणं श्वभिरवेक्षितम् । अवलीढ़ावपन्नञ्च सारोद्धरणदूषितम् ॥५५॥
जिस वस्तु में चाल व कीड़े पड़ गये हों, कुत्ते की दृष्टि पड़ गई हो, अथवा मूंठी वस्तु या जिसका अ अनुचित तरीके से निकाला गया हो उन चीज़ों का सेवन न करे ॥ ५५ ॥
पृष्ठमांसं वृथामांसं वच्छय मांसंच पुत्रक । न भक्षयीत सततं प्रत्यक्षलवरणानि च ॥ ५६ ॥
हे पुत्र ! पीठ का माँस, वृथा मांस तथा वर्जित मांस और प्रत्यक्ष नौन नखाय ॥ ५६ ॥
वच्छ चिरोषितं पुत्र भक्तं पर्य्युपितंच यत् । पिष्टशाकेक्षुपयसां विकारान् नृपनन्दन ॥५७॥
हे पुत्र ! वासी और बहुत देर तक राँधा हुआ भात न खाय । हे राजकुमार ! पिष्ट, शाक, ऊस का वासी रस सेवन न करे ||१७||
तथा मासविकारांश्च ते च वज्यश्चिरोषिताः । उदयास्तमने भानोः शयनंच विवर्जयेत् ॥ ५८ ॥
बहुत देर का खींचा हुया मांस का रस वर्जित है । सूर्योों- दय और सूर्यास्त के समय न सोवे ॥ ५८ ॥
नास्नातो नैव संविष्टो न चैवान्यमना नरः । न चैव शयने नोर्व्यामुपविष्टो न शब्दवत् ||५६।।
विना स्नान किये हुए, श्रन्यमनस्क वैठे हुए, सोते हुए, विना श्रासन पृथ्वी पर बैठे हुए हुए और वोलते हुए भोजन न करे ॥ ५६ ॥
न चैकवस्त्रो न वदन् प्रेक्षतामप्रदाय च । भुञ्जीत पुरुषः स्नातः सायं प्रातर्यथाविधि || ६०
एक वस्त्र पहिने तथा कोई देखता हो तो उसको बिना दिये भोजन न करे । प्रातःकाल और सायंकाल की विधिपूर्वक सन्ध्या करके और स्नान करके भोजन करे ॥ ६० ॥
परदारा न गन्तव्याः पुरुषेण विपश्चिता । । इष्टापूर्त्तायुषां हन्त्री परदारगतिनृणाम् ॥ ६१ ॥
ज्ञानी मनुष्य को चाहिये कि दूसरेकी स्त्री के साथ मैथुन न करे । परस्त्री गमन से पुण्य और श्रायु का क्षय होता है ॥ ६१ ॥
नं हीदृशमनायुष्यं लोके किंचन विद्यते । यादृशं पुरुषस्येह परदाराभिमर्पणम् ॥६२॥
संसार में पुरुष के लिये परस्त्री कार्य नहीं है ॥ ६२॥
देवार्चनामिकारिण तथा गुर्व्वभिवादनम् । कुर्वीत सम्यगाचम्य तद्वदन्नभुजिक्रियाम् ||६३ ||
देवपूजन, हवन तथा गुरु का गमन के समान श्रायु क्षीण करने वाला दूसरा अभिवादन भली भांति श्राचमन करके करे तथा इसी प्रकार भोजन करे ॥ ६३ ॥
अफेनाभिरगन्धाभिरद्भिरच्छाभिरादरात् श्राचामेत् पुत्र पुण्याभिः माङमुखोदङ्मुखोऽपि वा ६४
फेन और दुर्गन्धि रहित जल को श्रादर पूर्वक लेकर उत्तर अथवा पूर्व पुण्य दिशा में मुख करके आचमन करे ॥६४॥
अन्तर्जलादावसथाद्वल्मीकान्मूषिकस्थलात् । कृतशौचावशिष्टाश्च वर्जयेत् पंच वै मृदः ॥ ६५ ॥
में जल के भीतर की मिट्टी, दीमक की लगी मिट्टी तथा मूसे के बिल की मिट्टी और जो मिट्टी किसी ने हाथ धोकर छोड़ दी हो ये पाँच प्रकार की मिट्टी वर्जित है ॥ ६५ ॥
प्रक्षाल्य हस्तौ पादौ च समभ्युक्ष्य समाहितः । अन्तनुस्तथाचामेत् त्रिचतुर्वा पिवेदपः ॥ ६६।।
हाथ और पाँव धोकर स्वस्थ चित्त हो जानु के भीतर हाथ रखकर श्राचमनकरे श्रर्थात् तीन या चार वेर थोड़ा पानी पिये ॥ ६६ ॥
परिमृज्य द्विरास्यान्तं स्वानि मर्द्धानमेव च । सम्यगाचम्य तोयेन क्रियां कुर्व्वीत वै शुचिः ||६७ ||
दो बार मुंह धोकर शिर पर पानी छिड़के अरौ पवित्र होकर भली भांति श्राचमन कर जल से क्रियायें करे ॥६७॥
देवतानामृषीणाञ्च पितृणाञ्चैव यत्नतः । समाहितमना भूत्वा कुब्बत सततं नरः ॥ ६८ ॥
यत्नपूर्वक स्वस्थ चित्त होकर देवताओं, ऋषियों और पितरोंकी निरन्तर क्रियायें करे ॥६८॥
क्षुत्त्वा निष्ठीव्य वासश्व परिधायाच मेद्बुधः । क्षुतेऽवलिट्टे वान्ते च तथा निष्ठीवनादिषु ॥ ६६ ॥
बुद्धिमान् मनुष्य छींक कर अथवा थुक कर कपड़े बदले और आचमन करे । खाँसने, जानवर के चाट लेने और दमन करने में ॥ ६६ ॥
कुर्य्यादाचमनं स्पर्शं गोपृष्ठस्यार्कदर्शनम् । कुव्र्वतालम्बनञ्चापि दक्षिणश्रवणस्य वै ॥७०
गौ को स्पर्श करे और सूर्य का दर्शन करके श्राच मन करे तथा अपना दाहिना कान छूले ॥ ७० ॥ यथाविभवतो तत् पूर्वाभावे ततः परम् । श्रविद्यमाने पूर्वोक्ते उत्तरप्राप्तिरिष्यते ॥७१।।
अपने वैभव के अनुसार ये सब करे । पहिले. कार्य के अभाव में दूसरा कार्य करे और यदि पहिली : कही हुई स्थिति न हो तो बाद में कही दूसरी स्थिति के अनुसार करे ॥ ७१ ॥
न कुर्य्यादन्त संघर्ष नात्मनो देहताड़नम् । स्वमाध्ययनभोज्यानि सन्ध्ययोश्च विवर्जयेत्॥ ७२ ॥
सन्ध्यायां मैथुनञ्चापि तथा पन्थानमेव च ॥ ७३ ॥
दाँतों को न कट- कटाये तथा अपने शरीरपर ताड़न न करे । संध्या वर्जित है ॥ ७२ ॥ सन्ध्या मार्ग समय सोना, अध्ययन करना, तथा भोजन करना चलने का भी निषेध है ॥ ७३ ॥
पूर्वा तात देवानां मनुष्याणाञ्च मध्यमे । भक्त्या तथापराङ्ख े च कुर्व्वीत पितृपूजनम् ॥ ७४।।
हे तात ! पूर्वाह्न में देवताओं का तथा अपराह्न में भक्ति पूर्वक पितरों का पूजन करे ॥ ७४ ॥
शिरः स्नातश्च कुर्वीत दैवं पैन्यमथापि वा । माङ्मुखोदङ्मुखो वापि श्मश्रुकर्म्म च कारयेत् ॥७५॥
देवताओं और पितरों का पूजन शिर से स्नान करके करे और पूर्व मुख: या उत्तर मुख होकर क्षौरकर्म करावे ॥७५॥
व्यङ्गिनीं वर्जयेत् कन्यां कुलजामपि रोगिणीम् । विकृतां पिङ्गलाश्चैव वाचायां सर्व्वदूषिताम् ॥७६॥
जो कन्या. कुलीन हो परन्तु रोगिणी, व्यङ्ग वचन बोलनेवाली विकृत, कर्कशा, अथवा सबसे दूषित हो तो ऐसी कन्या को ग्रहण न करे ॥७६॥
व्यङ्गीं सौम्यनासाश्च सर्व्वलक्षणलक्षिताम् । 'तादृशीमुद्वहेत् कन्यां श्रेयः कामो नरः सदा ॥७७॥
व्यङ्ग वचन न बोलने बाली, सुन्दर नासिका वाली, सब सुन्दर लक्षणों - से युक्त ऐसी कन्या से मनुष्य अपने कल्याण के लिये विवाह करे ॥ ७७ ॥
उद्वहेत् पितृमात्रोश्च सप्तमीं पंचमीं तथा । रक्षेद्दारान् त्यजेदीयां दिवा च स्वप्नमैथने ॥७८॥
पिता से सातवें और माता के पाँचवे सम्बन्ध में विवाह करे । ईर्ष्या छोड़कर स्त्री की रक्षा करे तथा दिन में शयन और मैथुन न करे ||७||
परोपतापकं कर्म्म जन्तुपीड़ाञ्च वर्जयेत् । उदक्या सर्व्ववर्णानां वर्ज्या रात्रिचतुष्टयम् ॥ ७६
दूसरों को क्लेश पहुँचाने वाला. कार्य न करे तथा पशुओं को पीड़ा न पहुँचावे ! है ॥७६॥
स्त्रीजन्मपरिहारार्थं पंचमीमपि वर्जयेत् । ततः पष्ट्यां व्रजेद्राच्यां श्रेष्ठा युग्मासु पुत्रक ||८०||
स्त्री जन्म न पावे इस विचार से रजस्वला रजस्वला स्त्री चार रात्रि तक सब वर्णों में वर्जित से पाँचवें दिन भी मैथुन न करे। हे पुत्र ! छठी रात्रि को स्त्री गमन करना चाहिये ॥ ८० ॥
युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु । तस्माद्युग्मासु पुत्रार्थी संविशेत सदा नरः ।॥ विधम्मिणोऽह्नि पूर्व्वाख्ये सन्ध्याकाले च पण्डूकाः ८१
युग्म रात्रि में स्त्री गमन करने से पुत्र और अयुग्म में कन्या उत्पन्न होती है । इसलिये पुत्र की इच्छा 'रखने वाला मनुष्य युग्म रात्रि में मैथुन करे । इस: से पहिले यानी पाँच रात्रियों में मैथुन करने से विधर्मी और सन्ध्या समय स्त्रीगमन करने से पी- लिया रोग से ग्रसित पुत्र उत्पन्न होता है. ॥ ८१ ॥
क्षरकर्म्मणि वान्ते च स्त्रीसम्भोगे च पुत्रक । स्नायीत चलवान् प्राज्ञः कटभूमिमुपेत्य च ॥ ८२ ॥ ||
हे पुत्र ! हजामत बनवाकर, बमन करके तथा स्त्री सम्भोग करने के उपरान्त बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि वस्त्रों सहित स्नान करे और इसी तरह अशुद्ध भूमि में जाने पर भी स्नान करे ||२||
देव-वेद - द्विजातीनां साधुसत्य महात्मनाम् ।
गुरोः पतिव्रतानाञ्च तथा यज्यतपस्विनाम् ॥८३॥
देवता वेद, ब्राह्मण, सत्यवादी, महात्मा, गुरु, पतिव्रता, यज्ञ-कर्ता, तपस्वी ॥ ८३ ॥
परिवादं न कुर्व्वीत परिहासंच पुत्रक।
कुर्व्वतामविनीतानां न श्रोतव्यं कथंचन ॥ ८४ ॥
हे पुत्र ! इनकी निन्दा परिवादं न कुर्व्वीत परिहासंच पुत्रक । तथा उपहास न करें । तथा कभी इनकी निन्दा:-करने वालों की न सुने ॥ ८४ ॥
नोत्कृष्टशय्यासनयोर्नापकृष्टस्य चारुहेत् ।
न चामङ्गल्यवेशः स्यान्न चामङ्गल्यवाग्भवेत् ॥८५॥
अपने से श्रेष्ठ तथा अपने से नीच की शय्या पर न चढ़े। अपना : श्रमङ्गल वेप न करे तथा श्रमङ्गल वचन न वोले ॥
धवलाम्वरसंवीतः सितपुष्पविभूषितः ।
नोद्धतोन्मत्तमूढैश्च नाविनीतैश्च पण्डितः ॥ ८६ ॥
सफेद वस्त्र पहिने तथा श्वेत माला से अपने को विभूपित करे और उद्धत, उन्मत्त, मूर्ख, दुर्विनीत," पण्डित ॥ ८६ ॥
गच्छेन्मंत्री न चाशीलैर्न च चौय्र्यादिदूषितैः ।
न चातिव्ययशीलैश्च न लुब्धैर्नापि वैरिभिः ॥८७॥
और दुःशील, चोर, फ़िज़ूलखर्च :लोभी और वैरियों से मित्रता न करे ॥ ८७ ॥
न बन्धकीभिर्न न्यूनैर्वन्धकीपतिभिस्तथा ।
सार्द्धं न बलिभिः कुर्य्यान्न च न्यूनैर्न निन्दितैः ८८ ॥
बन्धकी स्त्री और उसके पति से तथा अपने से अधिक चलवान् और कमज़ोर से तथा निंदित पुरुषों से भी मित्रता न करे ॥ ८८ ॥
न सर्व्वशङ्किभिर्नित्यं न च देवपरैर्नरः ॥ ८६ ॥
और सबसे डरने वाले कायर लोगों से भी मित्रता नहीं करनी चाहिये ॥ ८६ ॥
कुव्र्वीत साधुभिमैत्री सदाचारावलम्बिभिः । प्राज्ञेर पिशुनैः शक्तैः कर्म्मण्युद्योगभागिभिः॥ ६० ।।
साधुओं, सदाचार से रहने वालों,विद्वानों, शुभ वचन बोलने वालों, सामर्थ्यवानों और कर्मवीर उद्योगी लोगों से मित्रता करनी चाहिये ॥ ६० ॥
वेदविद्याव्रतस्नातैः सहासीत सदा युधः । सुहृदीक्षित भूपाल - स्नातक- श्वशुरैः सह ॥ ६१
मित्र, दीक्षा प्राप्त मनुष्य, राजा, स्नातक, श्वसुर, ऋत्विक इन छहों में किसी के घर आने पर उनका अर्ध सहित पूजन करे ॥ ६१ ॥
ऋत्विगादीन पड़र्याहनिच्चयेच्च गृहागतान् ।
यथा विभवतः पुत्र द्विजान् संवत्सरोषितान् ||२|||
हे पुत्र ! वर्ष दिन के व्रती ब्राह्मणों का मधुपर्क श्रादि से पूजन अपनी शक्ति के अनुसार करना चाहिये ॥६२॥
अर्चयेन्मधुपर्केण यथाकालमतन्द्रितः । तिष्ठेच्च शासने तेषां श्रेयस्कामो द्विजोत्तमः । न च तान् विवदेद्धीमानाक्रुष्टश्वापि तैः सदा ॥६३॥
श्रपने कल्याण की कामना करने वाले मनुष्य को चाहिये कि उनके शासन में रहें तथां उनसे विवाद करके उनका शाप न ले ॥ ६३॥
सम्यग्गृहाच्र्च्चनं कृत्वा यथास्थानमनुक्रमात् । सम्पूजयेत् ततो वहिं दद्याच्चैवाहुतीः क्रमात् ॥ ६४ ॥
अपने घर में यथास्थान देवार्चन करे तथा फिर अनि का पूजन कर उसमें आहुति दे ॥ ६४ ॥ प्रथमां ब्रह्मणे दद्यात् प्रजानां पतये ततः ।
तृतीयाञ्चैव गुझेभ्यः कश्यपाय तथापराम् ||५|||
पहिले आहुति ब्राह्मण को दे, फिर प्रजापति को, तीसरी गुह्यक को तथा फिर कश्यप को याहुति दे ॥ ६५ ॥
ततोऽनुमतये दत्त्वा दद्याद गृहवलिं ततः । पूर्व्वाख्यातं मया यत् तं नित्यकर्म्मक्रियाविधौ ॥ ६६ ॥
फिर पाँचवीं श्राहुति अनुमति को देकर गृह में वलि प्रदान करे और फिर जो नित्यकर्म क्रियाऐं मैंने पहिले कही हैं उनको विधिपूर्वक करे ||१६||
वैश्वदेवं ततः कुर्य्यादवलयस्तत्र मे शृणु । यथास्थानविभागन्तु देवानुद्दिश्य वै पृथक् ॥६७॥
इसके वाद वैश्वदेवकर्म करे और फिर जिस प्रकार यथा स्थान देवताओंका विभाग करके वलि देना चाहिये वह सुनो ॥६७॥
पर्ज्जन्यापोधरित्रीणां दद्याच्च मानके त्रयम् । वायवे च प्रतिदिशं दिग्भ्यः माच्यादितः क्रमात् ।८||
वादल, पृथ्वी और वायु इन तीने को मण्डप में स्थित कर पूजन करे और पूर्व दिश के क्रम से प्रत्येक दिशा में बलि देवे ॥ ६८ ॥
ब्रह्मणे चान्तरीक्षाय सूर्याय च यथाक्रमम् ।
वेश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो विश्वभूतेभ्य एव च ॥ ६६ ॥
तथ यथाक्रम ब्रह्मा, अन्तरिक्ष, सूर्य, विश्वदेवों और विश्वभूतों को बलि प्रदान करे ॥ ६६ ॥
उषसे भूतपतये दद्याच्चोत्तरतस्ततः । स्वधानम इतीत्युक्त्वा पितृभ्यश्चापि दक्षिणे ॥ १००।।
उपस् और भूतपति को उत्तर दिशा में और स्वधानमः यह कहकर पितरोंको दक्षिण दिशामें बलिं देवे ॥१००॥ कृत्वापसव्यं वायव्यां यक्ष्मैतत्तेति भाजनात् । प्रश्नावशेषमिच्छन् वै तोयं दद्याद्यथाविधि ॥ १०१ ॥
श्रपसव्य होकर वर्तन में से बचे हुए अन्न को निकाल कर 'यक्षमैतत्ते' यह कहकर वायुकोण में रक्खे और विधिपूर्वक जलदान करे ॥ १०१ ॥
ततोsनाग्रं समुद्धृत्य हन्तकारोपकल्पनम् । प्रथाविधि यथान्यायं ब्राह्मणायोपपादयेत् ॥१०२॥
इसके अनन्तर आगे रक्खे हुए शश्न को हन्तकार कहकर विधि और न्याय के अनुसार ब्राह्मण को देदे ॥
कुर्य्यात् कर्माणि तीर्थेन स्वेन स्वेन यथाविधि । देवादीनां तथा कुर्य्याद्ब्राह्म्येणाचमनक्रियाम् १०३।
ब्राह्मणों और देवताओं की जिस-जिस कर्म और तीर्थ से पूजा की जाती है उसी से उनको अर्थ्य आदि देना चाहिये ॥ १०३ ॥
अंगुष्ठोत्तरतो रेखा पाणेर्या दक्षिणस्य तु । रतं ब्राहम्यमिति ख्यातं तीर्थमाचमनाय वै। १०४ ॥
अँगूठे के उत्तर की रेखा, जो ब्रह्मतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है और जो दाहिने हाथ की है उसी से श्राचमन करना चाहिये ॥ १०४ ॥
वज्र्जन्यङगुष्ठयोरन्तः पैत्रयं तीर्थमुदाहृतम् । पितृणां तेन तोयादि दद्यान्नान्दीमुखाहते || १०५ ॥
तर्जनी अंगुली और अंगूठे के बीच का स्थान पितृतीर्थ कहलाता है उसी से नान्दी मुख पितरों को छोड़कर अन्य पितरों को जल देना चाहिये ॥ १०५ ॥
अंगुल्यग्रे तथा दैवं तेन देवक्रियाविधिः । तीर्थं कनिष्ठिकामूले कार्यं तेन प्रजापतेः ॥ १०६ ॥
अँगुलियों के आगे का भाग देव- तीर्थ कहलाता है उसी से देवक्रिया करनी चाहिये कनिष्ठिका अंगुली की जड़ प्राजापत्य तीर्थ है जिस से प्राजापत्य कर्म करना चाहिये ॥ १०६ ॥
एवमेभिः सदा तीर्थ देवानां पितृभिः सह । पदा काय्र्याणि कुर्व्वीत नान्यतीर्थेन कर्हिचित १०७॥
इनही तीथों से देवताओं और पितरों की क्रियाये की जानी चाहिये । भिन्न तीर्थों से अन्य क्रियायें न करनी चाहियें ॥१०७॥
ब्राह्म्येणाचमनं शस्तं पित्र्यं पैत्र्येण सर्व्वदा । देवतीर्थेन देवानां प्राजापत्यं निजेन च ॥ १०८ ॥
ब्रह्मतीर्थ से श्राचमन, पितृ तीर्थं से पितृकर्म, देवतीर्थ और प्रजापति तीर्थ से क्रमशः देवकर्म और प्राजापत्यकर्म करने चाहिये ||
नान्दीमुखानां कुर्व्वीत प्राज्ञः पिण्डोदकक्रियाम् । माजापत्येन तीर्थेन यच किंचित् प्रजापतेः ॥ १०६ ॥
वुद्धिमान मनुष्य नान्दीमुख पितरों की क्रिया और प्राजापत्य क्रिया प्राजापत्य तीर्थ से करे ॥ १०६ ॥
युगपज्जलमनिंच बिभृयान्न विचक्षणः ।
गुरुदेवान् प्रति तथा न च पादौ प्रसारयेत् ॥ ११० ॥
चतुर लोग एक साथ अग्नि और जल न ले चल तथा गुरु और देवताओं की ओर पाँच न पसारें ॥
नाचक्षीत धयन्तीं गां जलं नाञ्जलिना पिवेत्॥ ११९॥
दूध देती हुई गाय को न रोके और अञ्जलि से: जल न पीवें ॥ १११ ॥
शौचकालेषु सर्व्वेषु गुरुष्वल्पेषु वा पुनः । न विलम्बेत शौचार्थं न मुखेनानलं धमेत् ॥ ११२ ॥
सव शौचकालों में चाहे वे बड़े से ब्रांच को न फूंके ॥ ११२ ॥
तत्र पुत्र न वस्तव्यं यत्र नास्ति चतुष्टयम् । ऋणप्रदाता वैद्यश्च श्रोत्रियः सजला नदी ॥ ११३
हे पुत्र ! जहाँ यह हों अथवा छोटे, शौच में विलम्व न करे तथा मुख चार न रहते हों वहाँ न रहे (१) ऋणदाता ( २ ) वैद्य (३) पण्डित और (४) जल वाली नदी ॥
जितामित्रो नृपो यत्र बलवान् धर्म्मतत्परः । तत्र नित्यं वसेत् प्राज्ञः कुतः कुनृपतौ सुखम् ॥ ११४॥
जहाँ पर वलवान् और धर्ममें तत्पर राजा हो वहाँ पर बुद्धिमान् सदैव रहे क्योंकि दुष्ट राजाके राज्य सुख कहाँ ॥ ११४॥
यत्रामधृष्यो नृपतिर्यत्र शस्यवती मही । पौराः सुसंयता यत्र सततं न्यायवर्त्तिनः । यंत्रामत्सरिणो लोकास्तत्र वासः सुखोदयः ॥११५॥
जहाँ राजा धर्मात्मा हो और पृथ्वी उपजाऊ हो, जहाँ नागरिक संयमयुक्त तथा न्यायवर्ती हों और जहाँ लोगों में ईर्ष्या न हों वहाँ रहना सुखदायक है ॥ ११५ ॥
अस्मिन् कृषीवला राष्ट्र मायशो नातिभोगिनः । यत्रौषधान्यशेपाणि वसेत् तत्र विचक्षणः ॥ ११६ ॥ जहाँ खेत बहुत हो तथा भोगने वाले कम हों, जहाँ वहुत प्रकार की मैं श्रौषधियाँ हों चतुर मनुष्य वहाँ रहे ॥ ११६ ॥
तत्र पुत्र न वस्तव्यं यत्रैतत् त्रितयं सदा । जिगीषुः पूर्व्ववैरश्च जनश्च सततोत्सवः ॥ ११७ ॥
हे पुत्र ! जहां यह तीन रहते हों वहाँ न रहे ( १ ) अपनी जीत की इच्छा रखने वाले (२) जिनसे पहिले शत्रुता रही हो ( ३ ) तथा जहाँ मनुष्यनित्य उत्सवयुक्त हों ॥ ११७ ॥
वसेन्नित्यं सुशीलेषु सहवासिपु पण्डितः । इत्येतत् कथितं पुत्र मया ते हितकाम्यया ॥ ११८ ॥
परिडत लोग वहाँ ही रहे जहाँ पर रहने वाले सुशील हों । हे पुत्र ! | यह सब मैंने तुम्हारे हित की इच्छा से कहा है ॥
इति श्रीमार्कण्डेय पुराण में अलर्कानुशासन में सदाचार नाम ३४वाँ श्र० समाप्त ।
Summary of chapter 34 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
Unrolling the subtle parchment inside the ring, Alarka reads Madālasā's instruction directing him to abandon attachment to external kingdoms and seek refuge at the lotus feet of Avadhūta Dattātreya. Realizing that true kingship lies over one's own mind, Alarka approaches Dattātreya in the forest, receives supreme Ātmajñāna, and realizes the illusory nature of both kingdom and conquest.